गोपाल प्रधान का आलेख ‘पूंजी’ का यूरोप में प्रसार
पूंजी कार्ल मार्क्स द्वारा लिखा गया युगांतकारी ग्रंथ है। इस ग्रंथ को शुरुआत में आलोचनाओं का सामना करना पडा। प्रतिभा से ईर्ष्या कोई नयी बात नहीं। बहरहाल मार्क्स द्वारा रचित इस ग्रंथ में वह बात थी जिससे शीघ्र ही इस ग्रंथ को लोकप्रियता मिलनी शुरु हो गयी। बैक्स ने तो न केवल यह माना कि ‘ पूंजी ’ इस ‘ सदी की सबसे महत्व की किताबों में से एक है ’, बल्कि मार्क्स की शैली की भी प्रशंसा की और उसकी तुलना इसके ‘ आकर्षण और उमंग ’, इसके ‘ हास्य ’ और इसकी ‘ सर्वाधिक अमूर्त सिद्धांतों की अत्यंत बोधगम्य प्रस्तुति ’ के लिए शापेनहावर से की। मार्चेलो मुस्तो की किताब ‘ मार्क्स के आखिरी दिन ’ का प्रवाहपूर्ण अनुवाद किया है प्रख्यात मार्क्सवादी आलोचक गोपाल प्रधान ने। इस किताब का एक महत्त्वपूर्ण अध्याय हम पहली बार के पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं। तो आइए आज पहली बार पर पढते हैं गोपाल प्रधान का आलेख ‘ पूंजी का यूरोप में प्रसार ’ । गोपाल प्रधान बुजुर्ग की मकबूलियत ‘ पूंजी ’ का यूरोप मे...