सुबोध शुक्ल
पल-पल का हिसाब लेती कविता (भगवत रावत का कविता सन्दर्भ) एक पुरानी ग्रीक कहानी याद आ रही है। एक देवपुत्र था-प्रॉमिथियम, धरती पर रहने वाली एक सुन्दरी से प्रेम कर बैठा। परमेश्वर ने सजा सुनायी कि लड़की को छोडो या दण्ड भोगो। प्रॉमिथियस एक निर्दोष प्रेमी की तरह दण्ड को तत्पर हो गया। सजा दी गयी। एक गिद्ध प्रॉमिथियस के कलेजे को फाड़-फाड़ कर निकालेगा, उसे खायेगा, उड़ जायेगा और देवता होने के कारण यानी की अमर होने के कारण रातों-रात एक नया कलेजा पैदा हो जायेगा और पुनः गिद्ध को आ कर उसे नष्ट करना होगा। यह क्रम अहर्निश चलता रहेगा। हर धर्मशास्त्र के लोक मिथक, अपने किस्म के अदृष्ट माया लोक, अपरिभाषित नीति मानकों, अप्रतिहत अस्वीकृत दांवों और अन्तर्विसंगतियों से जूझते नायकों के श्वेत पत्र की तरह हैं। मैं जन-विश्वासों तथा लोक -आस्थाओं के समानान्तर जीवन-संसार को एक लिहाज से स्वीकारणीय पाता हूँ। कथाओं का निर्माण एक समूची संस्कृति का अपनी ‘उपस्थिति’ से अपने ‘अस्तित्व’ में संक्रमण है। प्रत्येक युग अपने समय के संभावित तर्क के साथ-साथ अपनी प्रस्तावित कल्पना का भी साक्षी होता है। यह अवश्य विचारणीय है कि य...