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विनोद दास का संस्मरण 'सज्जनता और ज्ञान की चमक: कुँवर नारायण'

  संस्मरण  'सज्जनता और ज्ञान की चमक: कुँवर नारायण'   विनोद दास  हम उन यादों से बार-बार गुज़रना चाहते हैं जो हमारे साथ पहली बार घटित होती हैं। पहली बार देखी गयी फिल्म। पहली बार पढ़ी गयी किताब। पहली बार लिखी गयी कविता। किसी को देखने पर पहली बार धड़का दिल। पहली बार की गयी रेल या हवाई यात्रा।  मुझे आज अपने मन की वह घुमड़न याद आ रही है जब किसी किताब को पढ़कर उस पर पहली बार कुछ लिखने की इच्छा अंकुरित हुई थी। किताब थी-कुँवर नारायण का कहानी संग्रह-'आकारों के आसपास'।  छोटे कलेवर की कहानियाँ। कथ्य और शिल्प में विविधता और नवाचार। बहुस्तरीय अर्थ अनुभव से समृद्ध ताज़ी और मर्मस्पर्शी भाषा। कवि की कहानियाँ होने के बावजूद संवेदना के धरातल पर लिजलिजे रोमान से सायास दूरी। कहानी होते हुए कहानी के पारम्परिक विन्यास से मुक्त।  उनकी कहानियाँ पढ़ते हुए कभी लगता कि कोई निबन्ध पढ़ रहे है तो कभी लगता कि किसी छोटी नीतिकथा से कोई सबक सीख रहे हैं। इनमें कभी संस्मरण का आस्वाद मिलता तो कभी किसी मामले घटना को पढ़ते हुए अखबार की रपट की याद आती। यह एक सुखद संयोग भी था कि उन दिनों कुँवर नार...

कुमार मंगलम का आलेख मैं अपनी अनास्था में अधिक सहिष्णु हूँ।

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  एक कवि में उसका समय शिद्दत से समाहित होता है। लेकिन कई अर्थों में यह समय एक नहीं, बल्कि अनेक होता है। कुंवर नारायण ऐसे ही कवि रहे हैं जिनमें कई समय एक साथ दिख जाते हैं। जहां एक तरफ वे अपने समकाल को रेखांकित करते हैं वहीं वे मिथकों को पुनर्जीवित करने का काम भी बखूबी करते हैं। हालांकि इन सबके मूल में मनुष्यता है। बीते 19 सितंबर 2022 को कुंवर जी का जन्म दिन था। युवा कवि कुमार मंगलम ने कुंवर जी पर केन्द्रित एक आलेख लिखा है। कुंवर जी की स्मृति को नमन करते हुए आज पहली बार पर हम प्रस्तुत कर रहे हैं कुमार मंगलम का आलेख 'मैं अपनी अनास्था में अधिक सहिष्णु हूँ'। मैं अपनी अनास्था में अधिक सहिष्णु हूँ। कुमार मंगलम स्वप्नान्नं जागरितांत चोभौ येनानुपश्यति। महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति।। (बृहदारण्यक उपनिषद्) भारतीय दर्शन , साहित्य , कला एवं विचार में “सस्यमिव मर्त्यः पच्यते सस्यमिव अजायते पुनः” का भाव एक कलात्मक दृष्टिकोण के रूप में ही नहीं वरन एक बुनियादी जीवन-दर्शन एवं विवेक के रूप में अभिव्यक्त हुआ है। जो सृजन भी है सृजनकर्त्ता भी , स्वप्न भी और स्वप्न द्रष्टा भी। भारत...

कुँवर नारायण पर पंकज चतुर्वेदी का स्मृति आलेख 'समकालीन कविता के बुद्ध का जाना'

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कुँवर नारायण बीते 15 नवम्बर 2017 को हिन्दी के उम्दा कवि कुँवर नारायण का निधन हो गया । कुँवर जी  को याद करते हुए कवि पंकज चतुर्वेदी ने एक आत्मीय संस्मरण लिखा है । कुँवर नारायण को नमन करते हुए आज पहली बार पर प्रस्तुत है पंकज चतुर्वेदी का संस्मरण 'समकालीन कविता के बुद्ध का जाना' ।     समकालीन कविता के बुद्ध का जाना पंकज चतुर्वेदी   अब जीवन कुछ विपन्न हो गया है ;   उस मननशील औदात्य और संवेदना के सहज सौंदर्य से महरूम , जो यशस्वी कवि कुँवर नारायण के व्यक्तित्व की विशेषता थी। उनका जाना उसी   ' विघ्नहर विनायक छाया '   का ज़िंदगी से चले जाना है , जो उनके दुर्लभ सान्निध्य में महसूस होती थी और जिसे वह प्रेम कहते थे – ''..... एक शुभेच्छा की   विघ्नहर विनायक छाया में   अगर झुकते माथे जुड़ते हाथ   तो उस जुड़ने को हम प्रेम कहते '' बीस-बाईस बरस पहले दिल्ली में जब मैं पहली बार उनसे मिलने उनके घर गया , तो दरवाज़े पर कॉल बेल की बजाए कोई उपकरण लगा था , जिसके ज़रिए वह आगंतुक से बात कर सकते थे और शायद उसे देख भी सकते थे। मेरे...