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फ़िलिस्तीन की समकालीन कविताएँ

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  जीवन से बड़ा कुछ भी नहीं होता। न कोई राष्ट्र, न कोई धर्म, न कोई भाषा, न कोई वर्ग। इन सबका अस्तित्व मानव के होने से ही है। यह अलग बात है कि मानव जाति का इतिहास वस्तुतः युद्धों के इतिहास के रूप में ही दिखाई पड़ता है। युद्ध में जान माल की व्यापक क्षति होती है। लेकिन उस ज़िद का क्या किया जा सकता है जो अपने को सर्वोपरि मानती रही है। गज़ा आज इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। इस युद्ध के मूल में  वे यहूदी हैं जो बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में जाति और नस्ल आधारित हिंसा के सबसे बड़े शिकार रहे है किंतु ऐसा लगता है कि इस हिंसा और अत्याचार से उन्होंने कोई भी सबक नहीं लिया। अब वे स्वयं हिंसा और नस्लभेद को बढ़ावा देने वालों की पंक्ति में सबसे आगे खड़े दिखने लगे हैं। श्रीविलास सिंह ने कुछ फिलिस्तीनी कवियों की कविताओं का अनुवाद किया है। इन कविताओं में फिलिस्तीनियों की कथा व्यथा वर्णित है। इससे हम यह समझ सकते हैं कि युद्ध क्षेत्र के लोगों की प्राथमिकताएं कुछ अलग किस्म की ही होती हैं। इन कविताओं को पढ़ते हुए रोंगटे खड़े हो जाते हैं।  चयन, अनुवाद और प्रस्तुति के साथ साथ इन कविताओं की उम्द...