रवि रंजन का आलेख 'चित्र से परे: सविता सिंह की ‘स्त्री की आत्मा और पिकासो’ कविता में प्रतिनिधित्व और आत्मसत्ता'
'चित्र से परे: सविता सिंह की ‘स्त्री की आत्मा और पिकासो’ कविता में प्रतिनिधित्व और आत्मसत्ता'
रवि रंजन
हिंदी की समकालीन कविता को अपनी मौलिक दार्शनिक दृष्टि से समृद्ध करने वाली कवयित्री सविता सिंह का काव्य संसार अपनी अलग पहचान रखता है। उनकी कविताएँ स्त्री को पारंपरिक परिभाषाओं के सीमित दायरे से बाहर निकालती हैं और उसके सामने सोचने, समझने तथा अपने अस्तित्व को पहचानने के लिए एक नयी खिड़की खोलती हैं।
उनके कविता संग्रहों में स्त्री चेतना के कई रूप देखने को मिलते हैं। ‘अपने जैसा जीवन’, ‘स्वप्न समय’ और ‘नींद थी और रात थी’ जैसे संग्रहों में वे केवल विरोध दर्ज नहीं करतीं, बल्कि स्त्री के अस्तित्व को समझने और उसकी स्वतंत्र पहचान के लिए नये विचार सामने रखती हैं। वहीं, ‘खोई हुई चीज़ों का शोक’, ‘प्रेम भी एक यातना है’ और ‘वासना एक नदी का नाम है’ जैसी कृतियों से पता चलता है कि उनकी कविताएँ सिर्फ़ विरोध तक सीमित नहीं हैं। वे प्रेम, इच्छा, स्मृति, पीड़ा और आत्मबोध जैसे अनुभवों को भी गहराई से समझने की कोशिश करती हैं।
सविता सिंह अपने भीतर की दुनिया, भाषा की ताकत, चुप्पी के अनकहे अर्थों और समय के लगातार बदलते स्वभाव से गहरा जुड़ाव रखती हैं। उनकी कविताओं में संवेदना की गहराई और जीवन से जुड़ी दृष्टि साथ-साथ चलती हैं। यही उनके लेखन की असली ताकत है।
मनुष्य को देखना, समझना और उसकी अनुभूतियों को शब्दों या दूसरे कलात्मक रूपों में व्यक्त करना मानव सभ्यता की पुरानी बौद्धिक और कलात्मक कोशिशों में से एक है। कला, साहित्य, दर्शन और इतिहास, सभी अपने-अपने ढंग से मनुष्य के अनुभवों को अर्थ देने और उसके अस्तित्व को समझने का प्रयास करते रहे हैं। लेकिन इस कोशिश के साथ एक बुनियादी सवाल भी जुड़ा रहा है। क्या किसी मनुष्य का चित्र या वर्णन उसके वास्तविक अस्तित्व को भी सामने ला पाता है? क्या किसी व्यक्ति की छवि या उसके बारे में गढ़ी गई सांस्कृतिक कहानी उसके पूरे व्यक्तित्व को व्यक्त कर सकती है? या फिर हर तरह का चित्रण और वर्णन अपने विषय से कुछ दूरी बनाए रखता है, जिसे पूरी तरह मिटाना संभव नहीं है?
स्त्री के मामले में यह सवाल और पेचीदा हो जाता है। कला के इतिहास में स्त्री को खूब चित्रित किया गया है, उसके बारे में लिखा गया है और उसकी अलग-अलग व्याख्याएँ की गई हैं। वह सौंदर्य, प्रेम, रहस्य, करुणा, इच्छा, मातृत्व और प्रेरणा जैसे अनेक सांस्कृतिक रूपों में सामने आती रही है। लेकिन इतनी व्यापक मौजूदगी के बावजूद एक सवाल बना रहता है। कला में दिखाई देने वाली स्त्री क्या सचमुच स्त्री है, या वह स्त्री की एक गढ़ी हुई छवि भर है? दूसरे शब्दों में, क्या चित्र में दिखाई देने वाली स्त्री और अपने जीवन को जीने वाली स्त्री एक ही हैं? यह सवाल केवल स्त्री को चित्रित करने या उसके बारे में लिखने तक सीमित नहीं है। इसका संबंध मनुष्य की अपनी पहचान, उसकी स्वतंत्रता और उसके उस विशिष्ट अस्तित्व से भी है, जिसकी जगह कोई दूसरा नहीं ले सकता।
सविता सिंह की ‘स्त्री की आत्मा और पिकासो’ कविता इसी बुनियादी दार्शनिक सवाल को केंद्र में रखती है। इस कविता में वे विश्वविख्यात चित्रकार पाब्लो पिकासो की कला के सहारे यह समझने की कोशिश करती हैं कि किसी व्यक्ति की छवि और उसके वास्तविक अस्तित्व के बीच कैसा तनाव बना रहता है। पिकासो आधुनिक चित्रकला के उन कलाकारों में शामिल हैं जिन्होंने चित्र बनाने के पारंपरिक तरीकों को बदल दिया। उन्होंने वस्तुओं और व्यक्तियों को किसी एक कोण से देखने के बजाय उन्हें अलग-अलग कोणों और रूपों में चित्रित किया। उनकी कला ने देखने और दिखाने के पुराने तरीकों पर सवाल उठाए। लेकिन सविता सिंह की कविता इससे आगे बढ़कर पूछती है कि क्या देखने का यह जटिल कलात्मक तरीका किसी मनुष्य की आत्मा तक पहुँचने के लिए काफी है?
कविता का केंद्रीय विचार यह है कि मनुष्य, खासकर स्त्री, किसी भी चित्र या वर्णन से कहीं अधिक व्यापक है। हम उसे चित्रित कर सकते हैं, देख सकते हैं और उसके बारे में लिख सकते हैं, लेकिन इससे हम उसे पूरी तरह जान नहीं लेते। उसका भीतरी संसार किसी छवि, भाषा या कलात्मक रूप में पूरी तरह नहीं समा सकता। यही वजह है कि कविता में स्त्री उन तमाम कोशिशों से बाहर निकलती दिखाई देती है, जो उसे किसी एक अर्थ, तय पहचान या अंतिम रूप में बाँध देना चाहती हैं। वह चित्र में मौजूद होकर भी चित्र से बड़ी है। वह दिखाई देती है, फिर भी उसका पूरा अस्तित्व आँखों के सामने नहीं खुलता। उसके बारे में व्याख्या की जा सकती है, लेकिन इससे उसके हर अनुभव और उसकी पूरी आत्मा को समझ लेने का दावा नहीं किया जा सकता।
इस नज़रिए से देखें तो ‘स्त्री की आत्मा और पिकासो’ केवल पिकासो की चित्रकला पर लिखी गई कविता नहीं है। यह कला और जीवन, छवि और वास्तविकता, ज्ञान और रहस्य तथा देखने और होने के बीच के संबंधों पर भी विचार करती है। कविता हमें सोचने पर मजबूर करती है कि किसी व्यक्ति को देखना और उसे जानना दो अलग बातें हैं। इसी तरह, किसी व्यक्ति का चित्र बना लेना और उसकी आत्मा तक पहुँच जाना भी एक ही बात नहीं है।
सविता सिंह कला की ताकत को नकारती नहीं हैं, लेकिन वे उसकी सीमाओं की ओर भी हमारा ध्यान खींचती हैं। उनका मानना है कि किसी व्यक्ति को चित्र या शब्दों में व्यक्त करने की कोशिश के बावजूद उसके अस्तित्व का एक हिस्सा ऐसा रहता है, जिसे पूरी तरह पकड़ पाना संभव नहीं है। इस तरह कविता मनुष्य की उस स्वतंत्र सत्ता की ओर हमारा ध्यान ले जाती है, जो हर चित्र, हर परिभाषा और हर व्याख्या से आगे बनी रहती है।
प्रस्तुत आलेख में ‘स्त्री की आत्मा और पिकासो’ कविता को इसी नज़रिए से समझने की कोशिश की जाएगी। इसमें यह देखा जाएगा कि यह कविता पिकासो के चित्र में दिखाई देने वाली स्त्री और अपने जीवन को जीने वाली स्त्री के बीच किस तरह का अंतर सामने लाती है। साथ ही, इस दौरान यह भी समझने की कोशिश होगी कि प्रतिनिधित्व और आत्मसत्ता के सवाल कविता में किन वैचारिक, कलात्मक और दार्शनिक रूपों में उभरते हैं। इसके अलावा, हम यह भी देखेंगे कि विवेच्य कविता अपने रचनात्मक अभिप्राय एवं प्रभाव के तहत कला, स्मृति, इतिहास, नैतिकता और स्त्री के अस्तित्व से जुड़े सवालों को आपस में कैसे जोड़ती है और रचना-क्रम में सविता सिंह आधुनिक कला की एक प्रतिष्ठित परंपरा के भीतर मौजूद अंतर्विरोधों को किस संवेदनशीलता और आलोचनात्मक विवेक से सामने लाती हैं।
कविता का मूल पाठ नीचे दिया जा रहा है।
स्त्री की आत्मा और पिकासो
पिकासो की कलाकृतियों की प्रदर्शनी देखने गई
अचानक यूरोप का एक टुकड़ा समय दिखने लगा
अपनी आकृतियों और लकीरों में सिमटा हुआ
यह सबकुछ एक कलाकार की वजह से बचा रहा था
नहीं तो समय खुद को निगलता ही रहता है
पिकासो की राय में स्त्रियाँ मनुष्य की तमाम प्रजातियों में
सबसे क्षणभंगुर होती हैं
इसलिए उनके कई चेहरे होते हैं
कलाकृतियों में वे बल्कि कम रहस्यमय दिखती हैं
शायद सुंदर ज्यादा
एक कलाकार के लिए कितना जानलेवा है उनका होना
उनके भीतर के तूफ़ान को महज हवा समझना भारी गलती करने जैसे है
उनके चेहरे को बार-बार देखना होता है
यह सब बताने के लिए
किसी भूल की गुंजाइश यहाँ चित्र को बिगाड़ने के लिए काफ़ी है
वैसे उनकी सच्ची तस्वीर नहीं बनाई जा सकती
चाहे आप उन्हें नग्न ही क्यों न कर दें अपनी कृति में
वे किसी को नहीं मिलतीं
किसी जाने पहचाने रंग को नहीं हासिल वे
किसी दूसरे की आत्मा में भी नहीं झलकतीं
वे अपने हाथ अपने दोशालों में छिपाकर रखना पसंद करती हैं
यह सब कहते गुनते एक थके बूढ़े कलाकार को मैं देख रही थी
और याद कर रही थी कि उन तमाम यातनाओं को
जो उसने दिए उन स्त्रियों को
जो उनके पास आईं.
-सविता सिंह
‘स्त्री की आत्मा और पिकासो’ कविता पिकासो की चित्रकला, उनकी कलादृष्टि और स्त्रियों के साथ उनके जटिल तथा विवादास्पद संबंधों के बीच एक आलोचनात्मक संवाद रचती है। कविता की शुरुआत एक कला प्रदर्शनी के दृश्य से होती है। वहाँ कवयित्री पिकासो की कृतियों को देखते हुए केवल चित्रों को नहीं देख रही हैं, बल्कि उनके भीतर सुरक्षित एक पूरे ऐतिहासिक समय को भी महसूस कर रही हैं। ‘अचानक यूरोप का एक टुकड़ा समय दिखने लगा’ जैसी पंक्ति बताती है कि कला बीते हुए समय को अपने भीतर सँजोकर रख सकती है। पिकासो की चित्रकला में बीसवीं शताब्दी के यूरोप की उथल-पुथल, आधुनिकता, युद्ध, टूटन और संवेदनात्मक संकटों की झलक मिलती है। इसीलिए कवयित्री कहती हैं, ‘यह सबकुछ एक कलाकार की वजह से बचा रहा था / नहीं तो समय खुद को निगलता ही रहता है।’ यहाँ वे कलाकार की सृजनात्मक शक्ति को स्वीकार करती हैं। कलाकार अपनी कला के ज़रिए समय के विनाशकारी प्रभावों के बीच स्मृति को बचाए रखता है।
कविता आगे बढ़ती है तो कवयित्री का ध्यान पिकासो की स्त्री संबंधी दृष्टि पर जाता है। ‘पिकासो की राय में स्त्रियाँ मनुष्य की तमाम प्रजातियों में / सबसे क्षणभंगुर होती हैं / इसलिए उनके कई चेहरे होते हैं।’ ये पंक्तियाँ पिकासो की चित्रशैली और उनके स्त्री चित्रण की ओर संकेत करती हैं। ‘क्यूबिज़्म’ या ‘घनवाद’ आधुनिक चित्रकला का वह आंदोलन है, जिसमें किसी वस्तु या व्यक्ति को एक ही नज़रिए से देखने के बजाय उसके कई रूपों और कोणों को एक साथ दिखाने की कोशिश की जाती है। पिकासो के स्त्री विषयक चित्रों में चेहरे टूटे हुए, विभाजित और कई कोणों से बने दिखाई देते हैं। कविता इस शैली को केवल कलात्मक प्रयोग के रूप में नहीं देखती, बल्कि इसके ज़रिए स्त्री को समझने की कलाकार की कोशिश पर भी विचार करती है। स्त्री के ‘कई चेहरे’ उसकी जटिलता, बदलते स्वभाव और अनिश्चितता के प्रतीक बन जाते हैं।
लेकिन कविता केवल पिकासो की कलात्मक उपलब्धियों की प्रशंसा नहीं करती। वह उनकी दृष्टि की सीमाओं को भी सामने लाती है। ‘कलाकृतियों में वे बल्कि कम रहस्यमय दिखती हैं / शायद सुंदर ज्यादा।’ यह टिप्पणी कविता के विचार को समझने में मदद करती है। पिकासो की कला स्त्री को चित्रित तो करती है, लेकिन क्या वह उसके भीतर की जटिलता, उसकी आत्मा और उसके अनकहे अनुभवों को भी पूरी तरह सामने ला पाती है? कवयित्री को लगता है कि चित्रों में स्त्री का सौंदर्य अधिक उभरकर आता है, जबकि उसका रहस्य पीछे छूट जाता है। यहाँ वे उस पुरुष दृष्टि पर सवाल उठाती हैं, जो स्त्री को देखने, समझने और चित्रित करने का दावा करती है, लेकिन कई बार उसे एक कलात्मक वस्तु तक सीमित कर देती है।
‘एक कलाकार के लिए कितना जानलेवा है उनका होना / उनके भीतर के तूफ़ान को महज हवा समझना भारी गलती करने जैसे है।’ ━इन पंक्तियों में कवयित्री स्त्री की भीतरी शक्ति और उसके अनुभवों की गहराई की ओर हमारा ध्यान खींचती हैं। पिकासो की कला में स्त्री बार बार दिखाई देती है, लेकिन उसे चित्रित करना और उसके भीतर चल रही उथल पुथल को समझना दो अलग बातें हैं। स्त्री के अनुभवों को सतही नज़र से देखना और उसके भीतर उठने वाले तूफ़ान को मामूली हवा समझ लेना एक बड़ी भूल है। यह बात केवल पिकासो पर लागू नहीं होती। इसके ज़रिए कवयित्री उस पुरुष प्रधान कलात्मक परंपरा पर भी सवाल उठाती हैं, जिसने स्त्री को अक्सर सौंदर्य, प्रेरणा या इच्छा की वस्तु माना, लेकिन उसकी स्वतंत्र चेतना और अपने अनुभवों को समझने की क्षमता को पर्याप्त जगह नहीं दी।
‘उनके चेहरे को बार बार देखना होता है।’━ यह काव्यपंक्ति पिकासो की रचना प्रक्रिया की याद दिलाती है। उनकी चित्रकला में एक ही आकृति को कई कोणों से देखने और प्रस्तुत करने का प्रयास दिखाई देता है। लेकिन कविता में इस पंक्ति का अर्थ इससे आगे जाता है। स्त्री को समझने के लिए उसे बार बार देखना ज़रूरी है। उसके बदलते अनुभवों, भावनाओं और विचारों को पहचानना भी ज़रूरी है। फिर भी उसे पूरी तरह जान लेने का दावा नहीं किया जा सकता, क्योंकि ‘उनकी सच्ची तस्वीर नहीं बनाई जा सकती।’ यहाँ कविता एक बुनियादी दार्शनिक सवाल उठाती है। क्या किसी मनुष्य, खासकर स्त्री, के भीतर की दुनिया को पूरी तरह किसी दृश्य रूप में उतारा जा सकता है? कवयित्री का संकेत है कि ऐसा संभव नहीं है। चित्र किसी व्यक्ति के रूप को सामने ला सकता है, लेकिन उसके पूरे अस्तित्व को अपने भीतर नहीं समेट सकता।
‘चाहे आप उन्हें नग्न ही क्यों न कर दें अपनी कृति में।’ यह पंक्ति खास तौर पर ध्यान खींचती है। पिकासो सहित पश्चिमी कला की परंपरा में स्त्री का नग्न शरीर चित्रकला का एक प्रमुख विषय रहा है। लेकिन कवयित्री का कहना है कि शरीर को पूरी तरह अनावृत कर देने से भी उसकी आत्मा तक पहुँचना संभव नहीं होता। नग्नता को सत्य का पर्याय नहीं माना जा सकता। स्त्री का अस्तित्व उसके शरीर तक सीमित नहीं है। उसके विचार, अनुभव, इच्छाएँ, स्मृतियाँ और भावनाएँ भी उसकी पहचान का हिस्सा हैं। यहाँ कविता स्त्रीवादी आलोचना के उस विचार से जुड़ती है, जो स्त्री को केवल उसके शारीरिक रूप के आधार पर समझने का विरोध करता है।
‘वे किसी को नहीं मिलतीं / किसी जाने पहचाने रंग को नहीं हासिल वे / किसी दूसरे की आत्मा में भी नहीं झलकतीं।’━ इन पंक्तियों में स्त्री की स्वतंत्रता और उसके अपने अस्तित्व पर ज़ोर दिया गया है। स्त्री किसी एक रंग, रूप, परिभाषा या संबंध में पूरी तरह नहीं समा सकती। वह किसी दूसरे की आत्मा का प्रतिबिंब भी नहीं है। यह विचार उस पुरुषवादी धारणा का विरोध करता है, जिसमें स्त्री को पुरुष की पूरक या उसके व्यक्तित्व के विस्तार के रूप में देखा जाता रहा है। कविता स्त्री को एक स्वतंत्र मनुष्य के रूप में सामने लाती है, जिसकी अपनी पहचान है और जिसका भीतरी संसार किसी दूसरे की समझ या कल्पना पर निर्भर नहीं करता। उसकी आत्मा को पूरी तरह जान लेने का दावा कोई नहीं कर सकता।
‘वे अपने हाथ अपने दोशालों में छिपाकर रखना पसंद करती हैं।’━ यह एक सूक्ष्म और अर्थपूर्ण बिंब है। हाथों का संबंध काम करने, अपनी इच्छा के अनुसार कुछ करने और अपने विचारों को व्यवहार में लाने से है। जब स्त्री अपने हाथ दोशाले में छिपाकर रखती है, तो यह बिंब उसके भीतरी संसार की ओर संकेत करता है। वह अपने अस्तित्व के कुछ हिस्सों को अपने तक सुरक्षित रखना चाहती है। हर बात को दूसरों के सामने खोल देना या अपनी पूरी पहचान किसी दूसरे की समझ के हवाले कर देना उसके लिए ज़रूरी नहीं है। इस अर्थ में उसका रहस्य उसकी कमजोरी नहीं, बल्कि अपनी स्वतंत्रता और अपने ऊपर अपने अधिकार को बचाए रखने का संकेत है।
कविता के अंतिम हिस्से में कवयित्री का ध्यान पिकासो के निजी जीवन की ओर जाता है। ‘यह सब कहते गुनते एक थके बूढ़े कलाकार को मैं देख रही थी।’ यहाँ वे कलाकार की प्रतिभा और उसकी मानवीय सीमाओं को एक साथ देखती हैं। उम्र बढ़ने के बावजूद पिकासो की कला का प्रभाव बना रहता है, लेकिन कवयित्री की स्मृति केवल उनकी कलात्मक उपलब्धियों तक सीमित नहीं रहती। उन्हें ‘उन तमाम यातनाओं’ की भी याद आती है, ‘जो उसने दिए उन स्त्रियों को / जो उनके पास आईं।’ कविता का यह अंत उसकी आलोचनात्मक दिशा को साफ़ कर देता है। अब सवाल केवल यह नहीं रह जाता कि पिकासो ने स्त्री को अपनी कला में किस तरह चित्रित किया, बल्कि यह भी हो जाता है कि वास्तविक जीवन में स्त्रियों के साथ उनका व्यवहार कैसा था।
पिकासो के जीवन में फ़र्नांद ओलिविए (Fernande Olivier), ओल्गा खोखलोवा (Olga Khokhlova), मैरी थेरेज़ वाल्टर (Marie-Thérèse Walter), डोरा मार (Dora Maar), फ़्रांस्वाज़ जिलो (Françoise Gilot) और जैकलीन रोक (Jacqueline Roque) जैसी कई स्त्रियाँ आईं। उनके संबंधों में प्रेम और लगाव के साथ नियंत्रण, मानसिक हिंसा और भावनात्मक शोषण के आरोप भी जुड़े रहे हैं। कविता इन संबंधों को कला की चर्चा से जोड़कर एक ज़रूरी सवाल उठाती है। जो कलाकार स्त्री के इतने सारे चेहरे बना सकता था, क्या वह उसके दुःख, उसकी स्वतंत्रता और उसकी मनुष्यता को भी समझ पाया था? स्त्री को चित्रित करने की क्षमता और उसके साथ एक स्वतंत्र मनुष्य की तरह व्यवहार करने की क्षमता क्या एक ही बात है? इस तरह कविता कलाकार की रचनात्मक प्रतिभा और उसके नैतिक आचरण के बीच मौजूद तनाव को सामने लाती है।
पूरी कविता में सविता सिंह का रवैया न तो पिकासो की कला का एकतरफ़ा महिमामंडन करता है और न ही उनकी उपलब्धियों को पूरी तरह खारिज करता है। वे उनकी चित्रकला की शक्ति, आधुनिक चित्रभाषा और समय को कला में सँजोने की क्षमता को स्वीकार करती हैं। लेकिन साथ ही यह भी दिखाती हैं कि स्त्री की आत्मा किसी बड़े कलाकार की पकड़ से बाहर रह सकती है। पिकासो की चित्रकला में स्त्री के कई चेहरे हैं, फिर भी उसका भीतरी संसार पूरी तरह सामने नहीं आता। कविता का एक अहम विचार यह है कि स्त्री को देखने, चित्रित करने और उसके बारे में जानने की कोशिशों के बावजूद उसकी स्वतंत्रता और उसके अस्तित्व की जटिलता बनी रहती है। कोई कलाकार अपनी कृति में स्त्री को कितना ही जीवंत क्यों न बना दे, वह उसके पूरे जीवन और अनुभवों का स्थान नहीं ले सकती।
यह कविता कई स्तरों पर विचार करने का अवसर देती है। इसमें कला, इतिहास, स्त्री, स्मृति, प्रतिनिधित्व और नैतिकता के सवाल एक दूसरे से जुड़ते हैं। इसीलिए इसके मूल पाठ पर अलग अलग आलोचनात्मक और सामाजिक दार्शनिक दृष्टियों से चर्चा की जा सकती है।
स्त्रीवादी आलोचना का एक बुनियादी आग्रह यह रहा है कि स्त्री को साहित्य, कला और संस्कृति में केवल एक विषय के रूप में न देखा जाए। यह भी पूछा जाए कि उसे किसकी नज़र से दिखाया जा रहा है और उस प्रस्तुति में सत्ता के संबंध किस तरह काम करते हैं। सिमोन द बोउवार ने अपनी चर्चित पुस्तक ‘द सेकंड सेक्स’ में बताया था कि पुरुष प्रधान समाज स्त्री को अक्सर ‘अन्य’ (Other) के रूप में देखता है। पुरुष को सामान्य और केंद्रीय मनुष्य मान लिया जाता है, जबकि स्त्री की पहचान पुरुष के संदर्भ में तय की जाती है। बाद की स्त्रीवादी आलोचना ने इस सवाल को आगे बढ़ाते हुए दिखाया कि कला और साहित्य में स्त्री की मौजूदगी कई बार उसके अपने अनुभवों को सामने नहीं लाती। इसके बजाय वह पुरुष की कल्पना, इच्छा, भय और सांस्कृतिक धारणाओं से बनी छवि के रूप में दिखाई देती है। इसी संदर्भ में ‘पुरुष दृष्टि’ (male gaze) की अवधारणा सामने आई। इसके अनुसार, देखने और किसी को अर्थ देने की ताकत अक्सर पुरुष के पास रहती है, जबकि स्त्री को देखने योग्य वस्तु बना दिया जाता है।
इस सैद्धांतिक पृष्ठभूमि में ‘स्त्री की आत्मा और पिकासो’ कविता ख़ास तौर से ध्यान खींचती है। कविता का बुनियादी सवाल यह नहीं है कि पिकासो ने स्त्रियों के कितने चित्र बनाए या उनकी चित्रभाषा कितनी नयी थी। सवाल यह है कि क्या किसी स्त्री को चित्रित कर देने भर से उसकी आत्मा तक पहुँचा जा सकता है। कविता कला और जीवन, चित्र और व्यक्ति तथा दिखाई देने वाले रूप और भीतरी अस्तित्व के बीच की दूरी को सामने लाती है। वह इस धारणा को स्वीकार नहीं करती कि किसी मनुष्य की तस्वीर या कलात्मक प्रस्तुति उसके पूरे सच को व्यक्त कर सकती है।
कविता की शुरुआत पिकासो की कलात्मक उपलब्धियों को स्वीकार करने से होती है। प्रदर्शनी में खड़ी कविता की प्रोटागोनिस्ट को पिकासो की कृतियों में यूरोप के एक ऐतिहासिक दौर की झलक दिखाई देती है। यहाँ पिकासो ऐसे कलाकार के रूप में सामने आते हैं, जो अपनी कला में बीते समय को सँजोते हैं। यह बात ध्यान देने योग्य है, क्योंकि कवयित्री का आलोचनात्मक नज़रिया किसी पूर्वनिर्धारित धारणा पर आधारित नहीं है। वे पहले कलाकार की रचनात्मक क्षमता को पहचानती हैं और फिर उसकी सीमाओं पर विचार करती हैं। पिकासो की कला के योगदान को स्वीकार करने के बावजूद वे उनके निजी जीवन और स्त्रियों के प्रति उनके व्यवहार से जुड़े सवालों को अनदेखा नहीं करतीं।
इसके बाद कविता का केंद्र स्त्री बन जाती है। ‘स्त्रियाँ सबसे क्षणभंगुर होती हैं, इसलिए उनके कई चेहरे होते हैं।’ यह कथन पिकासो की चित्रशैली की ओर संकेत करता है, लेकिन इसका अर्थ केवल चित्रकला तक सीमित नहीं है। इसमें स्त्री की बहुलता, उसके बदलते अनुभवों और उसकी जटिलता का बोध भी शामिल है। स्त्री को किसी एक पहचान में बाँधना संभव नहीं है। उसके विचार, इच्छाएँ और अनुभव समय के साथ बदलते हैं। वह अलग अलग परिस्थितियों में अपने अस्तित्व के अलग पहलुओं को सामने ला सकती है। लेकिन कविता यह भी बताती है कि स्त्री के इन अनेक रूपों को चित्रित कर पाना और उसे सचमुच समझ लेना दो अलग बातें हैं।
‘कलाकृतियों में वे बल्कि कम रहस्यमय दिखती हैं / शायद सुंदर ज्यादा।’ यह कविता की केंद्रीय टिप्पणियों में से एक है। यहाँ सौंदर्य और रहस्य के बीच तनाव दिखाई देता है। कविता का संकेत है कि कला कभी कभी अपने विषय को इस तरह प्रस्तुत करती है कि उसकी जटिलता एक आकर्षक दृश्य रूप में बदल जाती है। जो स्त्री अपने भीतर अनेक अनुभव, विरोधाभास और अनकही बातें सँजोए हुए है, वह चित्र में मुख्य रूप से सौंदर्य की वस्तु बनकर रह जाती है। उसकी छवि सामने आ जाती है, लेकिन उसके जीवन की पूरी जटिलता पीछे छूट सकती है। यह टिप्पणी केवल पिकासो की कला तक सीमित नहीं है। इसके ज़रिए कवयित्री उस व्यापक कलात्मक परंपरा पर भी सवाल उठाती हैं, जिसमें स्त्री का चित्र तो सामने आता है, लेकिन उसके अपने अनुभव और उसकी स्वतंत्र आवाज़ कई बार उस चित्र के पीछे छिप जाते हैं।
कविता स्त्री को निष्क्रिय उपस्थिति के रूप में नहीं देखती। ‘उनके भीतर के तूफ़ान’ का उल्लेख बताता है कि स्त्री का भीतरी संसार अपनी तीव्रता और जटिलता में एक स्वतंत्र यथार्थ है। उसके अनुभवों को सतही ढंग से समझना या उनकी गंभीरता को कम करके आँकना बौद्धिक और नैतिक, दोनों स्तरों पर एक भूल है। यहाँ सविता सिंह स्त्री के अनुभवों को गंभीरता से लेने की माँग करती हैं। वे यह भी संकेत करती हैं कि स्त्री को समझने के लिए उसके बाहरी रूप को देख लेना काफ़ी नहीं है। उसके भीतर चलने वाले विचारों, भावनाओं और संघर्षों को समझना भी ज़रूरी है।
प्रतिनिधित्व का सवाल कविता में बार-बार सामने आता है। ‘उनकी सच्ची तस्वीर नहीं बनाई जा सकती’ केवल स्त्री के बारे में कही गई बात नहीं है। यह कला की सीमाओं की ओर भी इशारा करती है। मनुष्य का भीतरी जीवन किसी भी दृश्य रूप से बड़ा होता है। कोई चित्र उसके चेहरे, शरीर और बाहरी हावभाव को सामने ला सकता है, लेकिन उसके अनुभवों और भावनाओं को पूरी तरह व्यक्त नहीं कर सकता। इसीलिए नग्नता भी सत्य की गारंटी नहीं बनती। शरीर को पूरी तरह दिखा देने पर भी व्यक्ति की आत्मा अनकही रह सकती है। कविता उस धारणा पर सवाल उठाती है जो किसी को पूरी तरह सामने ला देने को उसे गहराई से जान लेने के बराबर मानती है।
इस संदर्भ में लौरा मल्वी (Laura Mulvey) की ‘मेल गेज़’ (Male Gaze) की अवधारणा के तहत विवेच्य कविता को समझना उपयोगी होगा। मल्वी ने अपने चर्चित निबंध ‘विजुअल प्लेज़र एंड नैरेटिव सिनेमा’ (Visual Pleasure and Narrative Cinema, 1975) में मुख्यधारा के सिनेमा में काम करने वाली पुरुष दृष्टि की पड़ताल की थी। उन्होंने बताया कि सिनेमा में कैमरे की नज़र, कहानी कहने का ढंग और दर्शक की स्थिति अक्सर इस तरह बनती है कि पुरुष देखने वाले की भूमिका में रहता है और स्त्री देखने योग्य वस्तु बन जाती है। इस प्रक्रिया में स्त्री की छवि पुरुष की इच्छा और कल्पना के अनुसार आकार ले सकती है। मल्वी का विश्लेषण मुख्य रूप से सिनेमा पर केंद्रित है, लेकिन उनकी अवधारणा के सहारे चित्रकला और साहित्य में स्त्री के चित्रण को भी समझा जा सकता है।
‘स्त्री की आत्मा और पिकासो’ में सविता सिंह इसी तरह के सवाल को चित्रकला के संदर्भ में उठाती हैं। कविता की शुरुआत एक कला प्रदर्शनी में पिकासो की कृतियों को देखती कवयित्री से होती है। वे चित्रों में केवल आकृतियाँ नहीं देखतीं, बल्कि उनके भीतर सुरक्षित यूरोप के एक ऐतिहासिक समय को भी महसूस करती हैं। इस तरह कविता पिकासो की कलात्मक उपलब्धि को स्वीकार करती है। लेकिन जैसे ही कवयित्री का ध्यान स्त्री चित्रण की ओर जाता है, कला की सीमाओं का सवाल भी सामने आने लगता है। यहाँ कई दृष्टियाँ एक साथ काम करती हैं। पिकासो स्त्रियों को देखते हैं, उनकी दृष्टि चित्रों में रूप लेती है और फिर कवयित्री उन चित्रों को देखती हैं। लेकिन वे केवल दर्शक बनकर नहीं रहतीं। वे उस नज़र को भी परखती हैं जिसके सहारे कलाकार ने स्त्री को चित्रित किया है। इस तरह कविता चित्रों के साथ-साथ चित्रों के पीछे काम कर रहे नज़रिए की भी पड़ताल करती है।
'पिकासो की राय में स्त्रियाँ मनुष्य की तमाम प्रजातियों में / सबसे क्षणभंगुर होती हैं / इसलिए उनके कई चेहरे होते हैं।' - इन पंक्तियों में स्त्री के बारे में पिकासो की राय सामने आती है। यहाँ स्त्री स्वयं अपने बारे में कुछ नहीं कहती। उसके स्वभाव और अस्तित्व को समझने की कोशिश एक पुरुष कलाकार की दृष्टि से होती है। मल्वी की अवधारणा के संदर्भ में यह बात ध्यान देने योग्य है, क्योंकि स्त्री के बारे में अर्थ तय करने की ताकत यहाँ पुरुष के पास दिखाई देती है। स्त्री की अपनी आवाज़ और उसके अनुभव इस प्रक्रिया में पीछे छूट सकते हैं। कविता इस राय का सीधे खंडन नहीं करती, लेकिन आगे बढ़ते हुए उसकी सीमाओं को सामने लाती है। स्त्री के बारे में कही गई बात और उसके वास्तविक अस्तित्व के बीच का अंतर धीरे-धीरे स्पष्ट होता जाता है।
पिकासो की चित्रकला में स्त्री के कई चेहरे दिखाई देते हैं। घनवाद या क्यूबिज़्म में एक ही आकृति को अलग-अलग कोणों और रूपों में प्रस्तुत करने की कोशिश की जाती है। लेकिन सविता सिंह की कविता एक सवाल उठाती है। क्या किसी स्त्री के अनेक चेहरे बना देने से उसे सचमुच समझा जा सकता है? 'कलाकृतियों में वे बल्कि कम रहस्यमय दिखती हैं / शायद सुंदर ज्यादा।'- इस टिप्पणी में कविता की आलोचनात्मक दृष्टि साफ़ दिखाई देती है। स्त्री के कई रूप चित्रित करने के बावजूद क्या कलाकार उसे सौंदर्य की वस्तु तक सीमित कर देता है? क्या चित्र उसकी स्वतंत्र पहचान और अनुभवों को सामने लाता है, या वह देखने वाले की कलात्मक दृष्टि के अनुसार एक आकर्षक छवि बनकर रह जाती है?
मल्वी की 'मेल गेज़' की अवधारणा इस सवाल को समझने में मदद करती है। पुरुष दृष्टि केवल स्त्री को देखने तक सीमित नहीं रहती, बल्कि उसकी छवि को अपने नज़रिए के अनुसार अर्थ भी देती है। स्त्री की दृश्य उपस्थिति इस तरह उसके स्वतंत्र व्यक्तित्व पर हावी हो सकती है। वह चित्र में सुंदर दिखाई देती है, लेकिन उसके अनुभवों, इच्छाओं और संघर्षों को उतनी जगह नहीं मिलती। सविता सिंह की कविता इसी अंतर को सामने लाती है। वह पूछती है कि स्त्री को चित्रित करने की कलात्मक क्षमता क्या उसके भीतरी संसार को समझने की क्षमता भी है।
कविता का आशय यह नहीं है कि स्त्री को चित्रित करना ही गलत है। सवाल यह है कि चित्रण को स्त्री के पूरे अस्तित्व का प्रमाण क्यों मान लिया जाए। 'उनके चेहरे को बार-बार देखना होता है' और 'उनकी सच्ची तस्वीर नहीं बनाई जा सकती' जैसी पंक्तियाँ इसी समस्या को सामने लाती हैं। स्त्री को समझने के लिए उसे बार-बार देखना, उसके बदलते अनुभवों को पहचानना और उसके भीतर चलने वाले संघर्षों पर ध्यान देना ज़रूरी है। फिर भी उसे पूरी तरह जान लेने का दावा नहीं किया जा सकता। उसका चेहरा किसी एक अर्थ में स्थिर नहीं होता। उसके अनुभव, इच्छाएँ और भावनाएँ किसी एक चित्र में पूरी तरह नहीं समा सकतीं। इस तरह कविता उस आत्मविश्वास पर सवाल उठाती है जिसके सहारे देखने वाला अपने विषय के बारे में अंतिम निर्णय दे देता है।
यहाँ प्रतिनिधित्व की बहुलता और समझ की गहराई के बीच का अंतर भी ध्यान देने योग्य है। कोई कलाकार किसी व्यक्ति के जितने चाहे चित्र बना ले, इससे उस व्यक्ति का पूरा अस्तित्व सामने नहीं आ जाता। अनेक चित्र किसी के अलग-अलग रूप दिखा सकते हैं, लेकिन उसके जीवन के हर अनुभव को नहीं पकड़ सकते। पुरुष दृष्टि की समस्या तब पैदा होती है जब देखने वाला अपनी बनाई छवि को ही उस व्यक्ति का पूरा सच मानने लगता है। सविता सिंह की कविता इस दावे को स्वीकार नहीं करती। वह स्त्री के ऐसे अस्तित्व की ओर संकेत करती है जो चित्रों और व्याख्याओं से आगे बना रहता है।
'चाहे आप उन्हें नग्न ही क्यों न कर दें अपनी कृति में।' यह पंक्ति इस सवाल को और स्पष्ट करती है। पश्चिमी चित्रकला की परंपरा में स्त्री का नग्न शरीर लंबे समय से एक प्रमुख विषय रहा है।
लेकिन कवयित्री का संकेत है कि शरीर को पूरी तरह दिखा देने से भी स्त्री की आत्मा तक पहुँचना संभव नहीं होता। नग्नता को सत्य का पर्याय नहीं माना जा सकता। किसी व्यक्ति को देख लेना और उसे जान लेना दो अलग बातें हैं। यहाँ कविता दृश्यता और ज्ञान के बीच के संबंध पर सवाल उठाती है।
मल्वी की अवधारणा के अनुसार, स्त्री का शरीर पुरुष दर्शक के लिए दृश्य सुख का माध्यम बन सकता है। इस स्थिति में स्त्री अपने आप में स्वतंत्र व्यक्ति होने के बजाय देखने वाले की इच्छा और आनंद की वस्तु बन जाती है। सविता सिंह की कविता इस दृष्टि की सीमा सामने लाती है। वह बताती है कि स्त्री के शरीर को पूरी तरह चित्रित कर देने पर भी उसके भीतरी संसार तक पहुँचना संभव नहीं होता। स्त्री का अस्तित्व उसकी दृश्य छवि से बड़ा है। वह केवल देखने की वस्तु नहीं, बल्कि अपने अनुभवों, इच्छाओं और विचारों के साथ एक स्वतंत्र मनुष्य है। इस तरह कविता स्त्री के शरीर को देखने और उसकी आत्मा को समझने के बीच का अंतर स्पष्ट करती है। 'वे किसी को नहीं मिलतीं / किसी जाने पहचाने रंग को नहीं हासिल वे / किसी दूसरे की आत्मा में भी नहीं झलकतीं।' - इन पंक्तियों में स्त्री की स्वतंत्रता का विचार और स्पष्ट होता है। वह किसी एक रंग, तय पहचान या परिभाषा में नहीं समाती। वह किसी दूसरे की आत्मा का प्रतिबिंब भी नहीं है। पुरुष प्रधान कलात्मक परंपरा में स्त्री को कई बार पुरुष की भावनाओं, इच्छाओं और कल्पनाओं का दर्पण बनाकर प्रस्तुत किया गया है। ऐसे चित्रण में स्त्री अपने आप में स्वतंत्र व्यक्ति होने के बजाय पुरुष की आत्माभिव्यक्ति का माध्यम बन जाती है। सविता सिंह इस धारणा को स्वीकार नहीं करतीं। स्त्री का अपना आत्मबोध है और उसका भीतरी संसार किसी दूसरे की कल्पना में पूरी तरह नहीं समा सकता।
यहाँ मल्वी की अवधारणा और कविता के बीच एक स्पष्ट संबंध बनता है। मल्वी बताती हैं कि पुरुष दृष्टि स्त्री को देखने योग्य वस्तु में बदल सकती है, जबकि सविता सिंह की कविता इस प्रक्रिया की सीमा को सामने लाती है। स्त्री को देखने और उसके बारे में अर्थ तय करने की कोशिश के बावजूद उसका स्वतंत्र अस्तित्व बना रहता है। वह किसी पुरुष की इच्छा, कल्पना या भावनाओं में पूरी तरह नहीं समाती। कविता स्त्री को केवल पुरुष दृष्टि की शिकार के रूप में नहीं देखती, बल्कि उसकी उस आंतरिक स्वतंत्रता को भी सामने लाती है जिसे कोई बाहरी दृष्टि पूरी तरह अपने नियंत्रण में नहीं ले सकती।
'किसी जाने पहचाने रंग को नहीं हासिल वे' पंक्ति स्त्री की पहचान को स्थिर करने की सांस्कृतिक कोशिशों पर भी सवाल उठाती है। संस्कृति ने स्त्री की कई परिचित छवियाँ बनाई हैं। कभी वह माँ है, कभी प्रेमिका, कभी प्रेरणा, कभी देवी और कभी सौंदर्य या रहस्य का प्रतीक। इन छवियों के ज़रिए स्त्री के कुछ रूप सामने आते हैं, लेकिन उसका पूरा अस्तित्व व्यक्त नहीं होता। कविता कहती है कि स्त्री किसी एक परिचित रंग में नहीं समाती। उसके अनुभव और उसकी पहचान उन तय प्रतीकों से कहीं आगे जाते हैं। इस तरह कविता उन रूढ़ छवियों को भी चुनौती देती है जिनके सहारे कला और संस्कृति स्त्री को समझने की कोशिश करती रही हैं। 'वे अपने हाथ अपने दोशालों में छिपाकर रखना पसंद करती हैं।'-यह बिंब स्त्री की उस निजता की ओर संकेत करता है जिसे वह अपने तक सुरक्षित रखना चाहती है। हाथों का संबंध काम करने, अपनी इच्छा के अनुसार कुछ करने और अपने विचारों को व्यवहार में लाने से है। उन्हें दोशाले में छिपाकर रखने का बिंब इस बात की ओर भी संकेत करता है कि स्त्री अपने अस्तित्व के कुछ हिस्सों को दूसरों की नज़र से बचाकर रखना चाहती है। हर बात को सामने रखना या अपनी पूरी पहचान किसी दूसरे की समझ के हवाले कर देना उसके लिए ज़रूरी नहीं है। इस अर्थ में अपने भीतर के कुछ हिस्सों को सुरक्षित रखना कमजोरी नहीं, बल्कि अपनी स्वतंत्रता बनाए रखने का एक तरीका है।
कविता का अंतिम हिस्सा इस विमर्श को कला से आगे बढ़ाकर जीवन और नैतिकता के सवालों तक ले जाता है। कवयित्री पिकासो की कलात्मक उपलब्धियों को स्वीकार करते हुए उन स्त्रियों को भी याद करती हैं जो उनके जीवन का हिस्सा रही थीं। यहाँ सवाल केवल यह नहीं है कि पिकासो ने स्त्री को किस तरह चित्रित किया, बल्कि यह भी है कि वास्तविक जीवन में स्त्रियों के साथ उनका व्यवहार कैसा था। कविता कलाकार की प्रतिभा और उसके निजी आचरण के बीच मौजूद तनाव को सामने लाती है।
पिकासो के जीवन में फ़र्नाद ओलिविए (Fernande Olivier), ओल्गा खोखलोवा (Olga Khokhlova), मैरी-थेरेज़ वाल्टर (Marie-Thérèse Walter), डोरा मार (Dora Maar), फ्रांस्वाज़ जिलो (Françoise Gilot) और जैकलीन रोक (Jacqueline Roque) जैसी कई स्त्रियाँ आईं। उनके कुछ संबंधों में नियंत्रण, मानसिक हिंसा और भावनात्मक शोषण के आरोप भी सामने आए हैं। कविता इन स्त्रियों की याद के ज़रिए कलाकार की नैतिक जवाबदेही का सवाल उठाती है। जो कलाकार स्त्री के अनेक चेहरे चित्रित कर सकता था, क्या वह वास्तविक जीवन में स्त्रियों के अनुभवों और स्वतंत्रता का सम्मान भी कर पाया? किसी स्त्री को चित्र में सुंदर, रहस्यमय या बहुआयामी रूप में दिखाना और उसे जीवन में बराबरी का दर्जा देना अलग-अलग बातें हैं।
इस संदर्भ में पुरुष दृष्टि का सवाल एक नया रूप ले लेता है। अब बात केवल चित्रों में स्त्री की छवि तक सीमित नहीं रहती, बल्कि वास्तविक संबंधों तक पहुँच जाती है। स्त्री को कला का विषय बनाना और उसे जीवन में बराबरी के साथ स्वीकार करना एक ही बात नहीं है। कलाकार अपनी कृति में स्त्री को स्वतंत्र और जटिल रूप में प्रस्तुत कर सकता है, लेकिन उसके निजी व्यवहार में वही स्वतंत्रता स्वीकार करना दूसरी बात है। कविता इस अंतर को सामने लाकर कला और नैतिकता के संबंध पर विचार करती है। वह यह संकेत भी देती है कि कलाकार की महानता का मूल्यांकन करते समय उसके निजी जीवन और दूसरे लोगों के साथ उसके व्यवहार को पूरी तरह नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
इस तरह 'स्त्री की आत्मा और पिकासो' को लौरा मल्वी की 'मेल गेज़' की अवधारणा के साथ पढ़ने पर दोनों के बीच एक सार्थक संवाद सामने आता है। मल्वी यह समझने में मदद करती हैं कि कला और संस्कृति में स्त्री को देखने की व्यवस्था किस तरह पुरुष की दृष्टि और इच्छा के अनुसार काम कर सकती है। सविता सिंह की कविता इस व्यवस्था की सीमाओं को उजागर करते हुए बताती है कि स्त्री की आत्मा किसी चित्र, किसी परिभाषा या किसी पुरुष की कल्पना में पूरी तरह नहीं समा सकती। कविता का आग्रह यह नहीं है कि स्त्री को देखा या चित्रित ही न किया जाए, बल्कि यह है कि उसे चित्रित कर देने को उसके पूरे अस्तित्व को जान लेने का प्रमाण न माना जाए।
कविता का एक केंद्रीय विचार यह है कि स्त्री को समझने के लिए उसकी छवि से आगे बढ़ना होगा। उसके अनुभवों, उसकी इच्छाओं, उसकी स्वतंत्रता और उसकी अपनी आवाज़ को भी जगह देनी होगी। कोई चित्र उसके अस्तित्व के कुछ पहलुओं को सामने ला सकता है, लेकिन उसे पूरी तरह परिभाषित नहीं कर सकता। इसी तरह, किसी कलाकार की रचनात्मक उपलब्धि अपने आप उसके नैतिक आचरण का प्रमाण नहीं बन जाती। कला की शक्ति को स्वीकार करते हुए भी उसके भीतर काम करने वाली दृष्टि और सत्ता के संबंधों की जाँच करना ज़रूरी है। सविता सिंह की कविता यही काम करती है। वह पिकासो की कला को खारिज किए बिना उसके स्त्री चित्रण की सीमाओं और कलाकार के निजी जीवन से जुड़े सवालों को सामने लाती है। इस तरह कविता स्त्री के प्रतिनिधित्व, उसकी आत्मसत्ता और कलाकार की नैतिक जवाबदेही को एक साथ रखकर देखने का अवसर देती है।
इस नज़रिए से देखें तो कविता का सबसे बड़ा हस्तक्षेप यह है कि वह स्त्री को केवल देखने की वस्तु नहीं रहने देती, बल्कि उसे एक स्वतंत्र व्यक्तित्व के रूप में सामने लाती है। पिकासो की कला में स्त्री चित्र का विषय है, लेकिन सविता सिंह की कविता में वह ऐसी उपस्थिति बन जाती है जिसके सामने कलाकार की दृष्टि भी सीमित पड़ जाती है। कविता का केंद्र अंततः कलाकार की उपलब्धियाँ नहीं, बल्कि वह भीतरी संसार है जहाँ तक उसकी नज़र नहीं पहुँच पाती। पुरुष दृष्टि की आलोचना का यही गहरा रूप है। स्त्री यहाँ केवल देखी जाने वाली नहीं है, बल्कि वह देखने की पूरी व्यवस्था पर सवाल उठाने वाली स्वतंत्र सत्ता है।
प्रतिनिधित्व (Representation) का सवाल आधुनिक दर्शन, भाषा-विज्ञान, सांस्कृतिक अध्ययन और कला-चिंतन में लंबे समय से चर्चा का विषय रहा है। प्लेटो से लेकर आधुनिक उत्तर-संरचनावादी विचारकों तक यह बहस चलती रही है कि कला और भाषा यथार्थ को किस तरह प्रस्तुत करती हैं। प्लेटो के अनुसार, कला यथार्थ की नकल की नकल है। इस कारण वह मनुष्य को सत्य से दूर भी ले जा सकती है। इसके विपरीत, अरस्तू ने कला को यथार्थ की सृजनात्मक पुनर्रचना के रूप में देखा। आधुनिक काल में फ़र्डिनां द सॉस्यूर (Ferdinand de Saussure) ने बताया कि शब्द और वस्तु के बीच कोई स्वाभाविक संबंध नहीं होता। भाषा में अर्थ संकेतों और उनके आपसी संबंधों से बनता है। मिशेल फूको (Michel Foucault) ने अपनी पुस्तक ‘द ऑर्डर ऑफ थिंग्स’ (The Order of Things) में स्पेनी चित्रकार डिएगो वेलास्केज़ (Diego Velázquez) की प्रसिद्ध पेंटिंग ‘लास मेनिनास’ (Las Meninas) का विश्लेषण करते हुए दिखाया कि प्रतिनिधित्व कोई सीधी और पारदर्शी प्रक्रिया नहीं है। इसमें देखने वाले, दिखाए जाने वाले और देखने की व्यवस्था के बीच जटिल संबंध काम करते हैं। जाक देरिदा (Jacques Derrida) ने अर्थ की स्थिरता पर सवाल उठाते हुए बताया कि कोई भी संकेत अपने अर्थ को पूरी तरह और हमेशा के लिए स्थिर नहीं कर सकता। अर्थ लगातार बदलता और आगे खिसकता रहता है। स्टुअर्ट हॉल (Stuart Hall) ने सांस्कृतिक अध्ययन में इस विचार को आगे बढ़ाया कि प्रतिनिधित्व केवल यथार्थ का प्रतिबिंब नहीं है, बल्कि अर्थ बनाने की एक प्रक्रिया भी है।
इन विचारों के मद्देनज़र प्रतिनिधित्व का सवाल केवल इतना नहीं रह जाता कि किसी व्यक्ति या वस्तु को किस रूप में दिखाया गया है। यह भी देखना पड़ता है कि कोई कलात्मक माध्यम उस व्यक्ति के भीतरी संसार, उसकी जटिलता और उसके जीवन के अनुभवों को किस हद तक व्यक्त कर सकता है। सविता सिंह की कविता ‘स्त्री की आत्मा और पिकासो’ इसी दार्शनिक सवाल से जुड़ती है। वह पूछती है कि किसी स्त्री का चित्र बना देना क्या उसके पूरे अस्तित्व को समझ लेने के बराबर है? क्या कोई कलाकार अपनी कला के सहारे किसी दूसरे मनुष्य की आत्मा तक पहुँच सकता है? कविता इन सवालों का सामना करते हुए कला की शक्ति को स्वीकार करती है, लेकिन उसकी सीमाओं को भी सामने लाती है।
पिकासो आधुनिक चित्रकला के उन प्रभावशाली कलाकारों में हैं जिन्होंने दृश्य यथार्थ को प्रस्तुत करने के पारंपरिक तरीकों को चुनौती दी। उन्होंने वस्तुओं और व्यक्तियों को एक ही कोण से दिखाने के बजाय उनके कई रूपों और कोणों को चित्रों में जगह दी। इस तरह उनकी कला ने प्रतिनिधित्व की पुरानी धारणाओं को बदला। लेकिन सविता सिंह की कविता इससे आगे बढ़कर एक सवाल उठाती है। यदि कोई कलाकार चित्र बनाने के स्तर पर इतनी नयी राह निकाल सकता है, तो क्या वह किसी मनुष्य के भीतरी संसार को भी पूरी तरह व्यक्त कर सकता है? दृश्य रूपों के साथ प्रयोग करने की क्षमता और किसी व्यक्ति की आत्मा को समझने की क्षमता क्या एक ही बात है?
कविता की शुरुआत में पिकासो की कला को समय को सँजोने वाली शक्ति के रूप में देखा गया है। प्रदर्शनी में उपस्थित कवयित्री को उनकी कृतियों में ‘यूरोप का एक टुकड़ा समय’ दिखाई देता है। यह पंक्ति बताती है कि कला बीते समय को अपने भीतर सँजो सकती है। कलाकार अपनी रचना के ज़रिए उन अनुभवों और घटनाओं को बचाए रखता है, जो समय के साथ भुलाए जा सकते हैं। इस अर्थ में कला समय के क्षरण के विरुद्ध एक प्रतिरोध रचती है। कविता इस रचनात्मक शक्ति को स्वीकार करती है, लेकिन साथ ही यह भी स्पष्ट करती है कि समय को कला में सँजो लेना और किसी मनुष्य की आंतरिक सत्ता को पूरी तरह व्यक्त कर देना दो अलग बातें हैं। कोई चित्र इतिहास की झलक दे सकता है, लेकिन किसी व्यक्ति के पूरे जीवन का स्थान नहीं ले सकता।
‘पिकासो की राय में स्त्रियाँ मनुष्य की तमाम प्रजातियों में / सबसे क्षणभंगुर होती हैं / इसलिए उनके कई चेहरे होते हैं।’ ये पंक्तियाँ पहली नज़र में पिकासो की चित्रशैली की ओर संकेत करती हैं, जिसमें एक ही चेहरे को कई कोणों से दिखाया जा सकता है। लेकिन प्रतिनिधित्व के सवाल से जोड़कर देखें तो इनमें एक दूसरी समस्या भी दिखाई देती है। यदि स्त्री की पहचान बदलती रहती है और उसके अनुभव किसी एक रूप में स्थिर नहीं होते, तो क्या उसका कोई एक अंतिम चित्र बनाया जा सकता है? अनेक चेहरे बनाने का अर्थ यह स्वीकार करना भी हो सकता है कि एक चेहरा पर्याप्त नहीं है। फिर भी कई चित्र मिलकर किसी व्यक्ति के पूरे अस्तित्व को व्यक्त नहीं कर सकते।
यहीं कविता प्रतिनिधित्व और यथार्थ के बीच के अंतर को सामने लाती है। ‘कलाकृतियों में वे बल्कि कम रहस्यमय दिखती हैं / शायद सुंदर ज्यादा।’ इस पंक्ति में कवयित्री चित्रण की प्रक्रिया पर सवाल उठाती हैं। चित्र किसी व्यक्ति को ज्यों का त्यों सामने नहीं रखता, बल्कि उसे एक खास दृश्य रूप देता है। कलाकार कुछ विशेषताओं को उभारता है, कुछ को पीछे छोड़ देता है और अपनी कलात्मक दृष्टि के अनुसार आकृति को एक रूप देता है। इस प्रक्रिया में चित्रित स्त्री और अपने जीवन को जीने वाली स्त्री के बीच अंतर पैदा होता है। चित्र में स्त्री का सौंदर्य सामने आ सकता है, लेकिन उसके अनुभवों की जटिलता उतनी स्पष्ट नहीं होती। इस तरह कविता बताती है कि प्रतिनिधित्व केवल किसी चीज़ को दिखाने का काम नहीं करता, बल्कि उसे एक खास अर्थ भी देता है।
‘उनके चेहरे को बार-बार देखना होता है।’ यह पंक्ति प्रतिनिधित्व की इसी सीमा को और स्पष्ट करती है। यदि किसी व्यक्ति को समझने के लिए उसे बार-बार देखना पड़ता है, तो इसका अर्थ है कि कोई एक छवि उसके बारे में अंतिम निर्णय नहीं दे सकती। हर चित्र में कुछ दिखाई देता है और कुछ छूट जाता है। हर दृष्टि की अपनी सीमा होती है। इस तरह कविता उस धारणा को चुनौती देती है कि किसी व्यक्ति का एक अंतिम और प्रामाणिक रूप कला में सुरक्षित किया जा सकता है। देखने की प्रक्रिया लगातार चलती रहती है, क्योंकि व्यक्ति का अस्तित्व किसी एक छवि में पूरी तरह नहीं समाता।
कविता का केंद्रीय कथन है, ‘वैसे उनकी सच्ची तस्वीर नहीं बनाई जा सकती।’ यहाँ प्रतिनिधित्व की समस्या सबसे साफ़ रूप में सामने आती है। ‘सच्ची तस्वीर’ की असंभवता का अर्थ यह नहीं है कि कला किसी व्यक्ति के बारे में कुछ भी नहीं बता सकती। इसका आशय यह है कि किसी चित्र और उस व्यक्ति के बीच हमेशा एक अंतर बना रहता है। चित्र उस व्यक्ति की ओर संकेत कर सकता है, उसके कुछ अनुभवों और भावनाओं को सामने ला सकता है, लेकिन उसका पूरा विकल्प नहीं बन सकता। मनुष्य का अस्तित्व किसी भी कलात्मक प्रस्तुति से अधिक व्यापक और जटिल होता है।
कविता इस विचार को नग्नता के प्रसंग में और तीखा बना देती है। ‘चाहे आप उन्हें नग्न ही क्यों न कर दें अपनी कृति में।’ यह पंक्ति दृश्यता और सत्य के बीच के संबंध पर सवाल उठाती है। आम तौर पर यह माना जाता है कि आवरण हटाने से वास्तविकता अधिक स्पष्ट हो जाती है। लेकिन कविता बताती है कि शरीर को पूरी तरह दिखा देने से आत्मा सामने नहीं आ जाती। चित्र में शरीर का हर हिस्सा दिखाई दे सकता है, फिर भी व्यक्ति के अनुभव, विचार और भावनाएँ अनकही रह सकती हैं। अधिक दृश्यता अपने आप अधिक ज्ञान नहीं देती।
लौरा मल्वी का 'मेल गेज़' (Male Gaze) का सिद्धांत यहाँ कविता के मर्म से गहराई से जुड़ता है। अपने चर्चित आलेख 'विजुअल प्लेज़र एंड नैरेटिव सिनेमा' में मल्वी रेखांकित करती हैं कि दृश्य-माध्यमों में पुरुष को प्रेक्षक (देखने वाले) का स्थान मिलता है, जबकि स्त्री महज दृश्य-वस्तु बना दी जाती है। सिनेमा से इतर यह दृष्टि धीरे-धीरे चित्रकला, साहित्य, विज्ञापन और फोटोग्राफी के विश्लेषण का भी मुख्य आधार बनी। इसका केंद्रीय प्रश्न यही है कि स्त्री का अवलोकन कौन कर रहा है, उसकी चेतना किस दृष्टिकोण से आंकी जा रही है और उस अवलोकन के आधार पर उसके अस्तित्व का अर्थ गढ़ने का अधिकार किसके पास है?
इस परिप्रेक्ष्य में जब हम इस कविता को परखते हैं, तो स्पष्ट होता है कि यह रचना सिर्फ पिकासो के स्त्री-चित्रों का ब्योरा भर नहीं देती, बल्कि उस देखने वाली नज़र का भी सूक्ष्म विश्लेषण करती है जिसके तहत स्त्री कैनवास पर उतरती है। ‘कलाकृतियों में वे बल्कि कम रहस्यमय दिखती हैं / शायद सुंदर ज्यादा’ जैसी पंक्तियाँ बताती हैं कि किसी कलाकृति में स्त्री की मौजूदगी उसके बाह्य सौंदर्य को तो निखार सकती है, मगर उसकी आंतरिक उलझनों और बारीकियों को ओझल भी कर सकती है। कैनवास पर स्त्री भले ही केंद्र बिंदु बने, लेकिन उसकी अपनी अनुभूतियों को वहाँ कितना स्थान मिला—यह प्रश्न अनुत्तरित ही रह जाता है। मल्वी की यह अवधारणा हमें यह समझने की दृष्टि देती है कि स्त्री को प्रस्तुत करने की यह समूची प्रक्रिया किस प्रकार उसे देखने वाले की अपनी आकांक्षाओं और कल्पनाओं के सांचे में ढाल देती है।
फिर भी सविता सिंह की कविता का दायरा ‘मेल गेज़’ की आलोचना से आगे जाता है। वह केवल यह नहीं पूछती कि पुरुष स्त्री को किस तरह देखता है, बल्कि यह भी पूछती है कि क्या देखने से उसे पूरी तरह जाना जा सकता है। ‘चाहे आप उन्हें नग्न ही क्यों न कर दें अपनी कृति में’ के बाद ‘वे किसी को नहीं मिलतीं’ जैसी पंक्तियाँ इस सवाल को और गहरा करती हैं। स्त्री किसी की उपलब्ध वस्तु नहीं है। उसे देखने, चित्रित करने या उसके बारे में लिखने से कोई व्यक्ति उस पर अधिकार हासिल नहीं कर लेता। उसका अस्तित्व अपनी जगह स्वतंत्र रहता है।
‘वे किसी को नहीं मिलतीं / किसी जाने पहचाने रंग को नहीं हासिल वे’ में स्त्री को किसी तय पहचान या सांस्कृतिक श्रेणी में बाँधने की कोशिश का विरोध दिखाई देता है। समाज और कला ने स्त्री की कई परिचित छवियाँ बनाई हैं। वह कभी माँ, कभी प्रेमिका, कभी देवी, कभी प्रेरणा और कभी सौंदर्य या रहस्य का प्रतीक बनकर सामने आती है। ये छवियाँ स्त्री के कुछ रूपों को व्यक्त करती हैं, लेकिन उसके पूरे अस्तित्व को नहीं। कविता कहती है कि स्त्री किसी एक परिचित रंग में नहीं समाती। उसकी पहचान उन तैयार प्रतीकों और धारणाओं से आगे जाती है जिनके सहारे कला और संस्कृति उसे समझने की कोशिश करती रही हैं।
‘किसी दूसरे की आत्मा में भी नहीं झलकतीं’ इस विचार को और स्पष्ट करती है। पुरुष प्रधान कलात्मक परंपरा में स्त्री को कई बार पुरुष की भावनाओं, इच्छाओं और कल्पनाओं का प्रतिबिंब बनाकर पेश किया गया है। इस तरह वह स्वतंत्र व्यक्ति के बजाय पुरुष की आत्माभिव्यक्ति का माध्यम बन जाती है। कविता इस धारणा को चुनौती देती है। स्त्री किसी दूसरे की आत्मा का विस्तार नहीं है। उसका अपना आत्मबोध है और उसके अनुभवों को किसी दूसरे की भावनाओं या कल्पनाओं में पूरी तरह नहीं समेटा जा सकता।
‘वे अपने हाथ अपने दोशालों में छिपाकर रखना पसंद करती हैं’ का बिंब भी प्रतिनिधित्व की सीमा को समझने में मदद करता है। हाथों का संबंध काम करने, अपनी इच्छा के अनुसार कुछ करने और अपने विचारों को व्यवहार में लाने से है। उन्हें दोशाले में छिपाकर रखने का बिंब स्त्री की निजता और अपने अस्तित्व के कुछ हिस्सों को अपने तक सुरक्षित रखने की इच्छा का संकेत देता है। हर व्यक्ति अपने जीवन के सभी अनुभवों को दूसरों के सामने खोलना नहीं चाहता। इसी तरह, किसी स्त्री के भीतर भी ऐसा संसार हो सकता है जिसे वह अपने तक रखना पसंद करे। यह दूरी उसकी कमजोरी नहीं है। यह उसके अपने अस्तित्व पर उसके अधिकार का संकेत भी हो सकती है।
प्रतिनिधित्व की समस्या को यहाँ उत्तर-संरचनावादी विचारों से भी जोड़ा जा सकता है। देरिदा ने दिखाया कि किसी चिह्न का अर्थ हमेशा एक ही जगह स्थिर नहीं रहता। वह दूसरे चिह्नों और संदर्भों के साथ अपने संबंधों में अर्थ ग्रहण करता है। इस विचार की मदद से कविता की उन पंक्तियों को समझा जा सकता है जिनमें स्त्री की सच्ची तस्वीर बनाने की असंभवता सामने आती है। स्त्री के बारे में हर चित्र और हर व्याख्या उसके कुछ पहलुओं को सामने लाती है, लेकिन उसके पूरे अस्तित्व को किसी एक अर्थ में बंद नहीं कर सकती। यहाँ कविता यह नहीं कहती कि स्त्री को समझना असंभव है, बल्कि यह बताती है कि उसे पूरी तरह परिभाषित कर लेने का दावा उचित नहीं है।
उत्तर-आधुनिक चिंतन भी किसी एक सार्वभौमिक, स्थिर और अंतिम सत्य पर आधारित व्याख्या के प्रति संदेह व्यक्त करता है। ज्याँ फ़्राँस्वा ल्योतार (Jean-François Lyotard) ने अपनी पुस्तक ‘द पोस्टमॉडर्न कंडीशन: अ रिपोर्ट ऑन नॉलेज’ (The Postmodern Condition: A Report on Knowledge, 1979) में उत्तर-आधुनिक स्थिति को महावृत्तांतों (Grand Narratives) के प्रति अविश्वास से जोड़ा था। इसका आशय उन बड़े दावों पर सवाल उठाना है जो किसी एक सत्य, इतिहास या पहचान को अंतिम मान लेते हैं। देरिदा ने अर्थ की स्थिरता को चुनौती दी और फूको ने ज्ञान तथा सत्ता के संबंधों की पड़ताल की। इन विचारों के आधार पर व्यक्ति को एक स्थिर और अपरिवर्तनीय इकाई के रूप में देखने के बजाय उसके अनुभवों, संबंधों और बदलती परिस्थितियों से बने अस्तित्व के रूप में समझा जा सकता है।
सविता सिंह की कविता में स्त्री का बहुल और बदलता हुआ अस्तित्व इसी संदर्भ में पढ़ा जा सकता है। उसके कई चेहरे हैं, लेकिन कोई एक चेहरा उसकी पूरी पहचान नहीं है। उसे किसी एक रंग, परिभाषा या संबंध में बाँधना उसके अस्तित्व को सीमित करना होगा। कविता इस तरह स्त्री की पहचान को किसी अंतिम व्याख्या में बंद करने से इनकार करती है। वह यह भी संकेत करती है कि किसी व्यक्ति के बारे में हमारी समझ हमेशा अधूरी रह सकती है, क्योंकि उसका जीवन हमारे द्वारा बनाई गई छवि से अधिक व्यापक होता है।
कविता के अंतिम हिस्से में प्रतिनिधित्व और वास्तविक जीवन के बीच का अंतर एक अलग रूप में सामने आता है। कवयित्री पिकासो की कला को देखते हुए उनके निजी जीवन की उन स्त्रियों को भी याद करती हैं जिन्हें उनके व्यवहार से पीड़ा पहुँची थी। इस स्मरण के साथ कविता का सवाल केवल चित्रों की सीमा तक नहीं रहता। वह कलाकार की नैतिक जवाबदेही तक पहुँच जाता है। किसी कलाकार की रचनात्मक उपलब्धियों को स्वीकार करना ज़रूरी हो सकता है, लेकिन इससे उसके निजी आचरण पर सवाल उठाने का अधिकार समाप्त नहीं हो जाता।
पिकासो की निजी ज़िन्दगी में फ़र्नांद ओलिविए (Fernande Olivier), ओल्गा खोखलोवा (Olga Khokhlova), मैरी-थेरेज़ वाल्टर (Marie-Thérèse Walter), डोरा मार (Dora Maar), फ़्रांस्वाज़ जिलो (Françoise Gilot) और जैकलीन रोक (Jacqueline Roque) जैसी कई स्त्रियाँ आईं। उनके कुछ संबंधों में नियंत्रण, मानसिक हिंसा और भावनात्मक शोषण के आरोप भी सामने आए हैं। कविता इन स्त्रियों की याद के ज़रिए कला और जीवन के बीच की दूरी को सामने लाती है। चित्र में स्त्री का सुंदर या रहस्यमय रूप वास्तविक जीवन में उसके अनुभवों का स्थान नहीं ले सकता। कलाकार अपनी कृति में स्त्री के अनेक चेहरे दिखा सकता है, लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि उसने वास्तविक स्त्रियों के दुःख, स्वतंत्रता और मनुष्यता को भी समझा था।
यहाँ लौरा मल्वी की अवधारणा और प्रतिनिधित्व के व्यापक दार्शनिक सवाल आपस में जुड़ते हैं। मल्वी की ‘मेल गेज़’ यह समझने में मदद करती है कि स्त्री को देखने और उसकी छवि बनाने की प्रक्रिया में पुरुष की दृष्टि किस तरह प्रभावी हो सकती है। प्रतिनिधित्व का दार्शनिक विमर्श इस सवाल को आगे बढ़ाता है कि क्या कोई छवि अपने विषय का पूरा सत्य सामने ला सकती है। सविता सिंह की कविता इन दोनों सवालों को एक साथ रखती है। वह पुरुष कलाकार की दृष्टि की सीमाओं को सामने लाती है और साथ ही स्त्री के उस स्वतंत्र अस्तित्व पर ज़ोर देती है जो किसी चित्र या व्याख्या में पूरी तरह नहीं समा सकता।
इस प्रकार विवेच्य कविता प्रतिनिधित्व (Representation) को निरर्थक नहीं मानती, बल्कि उसकी सीमाओं को पहचानने की माँग करती है। ज़ाहिर है कि कला समय को सँजो सकती है, अनुभवों को रूप दे सकती है और यथार्थ के अनेक पहलुओं को सामने ला सकती है। लेकिन वह किसी मनुष्य के पूरे भीतरी संसार को अपने भीतर नहीं समेट सकती। हर चित्र अपने विषय के कुछ पहलुओं को सामने लाता है और कुछ को पीछे छोड़ देता है। यही प्रतिनिधित्व की सीमा है, लेकिन इसी सीमा में मनुष्य की स्वतंत्रता भी सुरक्षित रहती है।
सविता सिंह की रचना का दार्शनिकता की ख़ूबी है कि वह स्त्री को किसी अंतिम परिभाषा में बाँधने से इनकार करती है। वह पिकासो की कला की शक्ति को स्वीकार करती है, लेकिन यह भी दिखाती है कि कलात्मक प्रतिभा किसी दूसरे मनुष्य को पूरी तरह जान लेने का सबूत नहीं है। स्त्री की आत्मा किसी कलाकार की कृति, किसी सांस्कृतिक छवि या किसी पुरुष की कल्पना में पूरी तरह नहीं समा सकती। वह अपने अनुभवों और अपनी स्वतंत्र पहचान के साथ बनी रहती है। इस तरह कविता कला, प्रतिनिधित्व, पुरुष दृष्टि और नैतिक जवाबदेही के सवालों को एक साथ रखकर स्त्री के स्वतंत्र अस्तित्व पर विचार करने का अवसर देती है।
‘स्त्री की आत्मा और पिकासो’ कविता को इस सन्दर्भ में पढ़ने पर स्पष्ट होता है कि यह केवल स्त्री या पिकासो के बारे में नहीं है। यह पहचान, सत्य और आत्म की स्थिर अवधारणाओं को भी चुनौती देती है। कविता में बार-बार ऐसी स्थितियाँ सामने आती हैं, जहाँ किसी अंतिम निष्कर्ष या निश्चित परिभाषा तक पहुँचना संभव नहीं रह जाता। इस अर्थ में कविता उत्तर-आधुनिक संवेदना के कई बुनियादी तत्त्वों को अपने भीतर समेटे हुए है।
कविता की शुरुआत ही एक दिलचस्प विडंबना से होती है। प्रदर्शनी में मौजूद प्रोटागोनिस्ट को पिकासो की कृतियों में ‘यूरोप का एक टुकड़ा समय’ दिखाई देता है। यहाँ समय किसी सीधी और एकसमान धारा की तरह नहीं, बल्कि एक ‘टुकड़े’ के रूप में सामने आता है। यह बिंब उत्तर-आधुनिक चेतना की ओर संकेत करता है। इतिहास यहाँ किसी एक व्यवस्थित कथा के रूप में नहीं, बल्कि बिखरी हुई स्मृतियों और अनुभवों के रूप में उपस्थित है। पिकासो की कलाकृतियों में भी ऐसा समय दर्ज है, जिसमें आधुनिकता की अस्थिरता, युद्ध, विस्थापन और टूटन की अनुभूति गहराई से मौजूद है।
‘स्त्रियाँ मनुष्य की तमाम प्रजातियों में / सबसे क्षणभंगुर होती हैं / इसलिए उनके कई चेहरे होते हैं।’― ये कविता की कुछ उल्लेखनीय पंक्तियाँ हैं। उत्तर-आधुनिक दृष्टि से देखें तो ‘कई चेहरे’ केवल बाहरी रूपों की बहुलता नहीं, बल्कि पहचान की अस्थिरता का भी संकेत हैं। आधुनिक मानवतावादी चिंतन में व्यक्ति को एक एकीकृत और सुसंगत व्यक्तित्व के रूप में देखा जाता था, जिसके भीतर एक केंद्रीय आत्म मौजूद होती है। उत्तर-आधुनिक विचार इस धारणा पर सवाल उठाता है। व्यक्ति की पहचान अनेक भूमिकाओं, अनुभवों और सामाजिक परिस्थितियों के बीच लगातार बदलती रहती है। कविता में स्त्री के ‘कई चेहरे’ इसी बहुलता और अस्थिरता का रूपक बन जाते हैं।
यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि कविता इन अनेक चेहरों को किसी एक अंतिम चेहरे में समेटने की कोशिश नहीं करती। वह यह नहीं बताती कि स्त्री का वास्तविक चेहरा कौन-सा है। इसके बजाय वह उसकी बहुलता को ही उसकी पहचान का आधार बनाती है। यह दृष्टि उत्तर-आधुनिक विचार के निकट है, जहाँ किसी अंतिम केंद्र या मूल पहचान की खोज को संदेह की नज़र से देखा जाता है।
‘कलाकृतियों में वे बल्कि कम रहस्यमय दिखती हैं / शायद सुंदर ज्यादा।’―इस पंक्ति पर भी उत्तर-आधुनिक दृष्टि से विचार किया जा सकता है। यहाँ कविता प्रतिनिधित्व और यथार्थ के बीच की दूरी की ओर ध्यान दिलाती है। चित्र में जो दिखाई देता है, वह किसी व्यक्ति का पूरा सच नहीं होता। दृश्य रूप एक कलात्मक निर्मिति है, जो अपने विषय को एक विशेष अर्थ देता है। उत्तर-आधुनिक आलोचना बार-बार इस बात पर ज़ोर देती है कि किसी प्रस्तुति को यथार्थ का सीधा और पारदर्शी रूप नहीं माना जा सकता। कविता भी इसी बात को अपने ढंग से सामने लाती है। चित्र में उपस्थित स्त्री और वास्तविक जीवन की स्त्री के बीच एक दूरी बनी रहती है, जिसे पूरी तरह मिटाया नहीं जा सकता।
कविता का एक और महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि वह किसी एक अर्थ को स्थिर नहीं होने देती। स्त्री को रहस्य, सौंदर्य, बहुलता या अप्राप्यता के रूप में देखा जा सकता है, लेकिन कविता इनमें से किसी एक अर्थ को अंतिम नहीं बनने देती। स्त्री लगातार इन परिभाषाओं की सीमाओं से बाहर निकलती रहती है। उत्तर-आधुनिक सिद्धांत की भाषा में कहें तो उसका अर्थ लगातार स्थगित होता रहता है। वह किसी एक संकेतक (signifier) से बँधकर नहीं रह जाती।
‘उनके भीतर के तूफ़ान को महज़ हवा समझना।’― इस पंक्ति में भी उत्तर-आधुनिक संवेदना की एक गहरी अंतर्ध्वनि सुनाई देती है। यहाँ सतह और गहराई के पारंपरिक द्वैत को जटिल बना दिया गया है। जो बाहर से मामूली दिखाई देता है, उसके भीतर अनेक अर्थ और अनुभव छिपे हो सकते हैं। इस तरह कविता किसी भी सरल और प्रत्यक्ष व्याख्या पर भरोसा करने से रोकती है। उत्तर-आधुनिकता की एक विशेषता यह है कि वह स्थिर अर्थ-संरचनाओं पर सवाल उठाती है और उनके भीतर छिपी जटिलताओं को सामने लाती है।
‘वैसे उनकी सच्ची तस्वीर नहीं बनाई जा सकती।’ ― यह कथन उत्तर-आधुनिक चिंतन के संदर्भ में खास अर्थ रखता है। यहाँ ‘सच्ची तस्वीर’ बना पाने की असंभवता किसी तकनीकी कमी का परिणाम नहीं है, बल्कि सत्य की प्रकृति के बारे में एक गहरी बात कहती है। यदि व्यक्ति स्वयं बहुल, गतिशील और परिवर्तनशील है, तो उसका कोई अंतिम और पूर्ण चित्रण कैसे संभव हो सकता है? उत्तर-आधुनिक विचार भी संपूर्ण और अंतिम ज्ञान के ऐसे दावों पर सवाल उठाता है। कविता किसी अंतिम सत्य तक पहुँचने का दावा करने के बजाय उसकी सीमाओं को स्वीकार करती है।
‘वे किसी को नहीं मिलतीं / किसी जाने-पहचाने रंग को नहीं हासिल वे।’ इन पंक्तियों में पहचान की अस्थिरता और तयशुदा श्रेणियों में बँधने से इनकार का भाव स्पष्ट है। उत्तर-आधुनिक चिंतन उन सांस्कृतिक संरचनाओं पर सवाल उठाता है, जो मनुष्य को निश्चित वर्गों और पहचानों में बाँध देती हैं। कविता की स्त्री किसी ‘जाने-पहचाने रंग’ को हासिल नहीं करती। वह पहले से तय किसी पहचान में पूरी तरह समा नहीं जाती। उसका अस्तित्व खुला हुआ है और इसी कारण उसे किसी एक अर्थ में सीमित नहीं किया जा सकता।
‘किसी दूसरे की आत्मा में भी नहीं झलकतीं।’ यह पंक्ति स्त्री की स्वायत्तता के साथ-साथ उसके भीतर मौजूद उस जटिलता को भी सामने लाती है, जिसे कोई दूसरा पूरी तरह नहीं जान सकता। उत्तर-आधुनिक चिंतन में व्यक्ति को ऐसी पारदर्शी सत्ता नहीं माना जाता, जिसे पूरी तरह समझा या परिभाषित किया जा सके। व्यक्ति स्वयं भी लगातार बनती और बदलती हुई प्रक्रिया है। कविता इस जटिलता को स्वीकार करती है। स्त्री किसी दूसरे के आत्मबोध में पूरी तरह समा नहीं जाती। उसके भीतर हमेशा कुछ ऐसा बचा रहता है, जो किसी भी चित्रण या व्याख्या की पकड़ से बाहर है।
‘वे अपने हाथ अपने दोशालों में छिपाकर रखना पसंद करती हैं।’ इस बिंब को भी उत्तर-आधुनिक अर्थ-संरचना के भीतर पढ़ा जा सकता है। यहाँ स्त्री का पूरा उद्घाटन नहीं होता। वह स्वयं को पूरी तरह दूसरों के सामने उपलब्ध नहीं कराती। अपने भीतर कुछ ऐसा बचाकर रखती है, जो हर तरह की व्याख्या का प्रतिरोध करता है। यह रहस्य किसी स्थायी और जन्मजात स्त्री-स्वभाव का प्रमाण नहीं है, बल्कि पहचान की बहुलता और अपूर्णता का संकेत है।
कविता का अंतिम हिस्सा खास तौर पर ध्यान खींचता है, क्योंकि यहाँ कलाकार की छवि भी स्थिर नहीं रहती। पिकासो एक महान कलाकार हैं, लेकिन साथ ही वे एक थके हुए बूढ़े मनुष्य भी हैं। उनके जीवन से जुड़ी स्त्रियों की स्मृतियाँ भी इस चित्र का हिस्सा बनती हैं। इस तरह कविता किसी एक निश्चित मूल्यांकन पर नहीं पहुँचती। वह न तो कलाकार का महिमामंडन करती है और न ही उसे पूरी तरह खारिज करती है। किसी व्यक्ति को केवल एक गुण या दोष के आधार पर समझने से बचना भी उत्तर-आधुनिक संवेदना का एक पक्ष है।
इस तरह ‘स्त्री की आत्मा और पिकासो’ को उत्तर-आधुनिक परिप्रेक्ष्य में पढ़ने पर यह कविता पहचान की बहुलता, सत्य की अस्थिरता, प्रतिनिधित्व की सीमाओं और अस्थिरता, प्रतिनिधित्व की सीमाओं और अर्थ की अनिश्चितता पर विचार करती दिखाई देती है। कविता किसी अंतिम निष्कर्ष तक पहुँचने के बजाय उन जगहों को सामने लाती है, जहाँ अर्थ टूटता है, पहचान बिखरती है और सत्य एकवचन से बहुवचन में बदल जाता है। यहाँ स्त्री कोई स्थिर सत्ता नहीं, बल्कि लगातार बदलती हुई, तयशुदा परिभाषाओं से बाहर निकलती हुई और अंतिम ज्ञान के दावों को चुनौती देती हुई उपस्थिति है। इसी वजह से कविता उत्तर-आधुनिक चिंतन के बुनियादी सवालों के साथ सार्थक संवाद करती है।
कला और नैतिकता का संबंध सौंदर्यशास्त्र की पुरानी और जटिल बहसों में से एक है। एक ओर ऐसी परंपरा रही है, जो कला को उसके नैतिक, सामाजिक और राजनीतिक संदर्भों से जोड़कर देखती है। दूसरी ओर, ऐसी धारा भी रही है जो कला की स्वायत्तता पर ज़ोर देती है। उन्नीसवीं शताब्दी के यूरोपीय सौंदर्यवाद में 'कला कला के लिए' (Art for Art's Sake) का विचार इसी स्वायत्तता का समर्थन करता है। इसके विपरीत, लियो टॉल्स्टॉय ने 'कला क्या है?' (What Is Art?) में कला के नैतिक दायित्व पर ज़ोर दिया। उनका मानना था कि कला को मनुष्यों के बीच संवेदनात्मक और नैतिक संबंधों को गहरा करना चाहिए। बीसवीं शताब्दी में थियोडोर अडोर्नो ने कला की स्वायत्तता को स्वीकार करते हुए भी उसे इतिहास और समाज से पूरी तरह अलग नहीं माना।
समकालीन आलोचना में यह सवाल और तीखा हो गया है कि क्या किसी कलाकार की रचना का मूल्यांकन उसके निजी जीवन से स्वतंत्र होकर किया जा सकता है। यह सवाल खास तौर पर तब उठता है, जब कलाकार के जीवन में हिंसा, स्त्री-विरोध, नस्लवाद या शोषण जैसी प्रवृत्तियों के प्रमाण मौजूद हों। क्या कलाकृति अपने सर्जक से स्वतंत्र अस्तित्व रखती है, या उसके नैतिक मूल्यांकन में कलाकार का आचरण भी शामिल होना चाहिए? सविता सिंह की कविता 'स्त्री की आत्मा और पिकासो' इसी जटिल सवाल को बारीकी से सामने लाती है।
इस कविता की ख़ासियत यह है कि वह इस सवाल को किसी सैद्धांतिक बहस की तरह नहीं, बल्कि एक कलानुभव के भीतर से उठाती है। आरंभिक पंक्तियों में उनकी कलात्मक उपलब्धि के प्रति गहरा सम्मान दिखाई देता है। उनकी चित्रकला में एक ऐतिहासिक समय सुरक्षित है। कला समय को पूरी तरह मिट जाने से बचाती है, स्मृतियों को आकार देती है और इतिहास को दृश्य रूप प्रदान करती है। इस स्तर पर कविता पिकासो को आधुनिक कला के एक बड़े कलाकार के रूप में स्वीकार करती है। उनकी उपलब्धियों को कम करके आँकने की कोशिश यहाँ दिखाई नहीं देती।
लेकिन कविता की खास बात यह है कि वह कलात्मक उपलब्धि के इस अनुभव को अपने आप में पूरा नहीं मानती। जैसे-जैसे कविता आगे बढ़ती है, चित्रों में उपस्थित स्त्रियाँ और कलाकार के जीवन से जुड़ी स्त्रियाँ एक-दूसरे के करीब आने लगती हैं। यहीं कला और जीवन के बीच खींची जाने वाली सामान्य रेखा धुँधली पड़ने लगती है।
पूरी कविता में पिकासो के स्त्रियों को देखने के नज़रिए पर विचार किया गया है। वे स्त्री के अनेक चेहरों को चित्रित करते हैं, उसकी जटिलता को पकड़ने की कोशिश करते हैं और उसके रहस्य को समझना चाहते हैं। लेकिन कविता बार-बार यह संकेत देती है कि चित्रण और समझ एक ही बात नहीं हैं। किसी व्यक्ति को कला का विषय बना देना और उसे उसके मानवीय अस्तित्व में स्वीकार करना दो अलग प्रक्रियाएँ हैं। कविता के अंतिम हिस्से में यह तनाव सबसे तीखे रूप में सामने आता है।
'यह सब कहते गुनते एक थके बूढ़े कलाकार को मैं देख रही थी।' -इस पंक्ति का महत्त्व केवल इतना नहीं है कि यहाँ पिकासो की वृद्धावस्था का चित्र सामने आता है। दरअसल, यह वह क्षण है जब कला का मिथकीय आभामंडल टूटने लगता है और कलाकार एक मनुष्य के रूप में दिखाई देता है। प्रदर्शनी में मौजूद चित्रों के पीछे अब एक जीवन नज़र आने लगता है। यह जीवन केवल सृजन का इतिहास नहीं, बल्कि संबंधों, इच्छाओं, विफलताओं और सत्ता-संबंधों का इतिहास भी है।
इसके बाद कविता कहती है, 'और याद कर रही थी कि उन तमाम यातनाओं को / जो उसने दिए उन स्त्रियों को / जो उनके पास आईं।' यहीं कला और नैतिकता का सवाल पूरी ताकत के साथ सामने आता है। कवयित्री चित्रों को देखते हुए उन स्त्रियों को भूल नहीं पातीं, जो पिकासो के जीवन का हिस्सा थीं। यह याद इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि कला का इतिहास अक्सर कलाकार की प्रतिभा को केंद्र में रखता है और उसके आसपास के लोगों, खासकर स्त्रियों के अनुभवों को हाशिए पर धकेल देता है। कविता इस विस्मृति का प्रतिरोध करती है।
यहाँ ध्यान देने की बात है कि कविता कोई नैतिक फैसला सुनाने वाली रचना नहीं है। वह यह नहीं कहती कि पिकासो की कला इसलिए निरर्थक हो जाती है क्योंकि उनके निजी जीवन में समस्याएँ थीं। अगर कविता ऐसा करती, तो सवाल बहुत सरल हो जाता। इसके बजाय वह दोनों स्थितियों को एक साथ सामने रखती है। एक ओर महान कला है, दूसरी ओर उन स्त्रियों का दुःख है जिनके साथ कलाकार के संबंध रहे। कविता इनमें से किसी एक को दूसरे के आधार पर खारिज नहीं करती। यही उसकी आलोचनात्मक शक्ति है।
कला और नैतिकता की बहस में अक्सर दो अतिवादी स्थितियाँ सामने आती हैं। पहली यह कि कलाकार का निजी जीवन उसकी कला के मूल्यांकन में कोई भूमिका नहीं निभाता और केवल कलाकृति महत्त्वपूर्ण है। दूसरी यह कि कलाकार का नैतिक आचरण ही उसकी कला का अंतिम मूल्य तय करता है। सविता सिंह की कविता इन दोनों स्थितियों से बचती है। वह न तो कला को नैतिक सवालों से पूरी तरह मुक्त मानती है, न ही उसे केवल नैतिकता का साधन बना देती है। वह इस तनाव को बनाए रखती है और पाठक को इस पर सोचने के लिए प्रेरित करती है।
कविता यह संकेत भी देती है कि कलात्मक संवेदनशीलता और नैतिक संवेदनशीलता हमेशा एक-दूसरे की गारंटी नहीं होतीं। कोई कलाकार मानवीय अनुभवों को गहराई से व्यक्त कर सकता है, लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि वह अपने निजी जीवन में भी उतना ही संवेदनशील होगा। पिकासो के संदर्भ में यह सवाल खास तौर पर तीखा हो जाता है। उनकी कला में स्त्री की उपस्थिति केंद्रीय है, लेकिन उनके साथ संबंध रखने वाली कई स्त्रियों ने मानसिक नियंत्रण, अपमान और पीड़ा के अनुभव दर्ज किए हैं।
कविता इसी विरोधाभास को सामने लाती है।
इस दृष्टि से कविता कलाकार की नैतिक जवाबदेही का सवाल भी उठाती है। यदि कला मनुष्य के अनुभवों को समझने और व्यक्त करने का माध्यम है, तो क्या कलाकार स्वयं उन मानवीय मूल्यों से मुक्त रह सकता है, जो उसकी कला में दिखाई देते हैं? कविता इस सवाल का कोई अंतिम उत्तर नहीं देती, लेकिन यह ज़रूर बताती है कि इसे अनदेखा नहीं किया जा सकता।
कविता का प्रभाव इसलिए गहरा है कि वह पाठक को एक असुविधाजनक स्थिति में छोड़ देती है। हम पिकासो की कला से प्रभावित होते हैं, लेकिन उसी समय उन स्त्रियों की स्मृति भी हमारे सामने बनी रहती है। न कला पूरी तरह निर्दोष रह जाती है, न कलाकार पूरी तरह राक्षसी बन जाता है। दोनों के बीच एक जटिल संबंध उभरता है, जिसमें प्रशंसा, आलोचना, आकर्षण और असहजता एक साथ मौजूद हैं।
इसी वजह से 'स्त्री की आत्मा और पिकासो' कला और नैतिकता के संबंध पर विचार करने के लिए एक महत्त्वपूर्ण पाठ बन जाती है। कविता किसी निष्कर्ष पर पहुँचने की जल्दी नहीं करती। वह हमें सोचने के लिए प्रेरित करती है कि महान कला का अनुभव करते समय कलाकार के जीवन को किस हद तक याद रखा जाना चाहिए और उसके जीवन का मूल्यांकन करते समय उसकी कला को कितनी जगह दी जानी चाहिए। कविता का महत्त्व इसी सवाल को जीवित रखने में है। वह न कला की स्वायत्तता को पूरी तरह नकारती है, न नैतिक उत्तरदायित्व को। इसके बजाय वह दोनों के बीच मौजूद उस तनाव को सामने लाती है, जहाँ से कला, जीवन और मनुष्यता के बारे में गंभीर सवाल पैदा होते हैं।
पिकासो की स्त्री-विषयक कृतियों में 'वीपिंग वूमन' (The Weeping Woman, 1937) ख़ास तौर पर उल्लेखनीय है। यह चित्र उनकी साथी डोरा मार (Dora Maar) से जुड़ा माना जाता है। डोरा मार स्वयं एक प्रतिभाशाली फ़ोटोग्राफ़र और कलाकार थीं तथा लंबे समय तक पिकासो के साथ उनके संबंध रहे। चित्र में स्त्री का चेहरा तीखे कोणों, टूटे हुए आकारों और विकृत रेखाओं से बना है। उसकी आँखें आँसुओं से भरी हैं और रूमाल उसके चेहरे को ढँकता हुआ दिखाई देता है। पूरा चेहरा जैसे पीड़ा के कई टुकड़ों में बिखर गया हो। पहली नज़र में यह चित्र दुःख, त्रासदी और मानसिक विखंडन की सशक्त अभिव्यक्ति लगता है। आधुनिक कला के इतिहास में इसे मानवीय पीड़ा के प्रभावशाली चित्रों में गिना जाता है।
लेकिन जब हम इस चित्र को डोरा मार और पिकासो के संबंधों के संदर्भ में देखते हैं, तो इसका अर्थ और जटिल हो जाता है। डोरा मार केवल पिकासो की प्रेरणा या मॉडल नहीं थीं, बल्कि स्वयं एक सृजनशील कलाकार थीं। फिर भी कला के इतिहास में उन्हें अक्सर 'पिकासो की रोती हुई स्त्री' के रूप में याद किया जाता है। यहाँ एक सवाल उठता है: क्या
चित्र में उपस्थित स्त्री डोरा मार हैं, या वह डोरा मार की वह छवि है जिसे पिकासो ने अपनी कलात्मक दृष्टि से निर्मित किया? दूसरे शब्दों में, क्या हम यहाँ एक स्त्री को देख रहे हैं या एक कलाकार द्वारा बनाई गई स्त्री-छवि को ?
यहीं सविता सिंह की कविता 'स्त्री की आत्मा और पिकासो' के सवाल प्रासंगिक हो जाते हैं। कविता बार-बार इस बात पर ज़ोर देती है कि स्त्री की 'सच्ची तस्वीर' नहीं बनाई जा सकती। 'वीपिंग वूमन' को देखें तो पिकासो ने डोरा मार की पीड़ा को एक सशक्त दृश्य रूप दिया है, लेकिन क्या इस चित्र में डोरा मार का पूरा व्यक्तित्व मौजूद है? क्या उनकी रचनात्मकता, बौद्धिकता, इच्छाएँ और स्वतंत्र पहचान भी उतनी ही दिखाई देती हैं? या वे मुख्यतः पीड़ा के एक प्रतीक में बदल जाती हैं? कविता हमें इसी दिशा में सोचने के लिए प्रेरित करती है।
चित्र का एक और पक्ष ध्यान देने योग्य है। पिकासो स्त्री की भावनात्मक तीव्रता को चित्रित करने में असाधारण क्षमता दिखाते हैं। 'वीपिंग वूमन' में दुःख केवल चेहरे पर नहीं है, बल्कि पूरा चित्र ही दुःख की संरचना बन जाता है। लेकिन कवयित्री के शब्दों में कहें तो यह भी संभव है कि स्त्री के 'भीतर के तूफ़ान' को कला एक खास दृश्य रूप में बदल दे। तब सवाल उठता है कि यह तूफ़ान स्वयं स्त्री का अनुभव है या कलाकार की व्याख्या। कविता अनुभव और उसके प्रतिनिधित्व के बीच बनी दूरी की ओर ध्यान दिलाती है। कविता की पंक्ति 'कलाकृतियों में वे बल्कि कम रहस्यमय दिखती हैं । शायद सुंदर ज्यादा' 'वीपिंग वूमन' के संदर्भ में भी विचारणीय है। यहाँ स्त्री का दुःख एक विशिष्ट कलात्मक रूप में बदल गया है। दर्शक चित्र की सौंदर्यात्मक शक्ति से प्रभावित हो सकता है, लेकिन इसी प्रक्रिया में वास्तविक स्त्री का जीवनानुभव कलात्मक संरचना में समा जाता है। पीड़ा एक कलात्मक उपलब्धि बन जाती है। कविता इस संभावना के प्रति सजग करती है कि कला जीवन के अनुभव को रूप देते हुए उसे अपने ढंग से बदलती और पुनर्गठित भी करती है।
पिकासो के स्त्री-विषयक दृष्टिकोण पर चर्चा करते समय उनका एक चर्चित कथन भी सामने आता है कि 'स्त्रियाँ या तो देवियाँ होती हैं या दासियाँ।' हालाँकि इस कथन के स्रोत और प्रामाणिकता को लेकर सावधानी बरतने की ज़रूरत है। इसे पिकासो का प्रमाणित कथन मानकर उद्धृत करना उचित नहीं होगा। फिर भी उनकी चित्रकला और निजी संबंधों पर हुई आलोचनात्मक चर्चाओं में यह सवाल बार-बार उठता है कि स्त्रियों को उनकी कला में किस तरह प्रस्तुत किया गया और उनके निजी जीवन में उनके साथ कैसा व्यवहार किया गया।
इस संदर्भ में पिकासो की साथी फ्रांस्वाज़ जिलो (Françoise Gilot) की पुस्तक 'लाइफ़ विद पिकासो' (Life with Picasso), जिसे उन्होंने कार्लटन लेक (Carlton Lake) के साथ लिखा था और जो 1964 में मैक्ग्रा-हिल (McGraw-Hill) से प्रकाशित हुई, एक उल्लेखनीय स्रोत है। इसमें जिलो ने पिकासो के साथ अपने संबंधों और स्त्रियों के प्रति उनके रवैये के बारे में कई बातें दर्ज की हैं। पुस्तक से जुड़ा एक कथन, 'स्त्रियाँ यातना सहने की मशीनें हैं' ('Women are machines for suffering'), पिकासो की स्त्री-दृष्टि पर होने वाली बहसों में अक्सर उद्धृत किया जाता है। हालाँकि किसी भी चर्चित कथन का इस्तेमाल करते समय उसके मूल संदर्भ और पाठ में उसकी प्रामाणिकता की जाँच करना ज़रूरी है।
'लाइफ़ विद पिकासो' में जिलो ने पिकासो के निजी संबंधों और स्त्रियों के प्रति उनके व्यवहार का भी वर्णन किया है। उनके विवरण से यह सवाल उठता है कि पिकासो अपने जीवन में स्त्रियों को किस हद तक स्वतंत्र व्यक्तियों के रूप में स्वीकार करते थे और किस हद तक उन्हें अपनी इच्छाओं, अपेक्षाओं या कलात्मक प्रेरणा से जोड़कर देखते थे। 'देवियाँ और पायदान' ('goddesses and doormats') वाला कथन भले ही स्रोत की दृष्टि से संदिग्ध हो, लेकिन यह स्त्रियों के प्रति पिकासो के रवैये पर होने वाली आलोचनात्मक बहस से जुड़ जाता है। उनकी कला में स्त्री प्रेरणा, रहस्य, इच्छा और पीड़ा के रूप में सामने आती है, लेकिन कई बार उसकी स्वतंत्र सामाजिक पहचान पीछे छूट जाती है। यही वह बिंदु है जहाँ सविता सिंह की कविता पिकासो की कलात्मक दृष्टि से असहमति दर्ज करती दिखाई देती है। 'स्त्री की आत्मा और पिकासो' स्त्री को किसी प्रतीक या रूपक तक सीमित नहीं करती। वह ऐसी आत्मसत्ता की बात करती है, जो हर चित्र, हर रंग और हर परिभाषा से आगे बनी रहती है।
'वीपिंग वूमन' को देखते हुए कविता की यह पंक्ति भी याद आती है: 'चाहे आप उन्हें नग्न ही क्यों न कर दें अपनी कृति में / वे किसी को नहीं मिलतीं।' इसका व्यापक अर्थ यह है कि किसी स्त्री को पूरी तरह दृश्य बना देना भी उसे पूरी तरह जान लेना नहीं है। इसी तरह 'वीपिंग वूमन' में डोरा मार की पीड़ा तीव्र रूप में दिखाई देती है, फिर भी उनका पूरा अस्तित्व चित्र में समा नहीं जाता। चित्र उनके बारे में कुछ बताता है, लेकिन उन्हें पूरी तरह व्यक्त नहीं कर सकता। कविता के अंतिम हिस्से में कवयित्री उन स्त्रियों को याद करती हैं जिन्हें पिकासो ने अपने जीवन में यातना दी। इस संदर्भ में 'वीपिंग वूमन' एक और अर्थ ग्रहण करती है। डोरा मार और पिकासो के संबंधों के बारे में उपलब्ध विवरण बताते हैं कि यह संबंध उनके जीवन में गहरे मानसिक संकटों से जुड़ा रहा। ऐसे में चित्र केवल एक स्त्री के दुःख की अभिव्यक्ति नहीं रह जाता, बल्कि कलाकार और उसकी प्रेरणा के बीच मौजूद जटिल संबंधों की ओर भी ध्यान दिलाता है। यहाँ कला और जीवन को पूरी तरह अलग-अलग नहीं रखा जा सकता। चित्र देखते समय हम केवल उसकी सौंदर्यात्मक उपलब्धि पर ध्यान नहीं देते, बल्कि उसके पीछे मौजूद मानवीय संबंध भी हमारी नज़र में आने लगते हैं। इस तरह 'वीपिंग वूमन' पिकासो की कला की शक्ति और उसकी सीमाओं, दोनों को सामने लाती है। यह दिखाती है कि पिकासो स्त्री की भावनात्मक जटिलता को असाधारण कलात्मक शक्ति के साथ व्यक्त कर सकते थे। साथ ही, यह सवाल भी उठता है कि उनकी कला में स्त्री की छवि किस हद तक कलाकार की अपनी दृष्टि से निर्मित होती है। सविता सिंह की कविता इसी बिंदु पर तीखा सवाल उठाती है। वह पूछती है कि क्या स्त्री की आत्मा किसी चित्र में पूरी तरह उपस्थित हो सकती है, या वह हर तरह के प्रतिनिधित्व से कुछ आगे बनी रहती है।
'वीपिंग वूमन' को 'स्त्री की आत्मा और पिकासो' के साथ रखकर पढ़ने पर यह स्पष्ट होता है कि पिकासो ने स्त्री के अनेक चेहरे चित्रित किए और उसकी पीड़ा, सुंदरता तथा जटिलता को दृश्य रूप दिया। लेकिन कविता हमें याद दिलाती है कि इन सबके बावजूद स्त्री की आत्मा किसी भी चित्र से बड़ी है और उसे पूरी तरह जान लेना संभव नहीं है। यही वह जगह है जहाँ कविता पिकासो की कला से संवाद भी करती है और उसकी आलोचना भी।
पिकासो की स्त्री-पुरुष संबंधों पर आधारित चित्रों में 'द किस' (The Kiss, 1969) ख़ास तौर पर उल्लेखनीय है। इस चित्र में स्त्री और पुरुष के चुंबन का दृश्य है, लेकिन यह कोई कोमल, सहज या पारंपरिक प्रेम-दृश्य नहीं है। दोनों आकृतियाँ एक-दूसरे में इस तरह गुंथी हुई हैं कि उनके चेहरे लगभग एक-दूसरे को निगलते हुए दिखाई देते हैं। चेहरे विकृत हैं, आँखें असामान्य रूप से उभरी हुई हैं और दोनों के बीच का संबंध प्रेम और हिंसा, आकर्षण और आक्रामकता, निकटता और वर्चस्व के बीच झूलता हुआ लगता है। यहाँ यौन आकर्षण केवल सुख या रोमांस का विषय नहीं है। वह ऐसी शक्ति के रूप में सामने आता है, जिसमें इच्छा, अधिकार, भय और स्वयं को दूसरे में विलीन कर देने की प्रवृत्तियाँ एक साथ सक्रिय हैं।
पिकासो की चित्रकला में स्त्री-पुरुष संबंध अक्सर इसी जटिलता के साथ सामने आते हैं। उनके यहाँ प्रेम का दृश्य केवल दो व्यक्तियों के मिलन का दृश्य नहीं रहता, बल्कि दो शक्तियों के टकराव का रूप भी ले लेता है। खासकर उनकी उत्तरकालीन चित्रों में कामना की तीव्रता के साथ बेचैनी और तनाव भी दिखाई देते हैं। ऐसा लगता है कि दूसरे व्यक्ति के साथ पूरी तरह एक हो जाने की इच्छा जितनी प्रबल है, उतना ही प्रबल उस पर अधिकार जमाने का आग्रह भी है। सविता सिंह की 'स्त्री की आत्मा और पिकासो' कविता के संदर्भ में इस चित्र को पढ़ने पर कई अर्थपूर्ण संबंध सामने आते हैं। कविता का एक केंद्रीय सवाल यह है कि क्या स्त्री को देखने, चित्रित करने या उसके साथ निकट संबंध बना लेने भर से उसकी आत्मा तक पहुँचा जा सकता है। 'द किस' में स्त्री और पुरुष शारीरिक तथा भावनात्मक निकटता की चरम स्थिति में दिखाई देते हैं, फिर भी उनके बीच एक दूरी बनी रहती है। वे एक-दूसरे में विलीन होते हुए भी पूरी तरह एक नहीं हो पाते। यह दृश्य कविता की उस पंक्ति की याद दिलाता है, 'वे किसी को नहीं मिलतीं।' यहाँ 'न मिलना' केवल सामाजिक या भावनात्मक दूरी का संकेत नहीं है, बल्कि एक अस्तित्वगत दूरी की ओर भी इशारा करता है। मनुष्य दूसरे के जितना करीब जाता है, उतना ही उसे दूसरे की स्वतंत्रता और अप्राप्यता का एहसास भी हो सकता है।
कविता में कहा गया है, 'वैसे उनकी सच्ची तस्वीर नहीं बनाई जा सकती / चाहे आप उन्हें नग्न ही क्यों न कर दें अपनी कृति में।' 'द किस' के संदर्भ में इस कथन को पढ़ना खास तौर पर सार्थक है।
पिकासो के चित्र में स्त्री और पुरुष का संबंध बहुत निकटता के साथ प्रस्तुत हुआ है। उनके शरीरों के बीच की दूरी लगभग समाप्त हो गई है। लेकिन 'स्त्री की आत्मा और पिकासो' का आग्रह है कि शारीरिक निकटता और किसी की आत्मा को जान लेना एक ही बात नहीं हैं। किसी व्यक्ति के बेहद करीब होने पर भी उसके भीतर का एक हिस्सा हमारी समझ से बाहर रह सकता है। इस तरह कविता उस धारणा पर सवाल उठाती है कि प्रेम, यौन संबंध या शारीरिक मिलन अपने आप दूसरे व्यक्ति के पूर्ण ज्ञान में बदल जाते हैं।
कविता की पंक्ति, 'उनके भीतर के तूफ़ान को महज़ हवा समझना भारी गलती करने जैसे है', यहाँ भी प्रासंगिक हो जाती है। 'द किस' में स्त्री केवल एक निष्क्रिय आकृति नहीं है, जो पुरुष की इच्छा के विषय के रूप में मौजूद हो। उसके चेहरे और उसकी उपस्थिति में भी एक तीव्रता दिखाई देती है। लेकिन सवाल यह है कि पिकासो की चित्रभाषा इस तीव्रता को किस रूप में व्यक्त करती है। क्या यह स्त्री के अपने अनुभव का रूप है या कलाकार की दृष्टि से निर्मित छवि ? यही सवाल विवेच्य कविता लगातार उठाती है। स्त्री का आंतरिक संसार चित्र में दिखाई तो देता है, लेकिन क्या वह उसी रूप में सामने आता है, जैसा वह स्वयं है?
पिकासो की कई चित्रों में प्रेम और यौन आकर्षण के दृश्य एक विचित्र द्वंद्व से भरे हुए हैं। वहाँ इच्छा के साथ भय, निकटता के साथ नियंत्रण और आकर्षण के साथ विखंडन भी मौजूद रहते हैं। मनोविश्लेषणात्मक दृष्टि से देखें तो दूसरे व्यक्ति को पाने की इच्छा और उसकी स्वतंत्रता को लेकर असुरक्षा साथ-साथ चल सकती हैं। सविता सिंह की कविता इसी द्वंद्व को अपने ढंग से व्यक्त करती है। स्त्री किसी कलाकार की दृष्टि का विषय बन सकती है और उसकी इच्छा का केंद्र भी, लेकिन इससे कलाकार को उसकी आत्मा पर अधिकार नहीं मिल जाता।
इसी वजह से कविता के अंतिम हिस्से में कवयित्री पिकासो की कला से आगे बढ़कर उनके जीवन में आई स्त्रियों को याद करती हैं। यहाँ सवाल केवल चित्रों का नहीं रह जाता, बल्कि उन वास्तविक संबंधों का भी हो जाता है जिनमें कलाकार और स्त्रियाँ एक-दूसरे के सामने थे। 'द किस' जैसे चित्रों में हम प्रेम और इच्छा की तीव्रता देखते हैं, लेकिन कविता हमें याद दिलाती है कि चित्रित संबंध और जीवन में जिए गए संबंध एक ही चीज़ नहीं हैं। चित्र में मौजूद स्त्री और वास्तविक जीवन की स्त्री के बीच एक दूरी बनी रहती है। इस तरह 'द किस' को 'स्त्री की आत्मा और पिकासो' के साथ पढ़ने पर स्पष्ट होता है कि पिकासो की कला दूसरे व्यक्ति तक पहुँचने की तीव्र मानवीय इच्छा को व्यक्त करती है, जबकि सविता सिंह की रचना इस इच्छा की सीमाओं को सामने लाती है। पिकासो का चित्र निकटता का दृश्य रचता है, जबकि कविता उस निकटता के भीतर बची हुई दूरी की पहचान करती है। चित्र में शरीर एक-दूसरे के करीब आते हैं, लेकिन कविता याद दिलाती है कि आत्मा का एक ऐसा क्षेत्र भी है, जो हर आलिंगन, हर दृष्टि और हर चित्र से परे बना रहता है। यही वह जगह है जहाँ कविता पिकासो की कला से संवाद भी करती है और उसकी आलोचना भी।
स्मृति और इतिहास का संबंध आधुनिक मानवीय चिंतन का एक महत्त्वपूर्ण विषय रहा है। लंबे समय तक इतिहास को मुख्यतः राजाओं, युद्धों, साम्राज्यों, महान व्यक्तियों और निर्णायक घटनाओं की कथा के रूप में लिखा जाता रहा। लेकिन बीसवीं शताब्दी में इतिहास को देखने के नए तरीकों ने इस धारणा को चुनौती दी। फ़्रांसीसी इतिहासकार पियेर नोरा (Pierre Nora) ने स्मृति और इतिहास के बीच के तनाव को रेखांकित करते हुए बताया कि इतिहास अतीत का एक व्यवस्थित बौद्धिक पुनर्निर्माण है, जबकि स्मृति जीवित अनुभवों, भावनाओं और सामूहिक संवेदनाओं से बनती है। वाल्टर बेंजामिन (Walter Benjamin) ने इतिहास को विजेताओं की कथा मानने वाली प्रवृत्ति का विरोध किया। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि इतिहास में दबे हुए, पराजित और भुला दिए गए अनुभवों को भी फिर से सामने लाना ज़रूरी है। इसी तरह उपनिवेशोत्तर और सबाल्टर्न इतिहासलेखन ने सवाल उठाया कि इतिहास में किन लोगों की आवाजें दर्ज होती हैं और किनकी आवाजें अनुपस्थित रह जाती हैं। इस दृष्टि से स्मृति केवल अतीत को याद करने का माध्यम नहीं है, बल्कि इतिहास की स्थापित धारणाओं को चुनौती देने का एक तरीका भी है।
'स्त्री की आत्मा और पिकासो' कविता को स्मृति और इतिहास के इसी परिप्रेक्ष्य में पढ़ने पर उसके अर्थों का एक नया पक्ष सामने आता है। पहली नज़र में यह कविता पिकासो, उनकी चित्रकला और स्त्री के सवाल पर केंद्रित दिखाई देती है। लेकिन भीतर से यह इतिहास के निर्माण और स्मृति की राजनीति से भी जुड़ी हुई है। कविता यह सवाल उठाती है कि अतीत को बचाकर रखने का काम कौन करता है, इतिहास में किन लोगों को याद रखा जाता है और किनके अनुभव धीरे-धीरे विस्मृति में चले जाते हैं। कविता की शुरुआत ही समय और स्मृति के सवाल से होती है। प्रदर्शनी में उपस्थित कवयित्री को पिकासो की कृतियों में 'यूरोप का एक टुकड़ा समय' दिखाई देता है। यह कोई साधारण टिप्पणी नहीं है। यहाँ कला को समय को बचाकर रखने वाले माध्यम के रूप में देखा गया है। समय लगातार आगे बढ़ता रहता है और अपने पीछे छूटे अनुभवों को धीरे-धीरे मिटाता जाता है। लेकिन कला इस प्रवाह के विरुद्ध खड़ी होती है। वह किसी क्षण, अनुभव या ऐतिहासिक परिस्थिति को रूप देकर भविष्य के लिए सुरक्षित कर लेती है। इसी अर्थ में कवयित्री कहती हैं, 'यह सबकुछ एक कलाकार की वजह से बचा रहा था / नहीं तो समय खुद को निगलता ही रहता है।' यह कथन कलाकार को स्मृति के रक्षक के रूप में सामने लाता है। इस दृष्टि से पिकासो केवल एक चित्रकार नहीं रह जाते। वे बीसवीं शताब्दी के यूरोप के सांस्कृतिक इतिहास को सँजोने वाले कलाकार के रूप में दिखाई देते हैं। उनकी कृतियों में आधुनिक यूरोप के अनुभव, संकट, बेचैनियाँ और विडंबनाएँ सुरक्षित हैं। इस तरह कविता कला की ऐतिहासिक भूमिका को स्वीकार करती है। वह मानती है कि कलाकृतियाँ केवल सौंदर्य की वस्तुएँ नहीं होतीं, बल्कि अपने समय की स्मृतियों को भी अपने भीतर सँजोए रखती हैं।
लेकिन कविता यहीं नहीं रुकती। यदि वह केवल पिकासो की कलात्मक उपलब्धियों का उत्सव मनाती, तो उसका इतिहास-बोध पारंपरिक और एकरेखीय रह जाता। कविता का असली हस्तक्षेप इस बात में है कि वह इतिहास के इस स्थापित रूप के साथ दूसरी स्मृतियों को भी सामने लाती है। पिकासो का नाम इतिहास में सुरक्षित है। उनकी कृतियाँ संग्रहालयों में संरक्षित हैं और उनकी कलात्मक महानता को दुनिया भर में मान्यता मिली है। लेकिन क्या इतिहास केवल यहीं तक सीमित है? क्या उन स्त्रियों की स्मृतियाँ भी इतिहास का हिस्सा नहीं हैं, जिनके साथ पिकासो ने अपना जीवन बिताया?
यहीं कविता इतिहास की आधिकारिक संरचना में एक दरार पैदा करती है। वह महान कलाकार की स्मृति के साथ उन स्त्रियों की स्मृतियों को भी चर्चा के केंद्र में लाती है, जो अक्सर कला के इतिहास में हाशिए पर चली जाती हैं। यह दृष्टि वाल्टर बेंजामिन की उस चिंता की याद दिलाती है कि इतिहास को केवल विजेताओं या महान व्यक्तियों के नज़रिए से नहीं पढ़ा जाना चाहिए। 'स्त्री की आत्मा और पिकासो' पिकासो की कलात्मक उपलब्धियों को स्वीकार करती है, लेकिन साथ ही उन स्त्रियों की उपस्थिति को भी सामने लाती है जिनकी आवाजें अक्सर कलाकार की ख्याति के नीचे दब जाती हैं।
कविता के मध्य भाग में स्त्री की जटिलता, उसकी अप्राप्यता और उसकी स्वतंत्र सत्ता को लेकर जो विचार सामने आते हैं, वे भी स्मृति के सवाल से जुड़े हैं। स्त्री यहाँ किसी कलाकार की प्रेरणा या विषय मात्र नहीं है। वह अपने अनुभवों, दुःखों और रहस्यों के साथ एक स्वतंत्र अस्तित्व रखती है। इसका अर्थ यह है कि उसकी स्मृति भी कलाकार की स्मृति से अलग है। वह केवल इसलिए महत्त्वपूर्ण नहीं हो जाती कि किसी महान कलाकार के जीवन में उसकी जगह थी। उसका अपना इतिहास और अपना अनुभव-संसार भी है। कविता के अंतिम हिस्से में यह विचार और साफ़ होकर सामने आता है। जब कवयित्री एक 'थके बूढ़े कलाकार' को देखती हैं, तो उन्हें उन 'तमाम यातनाओं' की भी याद आती है, जो पिकासो ने अपने जीवन में उनके साथ संबंध रखने वाली स्त्रियों को दी थीं। फ़र्नाद ओलिविए (Fernande Olivier), ओल्गा खोखलोवा (Olga Khokhlova), मैरी-थेरेज़ वाल्टर (Marie-Thérèse Walter), डोरा मार (Dora Maar), फ़्रांस्वाज़ जिलो (Françoise Gilot) और जैकलीन रोक (Jacqueline Roque) जैसी स्त्रियों के साथ उनके संबंधों के बारे में लिखे गए विवरणों में प्रेम के साथ नियंत्रण, मानसिक हिंसा और भावनात्मक शोषण के आरोपों का भी उल्लेख मिलता है। ऐसे में स्मृति की दिशा बदल जाती है। अब स्मरण का केंद्र केवल कलाकार नहीं रहता, बल्कि उन स्त्रियों की ओर भी चला जाता है जिनके अनुभव आधिकारिक कला-इतिहास में अक्सर गौण बने रहते हैं। यह स्मरण महज़ किसी कलाकार की निजी ज़िंदगी के बारे में जानने की उत्सुकता नहीं है। इसके ज़रिये इतिहास को एक दूसरे नज़रिए से पढ़ने की कोशिश की जाती है। यहाँ कविता स्मृति को प्रतिरोध के रूप में इस्तेमाल करती है। वह उस प्रवृत्ति का विरोध करती है, जिसमें महान कलाकारों की उपलब्धियों के सामने उनके आसपास के लोगों के अनुभवों को महत्त्वहीन बना दिया जाता है। स्मृति यहाँ विस्मरण के विरुद्ध खड़ी होती है। वह उन स्त्रियों को फिर से सामने लाती है जिन्हें इतिहास ने अपने केंद्र में जगह नहीं दी।
इस दृष्टि से कविता को स्मृति और इतिहास के बीच संवाद के रूप में भी पढ़ा जा सकता है। इतिहास कलाकार पिकासो को सुरक्षित रखता है, जबकि स्मृति उन स्त्रियों को भी सामने लाती है जिनके अनुभव उनकी ख्याति के पीछे छूट सकते हैं। इतिहास कलाकार की उपलब्धियों को दर्ज करता है, जबकि स्मृति उसके संबंधों के भीतर मौजूद दुःख, पीड़ा और असमानता को भी याद रखती है। कविता इन दोनों को आमने-सामने रखती है और बताती है कि अतीत की समझ तब तक अधूरी है, जब तक उसमें ये दोनों पक्ष शामिल न हों। कविता का एक और उल्लेखनीय पहलू यह है कि वह इतिहास को केवल सार्वजनिक घटनाओं तक सीमित नहीं रखती। निजी जीवन, प्रेम, संबंध, पीड़ा और भावनात्मक अनुभव भी इतिहास का हिस्सा हैं। यह दृष्टि सामाजिक इतिहास और स्त्रीवादी इतिहासलेखन के करीब है। इन दृष्टियों ने दिखाया है कि घरेलू जीवन, निजी संबंध और स्त्रियों के अनुभव भी उतने ही ऐतिहासिक हैं जितनी बड़ी राजनीतिक घटनाएँ। कविता इसी व्यापक इतिहास-बोध को सामने लाती है।
वस्तुतः 'स्त्री की आत्मा और पिकासो' स्मृति और इतिहास के संबंध को जटिल और कई स्तरों पर प्रस्तुत करती है। वह कला की उस शक्ति को स्वीकार करती है जिसके ज़रिये समय और इतिहास सुरक्षित रहते हैं, लेकिन साथ ही यह भी बताती है कि इतिहास केवल महान कलाकारों की उपलब्धियों से नहीं बनता। उसमें वे लोग भी शामिल हैं जो अक्सर आधिकारिक अभिलेखों से बाहर रह जाते हैं। पिकासो की स्मृति के साथ उन स्त्रियों की स्मृति को जोड़कर कविता इतिहास की अधिक मानवीय, समावेशी और आलोचनात्मक समझ विकसित करती है। वह हमें सोचने के लिए प्रेरित करती है कि अतीत को याद करते समय हम केवल उन्हीं लोगों को क्यों याद रखें जिनके नाम इतिहास में दर्ज हैं। उन लोगों को क्यों न याद करें जिनके अनुभवों ने उस इतिहास को संभव बनाया और जिनकी आवाजें अक्सर उसके भीतर दबकर रह गईं? ज्ञानमीमांसा (Epistemology) दर्शन की वह शाखा है जो ज्ञान की प्रकृति, उसकी सीमाओं, उसकी वैधता और उसकी संभावनाओं पर विचार करती है। इसका एक बुनियादी सवाल यह है कि हम किसी वस्तु, व्यक्ति या संसार को वास्तव में कितना जान सकते हैं। पश्चिमी दर्शन में रेने देकार्त से लेकर इमानुएल कांट और एडमंड हुसर्ल तक यह प्रश्न अलग-अलग रूपों में सामने आता रहा है कि ज्ञान की सीमा कहाँ तक है और क्या कोई ऐसी सत्ता भी है जो हमारी समझ से बाहर रह जाती है। कांट ने वस्तु के ‘स्वयं में होने’ (thing-in-itself) और हमारे अनुभव में दिखाई देने वाली वस्तु के बीच भेद किया। इससे यह संकेत मिलता है कि मनुष्य का ज्ञान हमेशा कुछ माध्यमों से होकर बनता है और उसकी अपनी सीमाएँ होती हैं।
मार्टिन बूबर ने ‘मैं-तुम’ (I–Thou) संबंध की चर्चा करते हुए बताया कि दूसरे मनुष्य को किसी वस्तु की तरह जानना संभव नहीं है। दूसरा व्यक्ति हमेशा एक स्वतंत्र और जीवित उपस्थिति बना रहता है। इमैनुएल लेविनास ने ‘दूसरे’ (the Other) की ऐसी अवधारणा प्रस्तुत की, जिसके अनुसार दूसरा व्यक्ति हमारी समझ और अवधारणाओं से हमेशा बड़ा होता है। वह केवल हमारे ज्ञान का विषय बनकर नहीं रह सकता। सविता सिंह की कविता ‘स्त्री की आत्मा और पिकासो’ को ज्ञानमीमांसीय दृष्टि से पढ़ने पर स्पष्ट होता है कि उसका एक केंद्रीय सवाल भी यही है: क्या किसी दूसरे मनुष्य को पूरी तरह जाना जा सकता है?
‘स्त्री की आत्मा और पिकासो’ कविता का पूरा विन्यास इसी सवाल के इर्द-गिर्द बना दिखाई देता है। पिकासो यहाँ केवल एक चित्रकार नहीं हैं। वे उस मनुष्य का प्रतिनिधित्व करते हैं जो दूसरे को समझने, देखने और उसके सत्य तक पहुँचने की कोशिश करता है। कला इस कोशिश का माध्यम बनती है। चित्र बनाना केवल किसी के रूप को कागज़ या कैनवस पर उतारना नहीं, बल्कि उसे जानने की एक प्रक्रिया भी है। किसी चेहरे को बार-बार देखना, उसे अलग-अलग रूपों में चित्रित करना और उसकी आकृतियों तथा रेखाओं को पकड़ना, ये सब उस व्यक्ति तक पहुँचने के प्रयास हैं जो चित्र का विषय है। लेकिन कविता धीरे-धीरे यह दिखाती है कि यह प्रयास जितना गहरा होता जाता है, इसकी सीमाएँ भी उतनी ही स्पष्ट होने लगती हैं।
ज्ञानमीमांसीय दृष्टि से ‘स्त्री की आत्मा और पिकासो’ कविता की एक महत्त्वपूर्ण पंक्ति है, ‘पिकासो की राय में स्त्रियाँ मनुष्य की तमाम प्रजातियों में / सबसे क्षणभंगुर होती हैं / इसलिए उनके कई चेहरे होते हैं।’ यहाँ स्त्री के ‘कई चेहरे’ केवल उसके बाहरी रूपों की बहुलता नहीं बताते, बल्कि उस बदलाव की ओर भी संकेत करते हैं जो हर मनुष्य के अस्तित्व का हिस्सा है। यदि किसी व्यक्ति का कोई एक स्थिर रूप नहीं है और वह लगातार बदलता रहता है, तो उसके बारे में हमारा ज्ञान भी कभी पूरा नहीं हो सकता। ज्ञान अक्सर किसी स्थिर पहचान या निश्चित निष्कर्ष तक पहुँचने की कोशिश करता है, लेकिन कविता का संसार स्थिरता के बजाय परिवर्तनशीलता से बनता है। इसीलिए किसी व्यक्ति को जानने की प्रक्रिया कभी पूरी नहीं होती।
कविता में यह बात तब और स्पष्ट होती है, जब कहा जाता है कि ‘उनके चेहरे को बार-बार देखना होता है।’ यह पंक्ति देखने को एक बार की घटना नहीं रहने देती। यदि किसी व्यक्ति को समझने के लिए बार-बार देखना पड़ता है, तो इसका अर्थ है कि हर बार उसके बारे में कुछ नया सामने आता है। यहाँ ज्ञान कोई अंतिम उपलब्धि नहीं, बल्कि लगातार चलने वाली प्रक्रिया है। हर नया अवलोकन पहले से हासिल समझ की सीमाएँ उजागर करता है। इस तरह कविता उस धारणा पर सवाल उठाती है कि किसी व्यक्ति को एक बार समझ लेने के बाद उसका सत्य हमेशा के लिए हमारे पास सुरक्षित हो जाता है।
कविता की एक निर्णायक पंक्ति है, ‘वैसे उनकी सच्ची तस्वीर नहीं बनाई जा सकती।’ ज्ञानमीमांसीय दृष्टि से यह केवल चित्रकला का सवाल नहीं, बल्कि सत्य और ज्ञान का सवाल भी है। किसी व्यक्ति की सच्ची तस्वीर बनाने का अर्थ उसके संपूर्ण सत्य को जान लेने के रूप में समझा जा सकता है। कविता इस संभावना को स्वीकार नहीं करती। वह यह नहीं कहती कि हम दूसरे व्यक्ति को बिल्कुल नहीं जान सकते, बल्कि यह बताती है कि हमारा ज्ञान कभी पूरा नहीं होता। जानना और पूरी तरह जान लेना दो अलग बातें हैं। मनुष्य के भीतर हमेशा कुछ ऐसा बचा रहता है, जो हमारी समझ और ज्ञान की पहुँच से बाहर होता है।
यहाँ कविता ज्ञान और रहस्य के संबंध पर भी विचार करती है। आधुनिक ज्ञान-परंपरा में रहस्य को अक्सर अज्ञान की स्थिति माना गया है। लेकिन कविता रहस्य को केवल ज्ञान की कमी के रूप में नहीं देखती। ‘कलाकृतियों में वे बल्कि कम रहस्यमय दिखती हैं’ जैसी पंक्ति संकेत करती है कि किसी व्यक्ति का रहस्य भी उसकी वास्तविकता का हिस्सा है। उसे पूरी तरह समाप्त कर देना न तो संभव है और न ही शायद ज़रूरी। दूसरे शब्दों में, व्यक्ति का अस्तित्व उसके बारे में हमारे ज्ञान से बड़ा है। इसीलिए यहाँ रहस्य किसी कमी का नहीं, बल्कि मानवीय स्वतंत्रता का संकेत बन जाता है।
‘चाहे आप उन्हें नग्न ही क्यों न कर दें अपनी कृति में।’ इस पंक्ति का ज्ञानमीमांसीय अर्थ भी गहरा है। आम तौर पर यह माना जाता है कि किसी वस्तु या व्यक्ति को जितना अधिक अनावृत किया जाएगा, उसके बारे में उतना ही अधिक ज्ञान प्राप्त होगा। लेकिन कविता इस धारणा को चुनौती देती है। किसी को दृश्य रूप में पूरी तरह सामने ले आना और उसे वास्तव में जान लेना एक ही बात नहीं है। किसी व्यक्ति के बारे में अधिक जानकारी हासिल कर लेने, उसे अधिक देख लेने या उसके बहुत करीब पहुँच जाने से भी उसके संपूर्ण ज्ञान की गारंटी नहीं मिलती। इस तरह कविता उस विश्वास पर सवाल उठाती है कि अधिक जानकारी अपने आप अधिक समझ में बदल जाती है।
‘वे किसी को नहीं मिलतीं।’ यह पंक्ति भी ज्ञान की सीमाओं की ओर संकेत करती है। यहाँ ‘मिलना’ केवल संबंध का नहीं, बल्कि किसी को समझने और जानने का भी रूपक है। किसी व्यक्ति को पा लेना, उसे पूरी तरह समझ लेना या किसी अंतिम अर्थ में जान लेना संभव नहीं है। स्त्री यहाँ ऐसी स्वतंत्र सत्ता के रूप में सामने आती है, जो किसी दूसरे के ज्ञान संबंधी दावे को पूरी तरह स्वीकार नहीं करती। वह किसी की बौद्धिक संपत्ति नहीं बनती।
‘किसी दूसरे की आत्मा में भी नहीं झलकतीं।’ यह कथन ज्ञान की आत्मपरक सीमाओं को सामने लाता है। हम दूसरे व्यक्ति को अक्सर अपने अनुभवों, भावनाओं और कल्पनाओं के सहारे समझते हैं। लेकिन कविता बताती है कि दूसरा व्यक्ति हमारे भीतर पूरी तरह प्रतिबिंबित नहीं हो सकता। उसकी अपनी विशिष्टता बनी रहती है। यह विचार इमैनुएल लेविनास (Emmanuel Levinas) की उस अवधारणा के निकट दिखाई देता है, जिसके अनुसार दूसरा व्यक्ति हमारी अवधारणाओं से हमेशा बड़ा होता है। उसे पूरी तरह अपने ज्ञान के दायरे में समेटना संभव नहीं है।
‘वे अपने हाथ अपने दोशालों में छिपाकर रखना पसंद करती हैं।’ इस बिंब में भी ज्ञानमीमांसीय अर्थ छिपा है। यहाँ व्यक्ति अपनी आंतरिकता के एक हिस्से को सुरक्षित रखता है। यह किसी छल या गोपनीयता का संकेत नहीं, बल्कि अस्तित्व की स्वाभाविक स्थिति है। स्त्री ही नहीं, हर मनुष्य का एक हिस्सा ऐसा होता है जो अनकहा, अनदेखा और अनजाना बना रहता है। कविता इस अप्रकट हिस्से को स्वीकार करती है। यही वह क्षेत्र है जहाँ व्यक्ति की स्वतंत्रता और विशिष्टता बनी रहती है।
कविता का अंतिम हिस्सा इस सवाल को और जटिल बना देता है। पिकासो ने स्त्रियों को बार-बार चित्रित किया, उनके अनेक चेहरे बनाए और उन्हें अपनी कला का केंद्रीय विषय बनाया। लेकिन कवयित्री को अंततः उन स्त्रियों की यातनाएँ याद आती हैं। यह स्मरण बताता है कि किसी व्यक्ति को जानने का दावा करना और उसके अनुभव को वास्तव में समझ पाना अलग-अलग बातें हैं। कलाकार ने स्त्री के चेहरे को देखा, लेकिन क्या वह उसके दुःख को भी उसी गहराई से समझ पाया? कविता इसी अंतर को सामने लाती है।
इस तरह ‘स्त्री की आत्मा और पिकासो’ ज्ञानमीमांसीय स्तर पर मनुष्य को जानने की संभावना और उसकी सीमाओं, दोनों पर विचार करती है। कविता मानती है कि कला, दृष्टि और अनुभव हमें दूसरे व्यक्ति तक पहुँचने के साधन देते हैं, लेकिन साथ ही यह भी बताती है कि दूसरा व्यक्ति कभी पूरी तरह हमारे ज्ञान का विषय नहीं बन सकता। उसकी आंतरिकता का एक हिस्सा हमेशा हमारी पहुँच से बाहर रहता है। इसीलिए कविता किसी अंतिम ज्ञान की संभावना पर भरोसा नहीं करती। वह मनुष्य को एक जीवित और जटिल सत्ता के रूप में देखती है, जो हर चित्र, भाषा और व्याख्या से कुछ अधिक है। इस अर्थ में कविता ज्ञान के प्रति विनम्र रहना सिखाती है। दूसरे को जानने की कोशिश ज़रूरी है, लेकिन उसे पूरी तरह जान लेने का दावा अंततः एक भ्रम है।
अस्तित्ववादी दृष्टि से पढ़ने पर ‘स्त्री की आत्मा और पिकासो’ केवल स्त्री, चित्रकला या कलाकार के बारे में लिखी कविता नहीं रह जाती। यह मनुष्य के अस्तित्व, उसकी आंतरिक स्वतंत्रता और उसकी अप्राप्यता के सवालों से जुड़ जाती है। कविता बार-बार संकेत करती है कि मनुष्य को किसी स्थिर परिभाषा, निश्चित पहचान या बाहरी छवि में पूरी तरह समेटा नहीं जा सकता। उसके अस्तित्व का एक ऐसा हिस्सा हमेशा बचा रहता है, जो सभी व्याख्याओं, वर्गीकरणों और चित्रणों से बड़ा होता है।
कविता का केंद्रीय तनाव इसी बिंदु से पैदा होता है। एक ओर कलाकार है, जो देखने, समझने और रूप देने की कोशिश करता है। दूसरी ओर स्त्री है, जो बार-बार उस कोशिश की सीमाओं को सामने लाती है। यह तनाव वास्तव में मनुष्य को जानने और परिभाषित करने की इच्छा तथा उसकी आंतरिक स्वतंत्रता के बीच का तनाव है। कविता का आग्रह है कि कोई भी व्यक्ति किसी दूसरे की दृष्टि का पूरी तरह विषय नहीं बन सकता। उसके भीतर हमेशा कुछ ऐसा मौजूद रहता है, जो हर तरह की पकड़ से बाहर है।
‘स्त्रियाँ मनुष्य की तमाम प्रजातियों में / सबसे क्षणभंगुर होती हैं / इसलिए उनके कई चेहरे होते हैं।’ इन पंक्तियों को अस्तित्ववादी दृष्टि से देखें तो ‘कई चेहरे’ होना किसी स्थिर सार के अभाव की ओर संकेत करता है। मनुष्य किसी एक रूप, पहचान या निश्चित चरित्र में बँधा नहीं रहता। उसका अस्तित्व लगातार बनने, बदलने और स्वयं को नए रूप में ढालने की प्रक्रिया है। इसलिए किसी व्यक्ति का कोई अंतिम चेहरा नहीं होता। वह हर क्षण अपने पहले के रूप से अलग हो सकता है। कविता स्त्री के माध्यम से इस परिवर्तनशीलता को व्यक्त करती है, लेकिन इसका अर्थ व्यापक मानवीय स्थिति से जुड़ता है।
इसी वजह से कविता में बार-बार देखने के बावजूद अंतिम समझ हासिल नहीं हो पाती। ‘उनके चेहरे को बार-बार देखना होता है।’ यह पंक्ति केवल चित्रकार की रचना-प्रक्रिया का वर्णन नहीं करती, बल्कि मनुष्य को जानने की उस प्रक्रिया की ओर भी संकेत करती है जो कभी पूरी नहीं होती। किसी व्यक्ति को जितना अधिक समझने की कोशिश की जाती है, उतना ही यह एहसास गहरा होता है कि उसे किसी एक अर्थ में सीमित नहीं किया जा सकता। उसका अस्तित्व हर निश्चित निष्कर्ष से आगे निकल जाता है।
कविता का सबसे निर्णायक कथन है, ‘वैसे उनकी सच्ची तस्वीर नहीं बनाई जा सकती।’ अस्तित्ववादी दृष्टि से यह मनुष्य की स्वतंत्रता का कथन है। यदि किसी व्यक्ति की सच्ची तस्वीर बनाई जा सकती, तो उसे किसी निश्चित रूप में बाँधा जा सकता था। लेकिन कविता इस संभावना को नकारती है। व्यक्ति कोई तैयार वस्तु नहीं है, जिसका पूरा नक्शा बनाया जा सके। वह एक जीवित प्रक्रिया है, जिसमें हर क्षण स्वयं को नए सिरे से रचने की संभावना रहती है। इसीलिए उसका कोई अंतिम चित्र संभव नहीं है।
कविता में स्त्री उन सभी कोशिशों का प्रतिरोध करती है, जो उसे किसी एक पहचान में सीमित करना चाहती हैं। ‘किसी जाने-पहचाने रंग को नहीं हासिल वे।’ यह पंक्ति खास तौर पर विचारणीय है। यहाँ रंग केवल दृश्य रंग नहीं, बल्कि पहचान, वर्गीकरण और सामाजिक परिभाषा का रूपक भी है। किसी व्यक्ति को समझने के लिए हम अक्सर उसे किसी परिचित श्रेणी में रख देते हैं। लेकिन कविता बताती है कि व्यक्ति किसी पहले से तय अर्थ में पूरी तरह समा नहीं सकता। उसकी विशिष्टता हर सामान्यीकरण से बड़ी होती है।
‘किसी दूसरे की आत्मा में भी नहीं झलकतीं।’ यह पंक्ति व्यक्ति की स्वतंत्र सत्ता को और स्पष्ट करती है। मनुष्य को अक्सर उसके संबंधों के माध्यम से समझा जाता है। उसे किसी का साथी, प्रिय, परिवारजन या किसी सामाजिक भूमिका का हिस्सा मानकर परिभाषित किया जाता है। लेकिन कविता का आग्रह है कि व्यक्ति का अस्तित्व इन संबंधों से कहीं अधिक व्यापक है। वह किसी दूसरे की आत्मा का प्रतिबिंब नहीं है। उसकी अपनी आंतरिकता है, जो किसी और में पूरी तरह विलीन नहीं होती।
इस दृष्टि से कविता का एक उल्लेखनीय पक्ष यह है कि व्यक्ति को किसी बाहरी पहचान से पूरी तरह परिभाषित नहीं किया जा सकता। उसका अस्तित्व उसके सामाजिक रूपों से बड़ा है। कविता में स्त्री की उपस्थिति इसी स्वतंत्रता का प्रतीक बन जाती है। वह किसी एक निश्चित अर्थ में उपलब्ध नहीं होती, क्योंकि उसका अस्तित्व किसी भी परिभाषा से अधिक जटिल है।
‘चाहे आप उन्हें नग्न ही क्यों न कर दें अपनी कृति में।’ इस पंक्ति में शरीर और अस्तित्व के बीच का अंतर स्पष्ट होता है। किसी व्यक्ति को पूरी तरह दृश्य बना देना उसके अस्तित्व को पूरी तरह समझ लेना नहीं है। मनुष्य केवल वही नहीं है जो दिखाई देता है। उसके भीतर अनुभवों, स्मृतियों, इच्छाओं, आशंकाओं और संभावनाओं का ऐसा संसार होता है, जो बाहरी अनावरण से पूरी तरह सामने नहीं आ सकता। कविता इसी आंतरिक संसार की स्वतंत्रता को रेखांकित करती है।
‘वे किसी को नहीं मिलतीं।’ इस पंक्ति में व्यक्ति की अनन्यता का बोध है। यहाँ ‘न मिलना’ केवल दूरी या असंबद्धता का संकेत नहीं है। इसका अर्थ यह भी है कि कोई व्यक्ति किसी दूसरे की पूरी संपत्ति नहीं बन सकता। वह अपने भीतर ऐसी स्वतंत्रता बचाए रखता है, जो उसे दूसरों से अलग और विशिष्ट बनाती है। यही स्वतंत्रता उसकी मानवीय गरिमा का आधार है।
‘वे अपने हाथ अपने दोशालों में छिपाकर रखना पसंद करती हैं।’ यह बिंब कविता के अस्तित्ववादी अर्थ को और गहरा करता है। यहाँ व्यक्ति अपनी आंतरिकता के एक हिस्से को सुरक्षित रखता है। वह स्वयं को पूरी तरह दूसरों के सामने उपलब्ध नहीं कराता। यह केवल रहस्यप्रियता नहीं, बल्कि अस्तित्व की स्वाभाविक स्थिति है। मनुष्य का एक हिस्सा हमेशा अनकहा और अप्रकट रहता है। इसी अप्रकटता में उसकी स्वतंत्रता निहित है।
कविता का एक और महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि वह व्यक्ति को किसी स्थिर सारतत्त्व में सीमित नहीं करती। स्त्री यहाँ किसी निश्चित ‘स्त्री-स्वभाव’ का प्रतिनिधित्व नहीं करती। वह लगातार बदलती हुई, अनेक रूपों वाली और परिभाषाओं से बाहर जाती हुई उपस्थिति है। इस तरह कविता मनुष्य को किसी पूर्वनिर्धारित सार के आधार पर नहीं, बल्कि उसकी जीवित और गतिशील उपस्थिति के माध्यम से समझती है। व्यक्ति केवल वह नहीं है जो उसके बारे में कहा गया है। वह वह भी है जो हर परिभाषा से बाहर निकल जाता है।
कविता के अंतिम हिस्से में जब कवयित्री पिकासो को देखती हैं और साथ ही डोरा मार (Dora Maar) जैसी अनेक स्त्रियों को याद करती हैं, जिन्हें पिकासो ने कथित तौर पर पीड़ा पहुँचाई थी, तब अस्तित्व का प्रश्न नैतिक आयाम ग्रहण कर लेता है। यहाँ यह संकेत मिलता है कि किसी व्यक्ति को समझना केवल उसका चित्र बना देना नहीं है, बल्कि उसके स्वतंत्र अस्तित्व को स्वीकार करना भी है। दूसरे की स्वतंत्रता को पहचानना ही मानवीय संबंध का आधार है। यदि किसी व्यक्ति को केवल अपनी दृष्टि, इच्छा या रचना का विषय बना दिया जाए, तो उसकी स्वतंत्र सत्ता की उपेक्षा होती है।
इस तरह ‘स्त्री की आत्मा और पिकासो’ अस्तित्ववादी स्तर पर मनुष्य की विशिष्टता, स्वतंत्रता और अप्राप्यता को सामने लाती है। कविता बताती है कि कोई भी व्यक्ति किसी चित्र, भाषा, संबंध या परिभाषा में पूरी तरह नहीं समा सकता। उसके भीतर हमेशा कुछ ऐसा बचा रहता है, जो ज्ञान और प्रतिनिधित्व की हर कोशिश से परे है। यही वह क्षेत्र है जहाँ उसकी स्वतंत्र सत्ता स्थित है। इसलिए कविता का मूल आग्रह यह नहीं है कि स्त्री को समझा ही नहीं जा सकता, बल्कि यह है कि उसे किसी व्याख्या में पूरी तरह समेटा नहीं जा सकता। वह हर व्याख्या से बड़ी, हर चित्र से अधिक व्यापक और हर परिभाषा से अधिक जीवित बनी रहती है। यही उसकी मानवीय गरिमा है और यही कविता का गहरा अस्तित्ववादी आशय है।
कला-दर्शन के क्षेत्र में एक बुनियादी सवाल यह रहा है कि कला का उद्देश्य क्या है। क्या कला का काम यथार्थ की नकल करना है, जैसा कि लंबे समय तक पाश्चात्य सौंदर्यशास्त्र में माना जाता रहा? या कला यथार्थ को दोहराने के बजाय उसकी व्याख्या करती है? अथवा कला किसी वस्तु, व्यक्ति या अनुभव को पूरी तरह खोलकर सामने रखने के बजाय उसके उन पहलुओं की ओर संकेत करती है, जो सामान्य दृष्टि से ओझल रहते हैं? प्लेटो और अरस्तू से लेकर हेगेल, बेनेडेट्टो क्रोचे, आर. जी. कॉलिंगवुड, मार्टिन हाइडेगर और मॉरिस मर्लो-पोंती तक कला के स्वरूप पर विचार करने वाले चिंतकों ने इन सवालों के अलग-अलग उत्तर दिए हैं।
मार्टिन हाइडेगर ने द ओरिजिन ऑफ द वर्क ऑफ आर्ट (The Origin of the Work of Art) में तर्क दिया कि कला किसी वस्तु की प्रतिलिपि भर नहीं बनाती, बल्कि उसके सत्य को एक विशेष ढंग से सामने लाती है। लेकिन यह उद्घाटन पूर्ण अनावरण नहीं होता। उसमें रहस्य और अप्रकटता के लिए भी जगह बनी रहती है। हाइडेगर के अनुसार सत्य एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें प्रकट और अप्रकट दोनों साथ-साथ मौजूद रहते हैं। इसी तरह मॉरिस मर्लो-पोंती ने कला को दृश्य जगत की नकल करने के बजाय उसके अनुभवात्मक रहस्य से जुड़ी क्रिया के रूप में देखा। इन सैद्धांतिक संदर्भों में सविता सिंह की ‘स्त्री की आत्मा और पिकासो’ कविता को पढ़ें, तो वह कला की प्रकृति और उसकी सीमाओं पर विचार करती दिखाई देती है। कविता यह सवाल उठाती है कि क्या कला किसी व्यक्ति के सत्य को पूरी तरह सामने ला सकती है, या हर कलात्मक प्रस्तुति के भीतर कुछ ऐसा बचा रहता है जिसे पूरी तरह व्यक्त नहीं किया जा सकता।
‘स्त्री की आत्मा और पिकासो’ कविता के केंद्र में चित्रकार पाब्लो पिकासो हैं, जिन्हें आधुनिक कला के इतिहास में प्रतिनिधित्व की पारंपरिक अवधारणाओं को चुनौती देने वाले प्रमुख कलाकारों में गिना जाता है। उन्होंने यथार्थ को जस का तस चित्रित करने के बजाय उसे नए रूपों में देखने और दिखाने की कोशिश की। इसलिए कवयित्री का पिकासो को चुनना आकस्मिक नहीं है। यदि कोई कलाकार दृश्य जगत को देखने के नए तरीके खोजने का दावा कर सकता था, तो पिकासो निश्चित रूप से उनमें से एक थे। लेकिन कविता इसी कलाकार के माध्यम से यह सवाल उठाती है कि कला की पहुँच आखिर कहाँ तक है।
कविता की शुरुआत में कला को समय को सुरक्षित रखने की शक्ति के रूप में देखा गया है। पिकासो की कृतियों में ‘यूरोप का एक टुकड़ा समय’ बचा हुआ दिखाई देता है। यहाँ कला केवल सौंदर्य की वस्तु नहीं, बल्कि इतिहास और स्मृति को सँजोने का माध्यम भी है। कलाकार समय के प्रवाह में नष्ट हो जाने वाली चीज़ों को अपने काम के ज़रिये बचाकर रखता है। इस अर्थ में कला का एक काम यथार्थ को संरक्षित करना है। लेकिन कविता आगे बढ़ते हुए यह भी बताती है कि मनुष्य का सत्य समय के सत्य से कहीं अधिक जटिल है। इतिहास को बचाकर रखना और किसी की आत्मा को पूरी तरह समझ लेना एक ही बात नहीं है।
‘स्त्रियाँ मनुष्य की तमाम प्रजातियों में / सबसे क्षणभंगुर होती हैं / इसलिए उनके कई चेहरे होते हैं।’ इन पंक्तियों में कला की एक बुनियादी समस्या सामने आती है। यदि किसी व्यक्ति का अस्तित्व बहुल और परिवर्तनशील है, तो कला उसे किस रूप में प्रस्तुत करेगी? क्या एक चित्र, एक आकृति या एक रूप उसके पूरे सत्य को व्यक्त कर सकता है? पिकासो की चित्रकला का एक बड़ा प्रयास व्यक्ति को केवल एक दृष्टिकोण से देखने के बजाय उसे कई दृष्टिकोणों से देखना था। कविता इस प्रयास को स्वीकार करती है, लेकिन साथ ही यह भी दिखाती है कि अनेक दृष्टिकोण अपना लेने से भी किसी व्यक्ति की संपूर्णता को पकड़ लेने की गारंटी नहीं मिलती।
यहीं कविता कला की व्याख्यात्मक प्रकृति पर विचार करती है। ‘कलाकृतियों में वे बल्कि कम रहस्यमय दिखती हैं / शायद सुंदर ज्यादा।’― यह कथन संकेत करता है कि कला अपने विषय को केवल सामने नहीं लाती, बल्कि उसे एक विशेष रूप भी देती है। चित्र में दिखाई देने वाली स्त्री और जीवन में मौजूद स्त्री पूरी तरह एक नहीं हैं। कलाकृति अपने विषय को एक खास संरचना, दृश्यता और अर्थ प्रदान करती है। इस प्रक्रिया में कुछ पहलू सामने आते हैं, जबकि कुछ पीछे छूट जाते हैं। इसलिए कला यथार्थ का दर्पण भर नहीं है, बल्कि उसकी एक व्याख्या भी है।
लेकिन कविता कला को केवल व्याख्या तक सीमित नहीं रखती। वह इससे आगे बढ़कर पूछती है कि क्या कला का काम किसी मनुष्य को पूरी तरह समझा देना है। ‘उनके चेहरे को बार-बार देखना होता है।’ यह पंक्ति बताती है कि कला का संबंध किसी अंतिम ज्ञान से नहीं, बल्कि लगातार चलने वाली खोज से है। कलाकार बार-बार अपने विषय की ओर लौटता है, क्योंकि उसका विषय कभी पूरी तरह समाप्त नहीं होता। हर नया चित्र किसी अंतिम उत्तर के बजाय एक नए सवाल की तरह सामने आता है।
कविता का केंद्रीय कथन, ‘वैसे उनकी सच्ची तस्वीर नहीं बनाई जा सकती’, कला-दर्शन के संदर्भ में खास महत्त्व रखता है। यहाँ कविता प्रतिनिधित्व की असफलता की घोषणा नहीं करती, बल्कि कला की प्रकृति को एक अलग ढंग से समझने का रास्ता खोलती है। यदि किसी मनुष्य की ‘सच्ची तस्वीर’ नहीं बनाई जा सकती, तो इसका अर्थ यह नहीं कि कला निरर्थक है। इसका अर्थ यह है कि कला का मूल्य केवल इस बात से तय नहीं होता कि वह अपने विषय को कितनी पूर्णता से प्रस्तुत करती है। उसकी अपूर्णता भी अर्थपूर्ण हो सकती है। वह मनुष्य को पूरी तरह अपने भीतर समेटने के बजाय उसकी अगम्यता का अनुभव कराती है।
यहीं कविता कला और रहस्य के संबंध को नया अर्थ देती है। आम तौर पर माना जाता है कि कला का काम अज्ञात को ज्ञात बनाना है। लेकिन कविता यह भी संकेत करती है कि कला का एक काम रहस्य को रहस्य बने रहने देना है। यहाँ स्त्री का रहस्य किसी रोमानी कल्पना का हिस्सा नहीं है। वह इस बात की स्वीकृति है कि मनुष्य किसी भी चित्रण या प्रस्तुति से बड़ा होता है। कला उसकी संपूर्ण उपस्थिति को अपने भीतर समेट नहीं सकती।
‘चाहे आप उन्हें नग्न ही क्यों न कर दें अपनी कृति में।’― कला-दर्शन की दृष्टि से यह पंक्ति विचारणीय है। पश्चिमी कला-परंपरा में नग्नता को कई बार सत्य और प्रामाणिकता के साथ जोड़कर देखा गया है। लेकिन कविता इस संबंध पर सवाल उठाती है। शरीर का पूरा अनावरण आत्मा का अनावरण नहीं है। यहाँ कला की दृश्यता अपनी सीमा से टकराती है। जो सबसे अधिक दिखाई देता है, ज़रूरी नहीं कि वही सबसे अधिक समझ में भी आए। इस तरह कविता दृश्य प्रस्तुति और अस्तित्वगत सत्य के बीच की दूरी को बनाए रखती है।
‘वे किसी को नहीं मिलतीं / किसी जाने-पहचाने रंग को नहीं हासिल वे।’― इन पंक्तियों में कला की उस प्रवृत्ति पर भी सवाल उठता है, जिसके तहत वह अपने विषय को किसी खास रूप, रंग या अर्थ में बाँध देती है। कविता की स्त्री इन सभी तयशुदा रूपों से बाहर निकल जाती है। वह किसी एक निश्चित प्रतीक में नहीं बदलती। उसका अस्तित्व हर प्रतिनिधित्व से अधिक व्यापक बना रहता है।
‘किसी दूसरे की आत्मा में भी नहीं झलकतीं।’ ― यह कथन कला के उस दावे की सीमा भी सामने लाता है कि वह दूसरे के अनुभव को पूरी तरह पुनःसृजित कर सकती है। कला हमें दूसरे व्यक्ति के करीब ला सकती है, लेकिन उसे पूरी तरह हमारे सामने उपलब्ध नहीं करा सकती। उसके अस्तित्व का एक हिस्सा हमेशा ऐसा रहता है, जो किसी भी कलात्मक रूप से बाहर है।
‘वे अपने हाथ अपने दोशालों में छिपाकर रखना पसंद करती हैं।’ यह बिंब कविता के कला-दर्शन का सार प्रस्तुत करता है। यहाँ व्यक्ति का एक हिस्सा अप्रकट बना रहता है। कला का काम उस अप्रकटता को समाप्त कर देना नहीं, बल्कि उसकी मौजूदगी का एहसास कराना है। दूसरे शब्दों में, कला का मूल्य केवल इस बात में नहीं है कि वह हमें कितना कुछ दिखाती है, बल्कि इस बात में भी है कि वह हमें उस चीज़ का बोध कराती है, जो पूरी तरह दिखाई नहीं देती।
कविता के अंतिम हिस्से में जब कवयित्री पिकासो की कला से आगे बढ़ कर उनके जीवन में आई स्त्रियों को याद करती हैं, तो कला और जीवन के बीच एक और संबंध सामने आता है। यहाँ स्पष्ट होता है कि चित्रों में दिखाई देने वाली स्त्रियाँ और वास्तविक जीवन की स्त्रियाँ एक-दूसरे का पूरा विकल्प नहीं हैं। कला जीवन की जगह नहीं ले सकती। वह जीवन की ओर संकेत कर सकती है, उसे अर्थ दे सकती है, लेकिन उसे पूरी तरह अपने भीतर समेट नहीं सकती।
इसी संदर्भ में कविता का एक गहरा सौंदर्यशास्त्रीय निष्कर्ष सामने आता है। स्त्री की आत्मा चित्र में पूरी तरह उपस्थित नहीं होती, लेकिन उसका चित्र में पूरी तरह न समा पाना ही हमें उसके स्वतंत्र अस्तित्व का एहसास कराता है। जो चित्र में नहीं समा पाता, वही यह याद दिलाता है कि चित्र के बाहर भी एक जीवित, जटिल और स्वतंत्र मनुष्य मौजूद है। कला की सफलता इस बात में नहीं है कि वह उस अस्तित्व को पूरी तरह पकड़ ले, बल्कि इस बात में है कि वह उसकी अप्राप्यता का अनुभव संभव बनाए।
इस तरह 'स्त्री की आत्मा और पिकासो' कला-दर्शन के स्तर पर यह विचार सामने रखती है कि कला न तो यथार्थ की महज़ नकल है, न ही उसका पूर्ण उद्घाटन। वह यथार्थ को सामने लाते हुए उसकी अगम्यता को भी बनाए रखती है। । मनुष्य का सत्य किसी भी चित्र, भाषा या कलात्मक रूप से बड़ा है। कला का काम उस सत्य को समाप्त करना नहीं, बल्कि उसकी उपस्थिति का एहसास कराना है। यही कारण है कि कविता में स्त्री की आत्मा चित्रों के भीतर पूरी तरह दिखाई नहीं देती, फिर भी वही पूरी कविता की सबसे प्रभावशाली उपस्थिति बनी रहती है।
कुल मिलाकर, 'स्त्री की आत्मा और पिकासो' सिर्फ़ पिकासो या स्त्री के बारे में लिखी गई कविता नहीं है। यह कला और जीवन, प्रतिनिधित्व और यथार्थ, ज्ञान और रहस्य, कलाकार और नैतिकता, इतिहास और स्मृति तथा स्त्री और पुरुष-दृष्टि के संबंधों पर विचार करती है। इसी वजह से यह कविता अलग-अलग आलोचनात्मक दृष्टियों से पढ़ने के लिए एक सार्थक पाठ बन जाती है।
विश्व साहित्य में पिकासो और उनके जीवन से जुड़ी स्त्रियों पर कई तरह की साहित्यिक रचनाएँ मिलती हैं। इनमें कलाकार की प्रतिभा, स्त्रियों के अनुभव और कला के इतिहास में उनकी जगह जैसे सवाल उठाए गए हैं। इस संदर्भ में ब्रिटिश कवयित्री कैरल ऐन डफ़ी (Carol Ann Duffy) का नाम भी लिया जा सकता है। उनके संग्रह द वर्ल्डस वाइफ़ (The World's Wife, 1999) की कविताएँ महान पुरुषों, नायकों और मिथकीय पात्रों की कहानियों को स्त्रियों के दृष्टिकोण से दोबारा पढ़ती हैं। हालाँकि इस संग्रह को पिकासो पर केंद्रित रचनाओं के समान नहीं माना जा सकता, लेकिन स्त्री-अनुभव को केंद्र में लाने की उनकी काव्य-दृष्टि सविता सिंह की कविता के साथ तुलनात्मक विचार की गुंजाइश पैदा करती है।
पिकासो और उनके जीवन की स्त्रियों पर केंद्रित कविताओं के संदर्भमें एरिका जोंग (Erica Jong) की 'पिकासो'ज़ विमेन' (Picasso's Women) का भी उल्लेख किया जाता है। इस तरह की रचनाओं में पिकासो की कला के साथ उन स्त्रियों के जीवन और नियति पर ध्यान दिया जाता है, जिनके साथ उनके संबंध रहे। फ़र्नांद ओलिविए, डोरा मार, मैरी-थेरेज़ वाल्टर और फ्रांस्वाज़ जिलो जैसी स्त्रियों के अनुभवों के माध्यम से यह सवाल उठता है कि कला के इतिहास ने पिकासो को तो अमर बना दिया, लेकिन उनके जीवन और कला से जुड़ी स्त्रियों की आवाज़ों को कितनी जगह दी। ऐसी रचनाओं में कलाकार की प्रतिभा की स्वीकृति के साथ स्त्रियों की पीड़ा और इतिहास में उनकी उपस्थिति का सवाल भी सामने आता है।
यहाँ सविता सिंह की कविता का अलग स्वर दिखाई देता है। पिकासो और उनकी स्त्रियों के संबंधों पर केंद्रित रचनाएँ अक्सर कलाकार के व्यवहार के विरुद्ध स्त्रियों के अनुभवों को सामने लाती हैं। इसके विपरीत 'स्त्री की आत्मा और पिकासो' में एक व्यापक दार्शनिक सवाल भी मौजूद है। सविता सिंह पहले पिकासो की कलात्मक क्षमता को स्वीकार करती हैं। उनकी कृतियों में 'यूरोप का एक टुकड़ा समय' सुरक्षित दिखाई देता है। इसके बाद कविता उनकी स्त्री-दृष्टि और निजी जीवन से जुड़े नैतिक सवालों की ओर बढ़ती है। इस तरह वह केवल आरोप लगाने वाली रचना नहीं रह जाती, बल्कि कला, प्रतिनिधित्व और जीवन के संबंधों पर विचार करने लगती है।
पिकासो की साथी फ्रांस्वाज़ जिलो (Françoise Gilot) की आत्मकथात्मक पुस्तक लाइफ़ विद पिकासो (Life with Picasso), जिसे उन्होंने कार्लटन लेक (Carlton Lake) के साथ लिखा था, कविता नहीं है। फिर भी पिकासो और स्त्रियों के संबंधों पर होने वाली चर्चाओं के लिए यह एक उल्लेखनीय स्रोत है। इसमें जिलो ने पिकासो के साथ अपने संबंधों और उनके व्यवहार के बारे में अपने अनुभव दर्ज किए हैं।
पिकासो के जीवन पर आधारित बाद की कई साहित्यिक रचनाओं में कलाकार की प्रतिभा और उसके निजी संबंधों की जटिलताओं के बीच तनाव को समझने के लिए ऐसे संस्मरण उपयोगी संदर्भ बनते हैं।
तुलनात्मक दृष्टि से देखें तो सविता सिंह की 'स्त्री की आत्मा और पिकासो' की खासियत यह है कि वह केवल 'पिकासो की स्त्रियों' की कहानी नहीं कहती, बल्कि 'स्त्री की आत्मा' का प्रश्न उठाती है। उसका केंद्र किसी कलाकार की जीवनी या उसके संबंधों का इतिहास भर नहीं है। कविता का मूल सवाल यह है कि क्या महान कलाकार भी स्त्री की आत्मा को पूरी तरह चित्रित कर सकता है। इसलिए जहाँ पिकासो और उनके जीवन की स्त्रियों पर केंद्रित कई रचनाएँ उनके संबंधों की कहानी सामने लाती हैं, वहीं सविता सिंह की कविता कला, प्रतिनिधित्व, नैतिकता और स्त्री-अस्तित्व से संबंधित सवालों को एक साथ विचार का विषय बनाती है। यही उसकी ख़ासियत है।
सविता सिंह की 'स्त्री की आत्मा और पिकासो' को ग्रेस निकोल्स की कविता 'वीपिंग वुमन' (Weeping Woman) के साथ रखकर पढ़ने से स्त्री की पहचान और पुरुष कलाकार के नज़रिए के बीच का तनाव साफ़ दिखाई देता है। दोनों रचनाएँ अलग-अलग ढंग से यह सवाल उठाती हैं कि किसी स्त्री को चित्रित कर देना क्या उसे समझ लेने के बराबर है? क्या कलाकार की बनाई हुई छवि में उस स्त्री का पूरा जीवन, उसकी संवेदनाएँ और उसकी अपनी पहचान समा सकती हैं? इन सवालों के सहारे दोनों कविताओं के बीच एक सार्थक संवाद बनाया जा सकता है।
निकोल्स की कविता पिकासो की प्रसिद्ध पेंटिंग 'द वीपिंग वुमन' (The Weeping Woman) से जुड़ी है। इस पेंटिंग में डोरा मार का चेहरा आँसुओं और विकृत रेखाओं के माध्यम से सामने आता है। निकोल्स अपनी कविता में इस चित्रित स्त्री को बोलने का अवसर देती हैं। कविता का सबसे चर्चित पंक्ति है, 'पिकासो, मुझे मेरा चेहरा वापस चाहिए' (Picasso, I want my face back)। यह माँग सिर्फ़ चेहरे की स्वाभाविक बनावट वापस पाने की माँग नहीं है। इसके भीतर अपनी पहचान पर अपना अधिकार फिर से हासिल करने की इच्छा भी है। पिकासो ने डोरा मार को जिस रूप में चित्रित किया, वह कला के इतिहास में एक प्रसिद्ध छवि बन गया; लेकिन उस छवि और उसके पीछे मौजूद स्त्री के अपने अनुभवों के बीच दूरी बनी रहती है। निकोल्स की कविता इसी दूरी को सामने लाती है। वह मानो पूछती हैं कि किसी कलाकार की बनाई हुई छवि को उस स्त्री का सम्पूर्ण व्यक्तित्व कैसे मान लिया जाए, जबकि उसका अपना अनुभव उस छवि से कहीं अधिक व्यापक है।
कविता में आगे चलकर डोरा मार अपनी स्थिति को और स्पष्ट करती है। वह कहती है, 'पिकासो की कला पिकासो की कला है; वह डोरा मार नहीं है' (Picasso's art is Picasso's art. / Not one is Dora Maar)। इस कथन में कलाकार और उसकी बनाई हुई छवि के बीच का फ़र्क़ साफ़ हो जाता है। पिकासो की कला अपनी जगह है, लेकिन डोरा मार का जीवन, उसकी संवेदनाएँ और उसकी अपनी कलात्मक पहचान उस कला में पूरी तरह समा नहीं जातीं। वह केवल पिकासो की प्रेरणा या उसकी कला का विषय नहीं है; उसका अपना स्वतंत्र अस्तित्व भी है। निकोल्स की कविता में यह पहचान धीरे-धीरे उभरती है। डोरा मार पहले अपनी विकृत छवि से परेशान होती है, फिर अपनी प्रसिद्धि और कला में अपनी जगह पर विचार करती है और अंततः पिकासो की दृष्टि से अलग अपनी पहचान को समझने लगती है। इस तरह कविता चित्र में कैद स्त्री को अपनी आवाज़ और अपना पक्ष रखने का अवसर देती है।
सविता सिंह की रचना से इसकी तुलना करते हुए यह देखना ज़रूरी है कि दोनों रचनाएँ एक ही प्रश्न को अलग-अलग स्तरों पर उठाती हैं। निकोल्स की कविता में डोरा मार की आवाज़ के ज़रिये यह माँग सामने आती है कि उसे पिकासो की बनाई हुई छवि तक सीमित न किया जाए। सविता सिंह को भी स्त्री को पुरुष कलाकार की दृष्टि से परे देखने की ज़रूरत महसूस होती है, लेकिन यहाँ प्रश्न स्त्री की आत्मा तक पहुँचने का है। किसी स्त्री के चेहरे, शरीर, दुख या प्रेम को चित्रित कर देना उसके आंतरिक संसार को जान लेने के बराबर नहीं है। स्त्री की आत्मा का अपना एक ऐसा संसार है जिसे कोई बाहरी दृष्टि पूरी तरह अपने अधिकार में नहीं ले सकती। इस अर्थ में निकोल्स की कविता सविता सिंह की कविता के साथ एक सार्थक संवाद बनाती है: एक ओर स्त्री अपनी छवि वापस माँगती है, दूसरी ओर स्त्री की आत्मा को किसी कलाकार की दृष्टि में पूरी तरह समेट देने की सम्भावना पर सवाल उठता है।
इस क्रम में फ्रांसिन स्टर्ल की कविता 'ड्रीमिंग ऑफ़
पिकासो' (Dreaming of Picasso) का उल्लेख भी किया जा सकता है। इस कविता में पिकासो की पत्नियों, प्रेमिकाओं और माताओं के चेहरे कवयित्री के स्वप्न में बिखरे और अलग-अलग आकारों में उभरते हैं। इन चेहरों को देखते हुए कवयित्री की अपनी दृष्टि भी उनसे प्रभावित होने लगती है। वह अपने बारे में सोचती है, 'और मेरी अपनी जिज्ञासु आँख' (and my own curious eye), जो देखी हुई चीज़ों की ओर बढ़ती है। कविता के अंत में उसे अपनी ही आँख विकृत और चेहरे से अलग तैरती हुई दिखाई देती है- 'अपनी आँख को विकृत, लोहे जैसे गाल के ऊपर तैरते हुए' (my own eye, distorted / and floating above an iron cheek) I
यहाँ पिकासो की चित्र-शैली केवल उनकी बनाई हुई स्त्रियों के चेहरों तक सीमित नहीं रहती; वह देखने वाले की दृष्टि को भी प्रभावित करती है। स्टर्ल की कविता इस बात पर ध्यान दिलाती है कि कलाकार की बनाई हुई छवियाँ हमारे देखने और समझने के तरीके को भी बदल सकती हैं। सविता सिंह की रचना के संदर्भ में यह सवाल उठाया जा सकता है कि जब स्त्री को किसी पुरुष कलाकार की दृष्टि से देखा जाता है, तो क्या उसकी अपनी पहचान उसी दृष्टि के अनुसार तय होने लगती है? फिर भी दोनों कविताओं का ज़ोर अलग है। स्टर्ल की कविता में चित्र-शैली, दृष्टि और आत्म-छवि के बीच का सम्बन्ध अधिक स्पष्ट है, जबकि सविता सिंह की कविता स्त्री की आत्मा और उसके स्वतंत्र अस्तित्व के प्रश्न को केन्द्र में रहती है।
इन दोनों उदाहरणों के बाद मारी डॉज़ के कविता-संग्रह "विमेन ऑफ़ द मिनोटॉर : ले पोएम दे फेम द पिकासो" (Women of the Minotaur: Les Poèmes des femmes de Picasso) का उल्लेख संक्षेप में किया जा सकता है। इस संग्रह में फ़र्नांद ओलिविए, ईवा गूएल, मारी-थेरेज़ वाल्टर, डोरा मार और फ़्राँस्वाज़ जिलोट जैसी स्त्रियों के अनुभवों को अलग-अलग कविताओं में सामने लाया गया है।
संग्रह का महत्त्व इस बात में है कि पिकासो के जीवन को केवल महान कलाकार की कहानी मानने के बजाय उन स्त्रियों के अनुभवों की ओर भी ध्यान दिया जाता है, जो उसके जीवन और कला से जुड़ी रही थीं। यहाँ तुलना का आधार स्त्रियों की अलग-अलग आवाज़ों और अनुभवों को जगह देना है। सविता सिंह की कविता से इसका सम्बन्ध इसी बिन्दु पर बनता है, हालाँकि सविता सिंह का प्रश्न किसी एक स्त्री की जीवन-कथा तक सीमित नहीं है। वह स्त्री की आंतरिक सत्ता और उसे समझने की सीमाओं पर विचार करती हैं। इन कविताओं की तुलना से यह स्पष्ट होता है कि पिकासो की कला में स्त्री की उपस्थिति और स्त्री के अपने अस्तित्व के बीच फ़र्क करना ज़रूरी है। ग्रेस निकोल्स की कविता डोरा मार को अपनी पहचान वापस माँगने की आवाज़ देती है; फ्रांसिन स्टर्ल की कविता यह दिखाती है कि कलाकार की दृष्टि देखने वाले की अपनी छवि को भी प्रभावित कर सकती है; और मारी डॉज़ का संग्रह पिकासो से जुड़ी अनेक स्त्रियों के अनुभवों को जगह देता है। सविता सिंह की "स्त्री की आत्मा और पिकासो" इन प्रश्नों से जुड़ती है, लेकिन उसका अनोखापन इस बात में है कि वह स्त्री की आत्मा को किसी चित्र, किसी पुरुष की दृष्टि या किसी एक जीवन-कथा में पूरी तरह समेट देने की धारणा को प्रश्नांकित करती है। इस तरह तुलना का उद्देश्य इन रचनाओं को एक जैसा साबित करना नहीं, बल्कि यह समझना है कि वे स्त्री की पहचान, स्वतंत्रता और आंतरिक संसार के प्रश्न को किस तरह अलग-अलग ढंग से सामने लाती हैं।
सन्दर्भ
बुनियादी पाठ
सिंह, सविता. 'स्त्री की आत्मा और पिकासो' (कविता). 'पुस्तकनामा' (संपादकः राकेश बिहारी). 2026 सिंह, सविता. अपने जैसा जीवन, 2023. राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली
सिंह, सविता. खोई हुई चीजों का शोक 2021. राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली
सिंह, सविता. नींद थी और रात थी. 2025. राधाकृष्ण प्रकाशन. दिल्ली
सिंह, सविता. प्रेम भी एक यातना है. 2025. राजकमल प्रकाशन, दिल्ली.
सिंह, सविता. स्वप्न समय. 2025. राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली सिंह, सविता. वासना एक नदी का नाम है. 2024. वाणी प्रकाशन, दिल्ली
अन्य ग्रन्थ
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(प्रोफ़ेसर एवं पूर्व-अध्यक्ष (सेवानिवृत्त), हिन्दी विभाग, हैदराबाद विश्वविद्यालय)
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ई मेल : raviranjan@uohyd.ac.in
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