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रमाकान्त राय की समीक्षा 'चक्रधर की साहित्य धारा'

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आज पत्र-पत्रिकाओं में छपने वाली साहित्यिक प्रतिक्रियाओं को भले ही हल्के में लिया जाता हो लेकिन इसका एक आशय हुआ करता है। समीक्षा कैसे की जाती है और रचनाओं पर कैसे बेलाग प्रतिक्रिया व्यक्त की जानी चाहिए इसके बारे में हम मार्कंडेय की इसी तरह की उन टिप्पणियों को पढ़ कर जाना सकते हैं, जिसे उन्होंने कभी हैदराबाद से छपने वाली प्रतिष्ठित पत्रिका 'कल्पना' नामक पत्रिका के लिए लिखा था। ये टिप्पणियाँ उन्होंने चक्रधर के छद्म नाम से साहित्य धारा कॉलम के लिए की थी। अब यह एक पुस्तक के रूप में प्रकाशित हो चुकी हैं। इसी पुस्तक पर एक सारगर्भित समीक्षा लिखी है युवा आलोचक रमाकान्त राय ने। 'चक्रधर की साहित्य धारा' रमाकान्त राय  पत्र पत्रिकाओं के लिए पाठक का कितना महत्त्व है- इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि लगभग हर पत्र-पत्रिका में पाठकों के पत्र का एक स्तम्भ हुआ करता है। समाचार पत्र तो इसे बाकायदा सम्पादकीय पन्ने पर प्रकाशित करते हैं। सम्पादकीय पन्ने को पाठकों के पत्र के बिना अधूरा माना जाता है। पाठक के पत्र को पढ़ कर हम आसानी से अनुमान लगा सकते हैं कि पत्र कितना गंभीर ...

रमाकान्त राय

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आज प्रख्यात रचनाकार राही मासूम रजा का जन्मदिन है। रजा की ख्याति उनके उपन्यासों के साथ-साथ टेलीविजन धारावाहिक 'महाभारत' के संवाद लेखन से भी है। रजा के उपन्यास 'आधा गाँव' को बेहतर उपन्यासों की सूची में शुमार किया जाता है। रजा ने स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व एवं बाद के कुछ वर्षों की कथा को इस उपन्यास का विषय बनाया है। आंचलिकता के विमर्श से आगे परिभाषित किया जाय तो यह उपन्यास विभाजन एवं साम्प्रदायिकता से हमारा सीधा साक्षात्कार कराता है। रमाकांत राय ने रजा के इस उपन्यास में आये हिन्दू पात्रों को ले कर साम्प्रदायिकता के प्रश्नों पर गंभीर विमर्श किया है। रजा के जन्मदिन के विशेष अवसर पर आपके लिए प्रस्तुत है रमाकांत राय का यह आलेख 'आधा गाँव के हिन्दू।'       ‘आधा गाँव’ के हिन्दू                                 राही मासूम रज़ा का प्रसिद्ध उपन्यास ‘आधा गाँव’ (1966) हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ उपन्यासों में एक है। ‘वर्तमान साहित्य’ के ‘शताब्दी कथा साह...

रमाकान्त राय

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   दंगे किसी भी समाज और राष्ट्र के लिए भयावह त्रासदी की तरह होते हैं। दुर्भाग्यवश भारत आजादी के बहुत पहले से लेकर आज तक इस दंश को लगातार भुगतता रहा है। इन दंगों में इधर एक ख़ास प्रवृत्ति दिखाई पडी है - महिलाओं की इनमें सक्रिय भूमिका। युवा साथी रमाकांत राय ने अपने इस सुविचारित आलेख में इस प्रवृत्ति पर तर्कपूर्ण ढंग से प्रकाश डाला है। पहली बार के पाठकों के लिए प्रस्तुत है रमाकांत का यह आलेख 'साम्प्रदायिकता, दंगे और महिलाओं की बदलती भूमिका।'                      साम्प्रदायिकता, दंगे और महिलाओं की बदलती भूमिका उत्तर-आधुनिकता के दर्शन ने तमाम कुरूपताओं के मध्य जो प्रशंसनीय कार्य किया है वह है हाशिए का बहस तलब बनाना। दलित-विमर्श और स्त्री-विमर्श हिन्दी में इसी दर्शन की देन हैं जो कभी हाशिए के मुद्दे कहे जाते थे। भूमण्डलीकरण ने उत्तर-आधुनिकता के दर्शन को मजबूती से स्थापित किया है। भारत में 1991 से शुरू हुए उदारीकरण ने भूमण्डलीकरण के लिए अनुकूल वातावरण तैयार...