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सुप्रिया पाठक का आलेख 'बापू के जन्मदिन पर ‘बा’ की याद'

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  कस्तूरबा गांधी  गांधी जी के महान बनने में जिनका हाथ था वे प्रायः अलक्षित ही रहीं। कस्तूरबा पर कम लिखा भी गया है। कस्तूरबा जिन्हें प्यार से 'बा' भी कहा जाता है, गांधी जी की सहधर्मिणी ही नहीं बल्कि एक मित्र और उनके लिए प्रेरक की तरह थीं। गांधी जी खुद भी यह स्वीकार करते हैं कि 'कस्तूरबा उनके जीवन की सहयात्री शक्ति और जीवन का अभिन्न अंग थी'। सुप्रिया पाठक अपने आलेख में लिखती हैं कि 'कई मौके ऐसे आए जब लगा कि गांधी जी कस्तूरबा को समझ नहीं पाए। दूसरे शब्दों में कहें तो कस्तूरबा के मन को समझने में गांधी जी असमर्थ रहे। बा के जीवन में ऐसे अनेक पड़ाव है जब ऐसा लगा कि वह निसहाय पत्नी के रूप में दिख रही हैं एवं एक गर्वीले एवं स्वाभिमानी पति के निर्णयों को मौन रह कर मानने के अलावा उनके पास कोई दूसरा चारा नहीं है लेकिन दूसरी ओर ऐसे भी मौके दिखाई पड़ते हैं जब उन्होंने अपने अधिकार का बेझिझक प्रयोग किया साथ ही अपनी पत्नी धर्म को पूरी निष्ठा और संकल्प के साथ निभाया भी।' आज गांधी जयंती के अवसर पर हम उनकी स्मृति को याद करते हुए पहली बार पर प्रस्तुत कर रहे हैं सुप्रिया पाठक का आलेख ...