विनोद दास का संस्मरण 'सज्जनता और ज्ञान की चमक: कुँवर नारायण'
संस्मरण 'सज्जनता और ज्ञान की चमक: कुँवर नारायण' विनोद दास हम उन यादों से बार-बार गुज़रना चाहते हैं जो हमारे साथ पहली बार घटित होती हैं। पहली बार देखी गयी फिल्म। पहली बार पढ़ी गयी किताब। पहली बार लिखी गयी कविता। किसी को देखने पर पहली बार धड़का दिल। पहली बार की गयी रेल या हवाई यात्रा। मुझे आज अपने मन की वह घुमड़न याद आ रही है जब किसी किताब को पढ़कर उस पर पहली बार कुछ लिखने की इच्छा अंकुरित हुई थी। किताब थी-कुँवर नारायण का कहानी संग्रह-'आकारों के आसपास'। छोटे कलेवर की कहानियाँ। कथ्य और शिल्प में विविधता और नवाचार। बहुस्तरीय अर्थ अनुभव से समृद्ध ताज़ी और मर्मस्पर्शी भाषा। कवि की कहानियाँ होने के बावजूद संवेदना के धरातल पर लिजलिजे रोमान से सायास दूरी। कहानी होते हुए कहानी के पारम्परिक विन्यास से मुक्त। उनकी कहानियाँ पढ़ते हुए कभी लगता कि कोई निबन्ध पढ़ रहे है तो कभी लगता कि किसी छोटी नीतिकथा से कोई सबक सीख रहे हैं। इनमें कभी संस्मरण का आस्वाद मिलता तो कभी किसी मामले घटना को पढ़ते हुए अखबार की रपट की याद आती। यह एक सुखद संयोग भी था कि उन दिनों कुँवर नार...