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शुक्ला चौधरी की कहानी 'सुनो तो'

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      रोजमर्रा का रहन सहन ही अन्ततः एक   समूचा जीवन बन जाता है। इस रोजमर्रा के जीवन के हर पल को शिद्दत से जीने वाले लोग जीवन को उत्सव की तरह जीते हैं। छोटा से छोटा पल भी प्यार के साथ जीने का नाम है जिंदगी। इस रोजमर्रा के सामान्य जीवन को ले कर ही शुक्ला चौधरी ने कहानी लिखी ' सुनो तो ' । यह कहानी हमें भास्कर चौधरी के सौजन्य से ही प्राप्त हुई है। शुक्ला चौधरी को नमन करते हुए आज पहली बार पर हम प्रस्तुत कर रहे हैं शुक्ला चौधरी की कहानी   ' सुनो तो ' ।     सुनो तो     शुक्ला चौधुरी     क्या सच है , सच है कि हम दोनों साठ - सत्तर पार की उम्र में भी प्यार में डूबे हुए हैं ? मैं तुम्हारे कंधे पर सर रख कर खिलखिला रही हूँ और तुम मुझे मोजे पहनने को कह रहे हो ... " लो चलो उठो , मोजे पहन लो ...."   मैं तूतिया रंग की लेगिंस , उस पर टी - शर्ट लम्बी बाँह की पहन लेती हूँ ‍‍ । तु...