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सुशील कुमार का आलेख "काव्य परंपरा का 'अवाँ-गार्द'.. ?"

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  गीत चतुर्वेदी  समकालीन कवियों में जिन कवियों की चर्चा सर्वाधिक होती है उनमें कवि गीत चतुर्वेदी का नाम अग्रणी है। इस बात में कोई दो राय नहीं कि उनके पास अपनी एक आकर्षक भाषा है। अपने बिंबों के इस्तेमाल के दम पर गीत अक्सर अपने पाठकों को चकित कर देते हैं। लेकिन हिन्दी आलोचना की दिक्कत यह है कि वह अरुण कमल, राजेश जोशी, वीरेन डंगवाल, मंगलेश डबराल से आगे अब तक बढ़ ही नहीं पाई है। गीत चतुर्वेदी की चर्चा भले ही वैश्विक स्तर पर हुई हो, हिन्दी में उनकी कवित्व का मूल्यांकन अब तक नहीं हो पाया है। कवि आलोचक सुशील कुमार अपनी बेबाकी के लिए जाने जाते हैं। सुशील ने गीत चतुर्वेदी की कविता का एक आलोचनात्मक मूल्यांकन प्रस्तुत किया है। आइए आज पहली बार हम पढ़ते हैं सुशील कुमार का आलेख "काव्य परंपरा का 'अवाँ-गार्द'.. ?" "काव्य परंपरा का 'अवाँ-गार्द'.. ?" (गीत चतुर्वेदी की कविता) सुशील कुमार  जिस हिंदी लेखक को कविता के लिए भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार, स्पंदन कृति सम्मान, वाग्धारा नवरत्न सम्मान तथा गल्प के लिए कृष्ण प्रताप कथा सम्मान, शैलेश मटियानी कथा सम्मान, कृष्ण बलदेव वै...