पंकज चौधरी का आलेख 'समकालीन हिंदी कविता के देसी कवि दिनेश कुशवाह'
दिनेश कुशवाह हिन्दू समाज में कई बेसिर पैर की ऐसी परम्पराएं आज भी प्रचलित हैं जिन्होंने हमारे देश को बेहिसाब नुकसान पहुंचाया है। जाति व्यवस्था ऐसी ही परम्परा है जिसमें समाज के एक वर्ग को जानवरों से भी बदतर माना जाता है। उनके साथ मानवोचित व्यवहार आज भी एक सपना है। कवि दिनेश कुशवाह ने इन्हें 'इतिहास के अभागे' कहा है। यह उनके एक कविता संग्रह का नाम भी है। अपनी कविताओं में कवि ने इस जाति व्यवस्था की हकीकत को सामने रखा है। कवि पंकज चौधरी ने उनके संग्रहों के हवाले से एक महत्त्वपूर्ण आलेख लिखा है। पंकज लिखते हैं ' अब सवाल यह पैदा होता है कि जाति जैसे झूठ को किसने सबसे बड़ा सच बनाया? वही न, जिसने जाति की आड़ में हजारों साल से जीवन के तमाम कारोबार और प्रपंचों को बदस्तूर जारी रखा और यही समझता रहा कि दुनिया ऐसे ही चलती है। आखिर कवि दिनेश कुशवाह ने भी तो इस बात को स्वीकारा कि जाति भले ही सबसे बड़ा झूठ हो लेकिन आज वह सबसे बड़ी सच्चाई बन गई है। अगर गौर से देखें तो सम्पूर्ण भारतीय साहित्य ‘जाति’ की बुनियाद पर आपको टिका हुआ मिलेगा। ऐसा इसलिए क्योंकि जाति ही परोक्ष रूप से ...