दिव्य प्रकाश दुबे के कहानी संग्रह 'आको बाको' की यतीश कुमार द्वारा की गई समीक्षा
साहित्य जीवन को उसके संवेदनात्मक रूप में दिखाने वाला सशक्त माध्यम होता है। कल्पना या फंतासी बुनते हुए भी कहानीकार हकीकत के आसपास रहता है। जीवनानुभव कहानी को जीवन देते हैं। कई बार यह अहसास होता है कि कहानीकार ने जो लिखा है वह तो हमने खुद देखा या भुगता है। दिव्य प्रकाश दुबे का कहानी संग्रह ' आको बाको' पढ़ते हुए उन्हें बराबर इसका अहसास होता है। इस किताब पर एक समीक्षा यतीश कुमार ने लिखी है। आज पहली बार पर प्रस्तुत है दिव्य प्रकाश दुबे के कहानी संग्रह 'आको बाको' की यतीश कुमार द्वारा की गई समीक्षा ' आस पास के किरदार वाली कहानियाँ'। आस पास के किरदार वाली कहानियाँ यतीश कुमार जब 'आको बाको' पढ़ना शुरू कर रहा था तो कई पूर्वाग्रहों से घिरा था। यह इसलिए भी क्योंकि दिव्य का लिखा पहली बार पढ़ रहा था। पहली कहानी की शुरुआती रफ्तार से मुझे लगने लगा कि शायद जो मैं सोच के पढ़ रहा हूँ, वही सही है। हालांकि पहली कहानी खत्म होते-होते, खासकर आखिरी के दो पन्नों पर मेरे सारे सवालों का जवाब था। कहानी के किरदार आस-पास से लिए गए हैं। नीता जैसे किरदार शायद हमारे पड़ोस म...