प्रतुल जोशी का संस्मरण 'पिता की ज़िन्दगी के आख़िरी वर्ष'


शेखर जोशी


शेखर जोशी नई कहानी आन्दोलन के अग्रणी कहानीकार थे। रचनाओं में ही नहीं जीवन में भी वे ईमानदारी बरतने के के पक्षधर रहे। 'अनहद' का एक अंक जब हमने उन पर केन्द्रित करने का निर्णय लिया तब उन्होंने मुझे सलाह दिया कि मैं ऐसा न करूँ। इस क्रम में कई बार तो उन्होंने अपनी सख़्त नाराज़गी भी ज़ाहिर की। आज के वक़्त में जब नवोदित रचनाकार तक खुद पर अंक केन्द्रित करवाने की जुगत में लगे रहते हैं, तब उनकी यह सोच हमें विस्मय में डालती है। किसी भी दिखावे या शोरोगुल से वे हमेशा दूर रहे। जब ईजा का निधन हुआ और वे अकेले पड़ गए तब उन्होंने उस इलाहाबाद को छोड़ने का निर्णय लिया जिसे वे जीते थे। 100, लूकरगंज उनकी सांसों में समाया हुआ था। लेकिन वक़्त की नज़ाकत को भांपते हुए वे यह बात समझ गए थे कि इलाहाबाद उन्हें छोड़ना होगा। और यह कड़ा निर्णय उन्होंने लिया भी। आगे का शेष जीवन उन्होंने लखनऊ, ग़ाज़ियाबाद और पुणे में अपने बेटे बेटियों के साथ बिताया। अन्ततः 4 अक्टूबर 2022 को ग़ाज़ियाबाद में उनका निधन हुआ। उनके ज्येष्ठ पुत्र प्रतुल जोशी ने अपने पिता के अन्तिम दिनों को शब्दबद्ध किया है। एक जीवन्त व्यक्ति जिसकी दमदार आवाज सुनने के हम आदी रहे हों, अचानक एक दिन खामोश हो जाए तो यह त्रासदीपूर्ण होता है। प्रतुल जोशी के लिए अपने पिता के अन्तिम दिनों को डॉक्यूमेंटेड करना आसान नहीं रहा होगा। लेकिन रचनाकार अपनी रचनाओं में इस त्रासदी को ही तो जीवन्त करते हैं। हमारे यहां सामान्य तौर पर डॉक्यूमेंटेशन की परम्परा ही नहीं है। बहरहाल इस संस्मरण के जरिए हम शेखर जी के अन्तिम दिनों के जीवन संघर्ष को रेखांकित कर सकते हैं। उनकी अदम्य जिजीविषा के गवाह हम भी रह चुके हैं। जब उनकी एक आँख से दिखना लगभग बन्द हो गया और दूसरी आँख की रोशनी भी प्रभावित हुई तो वे मैग्नीफाइंग ग्लास से पत्र पत्रिकाओं को पढ़ते और कविताएं लिखने का काम बदस्तूर कर रहे थे। आज उनके जन्मदिन पर हम उनकी स्मृति को नमन करते हैं। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं प्रतुल जोशी का संस्मरण 'पिता की ज़िन्दगी के आख़िरी वर्ष'।


संस्मरण

'पिता की ज़िन्दगी के आख़िरी वर्ष'


प्रतुल जोशी 


पिता के अंतिम बार दर्शन कर हम लोग वापस लौट रहे थे। हम यानी मैं, छोटा भाई संजय, मेरी और संजय की बेटियाँ (हिना एवं पाखी) बहन कृष्णा का छोटा बेटा देबू एवं ममेरे भाई राजकुमार पंत का बेटा मोलू। हम लोग लौट रहे थे ग्रेटर नोएडा के शारदा मेडिकल कॉलेज से, जहाँ पिता का शव कॉलेज के शरीर विज्ञान विभाग (Anatomy Deptt) के एक बड़े हॉल में कई दराज़ों वाले फ़्रीज़र की एक दराज़ में रख दिया गया था। शरीर विज्ञान विभाग के इंचार्ज महेन्द्र जी ने हमें बता रखा था कि शव को देहदान वाले दिन ही अंतिम बार देखने की इजाज़त परिवारीजनों को है। देह दान के अगले दिन से कोई अपने परिवारीजन को नहीं देख सकता है।

पापा (घर में हम बच्चे पिता जी को पापा और माता जी को ईजा कह कर बुलाते थे) यूँ अचानक चले जायेंगे, इसका क़तई अहसास घर में किसी को भी नहीं था। उनके अस्पताल में भर्ती होने से केवल दो सप्ताह पूर्व हम लोगों ने बड़ी धूमधाम से उनका 90वां जन्म दिवस संजय के घर में मनाया था जो ग़ाज़ियाबाद जनपद के वसुंधरा इलाके में जनसत्ता अपार्टमेंट में है। फिर अचानक यह क्या हुआ कि खुशी और उत्साह का यह माहौल ग़म में तब्दील हो गया।


मार्कण्डेय, शेखर जोशी एवं दूधनाथ सिंह 


अक्टूबर 2012 में ईजा की मृत्यु के पश्चात् पापा लखनऊ में रेडियो कॉलोनी के फ़्लैट में मेरे साथ रहने आ गये थे। इलाहाबाद का 100, लूकरगंज वाला किराये का मकान कुछ दिनों तक बंद रहा। मकान में लटका ताला ईजा के महाप्रस्थान की सूचना लम्बे वक़्त तक देता रहा। वर्ष 2015 में उस मकान को मकान मालिक टंडन जी को सौंप कर हमारे परिवार का इलाहाबाद कनेक्शन समाप्त हो गया था। लगभग 08 वर्ष से अधिक पापा का ठिकाना लखनऊ की रेडियो कॉलोनी था। इन आठ वर्षों में उन्होंने कुछ समय संजय के साथ ग़ाज़ियाबाद और कुछ समय बहन कृष्णा के साथ पुणे में व्यतीत किया। लखनऊ के घर में अधिकांश समय हम तीन प्राणी रहते। पापा, मैं और लक्ष्मी। बेटी हिना एक वर्ष 2014 से 2015 लखनऊ में रही। 2011 से बाक़ी वक्त वह अपनी पढ़ाई के सिलसिले में पुणे और दिल्ली, बाद में अपनी नौकरी के चलते नोएडा और मुम्बई रहने लगी। रेडियो कॉलोनी के पारिवारिक त्रिकोण में वर्षों हम लोग एक जैसी स्थितियों में रहे। सर्वप्रथम लक्ष्मी सुबह जल्दी उठ कर नाश्ता तैयार कर स्कूल जाती, मैं दस बजते न बनते ऑफिस। दोपहर और रात्रि का खाना बनाने के लिये एक घरेलू सहायक गीता आती।

पिता जी की दिनचर्या भी सुबह 07 बजे से प्रारंभ हो जाती। प्रायः नित्यकर्म से निवृत्त होकर वह लगभग रोज़ाना अपनी दाढ़ी बनाते। मेरे कार्यालय जाने से पहले नहा भी लेते। हम लोग यह एहतियात भी बरतते कि वह हमारी उपस्थिति में नहा लें। नहाने धोने के पश्चात् नाश्ता कर, पापा ड्राईंग रूम में कुर्सी पर बैठ जाते। वह अपनी आलमारी या किसी बक्से से अपने पुराने काग़ज़ात/पत्रिका/किताबें निकाल कर कमरे में ले आते। फिर उनको अपने मैग्नीफ़ाइंग ग्लास से बड़े ग़ौर से पढ़ते। हर चीज़ को बड़े सलीक़े से रखना, उनकी आदत में शुमार था। जो भी काग़ज़ वह निकालते, वह सब किसी प्लास्टिक के थैले या फ़ाइल में बहुत क़रीने से रखा रहता। देर तक अपने काग़ज़ों को वह पढ़ते। जब कभी कुछ लिखने का मूड आता तो सफ़ेद काग़ज़ पर काले स्केच क़लम से बड़े-बड़े अक्षरों में लिखते। पिता जी क्या लिख रहे होते या क्या पढ़ रहे होते, इसको जानने को कोशिश न मैं करता, न लक्ष्मी। हम तीनों के क्षेत्र बंटे हुए थे। लक्ष्मी रसोई और स्कूल, मैं ऑफ़िस। पिताजी अपनी कुर्सी और टेबल पर। लक्ष्मी की गृह कार्य में दक्षता मेरे लिये कई बार शर्मिन्दगी का भी बायस थी। रसोई में, मैं प्रायः सिर्फ चाय बनाने के लिये ही घुसने की हिमाकत करता। लक्ष्मी यह सुनिश्चित करती कि पापा को सही वक्त पर नाश्ता मिले। दोपहर के खाने की ज़िम्मेदारी हमारी घरेलू सहायक गीता की थी। सोमवार से शुक्रवार, मैं दोपहर में कार्यालय में रहता, अलबत्ता रात्रि भोजन पिता जी और मैं डाइनिंग टेबल पर साथ ही करते।

लेकिन रात्रि भोजन से पूर्व शाम को पापा रेडियो कॉलोनी की दूसरी मंज़िल से उतर कर बाहर घूमने चल देते। महीनों तक यह उनका नियमित कर्म था। इसमें उनके स्थायी साथी होते वरिष्ठ पत्रकार महेश पांडेय जी जिनका घर हमारी कॉलोनी में थोड़ी दूर पर ही था।

वर्ष 2005 से पापा को आँखों की तकलीफ़ प्रारंभ हो गई थी। उनको समय-समय पर महंगे ल्यूसेंटिस इंजेक्शन लगने शुरू हो गये थे। एक इंजेक्शन की कीमत पच्चीस से तीस हज़ार रुपये की थी। ताज़िंदगी उनको ऐसे तक़रीबन 25 इंजेक्शन लगे थे। चूंकि पापा केन्द्रीय सरकार से सेवानिवृत्त हुए थे, अतएव इन इंजेक्शन का खर्चा भारत सरकार के केन्द्रीय सरकार स्वास्थ्य योजना (Central Govt. Heath Scheme) के मत्थे था। लगभग दस वर्ष पूर्व उनकी एक आँख की रोशनी भी जाती रही थी। इन सबके चलते वह बहुत दूर तक नहीं देख पाते थे। श्रवण शक्ति भी 10-12 वर्षों से काफी कमज़ोर हो गयी थी। शरीर के ऑडियो विज़ुअल तन्त्र में इन गड़बड़ियों के चलते,  रेडियो कॉलोनी के बाहर की भीड़-भाड़ वाली सड़क पर उनका शाम के धुंधलके में अकेले जाना, मेरे और लक्ष्मी के लिये चिंता का विषय होता। लेकिन पिताजी पूरे आत्मविश्वास के साथ, लगभग एक फ़र्लांग दूर महेश पांडेय जी के घर तक पहुँचते। फिर वहीं पड़ोस में समृद्धि पार्क में बैठ कर गप-शप करते। और लौटने में महेश जी उनको रेडियो कॉलोनी तक छोड़ने आते।

लखनऊ के इंदिरानगर सेक्टर आठ में स्थित रेडियो कॉलोनी एक लम्बे चौड़े परिसर में है। 71 मकानों की इस कॉलोनी में मकानों का वर्गीकरण A,B,C,D,E ब्लॉक्स के तौर पर है।कॉलोनी में चार छोटे-छोटे पार्क भी हैं। इस कॉलोनी में मैं वर्ष 1998 से रह रहा था। कॉलोनी, हम लोगों के लिये एक परिवार की तरह रही। पापा को यह कॉलोनी बहुत पसंद थी। डॉ. सुशील कुमार राय, इसी कॉलोनी में रहते थे। वह आकाशवाणी लखनऊ में कृषि कार्यक्रमों के इंचार्ज हैं। पापा के लिये सुशील जी का घर दूसरा घर था। शाम को पड़ोस के पार्क से घूम कर आने के बाद, पापा थोड़ी देर के लिये सुशील जी के घर बैठ कर गपशप करते। उनके परिवार का हाल-चाल लेते। सुशील जी, उनकी जीवनसंगिनी प्रीति, पुत्री प्रज्ञा और भतीजी भोली से बातचीत करते। इस तरह से सुबह से शाम तक का उनका समय व्यतीत होता। पापा से नियमित मिलने आने वालों में महेश पांडेय जी के अलावा वरिष्ठ पत्रकार एवं साहित्यकार नवीन जोशी ही थे। लेखन में उनकी नियमित सक्रियता, उनके जीवन के अंतिम दशक में ही मैंने देखी। जब तक वह वर्कशॉप की नौकरी में रहे, लेखन के लिये समय निकालना बहुत मुश्किल होता। जब किसी लघु पत्रिका के संपादक का बारंबार आग्रह होता तो वह दो तीन दिन की छुट्टी ले कर कोई कहानी या संस्मरण लिखते लेकिन नियमित लेखन उन्होंने कभी नहीं किया। इसके उलट अपने जीवन के अंतिम वर्षों में उन्होंने अपने को पूरी तरह लेखन के लिये समर्पित कर दिया था।

गाँव के संस्मरणों पर आधारित अपनी आत्मकथात्मक किताब "मेरा ओलियागांव" उन्होंने 86 वर्ष की वय में लिखना प्रारंभ की थी। किताब का ज़्यादातर हिस्सा उन्होंने ग़ाज़ियाबाद बाद में संजय के घर पर बैठ कर लिखा था।


विश्वनाथ त्रिपाठी के साथ शेखर जोशी


पिता जी की मृत्यु के पश्चात्, दिल्ली में एक श्रद्धांजलि सभा में वरिष्ठ आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी जी ने कहा कि "मैंने शेखर को पत्नी की मृत्यु के पश्चात्, अपनी पत्नी के बारे में बात करते हुए बहुत कम देखा।" यह बात सत्य थी। ईजा की मृत्यु के पश्चात् ,थोड़े वक़्त पापा ईजा की अनुपस्थिति को ले कर बेहद ग़मज़दा थे। लेकिन फिर जैसे उन्होंने उस दुःख से अपने को अलग किया और साहित्य साधना में जुट गये थे।

ईजा और पापा एक दूसरे से बचपन से परिचित थे। पापा हमारी दादी जी की मृत्यु के पश्चात् अजमेर के समीप केकड़ी में अपने मामा के यहाँ पढ़ने चले गये थे। उस समय उनकी वय बमुश्किल ग्यारह साल की रही होगी। पिताश्री के मामाजी के साथ ही हमारे नाना जी का परिवार भी रहता था। पापा के मामा जी जगन्नाथ शास्त्री जी निःसंतान थे तो हमारे नानाजी भगवान वल्लभ पंत का परिवार बेहद हरा-भरा था। ईजा और पापा का वैवाहिक जीवन 52 वर्षों का था। वर्ष 1960 के जनवरी महीने में उनका विवाह हुआ था और माता जी का निधन अक्टूबर 2012 में हुआ। वर्ष 1962 से हमारा परिवार लूकरगंज में रहा। लेकिन माता जी के देहावसान के पश्चात् इलाहाबाद छोड़ना पापा के लिये मजबूरी थी। क्योंकि हम भाई बहनों में किसी ने इलाहाबाद को अपनी कार्यस्थली नहीं बनाया था। संजय पढ़ाई के दौरान ही दिल्ली पहुँच गया था और फिर वहीं का हो कर रह गया। बहन कृष्णा शादी के बाद पुणे में स्थायी तौर पर रहने लगी। मैंने भी आकाशवाणी की नौकरी में आने के पश्चात् वर्ष 1988 में इलाहाबाद छोड़ दिया था।


शेखर जी ईजा के साथ 


ईजा के जीवित रहते पापा-ईजा इलाहाबाद के 100, लूकरगंज मुहल्ले में तक़रीबन पचास साल रहे। इलाहाबाद के आकर्षण ने उनको वहाँ बनाये रखा। यद्यपि बीच-बीच में लम्बा समय मेरे, संजय के या फिर कृष्णा के परिवार के साथ भी बिताते। लेकिन अक्तूबर 2012 के बाद परिस्थितियाँ बिल्कुल बदल गयीं। ईजा का देहावसान हो गया। पिता जी को देखने-सुनने की तकलीफ़ शुरू हो गयी थी। इलाहाबाद में अकेले रहना उनके लिये क़तई संभव नहीं था। जैसा मैंने पहले ज़िक्र किया कि वर्ष 2015 में हमारा परिवार इलाहाबाद के लूकरगंज से अपना सामान ले कर लखनऊ के इंदिरानगर स्थित रेडियो कॉलोनी आ गया था।

लखनऊ प्रवास पिता जी के लिये चुनौती बन कर आया। इलाहाबाद में वर्ष 2012 तक पापा के बहुत से मिलने वाले थे। पापा के अन्यतम मित्र अमरकांत जी रचनात्मक रूप से सक्रिय थे। अन्य समवयस्कों में दूधनाथ सिंह जी थे। बाद की पीढ़ी के बहुत से साहित्यकारों का घर में आना-जाना लगा रहता था। कुछ अत्यंत युवा कवि एवं कहानीकार भी समय-समय पर घर आते थे। इसके बरक्स लखनऊ में उनके लिये सब कुछ अलग था। उनके समवयस्क में केवल कामतानाथ जी यहाँ उस वक़्त हयात में थे और सक्रिय थे। दो-तीन दफे़ पापा उनसे मिलने उनके अलीगंज स्थित आवास पर भी गये। बाक़ी उनकी अगली पीढ़ी के कुछ साहित्यकार उनसे मिलने आते और यदा-कदा उनका हाल-चाल भी हम लोगों से पूछते रहते। इनमें सर्वश्री शकील सिद्दीक़ी, नलिन रंजन सिंह, सुभाष राय, भगवानस्वरूप कटियार, रामकिशोर, वंदना मिश्र, प्रज्ञा पांडेय, ऊषा राय, किरण सिंह, चन्द्रेश्वर एवं उनकी पत्नी आदि शामिल थे। अपवाद स्वरूप नवीन जोशी जी थे जो नियमित रूप से आते थे।नवीन जी  के तौर पर पापा को एक ऐसा मित्र/ सहयोगी भी मिला जिन्होंने पापा की रचनात्मकता के महत्व को समय रहते पहचाना । यद्यपि नवीन जी की ख्याति देश के वरिष्ठ पत्रकार के तौर पर है एवं आपने 'स्वतंत्र भारत' एवं ' हिन्दुस्तान'  दैनिक समाचार पत्रों में लम्बे समय तक संपादकीय दायित्व का निर्वाह किया है एवं अन्य कई समाचार पत्रों में बतौर पत्रकार कार्य किया। लेकिन साहित्य के प्रति आपकी प्रतिबद्धता ग़ज़ब की है। इसी के चलते ढेर सारी कहानियाँ और चार उपन्यासों को आपने अंजाम दिया है। पापा के ऊपर लिखी आप की पुस्तक 'शेखर जोशी : कुछ जीवन की, कुछ लेखन की',  पापा के व्यक्तित्व एवं कृतित्व के तमाम अनुछुए पहल‌ुओं को सामने लाने में सहायक सिद्ध हुई है। नवीन जी प्रायः सुबह 11 बजे के आस-पास आते। वर्ष 2015 के पश्चात् पापा ने कुमाऊंनी बोली की पत्रिकाओं के लिये लेखन प्रारंभ कर दिया था। उनका एक नियमित स्तंभ कुमाऊंनी पत्रिका "कुंभगढ़" में "क्वीड़" नाम चल रहा था। इस कॉलम में वह अपने गाँव के संस्मरण लिखा करते। सफ़ेद काग़ज़ में बड़े-बड़े अक्षरों से लिखे अपने लेख को वह नवीन जी को सौंप देते। नवीन जी उस लेख को कम्प्यूटर पर टाइप कर संबंधित पत्रिका को भेज देते।

लखनऊ और इलाहाबाद का सामाजिक ताना-बाना बिल्कुल अलग है। जहाँ लखनऊ राजधानी है एवं इलाहाबाद के मुक़ाबले काफ़ी बड़ा शहर है, वहीं इलाहाबाद में लम्बे वक़्त तक साहित्यिक माहौल रहा है। साथ ही विश्वविद्यालय का प्रभाव भी शहर के सामाजिक जीवन में काफ़ी ज़्यादा रहा है।



ईजा की मृत्यु के पश्चात् लखनऊ में अपने आठ साल के प्रवास के दौरान ज़्यादातर वक़्त पिता जी अकेलेपन का शिकार रहे। पापा के एक मौसेरे भाई स्व. सुरेश पांडेय जी, पापा के ख़ालीपन को भरने में अपना भरपूर योगदान देते। सुरेश पांडेय जी ने भी अपने बचपन था कुछ वक़्त के केकड़ी (राजस्थान) में बिताया था। चूंकि उनके मामा एवं हमारे पिता जी के मामा एक ही थे, इसलिये दोनों के पास साझा करने के लिये बहुत से विषय थे। सुरेश पांडेय जी का घर रेडियो कॉलोनी से लगभग दो किलोमीटर की दूरी पर है। सुरेश पांडेय जी चूँकि हमारे ननिहाल में रहे, इसलिये हम लोग उन्हें सुरेश मामा कहते थे। पापा और सुरेश मामा जी बचपन की यादों से लेकर नाते रिश्तेदारों की चर्चाओं में व्यस्त रहते।

पापा से नियमित मिलने वालों में दूसरे शख़्स 'नवभारत टाइम्स', 'राष्ट्रीय सहारा', 'उत्तर उजाला' और 'हिन्दुस्तान' जैसे दैनिक समाचारपत्रों में लम्बे वक़्त तक कार्य कर चुके महेश पांडेय जी का बचपन रानीखेत में बीता था और वह वहाँ लम्बे समय तक रहीं हमारी बुआजी के परिवार से भी भली भाँति परिचित थे।

मिलने वालों में हमारे बड़े मामा (दस भाई बहनों के परिवार में बड़े मामा प्रथम स्थान पर थे, ईजा दूसरे स्थान पर बाक़ी छः भाई एवं दो बहनें थीं) सुरेश चंद्र पंत जी भी थे जो अपनी पत्नी और कनिष्ठ पुत्र मुकेश के निधन के पश्चात् वर्ष 2015 से इंदिरा नगर के हलवासिया अपार्टमेंट में एक घरेलू सहायक के साथ रह रहे थे।

यद्यपि उनके ज्येष्ठ पुत्र राजकुमार पंत आई.आई.टी. मुम्बई में प्रोफ़ेसर के पद पर पर कार्यरत थे लेकिन चूंकि मामा जी ने नाबार्ड लखनऊ से महाप्रबंधक के पद से अवकाश ग्रहण करने के पश्चात् लखनऊ में मानसिक रूप से मंदित बच्चों के लिये एक संस्था एवं स्कूल स्थापित किया था, इसलिये संस्था एवं स्कूल की ज़िम्मेदारियों को निभाने के चलते वह लखनऊ में ही निवास कर रहे थे।

एक बड़ी उम्र में एक शहर में दूसरे शहर में स्थानांतरित होना कितना पीड़ादायक हो सकता है, यह पापा की स्थिति को देख कर लगता था। यह स्थिति तब और भी जटिल हो जाती है जब आप किसी एक शहर में बहुत लम्बे समय तक रहे हों। जिस व्यक्ति ने बरसों बरस इलाहाबाद का वह माहौल जिया हो, जहाँ साइकिल से एक स्थान से दूसरे स्थान तक जा सकते हों, जहाँ कॉफ़ी हाउस की किसी एक टेबल पर एक कप कॉफ़ी के साथ आप घंटों बहस-मुबाहिसे में गुज़ार सकते हों, जहाँ साहित्य की प्राथमिकताओं के समक्ष जीवन के अन्य मुद्दे गौण और महत्वहीन हों, उस व्यक्ति को उम्र के आठवें दशक में एक ऐसे शहर में रहना पड़े जहाँ सियासी दांव पेंच साहित्य में भी अपना हुनर दिखा रहे हों, जहाँ क़स्बेनुमा शहर की आत्मीयता के बजाय, महानगर की निर्वैयक्तिकता आम चलन में हो, जहाँ नवनिर्माण ने पुरानी तहज़ीब को लगभग ध्वंस कर दिया हो। ऐसे में पुरानी पीढ़ी के मूल्यों को संजो कर रखने वाले एक संवेदनशील व्यक्ति के लिये जीवन कितना चुनौतीपूर्ण हो सकता है, इसका केवल अंदाज़ा ही लगाया जा सकता है। और यह स्थिति तब और जटिल हो जाती है जब आपकी जीवन संगिनी आपका साथ छोड़ कर हमेशा के लिये चली गयो हो। लेकिन पिता जी ने बड़े धैर्य से इन परिस्थितियों का सामना किया। उन्होंने एक योगी की तरह अपनी रचनात्मक ऊर्जा को संकेन्द्रित किया और सात-आठ वर्षों में कविता, संस्मरणों और कथेतर साहित्य से हिन्दी साहित्य की श्रीवृद्धि की। लगातार एक स्थान पर बैठ कर, एक आँख की रौशनी के सहारे, मैग्नीफ़ाइंग ग्लास से बहुत सारे पत्र-पत्रिकाओं को पढ़ना। सिर्फ पढ़‌ना ही नहीं बल्कि सादे कागज पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिख कर रचनाकारों को अपनी प्रतिक्रिया से अवगत कराना।

खाने की टेबल एक ऐसी जगह थी जहाँ दिन भर में एक बार मैं और पापा साथ होते। 85 वर्ष से ऊपर की उम्र में भी पापा की डाइट अच्छी थी। उनके मुक़ाबले मैं (अपने पेट की दिक़्क़तों के चलते) कम खाता। पापा इस बात का नोटिस लेते और इसका उलाहना भी देते कि मैं कम खाता हूँ। मैं उनके पाचन तंत्र से रश्क करता। यहाँ यह भी गौरतलब है कि यद्यपि पापा विशुद्ध शाकाहारी नहीं थे, परंतु हमारे घर में यानी लखनऊ में मांसाहार का प्रचलन नहीं के बराबर है। इसका एक कारण लक्ष्मी का विशुद्ध शाकाहारी होना भी है। सामिष भोजन की इच्छा कभी मुझे तीव्र होती तो बाजार से मछली अथवा मुर्ग़े के व्यंजन मंगवा लेते। जनवरी 2017 से दिसंबर 2020 तक हमारे घर की व्यवस्था एकरेखीय थी। जनवरी 2017 में, सवा तीन वर्ष आकाशवाणी शिलाँग में पदस्थ रहने के पश्चात् मैं एक बार पुनः आकाशवाणी लखनऊ में पदस्थ हो गया था। पापा भी कुछ वक़्त संजय के साथ गाजियाबाद में बिताने के पश्चात् लखनऊ हम लोगों के साथ रहने आ गये। उनको कान और आँख की परेशानियाँ लगातार बनी हुई थीं। एक आँख की रौशनी जा चुकी थी और कान से भी ऊँचा सुनते थे। लेकिन मशीन लगा कर सुन लेते थे। फ़ोन पर किसी से बात करनी हो तो ईयर फोन का सहारा ले कर बात भी हो जाती। तमामतर पारिवारिक कार्यक्रमों में जाने का सिलसिला भी इस दौर में लगा रहा। साहित्यिक कार्यक्रमों से वह बहुधा दूर रहने लगे थे। प्रायः कहते कि जब मैं स्पष्ट देख नहीं सकता या स्पष्टतः सुन नहीं सकता तो फिर मेरा जाने का क्या मतलब? लेकिन घर में आने वाली साहित्यिक पत्रिकाओं को और अखबार को मैग्नीफ़ाइंग ग्लास से ज़रूर पढ़ते। इस दौर में रेडियो उनका अभिन्न साथी था। आकाशवाणी लखनऊ के कार्यक्रमों को बहुत ध्यान से सुनते। आकाशवाणी के कार्यक्रमों में एक कार्यक्रम होता है 'खोए हुए व्यक्तियों से संबंधित सूचनाएँ।' पापा इस कार्यक्रम को भी बहुत ध्यान से सुनते। उन्होंने इस कार्यक्रम को सुनने के पश्चात् एक बहुत ख़ूबसूरत कविता लिखी थी "एक उदास नवम्बरी साँझ"। मैं इस कविता को यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ-


यह नवंबरी साँझ

घिरती गहरी उदासी

बैठा, अकेला कर रहा आतुर प्रतीक्षा

दिन भर की ख़बर सुनने, साथी रेडियो से 

समाचारों से पहले कूद पड़ी 

यह मनहूस सूचना लापता लोगों की।

राम प्रसाद, उम्र 65 वर्ष, क़द मंझोला 

पाजामा, कुर्ता और हवाई चप्पल पहने हुए

मानसिक रूप से थोड़ा कमज़ोर 

दो दिन से घर से लापता है।

नहीं राम प्रसाद, तुम पूरे होशोहवास में होगे 

बेटों, बहुओं की उपेक्षा से दुःखी तुम्हें जीवन निस्सार लगने लगा था?

रेल की पटरी के किनारे डोलते रहे थे बहुत देर तक!

धड़घड़ाती रेल सामने से गुज़र गई

नहीं हुआ साहस आगे कूदने का

गंगा के पुल पर कितने चक्कर लगाये ?

जल समाधि लेना चाहते थे मां की गोद में?

 हर बार कोई राहगुज़र सामने से आता दिख गया 

घर लौट जाओ रामप्रसाद?

कोई कुछ नहीं कहेगा

कुलसुम, उम्र 20 साल, क़द 5 फीट 2 इंच

रंग गेहुवां

आख़िरी बार हल्का नीला सूट, काली चप्पल पहने देखी गई

तुम कहाँ खो गई कुलसुम?


"अपनी दादी की तरह

 बीड़ी बनाती बुढ़ा जाओगी

 चलो कहीं भाग चलें इस शहर से"


बग़ल से गुज़रता हुआ कह गया था,

 वह हंसमुख पतंगबाज़

 फिर उस दिन सुबह नल पर 

चुप्पे से पकड़ा गया रेल का टिकट "चार बजे वाली लखनऊ की ट्रेन के जनाने डिब्बे में बैठना 

मैं स्टेशन पर मिलूँगा"

यही कहा था उसने?


नहीं तुम्हें धोखा नहीं दिया होगा उसने

कहीं जाम में फंस गया होगा।


अच्छा हुआ तुम चलती ट्रेन से नहीं कूदी

कब तक राह देखोगी उसकी इस अजनबी शहर के स्टेशन पर?

भूखी प्यासी।


तुम्हारे बदन को छीलती हुई

यह शातिर निगाहें जो तुम्हें असहज कर रही हैं 

कहीं गुमराह न कर दें।


लौट आओ कुलसुम 

उसकी ख़ातिर लौट जाओ।


चंदन तिवारी उर्फ मुन्ना 

उम्र 12 साल, दुबला पतला शरीर बड़ी-बड़ी आँखें, दो दिन से घर से लापता है

ख़ाकी पैंट, सफ़ेद आधी बांह की कमीज़

नीले कपड़े के जूते पहने था 

कहाँ हो मुन्ना तुम?


भूखे-प्यासे, डरे-डरे से किस अजनबी जगह में पहुँच गये और कैसे?

क्या नयी माँ ने डांटा था तुम्हें? एक चपत भी लगाई थी? 

पड़ोसी औरतों के मुंह से तुमने पहली बार 'सौतेला' शब्द सुना था। नयी माँ के लिये तुम्हारे मन में ज़हर बोया था उन्होंने 

यक़ीन मानो मुन्ना हर औरत के अंदर एक सगी माँ होती है

सगी माँताएँ भी कभी डाँटती हैं 

कभी चपतियाती हैं

उनके बच्चे तो घर से नहीं भागते पुलिस वाले से डरो नहीं

वह परेशान बच्चों का दोस्त होता है 

बताओ उसे अपने पिता का नाम अपना मुहल्ला, अपना स्कूल

वह तुम्हें ज़रूर घर पहुँचा देगा

घर लौट जाओ मुन्ना 

नयी माँ तुम्हारी राह देख रही है


ख़त्म होने को नहीं आ रही है सूचना वह छोटे बच्चे को साथ ले कर घर से भागी भागमती

श्वसुर ने रपट लिखाई

सारे गहने भी साथ लेकर गई है

क्या सच? क्या झूठ!

लौट जाओ कुलसुम!

 लौट जाओ रामप्रसाद! 

लौट जाओ प्यारे मुन्ना।

सब लौट जाओ, अपने-अपने घर

मैं सुकून से समाचार सुन सकूं।"

आकाशवाणी में मैंने 34 वर्ष से अधिक की नौकरी की। सैकड़ों बार 'खोए हुए व्यक्तियों से संबंधित सूचनाएं' सुनी। लेकिन कभी भी मुझे यह कार्यक्रम कविता का विषय नहीं लगा। किसी कवि को कविता के लिये विषय कहाँ-कहाँ से मिल सकते हैं, यह मैंने अपने घर में ही जाना।

पिता जी, अपनी तन्हाई में कैसे-कैसे काल्पनिक पात्रों से संवाद स्थापित करते थे, यह भी इस कविता के माध्यम से जाना जा सकता है।


पापा का मन रेडियो कॉलोनी में खूब रमता। कॉलोनी में बच्चों से खूब संवाद करते। जब वह  शाम को टहलने निकलते तो बच्चे उन्हें घेर लेते। देर रात तक बच्चों से उनके स्कूल की बातें, पढ़ाई-लिखाई की बातें करते। बच्चों को पढ़ने के लिये किताबें और पत्रिकाएं देते। जब बाल थोड़े बढ़ जाते तो पड़ोस के नाई के खोखे में बाल कटवाने जाते। वहाँ उनकी नाई शकील जी से मित्रता हो गयी। एक खोखे में नाई की दुकान चलाने वाले, सुल्तानपुर निवासी शकील मियां ने कई वर्ष कलकत्ता में बिताए थे। वहाँ उनका परिचय मशहूर शायर मुनव्वर राना साहब के परिवार से हो गया था। शकील मियां, मुनव्वर राना परिवार से अपने प्रगाढ़ रिश्तों के बारे में बताते। शकील मियां के खोखे की बैठकी में हमारे सहकर्मी डॉ. सुशील कुमार राय भी होते। कभी-कभार महेश पाण्डेय जी भी इस महफ़िल की शोभा बढ़ाते। मज़े की बात कि इन सभी लोगों से बातचीत में वालिद साहब अपने बारे में कोई चर्चा नहीं करते। उनकी रुचि हमेशा दूसरों की बातों में ही रहती।


अपने छोटे पुत्र संजय जोशी के साथ शेखर जी


पिता जी के साथ मेरा वार्तालाप प्रायः सीमित ही होता था। मेरे मुक़ाबले संजय और कृष्णा से उनकी बातचीत ज़्यादा विस्तार से होती। इसका कारण शायद मेरा स्वभाव ही रहा है कि मैं बाहर के मुक़ाबले घर में अपेक्षाकृत कम बोलता रहा हूँ। सीमित वार्तालाप के चलते कई दफ़े मुझे यह नहीं पता चल पाता कि वालिद साहब के अन्तर्मन में क्या चल रहा है? कई बार उनके वक्तव्य मुझे आश्चर्य में डाल देते और मुझे अपने ऊपर संदेह होने लगता कि मैं अपने पिता को कितना कम जानता हूँ। यहाँ मैं एक घटना का ज़िक्र करना चाहूँगा। वर्ष 2012 में पिता जी को द्वितीय श्रीलाल शुक्ल इफ़्को सम्मान के लिये चुना गया था। यह एक अजीब इत्तेफ़ाक था कि पुरस्कार की घोषणा के तुरंत पश्चात् हमारी माता जी चन्द्रकला जोशी का स्वास्थ्य गिरने लगा। इफ़्को सम्मान 28 अक्तूबर 2012 को लखनऊ के गोमती नगर स्थित संत गाडगे सभागार में दिया जाना था। लेकिन माता जी का स्वास्थ्य 01 सितंबर 2012 से नाज़ुक होने लगा था। पहले उनको एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया। लेकिन कोई फ़ायदा नहीं हुआ। अंततः लखनऊ स्थित संजय गांधी स्नातकोत्तर चिकित्सा संस्थान (SGPGI) में भर्ती करवाया गया। हमारा परिवार अजीबोग़रीब स्थिति में फंसा था। एक तरफ इफ़्को की तरफ़ से शहर के विभिन्न स्थानों में बड़े-बड़े होर्डिंग लगे थे जिनमें श्रीलाल शुक्ल सम्मान और पिता जी का ज़िक्र था, दूसरी तरफ माता जी जीवन और मृत्यु के मध्य संघर्षरत। अंततः विजय मृत्यु की हुई। 23 अक्तूबर 2012 को माता जी इस नश्वर संसार को हमेशा के लिये छोड़ कर चली गयी। उसी दौरान इफ़्को के स्थानीय प्रबंधन ने पिता जी से निवेदन किया कि वह होटल ताज में तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से पुरस्कार समारोह के एक दिवस पूर्व यानी 27 अक्तूबर को प्रतीकात्मक सम्मान ग्रहण कर लें क्योंकि 28 अक्तूबर को अखिलेश यादव उपलब्ध नहीं थे। पहले तो पिता जी इसके लिये राज़ी नहीं हुए। लेकिन हम सभी के मान मनौव्वल के पश्चात् इस बात के लिये राज़ी हुए कि वह समारोह स्थल पर बहुत कम देर रुकेंगे। ख़ैर! हमारे परिवार के कुछ सदस्य और रेडियो कॉलोनी के हमारे सहकर्मी पिताजी समेत होटल ताज में इफ़्को के कार्यक्रम में पहुँचे। वहाँ अखिलेश यादव ने शाल ओढ़ा कर पिता जी को सम्मानित किया। तत्पश्चात् पिता जी को बोलने के लिये आमंत्रित किया। मैं सोच रहा था कि पापा संभवतः लेखकों की समस्याओं या समाज में हाशिए पर जाते हुए साहित्य की स्थिति जैसे किसी विषय पर बोलेंगे। परंतु मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ कि इन सब विषयों की बजाय उन्होंने गोरखपुर और आस-पास के क्षेत्रों में जापानी इन्सेफ़ेलाइटिस की बीमारी से मरते बच्चों की समस्याओं को उठाया और अखिलेश जी से निवेदन किया कि गोरखपुर में लखनऊ SGPGI की टक्कर का एक अस्पताल खोला जाये।


तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से इफ़्को सम्मान प्राप्त करते हुए 


पिता जी भीतर-ही-भीतर जो सोचते रहते थे, कई बार उसे बाहर ज़ाहिर नहीं करते थे। बहुत सारी चीज़ें उन्हें भीतर-ही-भीतर मथ रही होती, उसे वह काग़ज़ में उतार स्वर दे देते। लेकिन आपसी बातचीत में इनका ज़िक्र कम ही होता।



जनवरी 2017 से लखनऊ में हमारे परिवार में जो एकरेखीय व्यवस्था बनी हुई थी (यानी तीनों प्राणियों का अपने-अपने क्षेत्रों में व्यस्त रहना), उसमें एक झटका वर्ष 2019 के दिसंबर महीने से लगना शुरू हो गया। नवंबर 2019 में पापा, कृष्णा के पास पूना रहने चले गये। कारण वह लखनऊ की कड़कड़ाती सर्दी से अपने को बचाना चाहते थे। लेकिन दिसंबर 2019 में उनको तेज़ खांसी की शिकायत होने लगी। उन्होंने कृष्णा से लखनऊ लौटने की इच्छा व्यक्त की। दिसंबर के आख़िरी सप्ताह में पापा लखनऊ लौट गये थे। जनवरी 2020 में, मैंने उनको किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय, लखनऊ के छाती रोग विभाग में दिखलाया। पता चला पिता जी के फेफड़ों में पानी भरा है। फेफड़ों से लगभग ढाई लीटर पानी निकाला गया। फेफड़ों से पानी निकालने के दौरान पापा काफ़ी शांत रहे। बिना किसी तकलीफ़ के उन्होंने अपने बदन से पानी निकलवाया।

पिता जी समय-समय पर विभिन्न शारीरिक व्याधियों से प्रभावित रहे थे। सर्वप्रथम 36 वर्ष की उम्र में हॉर्निया का ऑपरेशन इलाहाबाद के एक सरकारी अस्पताल में हुआ था। फिर वर्ष 2002 में प्रोस्टेट का ऑपरेशन लखनऊ में हुआ था। 2009 में दिमाग़ में खून के थक्के जम जाने के कारण, दिमाग़ का ऑपरेशन करवाना पड़ा। 88 वर्ष की उम्र में शरीर से पानी निकाला गया। रोचक तथ्य यह है कि अपने तमाम ऑपरेशन्स् के दौरान पिता जी ने कभी अपना धैर्य नहीं खोया। बड़े स्वाभाविक तरीके से इन शल्य क्रियाओं को लेते रहे और हमेशा मुस्कराते हुए अस्पताल से वापस लौटे। 2009 में जब वह लखनऊ के विवेकानंद अस्पताल में भर्ती हुए तो उन्होंने वहाँ के माहौल पर ढेर सारी कविताएँ भी लिखी जो बाद में उनके दोनों कविता संग्रहों 'न रोको उन्हें शुभा' (2012) एवं  'पार्वती' (2022) में 'अस्पताल डायरी' खंड में प्रकाशित हुईं। जनवरी 2020 में उनकी पीठ से पानी निकालने के पश्चात्, छः महीने उनका टी.बी. का इलाज चला। यद्यपि उनको टी.बी. डायग्नोज़ नहीं हुई थी लेकिन एहतियातन डॉक्टर्स, छाती के संक्रमण वाले मरीज़ों का टी.बी. इलाज भी करते हैं।

2020 के मई महीने में मेरी प्रोन्नति आकाशवाणी के सहायक निदेशक के पद पर हो गई। यह प्रोन्नति मात्र 21 वर्ष के पश्चात् हुई थी। मेरी सेवानिवृत्ति में अभी 22 महीने शेष थे। मैं चाहता तो आकाशवाणी लखनऊ में ही अपनी पोस्टिंग करवा सकता था क्योंकि सरकारी सेवा में एक नियम यह भी है कि यदि आपकी सेवानिवृत्ति में दो वर्ष से कम का समय शेष है तो आपका स्थानांतरण अन्य केन्द्र नहीं होगा (अपवाद स्वरूप विशेष परिस्थितियाँ)। लेकिन मेरी निगाहें अल्मोड़ा पर थीं। उसके कई कारण थे। सबसे प्रमुख तो यह था कि मैं पिछले चार दशकों से कुमाऊं से पूरी तरह कट गया था। सत्तर के दशक में मैं कई वर्षों तक प्रतिवर्ष गर्मियों में रानीखेत/भुवाली जाता रहा था। उसका कारण था कि हमारी बुआ जी रानीखेत में रहती थीं और उनके तीन पुत्रों ने इलाहाबाद में हमारे घर में रह कर ही पढ़ाई की थी। गर्मियों में जब उनके शैक्षिक संस्थानों में छुट्टी होती तो मैं भी उनके साथ हो लेता। हमारे एक ताऊ जी भुवाली में रहा करते थे। तो जब रानीखेत जाते तो भुवाली भी रुकते। 1980 के पश्चात् यह सिलसिला समाप्त हो गया। बचपन की यादें मुझे समय-समय पर उद्वेलित करती रहतीं। रह-रहकर कुमाऊं के हरे-भरे पहाड़, नदियाँ, घाटियाँ, जंगल याद आते। जुलाई 2020 के अंत तक यह तय हो गया कि मैं आकाशवाणी अल्मोड़ा में कार्यालयाध्यक्ष के पद पर ज्वायन कर लूँगा। लेकिन तभी एक अन्य समस्या ने सिर उठा लिया। पिताश्री हॉर्निया की समस्या से पीड़ित हो गये थे। ऑपरेशन ही एकमात्र इलाज था। लेकिन 88 वर्ष की उम्र में ऑपरेशन के बहुत से ख़तरे थे। डॉक्टरों की सलाह के मुताबिक़ उनकी बहुत सी चिकित्सकीय जांचें हुई। सौभाग्यवश वह सभी जाँचों में ठीक पाये गये। लखनऊ के एक सर्जन से बात हुई। उन्होंने कहा कि इस उम्र में रिस्क तो होता ही है। ऑपरेशन बिना रिस्क के नहीं होगा। पिताजी को चलने में काफी परेशानी हो रही थी। मैंने और संजय ने आपस में सलाह की। तय किया कि हम लोग रिस्क लेंगे। पापा को परेशानी की स्थिति में देखना संभव नहीं हो पा रहा था। चूँकि पिता जी के स्वास्थ्य के अन्य मापदंड जैसे रक्तचाप, हृदयगति वगैरह ठीक थे। डायबिटीज़ की कोई समस्या नहीं थी। इसलिये मैं आश्वस्त था कि ऑपरेशन सफल होगा। जैसा सोचा था वैसा ही हुआ। नवंबर के पहले सप्ताह में लखनऊ के गोमती नगर इलाके में एक निजी चिकित्सालय में पिता जी का ऑपरेशन सफलतापूर्वक संपन्न हुआ।



दिसंबर 2020 से पिता जी और मेरी राहें जुदा हो गयीं। दिसंबर 2020 के तीसरे हफ़्ते में मैंने अल्मोड़ा में आकाशवाणी के केन्द्राध्यक्ष का पदभार ग्रहण कर लिया था। पिता जी, संजय के साथ ग़ाज़ियाबाद चले गये। मेरी योजना थी कि मेरे अल्मोड़ा प्रवास के दौरान पिता जी अल्मोड़ा आयेंगे, कुछ दिन वहाँ प्रवास करेंगे। आधुनिक अल्मोड़ा को देख कर अपने बचपन के देखे हुए अल्मोड़ा से उसकी तुलना  करेंगे। कुछ दिन हम लोग गाँव में बिताएंगे, उस गाँव में जिसकी मधुर स्मृतियों को संजो कर उन्होंने 'मेरा ओलियागाँव' जैसी चर्चित पुस्तक लिखी।

अपने विचारों को असल रूप देने के लिये मैंने अल्मोड़ा के लोअर मॉल इलाक़े में एक ऐसा मकान किराये पर लिया जो बिल्कुल सड़क किनारे था। इस मकान को ढूंढ़ने में मेरे कार्यालय के सहकर्मियों ने भी काफ़ी सहायता की। कई दिनों की मेहनत मशक्कत के पश्चात् यह मकान ढूंढ़ा गया था। दरअसल अल्मोड़ा को 'सीढ़ियों का शहर' भी कहा गया है। यहाँ कई मुहल्लों में एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने के लिये दर्जनों सीढ़ियों का उपयोग करना पड़ता है। पिताजी के हॉर्निया में सावधानी रखनी थी कि ऑपरेशन के कारण उन्हें कहीं ज़्यादा सीढ़ियाँ न चढ़नी उतरनी पड़े।

अन्तत: एक सुविधाजनक मकान हासिल करने में मुझे सफलता मिल गई थी। मैं इस प्रतीक्षा में था कि जल्द ही पिताश्री अल्मोड़ा आयेंगे। लेकिन हुआ उल्टा। अप्रैल 2021 होते-न-होते पूरे देश को कोरोना ने अपनी गिरफ़्त में ले लिया। और इसकी गिरफ़्त में पिताजी भी आ गये। गाजियाबाद में संजय का पूरा परिवार कोरोना की ज़द में आ गया था। संजय, उसकी पत्नी मनीषा, बेटी पाखी। और साथ में पिताश्री भी। 88 वर्ष की उम्र और उस पर से कोरोना का कहर। पिता जी का ऑक्सीजन स्तर 82 तक पहुँच गया था। परिवार के अन्य सदस्यों की जान सांसत में थी। पिता जी को कोरोना उस वक्त हुआ था जब पूरे देश से दुर्घटनाओं की बड़ी ख़बरें आ रही थीं। हज़ारों हज़ार लोगों की मौत के समाचार से अख़बार रंगे पड़े थे। मेरे बहुत से परिचित कोरोना की चपेट में आ कर अपनी जान गंवा बैठे थे। एक दुःखद हादसा वरिष्ठ साहित्यकार रमेश उपाध्याय जी के साथ पेश आया था। उन्होंने 19 अप्रैल 2021 को फेसबुक पर अपनी वॉल पर लिखा "हमारे फै़मिली डॉक्टर ने कहा कि हम चारों कोरोना का टेस्ट करा लें। टेस्ट के लिये दिल्ली में ऐसी महामारी है, कि कई दिन लग गये। रिपोर्ट चारों की पॉज़िटिव आयी है और अस्पताल में भर्ती होने को कहा गया है। लेकिन किसी अस्पताल में बेड खाली नहीं। जायें तो जायें कहाँ? करें तो क्या?" लेकिन इस पोस्ट के पांच दिवस के उपरान्त ही उनका देहावसान हो गया। अप्रैल में 2021 के तीसरे चौथे सप्ताह में कोरोना प्रचंड रूप में था। मैं अल्मोड़ा में सुरक्षित था। लेकिन फिर भी आत्मविश्वास जवाब दे रहा था। इसी दौरान लगभग 19 अप्रैल के आस-पास संजय ने फ़ोन पर सूचित किया कि पापा समेत उसका पूरा परिवार कोरोना की चपेट में आ गया था।

मेरे एक मामा एवं एक मौसी डॉक्टर हैं। हम लोगों के परिवार में अगर कोई भी चिकित्सकीय समस्या होती है तो समस्या के निराकरण के लिये तुरंत मामा-मौसी से संपर्क करते हैं। कोरोना की स्थिति में भी ऐसा ही हुआ। मामा-मौसी ने निर्देशित किया कि पापा को किसी अस्पताल में भर्ती न कराया जाये। उनका जो भी इलाज हो, घर पर ही किया जाये। उनके निर्देश पर संजय ने पापा को पेट के बल लिटा कर श्वास संबंधी बहुत सारे व्यायाम प्रारंभ करा दिये। पिताजी ने जीवन में पहली बात इतने सारे शारीरिक व्यायाम किये होंगे। इस बीच मामा जी ने Oxygen concentrate मशीन दिलवा दी। Oxygen concentrate और शारीरिक व्यायामों का असर था कि बिना अस्पताल में भर्ती हुए पिता जी कोरोना की बीमारी से सकुशल बाहर आ गये।

कोरोना की जंग के बाद पापा ने भविष्य की अपनी  किताबों पर स्वयं को केन्द्रित करना शुरू किया। यह दो किताबें थीं। पहली सम्पूर्ण कहानियों का समग्र और दूसरी इलाहाबाद शहर से जुड़े संस्मरणों पर आधारित किताब 'फ़क़ीरों का शहर इलाहाबाद'। पिछले वर्षों में संजय ने पुस्तक प्रकाशन के क्षेत्र में अच्छी खासी दक्षता हामिल कर ली है एवं इन दोनों किताबों का प्रकाशन संजय अपने प्रकाशन 'नवारुण प्रकाशन' से कर रहा है। अतएव संजय के साथ पिता जी इन दोनों किताबों के कथ्य, डिज़ाइन और कवर के संदर्भ में महीनों विचार-विमर्श करते रहे। कोरोना के दौरान ही उनका एक व्यंग्य कोरोना बीमारी के संदर्भ में 'दैनिक जागरण' समाचार पत्र में भी प्रकाशित हुआ था।

मैं आकाशवाणी अल्मोड़ा में विभिन्न कार्य व्यापार में व्यस्त था। चूँकि अल्मोड़ा में मेरा प्रवास मात्र पंद्रह महीनों का ही होना था, इसलिये अल्प समय में ज़्यादा से ज़्यादा चीज़ें हासिल करने की कोशिश में पिता जी से मेरा संपर्क दूरभाष से ही रहता। वर्ष 2021 में सितंबर में मेरी उनसे मुलाकात हुई, जब कोविड की विभीषिका के हल्का पड़ने पर मैं भी गाजियाबाद में उनसे मिला।

मैं मार्च 2022 की प्रतीक्षा कर रहा था जब रेडियो की नौकरी से सेवानिवृत्त हो कर मुझे वापस लौटना था। और पिताश्री को भी स्थायी रूप से लखनऊ रहने के लिये बुलाना था। समय का पहिया अपनी गति से घूम रहा था। 31 मार्च 2022 का दिन भी आ गया। मैं आकाशवाणी की 34 वर्ष 01 माह की सेवा से कार्यमुक्त हो गया। अब मेरे सम्मुख एक ही लक्ष्य था कि मैं पिता जी को गाजियाबाद से लखनऊ लिवा लाऊं और हमारा परिवार पुनः उन पुराने दिनों को जिये जो मेरे अल्मोड़ा जाने से पूर्व के दिन थे। लखनऊ में पिता जी की प्रतीक्षा मेरे साथ बहुत सारे लोग कर रहे थे, क्योंकि उन सबने पिता जी के साथ एक लंबा समय व्यतीत किया  था।

मेरी योजना के मुताबिक़, पापा अप्रैल के तीसरे सप्ताह में मेरे साथ लखनऊ लौट आये। लेकिन इस दफ़े परिस्थितियों में परिवर्तन था। पिता जी को एक नये शारीरिक कष्ट ने अपने घेरे में ले लिया था। उनको चलने-फिरने में असुविधा हो रही थी क्योंकि उनकी रीढ़ की हड्डियों में अंतराल ज़्यादा हो गया था। गाजियाबाद से लखनऊ तो वह किसी तरह से आ गये लेकिन लखनऊ में उनकी रचनात्मक सक्रियता में कमी आ गयी थी। जिस तरह पूर्व में वह लगातार एक जगह बैठ कर कार्य करते, अब वह स्थिति नहीं थी। प्रायः दिन में सो जाते। थोड़े समय इधर-उधर टहलते, थोड़ी देर कुर्सी पर बैठकर कार्य करते। शारीरिक अस्वस्थता के बावजूद वह अपने कार्य स्वयं ही करते। हम लोग उन्हें सलाह देते कि वह कोई भी भारी चीज़ न उठायें। वह इन बातों का पूरा ध्यान रखते। लेकिन अपने कपड़े धोने से ले कर दूसरे कार्यों के लिए किसी की सहायता न लेते।



वर्ष 2022 में लखनऊ में पिता जी का कयाम काफ़ी कम वक़्त के लिये रहा। लगभग डेढ़ महीने का। लक्ष्मी ने और मैंने तय किया कि जून में कुछ दिन मुंबई और पुणे में गुज़ारेंगे। दरअसल हमारी बेटी मुंबई में बहुराष्ट्रीय कंपनी में कार्यरत है। कॉरपोरेट जीवन की उसकी व्यस्तताओं के चलते, उसे लखनऊ आने का अवसर कम ही प्राप्त होता है। पत्नी (जो सरकारी स्कूल में अध्यापिका है) को वर्ष भर में एक ही बार मई-जून में  लम्बी छुट्टी मिलती है। हम लोगों का मत था कि वर्ष में कुछ दिन अपनी बेटी के पास रहना चाहिये। ताकि उसे भी माता-पिता की उपस्थिति का अहसास बराबर बना रहे। पिताश्री यद्यपि इस प्रस्ताव से बहुत संतुष्ट नहीं थे लेकिन इस यात्रा में उन्हें भी अपनी बेटी के पास रहने का सुख मिलना था, इसलिये वह उत्साहित थे। उन्होंने कई लोगों को बताया कि हम लोग मुंबई जा रहे थे। वहाँ से पिता जी बहन के पास पुणे चले जायेंगे। चार जून 2022, वायुमार्ग से हम लोग लखनऊ से मुंबई पहुँच गये। अगले दिन पिता जी हिना की कार में हम लोगों के साथ लोनावाला तक गये। पुणे से बहन कृष्णा, लोनावाला पहुँच गयी। पापा का पुणे प्रवास 05 जून 2022 से प्रारंभ हो गया। पहले तय था कि पिताजी हम लोगों के साथ 14 जून को रेलमार्ग से पुणे से लखनऊ लौटेंगे। परंतु अचानक उनकी पीठ में दर्द ज़्यादा होने लगा और फिर यह तय हुआ कि वह पुणे में रह कर अपना इलाज करवायें। ठीक होने के बाद लखनऊ आयें। कृष्णा ने पुणे के अच्छे चिकित्सकों से संपर्क किया। समय-समय पर पिता जी को हड्डी के डॉक्टर और फिज़ियोथिरेपिस्ट के पास ले जाया जाता रहा गया था।



जुलाई 2022 तक हममें से किसी को लेश मात्र भी आशंका नहीं थी कि पिता जी के कुछ दिन ही इस दुनिया में शेष हैं। यद्यपि पिता जी के मन के किसी कोने में इस आशंका ने घर कर लिया था। इसके चलते उन्होंने वसीयतनुमा अपने 'मन की बात' को काग़ज़ पर उतारना प्रारंभ कर दिया था और जुलाई के प्रथम सप्ताह तक उनकी यह 'मन की बात' पूरी तरह मुकम्मल हो गयी थी। 

जुलाई के अंतिम सप्ताह से पिता जी के महाप्रयाण की फ़ाइनल स्क्रिप्ट जैसे लिखनी शुरू हो गई थी।

जुलाई के मध्य में कृष्णा का फ़ोन आया कि कोविड की एक हल्की लहर ने पुणेवासियों को अपने आगोश में ले लिया था। कृष्णा, उसके पतिदेव अमिताभ और कनिष्ठ पुत्र देबू भी उससे प्रभावित हो गये थे। इस हल्की लहर के प्रभाव से पिता जी भी अछूते न थे। चूँकि जुलाई 2022 की लहर का प्रभाव उतना मारक नहीं था जितना अप्रैल 2021 का। अतएव हम लोगों ने इस लहर को ज़्यादा गंभीरता से नहीं लिया। आपसी बातचीत में, उन दिनों यह आम कथन था कि किसी को साधारण सा भी बुखार हो जाए तो कोविड टेस्ट करवाओ तो वह पॉज़िटिव ही आयेगा।



परिवार में पुणे कोविड की चर्चाओं पर विराम लगा ही था कि एक अल्प अंतराल के पश्चात् बहन कृष्णा के फ़ोन ने मुझे परेशान कर दिया। "पापा को तीन दिन से तेज़ बुखार है। बुखार उतर नहीं रहा।" जब तक इस घटना पर मैं कुछ ज़्यादा सोच पाता, अगले दिन कृष्णा का फोन आ गया कि पिता जी को पुणे के एक अस्पताल में भर्ती करा दिया गया था। यह अगस्त 2022 की बात थी। कृष्णा के पति को उसी दिन एक अत्यंत आवश्यक कार्यालयी कार्य से चेन्नई जाना था, इसलिये वह सारी परिस्थितियों का सामना अकेले ही कर रही थी। मैंने स्थिति की नाज़ुकी कम भांप कर अगले दिन का हवाई टिकट करवाया और सुबह लखनऊ से उड़ कर देर शाम पुणे पहुँच गया। फिर वहाँ अस्पताल में लगातार पिता जी के साथ रहा। बीच में थोड़े समय के लिये कृष्णा के घर नहाने एवं भोजन के लिये चले जाता।

पुणे के अस्पताल में पिता जी का इलाज छाती में संक्रमण के लिये चला। पुणे का संदर्भित अस्पताल बेहद व्यवस्थित था।

'Ruby Hall clinic' नामक इस अस्पताल में मेडिकल एवं पैरा मेडिकल स्टाफ़ अपने अपने कर्त्तव्यों का निर्वहन इतनी ज़िम्मेदारी से कर रहे थे कि कई बार बेहद आश्चर्य होता। जब मैंने उपरोक्त स्थितियों का वर्णन अपने मित्रों-परिचितों से किया तो अधिकांश की राय थी कि वर्तमान में ज़्यादातर बड़े निजी अस्पतालों में इसी तरह की कार्य संस्कृति है।

पांच दिवस के एन्टीबायोटिक दवाओं के कोर्स के पश्चात् पिता जी की ठीक-ठाक शारीरिक स्थिति को देखते हुए, उन्हें अस्पताल से डिस्चार्ज कर दिया गया। पहले तय था कि अस्पताल से डिस्चार्ज होने के पश्चात् पिता जी मेरे साथ वापस लखनऊ लौटेंगे। लेकिन उन्होंने निर्णय सुनाया कि वह लखनऊ के बजाए ग़ाज़ियाबाद वापस जाना पसंद करेंगे क्योंकि उन्हें संजय के साथ बैठ कर संपूर्ण कहानियों के संग्रह को अंतिम रूप देना था। 18 अगस्त 2022 को, पापा बहन कृष्णा के साथ एक बार पुनः ग़ाज़ियाबाद लौट आये। निकट भविष्य में प्रकाशित होने वाली अपनी किताबों के फ़ाइनल ड्राफ़्ट पर संजय से विचार-विमर्श करने।

10 सितंबर 2022 पापा का 90वाँ जन्मदिवस था। यह दिन हम सबके लिये एक ऐतिहासिक दिन था। एक ख़्वाब जो परिवार के तमाम सदस्यों ने मिल-जुल कर देखा था, उसके पूरा होने का वक़्त बस आ पहुँचा था। पिता जी के नब्बे वर्ष पूर्ण होने पर जश्न मनाने की तैयारी बहुत पहले से शुरू कर दी गई थी। भारत सरकार के प्रकाशन की चर्चित पत्रिका 'आजकल' ने सितंबर अंक का अच्छा-ख़ासा हिस्सा पिताश्री के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर समर्पित किया था। मुखपृष्ठ पर पिता जी की ख़ूबसूरत तस्वीर के साथ शीर्षक '90 वर्ष के हुए शेखर जोशी'।



इससे पूर्व 09 जुलाई 2022 को हिन्दी दैनिक 'अमर उजाला' ने हिन्दी साहित्यकारों के लिये स्थापित अपने शीर्ष सम्मान 'शब्द सत्ता सम्मान 2021' के लिये पापा के नाम की घोषणा कर दी थी। जुलाई से ही पापा साहित्यिक हल्कों में चर्चा के केन्द्र में थे। पूर्व में हम परिवारजन ने योजना बनाई थी कि 10 सितंबर को पापा की संपूर्ण कहानियों के संग्रह का लोकार्पण इलाहाबाद (वर्तमान प्रयागराज) में पापा की उपस्थिति में किया जाएगा ताकि उनका 90वाँ जन्मदिवस, सब लोगों के लिये एक यादगार दिवस साबित हो। लेकिन एक तरफ पिता जी की अस्वस्थता और दूसरी तरफ किताब के प्रकाशन न होने से यह योजना मूर्त रूप न ले सकी। बावजूद इसके परिवार के सदस्यों के उत्साह में कोई कमी नहीं थी। संजय ने हम भाई बहनों को सूचित किया कि 10 सितंबर को उसके आवास पर पिता जी की 90वीं वर्षगाँठ मनाई जायेगी। फ़्लैट में सीमित स्थान होने के चलते हम लोग चाह कर भी बहुत सारे लोगों को नहीं बुला सकते थे। अन्यत्र आयोजन करना संभव नहीं था क्योंकि रीढ़ की हड्डी के दर्द के चलते पापा तीसरे माले की सीढ़ियों से नीचे नहीं उतर सकते थे।



10 सितंबर के आयोजन की सूचना से पिता जी को अनभिज्ञ रखा गया  क्योंकि उनको हम लोगों द्वारा एक 'सरप्राइज़' देना था। लेकिन जब 09 तारीख को कृष्णा सपरिवार पुणे से, हिना (बेटी) मुंबई से पहुँचने लगी तो उन्हें समझ आ गया कि उनके 90वें जन्मदिवस को मनाने के लिये बच्चों ने कमर कस ली है।

यह 10 सितंबर 2022 की सुबह थी। मैं और लक्ष्मी लखनऊ से ग़ाज़ियाबाद, सुबह-सुबह पहुँच गये थे। बहुत दिनों बाद हम भाई बहनों के परिवार का संगम एक स्थान पर हो रहा था। पिता जी की 90वीं वर्षगाँठ के जश्न का सुबह से ही आग़ाज़ हो चुका था। फ़ेसबुक पर उनके दर्जनों प्रशंसकों ने अपने प्रिय कथाकार के 90वीं वर्षगाँठ की पोस्ट लगा रखी थी। इस अवसर पर मैंने भी एक लम्बा आलेख लिखा था '90 वर्ष के हुए पिताश्री' जिसे अनुज संतोष चतुर्वेदी ने अपने ब्लॉग पर और सुभाष राय जी के संपादन वाले 'जनसंदेश टाइम्स' ने अगले दिन यानी 11 सितंबर (रविवार) को प्रकाशित किया।

सुबह से ही देश के विभिन्न हिस्सों से रिश्तेदारों, परिचितों एवं प्रशंसकों के फ़ोन आने लगे। पिता जी सभी के फ़ोन रिसीव कर लम्बी बातचीत करते रहे। वह बार-बार कह रहे थे कि तुम लोगों को इस तरह के आयोजन को करने की क्या ज़रूरत? इतना पैसा तुम लोगों ने क्यूं ख़र्च किया? बेहतर होता किसी अनाथालय में जा कर बच्चों को खिला देते। कभी मज़ाक करते "अरे! मेरा 90वाँ जन्मदिन मनाने की क्या जरूरत थी। मुझे तो सौ साल जीना है।"



उत्साह और जोश के इस माहौल का रंग चढ़ा शाम को जब एक बेहद स्वादिष्ट केक को (जिस पर 90 लिखा था), सबकी उपस्थिति में काटा गया। परिवार की महिलाओं और पुरुषों ने इस अवसर पर ख़ूब ठुमके भी लगाये।  इस अवसर पर पिताजी को मिलने वाले उपहारों का भी ढेर लगा था जिसमें वस्त्र ज़्यादा थे।



पापा की 90वीं वर्षगाँठ के तीसरे दिन (यानी 13 सितंबर 2022 को) उन्हें देहरादून में फ़ोन पर सूचना प्राप्त हुई कि उनके मित्र प्रसिद्ध साहित्यकार विद्यासागर नौटियाल की स्मृति में प्रारंभ किये गये सम्मान के लिये उनका नाम तय किया गया है। विद्यासागर जी के परिवारजन एवं मित्रों ने नौटियाल जी की स्मृति में एक सम्मान समारोह का आयोजन वर्ष 2014 से प्रारंभ किया था। बीच में कोविड के चलते यह स्थगित हो गया था। इसका एकमात्र  कार्यक्रम वर्ष 2014 में ही हो पाया था। दूसरे संस्करण का आयोजन 29 सितंबर 2022 को रखा गया था। इस समारोह के लिये पापा का नाम कमेटी वालों ने सर्वसम्मति से तय किया था।

यदि किसी अन्य संस्था ने यह प्रस्ताव भेजा होता तो पापा शत-प्रतिशत मना कर देते। क्योंकि पूर्व में वह कई संस्थाओं द्वारा सम्मानित किये जाने के प्रस्ताव से असहमति जता चुके थे। उनका कहना था कि अतीत में उनको ढेर सारे सम्मान/पुरस्कार प्राप्त हो चुके थे, उनकी उम्र भी काफ़ी हो चुकी थी इसलिये सम्मान/पुरस्कार अपेक्षाकृत किसी युवा रचनाकार को दिये जाने चाहिये। लेकिन नौटियाल जी के लिये पापा के मन में अपार स्नेह था। नौटियाल जी से उनकी मित्रता वर्ष 1955 से थी। तब जब नौटियाल जी बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में पढ़ते थे और तेज़-तर्रार छात्र नेता भी थे। नौटियाल जी की शख़्सियत पर पिताश्री ने एक रोचक संस्मरण भी लिखा था जो उनकी पुस्तक 'स्मृतियों में रहें वे' में संकलित है। इसलिये नौटियाल जी की स्मृति में यदि कोई सम्मान समारोह आयोजित किया जा रहा हो तो उसमें अस्वीकृति देने का प्रश्न ही नहीं था। लेकिन अपने ख़राब स्वास्थ्य का ध्यान भी उन्हें था। इसलिये उन्होंने आयोजकों को सूचित किया कि सम्मान स्वीकारने में उन्हें कोई दिक़्क़त नहीं है लेकिन सम्मान ग्रहण करने आने में वह असमर्थ होंगे। हाँ, उनके दो पुत्रों में से कोई एक इस सम्मान को उन की तरफ़ से ग्रहण कर लेगा। संजय ने इस सम्मान समारोह की सूचना देते हुए कहा कि वह प्रकाशन संबंधी कार्यों में अत्यंत व्यस्त था, अतएव सम्मान ग्रहण करने का गुरुतर दायित्व मुझे निभाना होगा।

मैंने आयोजक गणों से बातचीत की। यह तय हुआ कि मैं 28 सितंबर को फ़्लाइट से लखनऊ से देहरादून जाऊँगा। 29 सितंबर को नौटियाल जी के जन्मदिवस पर आयोजित होने वाले सम्मान समारोह में शिरकत कर के, 30 तारीख़ को वापस लखनऊ लौट आऊंगा।



मैं देहरादून में आयोजित होने वाले सम्मान समारोह को ले कर काफ़ी उत्साहित था। एक तो यह कि इस समारोह में ढेर सारे साहित्यकारों से मिलने का अवसर मिलेगा। फिर देहरादून में मेरी ताईजी  उनके सुपुत्र गिरीश और दो बेटियॉं नीरू और पमपम भी रहती हैं। मुझे आशा थी कि अपने क़रीबी रिश्तेदारों से भी मैं इस सम्मान समारोह के बहाने मिल पाऊंगा। हमारे ताऊ जी (पिताजी दो भाई एवं एक बहन थे) स्वर्गीय नवीन चंद्र जोशी जी रेशम योजना विभाग में इंस्पेक्टर के पद से सेवानिवृत्त हुए थे। उन्होंने लम्बा समय देहरादून में ही बिताया था। उनके देहरादून प्रवास के दौरान हम लोग प्रायः देहरादून जाते रहते थे। कभी वह डोईवाला में रहे, कभी मांजरी में, कभी प्रेमनगर में। सत्तर के दशक के प्रारंभिक वर्षों में उनकी पोस्टिंग लम्बे समय तक विकासनगर के रेशम फार्म पर थी। आज से लगभग पचास वर्ष पूर्व देहरादून आज की तरह इतना गझिन नहीं बसा था। विकासनगर में रेशम योजना केन्द्र का फार्म ख़ूब लम्बा चौड़ा था। सैकड़ों की संख्या में शहतूत के वृक्ष वहाँ लगे थे। रेशम के कीड़ों को शहतूत खिलाकर पाला जाता था। हम लोग अपनी गर्मी की छुट्टियाँ विकासनगर में गुज़ारते। गाय के बछड़ों की तरह, लम्बे चौड़े फार्म हाउस में कुलांचे मारते। ताई जी की बहन के बच्चे भी दिल्ली से आ जाते। खूब धमाचौकड़ी रहती। विकासनगर में एक बावड़ी भी थी। ज्यों मौक़ा मिलता, हम लोग बावड़ी में पहुँच जाते। छपाक-छपाक के साथ बावड़ी स्नान का आनंद लेते। उन दिनों विकासनगर से थोड़ी दूर डाकपत्थर में यमुना नदी को हिमाचल की एक नदी से जोड़ने का काम चल रहा था। एक बड़ी सुरंग के भीतर पटरियों पर ट्रॉलियों में दिन-रात काम होता। सुरंग के भीतर छत से लगे बिजली के बल्बों से दिन में भी प्रकाश निकल कर सुरंग को रौशन किये रहता। डाकपत्थर के पहले यमुना अपने चौड़े पाट के साथ बहती।

एक बार ताऊ जी के कार्यालय के कुछ कर्मचारियों ने तय किया कि यमुना नदी में मछलियों का शिकार किया जाएगा। इसके लिये किसी विस्फोटक सामग्री का इस्तेमाल किया गया। यमुना नदी के पानी में तेज़ धमाका हुआ। लेकिन उस धमाके के बाद जो मछलियां बेहोश होकर सतह पर आयीं, वह बड़ी अजीब शक्ल ओ सूरत वाली थीं। उसमें से कुछ साँप की जैसी दिख रही थीं। अन्ततः उन सभी मछलियों (या मछलियों जैसे जीवों) को पुनः पानी में फेंक दिया गया। किसी की उन जीवों को खाने की हिम्मत न हुई।

देहरादून की ऐसी ही ढेर सारी स्मृतियां आज भी मेरे मानस में सजीव हैं। वर्ष 1991 से 94 तक देहरादून की भारतीय मिलिट्री एकेडमी (IMA) में मेरे मामाजी कमांडेंट के पर पर आसीन थे। वर्ष 1994 की जून में पत्नी लक्ष्मी और मैं केदारनाथ - बद्रीनाथ की यात्रा कर देहरादून पहुँचे थे तो मामा जी से मिलने IMA गये। मामाजी ने पूछा तुम देहरादून में कहाँ घूमने जाना चाहते हो? मैं एक बार पुनः डाकपत्थर देखना चाहता था। 1994 के डाकपत्थर के सामने 1974-75 का डाकपत्थर अपना अस्तित्व खो चुका था। वह विकासनगर भी पहचान से परे था जहाँ दो दशक पहले प्रतिवर्ष गर्मियों में हम लोग धमाल मचाते थे। तो ऐसी स्मृतियों से जुड़े देहरादून में जाने का मुझे अवसर मिल रहा था।

10 सितंबर को पापा के 90वें जन्मदिवस के समारोह के उपरांत जहाँ लक्ष्मी लखनऊ, बेटी हिना मुंबई, बहन कृष्णा पुणे लौट चुकी थीं मैं गाजियाबाद में दो दिन रुक गया था। बहुत दिनों से मेरी प्रबल इच्छा भी कि मैं कुछ दिनों के लिये कुमाऊं के किसी गाँव में प्रवास करूं। दरअसल मेरा मानना है कि समकालीन भारतीय समाज के यथार्थ को जानने के लिये शहर के लोगों को कुछ दिन किसी ग्रामीण क्षेत्र में अवश्य रहना चाहिये। ऐसा नहीं है कि मैं ग्रामीण क्षेत्रों में नहीं रहा हूँ या भारतीय ग्रामीण समाज के बारे में मेरी जानकारी बिल्कुल नहीं है। मैंने नौकरी की शुरुआत ही इलाहाबाद क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक में अधिकारी के पद से की थी। वर्ष 1985 अगस्त से वर्ष 1988 फरवरी के मध्य। उस दौरान इलाहाबाद जनपद के कई गाँवों में जाने और वहाँ कुछ कुछ समय के लिये रहने का अवसर भी मिला। फिर आकाशवाणी की नौकरी में आने के बाद हमेशा शहरी क्षेत्रों में ही रहा। गाँवों की ज़िंदगी का प्रबल आकर्षण मुझे बेचैन करता रहा।

मैंने तय किया कि सितंबर के मध्य में अल्मोड़ा के समीप के किसी गाँव में जा कर कुछ दिन रह कर अपनी इस इच्छा को भी पूरा कर लिया जाए। मेरे पास एक विकल्प अपने पैतृक गाँव 'ओलिया गाँव' में जाने का भी था लेकिन वहाँ खाने-पीने की उचित व्यवस्था न होने के चलते, उस विकल्प को त्यागना ही पड़ा। हमारे पैतृक गाँव में आज भी हम लोगों का एक पुराना मकान, मज़बूती के साथ खड़ा है। पिता जी के अनुसार इस मकान का निर्माण हमारे दादा जी ने वर्ष 1924 के आस-पास करवाया था। इस मकान में ही हमारे पिता जी का जन्म हुआ था। लेकिन वर्ष 1969 में दादा जी की मृत्यु के पश्चात् हमारे परिवार के सदस्यों का गाँव की तरफ रुख बहुत सीमित हो गया था। गाँव की ज़मीन और मकान को ले कर न तो पापा ही ने कभी कोई दिलचस्पी दिखाई न हमारे ताऊ जी ने। हाँ, पिता जी के ताऊ जी के ज्येष्ठ पुत्र स्वर्गीय भुवन चन्द्र जोशी जी (जिनकी भुवाली में किराने की एक दुकान थी और जिस दुकान पर बैठ कर कई गर्मियों में मैंने भुवाली के बाज़ार की चहल-पहल का आनंद लिया) बहुत वर्षों तक गाँव जाते रहे और हम लोगों के परिवार के तत्कालीन हलवाहा  से वार्षिक हिसाब-किताब कर कुछ चौथ वसूली कर लेते थे। लेकिन विगत 25-30 वर्षों यह क्रम भी बंद हो गया। एक तो ताऊजी (भुवन चन्द्र जोशी जी) का बीस बाईस वर्ष पूर्व निधन हो गया। फिर हलवाहे और उनकी पत्नी का भी निधन हो गया। वर्तमान में हयात सिंह और उनकी पत्नी में (जो पूर्व हलवाहा के पुत्र और पुत्रवधू हैं), हम लोगों के पैतृक मकान के मालिक हैं। गाँवों में जंगली जानवरों के प्रकोप के चलते, खेती बहुत अनुत्पादक हो गयी है। इसके चलते हयात सिंह और उसकी पत्नी अब खेती छोड़, लेबरी से अपना खर्चा चलाते हैं। गाँव में हमारे परिवार का केवल एक प्राणी शेष है 'राजू' जो हमारे पट्टीदार स्वर्गीय विपिन जोशी जी के सुपुत्र हैं और गाँव के भीतर अपने विशालकाय मकान को सुरक्षित रखे हैं। राजू भाई ने शादी नहीं की है। तो अपने पैतृक गाँव में रहने, खाने-पीने की उचित व्यवस्था न होने के चलते मैंने निश्चय किया कि अल्मोड़ा जनपद से तक़रीबन चालीस किलोमीटर दूर एक ग्राम 'विजयपुर पाटिया' में कुछ दिन प्रवास किया जाए। और इस उद्देश्य को मूर्त रूप देने 12 सितंबर को मैं ग़ाज़ियाबाद से अल्मोड़ा के लिये निकल पड़ा।

आजकल कुमाऊं के गाँवों में 'होम स्टे' का प्रचलन काफ़ी ज़ोरों पर है। 'पाटिया' में ही मुझे भी एक संस्था द्वारा प्रायोजित 'होम स्टे' में रहने का अवसर प्राप्त हुआ। यहाँ मैं इस बात का उल्लेख करना आवश्यक समझता हूँ कि 'पाटिया' की ख्याति कुमाऊं के उच्चकुलीन पांडेय लोगों के गाँव के तौर पर है। पिछली शताब्दी के प्रारंभिक दशकों में यहाँ एक परिवार ने बहुत शानदार कोठी बनवायी थी। माना जाता है कि उस कोठी की कीमत उस वक़्त नौ लाख रुपयों की थी। कोठी बनाने वाले परिवार को 'नौलखिया दीवान' कहा जाता था। दरअसल जिन लोगों ने अपने गाँव में कोठी बनवाई थी, वह किसी राजा के यहाँ दीवान यानी मंत्री थे। बाद में किसी ने 'नौलखिया दीवान' नाम का एक नाटक भी लिखा था जो कई बार मंचित किया गया। हमारे पिताजी और उनके समव्यस्कों ने 'पाटिया गाँव' में वह कोठी देखी थी। लेकिन समय के थपेड़ों ने उस कोठी का नामो-निशान गाँव से मिटा दिया है।

'पाटिया' में मेरे पापा की एक मौसी की शादी हुई थी। पिता जी के मौसा जी का एक विशालकाय मकान आज भी 'पाटिया' में बदस्तूर कायम है। वर्ष 2021 तक पिता जी के मौसा जी के परिवारीजन उस मकान में रह रहे थे। अपने बचपन में हमारे पिता जी का 'पाटिया' काफी आना-जाना लगा रहता था। 'पाटिया' में ही आकाशवाणी के पूर्व समाचार वाचक देवकीनंदन पांडेय जी का भी पैतृक मकान है। अपने अल्मोड़ा प्रवास के दौरान मैं दो बार इस गाँव में जा चुका था लेकिन रुका नहीं था। लेकिन सितंबर के मध्य में जब मैं दो दिन के लिये इसमें रुका तो मुझे पहाड़ों के गाँवों में व्याप्त ग़रीबी और बेरोज़गारी को बहुत क़रीब से देखने का अवसर हासिल हुआ।

"अहा, ग्राम्य जीवन भी क्या है?" के विपरीत  वर्तमान के  पहाड़ी गाँव में  जिस तरह की दैन्यता और अभाव के दर्शन मैने दो दिन के अल्प विराम में किये, उसने कलेजा मुंह को ला दिया। 

पहले 'पाटिया' और फिर 'पाटिया' से चालीस किलोमीटर दूर एक अन्य गाँव 'बसौली' में रह कर और कुमाऊं के ग्रामीण जीवन को क़रीब से देखने की इच्छा को पूरा करने के पश्चात् सितंबर के तीसरे सप्ताह में मैं लखनऊ लौट आया। इस दरम्यान पिताजी लगातार मेरा हाल-चाल लेते रहे। 'पाटिया' और 'बसौली' से अपने रिश्तों का ज़िक्र करते रहे। बताते कि कैसे वह बचपन में  ओलिया गाँव से 'पाटिया' और 'बसौली' जाते थे। जब मैं 'पाटिया' में था तो उन्होंने मोबाइल पर मुझे 'पाटिया' के कुछ पुराने लोगों के बारे में जानकारी दी  जिसे मैंने वहाँ के स्थानीय लोगों से साझा भी किया।



ख़ुशी और उत्साह के इस माहौल को सितंबर के चौथे सप्ताह में अचानक ऐसा ब्रेक लगा कि पूरा परिवार ही नहीं, देश का पूरा हिन्दी समाज हिल गया। 22 सितंबर की रात्रि संजय ने मुझे दूरभाष पर सूचित किया कि पिता जी को स्वास्थ्य संबंधी कुछ परेशानी है। उनको पेशाब नहीं हो रही थी। पेट भी कुछ फूल गया था। फ़ौरी तौर पर गाजियाबाद के एक मूत्र रोग विशेषज्ञ से संपर्क किया गया। उन्होंने कहा कि पेशाब के सामान्य प्रवाह के लिये Cathetar (कैथेटर) लगा दिया जाए। उनको कैथेटर दिया गया। पिताजी रीढ़ की हड्डियों में पैदा हुए अंतराल से पहले से परेशान चल रहे थे। संजय का घर जनसत्ता अपार्टमेंट के तीसरे माले पर है। उसके घर तक पहुँचने में ढेर सारी सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं। पिताजी को अचानक उत्पन्न परिस्थिति में अपनी रीढ़ की हड्डी के दर्द को सहते हुए यूरोलोजिस्ट के क्लीनिक जाना पड़ रहा था। कैथेटर पड़ने पर भी पिता जी की स्थिति में कोई खास सुधार नहीं हुआ। यूरोलोजिस्ट से संपर्क किया गया, उसने दुबारा कैथेटर लगाने का सुझाव दिया। पिताजी को दुबारा कैथेटर लगाया गया। लेकिन अपेक्षित सुधार नहीं हुआ। अंततः यूरोलॉजिस्ट के निर्देश पर पिता जी को ग़ाज़ियाबाद के वैशाली सेक्टर-4 के एक नर्सिंग होम में भर्ती कराया गया।

यह 25 सितंबर 2022 की रात की बात थी। पिता जी के अस्पताल में भर्ती की ख़बर मिलते ही अगले दिन बहन कृष्णा पुणे से गाजियाबाद पहुँच गयी। मैं उस वक़्त भी देहरादून जाने की उम्मीद से लखनऊ में ही डटा था।

27 सितम्बर की रात्रि संजय का फ़ोन आया। उसने बताया कि पिता जी के स्वास्थ्य सूचकांक बहुत अच्छे नहीं आ रहे थे। कभी रक्तचाप में उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा था तो कभी किसी अन्य में। चिकित्सकों ने पिता जी की आंतों में संक्रमण पाया जिसके चलते उनकी आंतें ब्लॉक हो गयी थीं। आंतों के ब्लॉक होने के चलते न तो उन्हें पेशाब हो रही थी और न ही मल त्याग। चिकित्सकों का मानना था कि आंतों की ब्लॉकिंग खत्म करने के लिये ऑपरेशन एक उपाय था। लेकिन ऑपरेशन के लिये पिताजी का शरीर पूरी तरह ठीक नहीं था। रह-रहकर बुखार भी आ जा रहा था। बुखार शरीर में इन्फैक्शन का प्रतीक माना जाता है। पिता जी ICU में भर्ती थे। वहाँ उनके शरीर के आधे भाग में कैथेटर लगा था तो गले के पास से एक नली डाल कर आंतों में इकट्ठे हो रहे मल को एक थैली में निकाला जा रहा था। नाक से ऑक्सीजन दी जा रही थी। वह नलियों से छेड़छाड़ न करें इसके लिये बायें हाथ को बेड की रॉड से बांध रखा था। एक सप्ताह पहले पिताश्री अपने शीघ्र प्रकाशित होने वाले 'कथा समग्र' को अंतिम रूप देने के लिये संजय से लगातार विचार-विमर्श कर रहे थे, फ़ोन पर मुझसे पहाड़ की मेरी यात्राओं के बारे में विस्तार से चर्चा कर रहे थे, वह सितंबर 2022 के अंतिम सप्ताह में अपनी शारीरिक अस्वस्थता के चलते एक निजी चिकित्सालय में बंधक की तरह पड़े थे। बहुत पीड़ादायक था उन क्षणों को जीना। जिस व्यक्ति ने अपनी क़लम से समाज के सबसे कमज़ोर तबक़े के व्यक्तियों में भी जिजीविषा ज्वाला प्रज्ज्वलित की थी, उनका अवसान शनैः शनै: देखना एक यातना से गुज़रना था। "हमारा कुरुक्षेत्र था, हमने लड़ा। इनका कुरुक्षेत्र है, यह लड़ेंगे। जीना है तो लड़ना है"। 'आशीर्वचन' कहानी की इन पंक्तियों का लेखक अन्ततः बीमारी के हाथों पराजित हो रहा था।

संजय से पिता जी के स्वास्थ्य संबंधी तमाम जानकारियाँ प्राप्त होते ही मैंने 28 सितंबर की शाम का लखनऊ-देहरादून हवाई टिकट निरस्त किया और 28 की सुबह लखनऊ से रेल यात्रा कर दोपहर तक ग़ाज़ियाबाद पहुँच गया।

संजय के यहाँ नहा धो कर जब लगभग ढाई बजे मैं पारस अस्पताल के ICU में दाखिल हुआ तो पिताजी की शारीरिक अवस्था देख कर काफ़ी दुःख हुआ। मैं उनसे कुछ कहता, इससे पहले उनका प्रश्न सुन कर चौंक पड़ा।

"तुम यहाँ कैसे? तुम्हें तो देहरादून होना था सम्मान समारोह में शामिल होने के लिये।" पिताजी के इस अप्रत्याशित प्रश्न में मैं अचंभित था। अपनी इस शारीरिक अवस्था में भी पिता जी सम्मान समारोह को ले कर ख़ासे उत्साहित थे। मैंने झिझकते हुए उत्तर दिया "मैं देहरादून जा रहा हूँ। सोचा आपसे मिलते हुए जाऊँ।" लेकिन अगले ही क्षण पिता जी कुछ ऐसी बातें करने लगे जिससे मुझे अंदाज़ा हो गया कि उनकी शारीरिक-मानसिक स्थिति ठीक नहीं थी। इस तरह की मानसिक स्थिति के लिये अंग्रेजी में एक शब्द है Delirium. 'Delirium' शब्द का अर्थ अंग्रेज़ी शब्दकोश में है:

"A disturbed state of consciousness, especially mind . An accute, transient condition associated with fever, intoxication, and certain other physical disorders, characterised confusion, by symptoms such as, disorientation, agitation and hallucinations".

पिता जी यद्यपि शारीरिक रूप से अस्पताल के ICU में थे लेकिन मानसिक तौर पर वह उस समय देहरादून में अगले दिन होने वाले विद्यासागर नौटियाल सम्मान समारोह में थे। अपने प्रिय मित्र के जन्मदिवस पर होने वाले सम्मान समारोह को ले कर वह बेहद उत्साहित थे। लेकिन उनकी इस मानसिक अवस्था में मुझे अनिरंतरता के चिन्ह स्पष्ट नजर आ रहे थे। वह कुछ बहकी बहकी बातें करने लगे थे। अचानक उन्होंने कहा, "वहाँ सम्मान समारोह में तुम्हें मेरी बहन के बेटे मिलेंगे जो ख़ुद को इन्ट्रोड्यूस करेंगे।" मेरा माथा ठनका। पापा अपनी किस बहन के लड़कों की बात कर रहे थे। हमारी एक ही बुआ जी थी जिनका निधन कुछ वर्ष पूर्व हो गया था। वह रानीखेत में रहती थीं। बाद के वर्षों में हल्द्वानी अपने सबसे छोटे पुत्र के साथ रहने लगी थीं। उनका कोई पुत्र देहरादून में नहीं था। फिर मुझे याद आया, पापा अपनी चचेरी बहन के बारे में बात कर रहे थे जो ताउम्र देहरादून में ही रहीं और जिनका लगभग बीस वर्ष पूर्व निधन हो चुका था। उनके दो बेटे रब्बू दा और बब्बू दा देहरादून में रहते थे। पापा उन्हीं दोनों का ज़िक्र कर रहे थे। पिता जी फिर किसी एक ऐसे मुद्दे पर बोलने लगे जिसका कोई प्रसंग नहीं था। उन्होंने कहा कि हमारे गाँव से जो सड़क गणनाथ मंदिर तक जाती है, उसका नाम हमारे गाँव के समीप रनमन में रहने वाले हरिकृष्ण पांडेय जी के नाम पर किया जाए। वह 'जनसत्ता' अखबार के किसी पत्रकार का ज़िक्र करने लगे जिसे उन्होंने इस संबंध में एक पत्र भी दिया था। हरिकृष्ण पांडेय जी वैद्यकी करते थे, उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में भी हिस्सा लिया था और उस क्षेत्र में शिक्षा के प्रसार में काफ़ी कार्य किया था। मैं पिताजी की असंगत बातों से थोड़ा अचकचाया लेकिन फिर यह सोच कर आश्वस्त हो गया कि पिता जी का दिमाग़ पूरी तरह चैतन्य था। उन्हें स्मरण था कि अगले दिन देहरादून में उनके मित्र की स्मृति में एक सम्मान समारोह है। पिताजी के derilium में जाने की घटना का मैं पुणे के अस्पताल में भी अनुभव कर चुका था क्योंकि एक दिन रात 1:30 बजे उन्होंने अचानक मुझसे पूछा "मैं कहाँ हूँ?" मुझे पापा के इस प्रश्न से बेहद खीज पैदा हुई। पापा को अस्पताल में तीन दिन हो चुके थे। अचानक रात में 01:30 बजे यह प्रश्न पूछना कि "मैं कहाँ हूँ" मेरे लिये अत्यंत अप्रत्याशित था।

मैंने शांत भाव से कहा "पापा, हम लोग अस्पताल में हैं।" और साथ ही कहा "पापा, आप आराम से सोओ और मुझे भी सोने दो।" पुणे अस्पताल के इस वार्तालाप के बाद पापा लगभग स्वस्थ होकर वापस बहन कृष्णा के घर लौट आये थे। इसलिये इस बार भी मुझे पूर्ण विश्वास था कि पापा की derilium वाली यह अवस्था पूर्णतया अस्थायी होगी और दो चार दिन में पापा पुणे की तरह, गाजियाबाद में भी लगभग स्वस्थ हो कर घर लौट आयेंगे। देहरादून को लेकर पापा के उत्साह को देखते हुए मैंने तुरंत अगले दिन सुबह का दिल्ली देहरादून शताब्दी ट्रेन का टिकट बुक करवा लिया।




29 सितंबर 2022

देहरादून में विद्यासागर नौटियाल जी के जन्मदिवस पर आयोजित होने वाले "द्वितीय विद्यासागर नौटियाल सम्मान समारोह" में भाग लेने के लिये दिल्ली से जाने-माने वरिष्ठ साहित्यकार पंकज बिष्ट जी आ चुके थे। इसके अलावा वरिष्ठ कथाकार सुभाष पंत जी भी वहाँ थे। दिल्ली से ही एक और वरिष्ठ साहित्यकार सुरेश उनियाल जी भी इस कार्यक्रम में शिरकत करने पहुँच चुके थे।

कार्यक्रम स्थल देहरादून का प्रसिद्ध राष्ट्रीय संस्थान था जो बहुत लम्बे समय तक NIVH (National Institute of Visually Handicapped) के नाम से जाना जाता रहा है। वर्तमान में इसका नया नामकरण NIE VD (The National Institute for the empowerment of Persons with visual disabilities) हो गया है। इस लम्बे चौड़े राष्ट्रीय संस्थान में दृष्टिबाधिता से प्रभावित बच्चों की पढ़ाई-लिखाई के लिये एक स्कूल, हॉस्टल एवं प्रशासनिक भवन है। साथ ही तीन कमरों का एक अतिथि गृह भी है। आयोजकों द्वारा बाहर से आने वाले मेहमानों के रहने का प्रबंध अतिथि गृह में किया गया था। मुख्य कार्यक्रम संस्थान के प्रशासनिक भवन के सभागार में आयोजित था।

सायं 05.00 बजे कार्यक्रम प्रारंभ हुआ। मैं जीवन में पहली बार एक बेहद विडंबनापूर्ण स्थिति का सामना कर रहा था। सम्मान पिता जी का होना था। उनके स्थान पर मुझे शॉल ओढ़ाया जा रहा था। आयोजकों ने सम्मान पत्र के साथ इक्कीस हजार रुपये की धनराशि भी प्रदान की। यद्यपि इसका उल्लेख सार्वजनिक मंच से नहीं किया गया। सभागार को आयोजकों ने ख़ूबसूरती से सजाया था। मंच के सामने एक तरफ़ पापा की फ़ोटो लम्बे स्टैंड पर और दूसरी तरफ नौटियाल जी की। बहुत से वक्ताओं ने पिता जी और नौटियाल जी के बारे में अपने विचार रखे जिसमें प्रमुख थे पंकज बिष्ट जी, सुभाष पंत जी, सुरेश उनियाल जी, विजय गौड़ जी एवं इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हम लोगों के पुराने साथी एवं वर्तमान में देहरादून में एक डिग्री कॉलेज में हिन्दी के प्राध्यापक धीरेन्द्र तिवारी। मैंने पिता जी की किताब 'स्मृतियों में रहें वे' से नौटियाल जी पर लिखा उनका संस्मरण पढ़ा। अचानक मेरे दिमाग़ में एक तथ्य कौंधा 'पिता जी और देहरादून के रिश्ते'। यह एक अजब संयोग था कि साहित्य का चस्का पिता जी को देहरादून से ही लगा था। जब पापा दसवीं की परीक्षा, अजमेर से पास कर देहरादून आये तो उन्होंने उस वक़्त देहरादून के डी.ए.वी. कॉलेज में प्रवेश लिया था। जहाँ तक मुझे स्मरण है, यह आज़ादी के तुरंत बाद का समय था। सन् 1949 से 1951 का दौर। पापा ने प्रवेश विज्ञान की पढ़ाई के लिये लिया था लेकिन उनके हाथ लग गयी हिन्दी और विदेशी साहित्य की किताबें। विज्ञान की पढ़ाई पीछे छूट गयी। इंटरमीडिएट की परीक्षा उत्तीर्ण नहीं कर पाये। उसी वक़्त भारतीय सेना की एक शाखा EME (The Corps of Electronics and Mechanical Engineers) में अप्रेन्टिसशिप निकली। पिता जी ने वह अप्रेंटिसशिप ज्वायन कर ली। देहरादून में साहित्य के जो बीज उनके भीतर पड़े, आगे दिल्ली और इलाहाबाद में पल्लवित पुष्पित हुए। 

मैं यह सोच कर हैरत में था कि जिस देहरादून से पिता जी ने अपने जीवन की साहित्यिक यात्रा का सूत्रपात किया था, उसी देहरादून से उनको जीते जी आख़िरी सम्मानों में से एक सम्मान हासिल हो रहा था। जैसे एक बिंदु ने एक त्रिज्या के माध्यम से चारों ओर अपनी परिक्रमा पूरी कर वृत्त का रूप ग्रहण कर लिया हो। यद्यपि 29 सितंबर 2022 तक मैं पिता जी के स्वस्थ होने को लेकर थोड़ा बहुत आशान्वित था। और इस बात की घोषणा मैंने मंच से भी कर दी थी कि मुझे पूर्ण विश्वास था कि 'द्वितीय विद्यासागर नौटियाल सम्मान' ले कर मैं जब वापस गाजियाबाद लौटूंगा तो पिता जी को स्वस्थ अवस्था में पाऊंगा। लेकिन बाद के घटनाक्रमों ने मुझे ग़लत साबित किया।

29 सितंबर तक पिता जी की चेतन अवस्था बनी हुई थी। यद्यपि उनको ICU के भीतर पांच दिन हो गये थे। मेरे देहरादून प्रवास के दौरान वह संजय से लगातार देहरादून का हाल-चाल ले रहे थे। सम्मान समारोह कैसा हुआ? हमारे परिवार से यानी ताऊ जी के परिवार से भी कोई उसमें सम्मिलित हुआ? आदि-आदि।

मैं 30 की रात्रि देहरादून से गाजियाबाद लौट आया। 01 अक्टूबर की सुबह पिता जी से मिलने हॉस्पिटल गया। पिता जी की स्थिति ख़राब हो रही थी। ICU में भर्ती होने के वक़्त जिस बुलंद आवाज़ में वह बोला करते थे और पूरा ICU उनकी बुलंद आवाज़ से गुंजायमान रहता, वह आवाज़ धीरे-धीरे कमज़ोर पड़ने लगी थी। बड़ी मुश्किल में शब्द उनके गले से निकल रहे थे।

अपने लखनऊ प्रवास के दौरान पिता जी के नित्यकर्म में प्रतिदिन दाढ़ी बनाना शामिल था। लेकिन ICU में उनकी बढ़ी दाढ़ी को देख कर मुझे ऐसा लगा कि जैसे पिता जी अचानक वृद्ध हो गये थे।

90 वर्ष की आयु तक भी जिनका चेहरा ऋषि मुनियों की तरह दैदीप्यमान रहता था, उस चेहरे से आभा का विलोपन एक युग के समाप्त होने का पूर्वाभास सा देता लगा। पिता जी ने मुझे देख कर एक बार फिर देहरादून के कार्यक्रम का हाल पूछा।

पूछा कि ताऊ जी के घर से कौन-कौन आया था? मुझे उनका मन रखने के लिये झूठ बोलना पड़ा कि ताऊ जी का बेटा आया था। यद्यपि अज्ञात कारणों से ताऊ जी के परिवार का कोई भी सदस्य पिता जी के सम्मान समारोह में सम्मिलित नहीं हुआ था। ICU में मरीज़ के किसी भी परिवारीजन/ परिचित को 15 मिनट से ज़्यादा रुकने को इजाज़त नहीं थी। परिवार के सभी सदस्य अस्पताल के इस प्रोटोकॉल का पूरी निष्ठा से पालन कर रहे थे। कुछ सदस्य सुबह जाते। 10-15 मिनट ICU में रहते। फिर वापस लौट जाते। दूसरा ग्रुप शाम को जाता।

पिता जी के आंतों में कोई सुधार नहीं था। वह ICU में बेड पर लगातार एक स्थिति में रहने से बेहद परेशान थे। जो भी उनसे मिलने आता, उससे निवेदन करते कि किसी तरह उन्हें ICU से हटाकर बाहर हॉल में ले जाया जाए। हम सभी परिवारीजन नियति के इस खेल के आगे नतमस्तक थे। मैंने एक दफ़े ICU इंचार्ज डॉ. रिशी से पूछा भी कि क्या ऐसी कोई स्थिति हो सकती है कि पिता जी को थोड़े समय के लिये ICU से बाहर ले जाया जा सके। डॉक्टर ने हाथ खड़े कर दिये। उन्होंने कहा कि हॉस्पिटल की व्यवस्थाओं में ऐसी स्थिति के लिये कोई स्कोप नहीं था। मैंने पिता जी के देहावसान के पश्चात् ICU की इस स्थिति का ज़िक्र जब अपने एक डॉक्टर मित्र से किया तो उसका कहना था कि हमारी वर्तमान चिकित्सा पद्धति में मरीज़ के तीमारदारों की संवेदनाओं के लिये कोई स्थान नहीं है।

हमारे डॉक्टर मामा जी चन्द्रशेखर पंत, पापा के ICU में एडमिट होने के वक़्त अपनी बेटी के पास दुबई में थे। वह दुबई से लगातार कोशिश कर रहे थे कि 'पारस अस्पताल' के मालिक और सर्जन डॉ. विनोद जैन से पिता जी के स्वास्थ्य में सुधार के लिये वैकल्पिक प्रयत्नों के बारे में बातचीत की जाए। डॉ. जैन को भी इस स्थिति से बाहर आने का कोई रास्ता नहीं दिख रहा था। एक ही रास्ता था ऑपरेशन। लेकिन पिता जी के स्वास्थ्य सूचकांक उसके लिये इजाज़त नहीं दे रहे थे। पिता जी समेत पूरा परिवार एक विचित्र स्थिति में फँसा नज़र आ रहा था। हम सब सोच रहे थे कि आख़िर इस स्थिति में हम कब एक फंसे रहेंगे? पापा की शारीरिक स्थिति देखना असह्य हो रहा था। एक ही स्थिति में अस्पताल की चारपाई पर पड़े-पड़े उन्हें एक सप्ताह हो गया था। बढ़ी हुई दाढ़ी, पेशाब के लिये लटकती थैली, गर्दन के नीचे से शरीर के अंदर गया पाइप और पाइप के दूसरे सिरे पर थैली में इकट्ठा होता आंतों का मल, ऑक्सीजन के लिये नाक में पाइप, हाथ रॉड से बंधे। मैं अपने पिता को ऐसी स्थिति में देखने के लिये कभी तैयार नहीं था। वह पिता जिसने अपनी जवानी, लोहे की बड़ी-बड़ी मशीनों के बीच में, उनके भीतर से उठने वाले संगीत को सुनने और फिर उस संगीत को अपनी क़लम के माध्यम से दुनिया भर में पहुँचाने में गुज़ारी। वही पिता उस समय कितने लाचार थे। और उनके साथ हम सभी लाचार। अंधेरे में उम्मीद की एक क्षीण किरण खोजते हुए। ICU में कार्यरत नर्सिंग स्टाफ पिता के शरीर में प्रतिदिन पाउडर वगैरह लगा देता। थोड़े समय इधर-उधर हिला-डुला भी देता। लेकिन स्थिति में कोई अपेक्षित सुधार नहीं। यह हमारे पिता जी की अर्द्धचेतन अवस्था का अंतिम दिन था। 'नयी कहानी आंदोलन' के आख़िरी स्तंभ द्वारा जीवन के स्पंदन को महसूस करने का आख़िरी दिन।

जैसा मैं पहले  लिख चुका हूँ, 01 अक्तूबर की सुबह पिता जी से ICU में मिल चुका था। दोपहर में हमारी मौसी (डॉ. निर्मला) और मौसा जी (डॉ. राजीव मोहन पांडेय) वाया गुरुग्राम हॉस्पिटल पहुँच गये। दोनों ही पेशे से डॉक्टर हैं। मौसी स्त्री रोग विशेषज्ञ और मौसा जी सर्जन। 75 वर्ष की वर्ष की आयु में प्रवेश कर चुके।

पापा का अपनी दोनों सालियों से अपार स्नेह रहा था। ICU में मौसी, मौसा जी की उपस्थिति से पिताजी की आँखें भर आयी। उनसे भी पापा एक ही गुहार लगा रहे थे, "मुझे इस ICU से बाहर ले चलो"। मौसी ने बहुत स्नेह से पापा के सिर पर हाथ फेरा और आश्वस्त किया कि वह जल्दी ठीक हो जायेंगे और फिर ICU से बाहर आ जायेंगे। पर ICU से बाहर आ कर, मौसी ने कहा "बेटा, पेशेंट की जनरल कंडीशन ठीक नहीं है।" अपने चिकित्सकीय तजुर्बे के आधार पर मौसीजी को समझ में आ गया था कि उनके जीजा जी की शारीरिक स्थिति बेहद नाज़ुक थी। हम लोगों को भी लग रहा था कि समय, रेत की तरह से हम लोगों की मुट्ठियों से फिसला जा रहा था। इस बीच संजय ने दौड़-भाग कर अपने प्रिंटर से पिताजी की संपूर्ण कहानियों की डमी बनवा ली थी। 25 तारीख को अस्पताल में भर्ती होने से पूर्व पिता जी के साथ बैठ कर संजय उनकी संपूर्ण कहानियों के ले-आउट और डिज़ाइन पर लगातार विचार-विमर्श कर रहा था। अपनी शीघ्र प्रकाश्य तीन किताबों को लेकर पापा बेहद उत्साहित थे। एक सम्पूर्ण कहानियों का संग्रह जिसमें उनकी कुछ 56 कहानियाँ सम्मिलित हैं। दूसरा इलाहाबाद के ऊपर अपने संस्मरण 'फ़क़ीरों के शहर इलाहाबाद में' और तीसरा उनके रेखाचित्रों का संग्रह।

01 तारीख की शाम को संपूर्ण कहानियों की डमी लेकर संजय हॉस्पिटल पहुँचा। वहाँ पहले से बहन कृष्णा मौजूद थी। संजय ने पापा को बताया कि वह डमी ले कर आया है। पापा ने बहन से कहा कि संजय से कहो, वह बाहर जाए। संजय बड़े असमंजस की स्थिति में कि ऐसा क्या घटित हुआ कि उसे ICU से बाहर भेजने को कहा जा रहा है। पापा ने फिर बहन कृष्णा से कहा कि तुम मेरा मुंह और गला साफ़ करो। कृष्णा ने पापा का मुंह और गला साफ़ किया। फिर पिता जी ने कृष्णा को आदेश दिया कि अब तुम संजय को ICU में भेजो।

संजय के ICU में दुबारा प्रवेश करने पर पापा ने कहा "लाओ, डमी दिखाओ।" डमी देख कर उन्होंने संजय से प्रश्न किया, "इसमें हंसराज रहबर वाला पृष्ठ कहाँ है?" संजय ने फ़ाइनल कॉपी में पृष्ठ शामिल करने का आश्वासन दिया। दरअसल पिताजी, हंसराज रहबर के एक शेर का ज़िक्र कर रहे थे जिसे कभी रहबर साहब ने पापा को सुनाया था और पापा उसे अपने 'कथा समग्र' के प्रारंभ में रखने के इच्छुक थे।

फिर उन्होंने पुस्तक के मूल्य के बारे में बातचीत की और पुस्तक का मूल्य इतना रखने की सलाह दी जो आम पाठक द्वारा वहनीय हो। उन्होंने गीतांजलिश्री के उपन्यास 'रेत समाधि' की चर्चा की और कहा कि बावजूद मोटा होने के, उसका मूल्य बहुत ज़्यादा नहीं है।

ICU की विपरीत परिस्थितियों में सातवें दिन भी जिस चैतन्यता और ऊर्जा से पिता जी ने संजय के साथ संवाद स्थापित किया, उसने हम लोगों के भीतर उनके जीवन के प्रति आशा की एक क्षीण चमक पैदा कर दी।

"जब इस परिस्थिति में भी दिमाग़ इतना सक्रिय है, तो हो सकता है कि दिमाग़ शारीरिक बीमारी पर डोमिनेट कर पिता जी को परेशानियों से निजात दिला दे।" मैंने घर में अपना मत व्यक्त किया। संजय, संजय की पत्नी मनीषा, बहन कृष्णा सभी इस बात से आश्वस्त थे कि पिताजी ने अपनी चेतना को अपने नियंत्रण में रखा है।लेकिन परिस्थिति का दूसरा पक्ष रह-रह कर हम लोगों को हतोत्साहित कर रहा था।उनकी आंतें लगातार ब्लॉक थीं। शरीर में कोई भी ठोस पदार्थ भोजन के रूप में नहीं पहुंच रहा था। नाक की नलियों से ही जो ग्लूकोज़ वगैरह जा रहा था, उसी से उनका शरीर कार्य कर रहा था।

अगले दिन यानी 02 अक्टूबर को मैं सुबह-सुबह एक बार फिर ICU पहुँचा। पिता जी की बोलने की शक्ति अत्यंत क्षीण हो चुकी थी। ऐसा लग रहा था कि वह अपनी चेतना भी लगातार खो रहे थे। दो अक्तूबर हमारी माता जी का जन्मदिवस होता है। मैंने पिता जी को बताया कि उस दिन ईजा का जन्मदिवस था। पिता जी ने बहुत ज़्यादा उत्साह नहीं प्रदर्शित किया।

मुझे पहली बार वह जीवन से हारते दिखे। एकदम लस्त-पस्त। डॉक्टर्स ICU में ज़्यादा देर नहीं रुकने देते हैं। थोड़ी देर बाद मेैं वापस संजय के घर पर था। मैंने पिताजी की हालत से भाई-बहनों को अवगत कराया। एक तारीख की शाम को हम भाई-बहनों के दरम्यान पिता जी के जीवन को ले कर आशा की जिन किरणों का संचार हुआ था, दो तारीख की सुबह वहाँ नैराश्य था।

पिता जी की बीमारी के प्रारंभ से ही हम भाई बहनों ने यह तय किया था कि हम लोग उनकी बीमारी को सोशल मीडिया पर नहीं लाएँगे। इसके पीछे हमारा सोचना था कि हम लोग उनके स्वस्थ होने पर ज़्यादा फ़ोकस करेंगे, बजाये इसके कि उनकी बीमारी के बारे में बताकर दूसरों को भी चिंतित करें। इसीलिये तमाम उतार-चढ़ावों के मध्य भी पिता जी की बीमारी के बारे में पिता जी के बेहद क़रीबियों को ही हमने सूचित कर रखा था।

02 अक्टूबर की रात हमारे डॉक्टर मामा (डॉ. चन्द्रशेखर पंत) भी दुबई से दिल्ली लौट आये थे। तय हुआ कि 03 अक्तूबर की सुबह वह अस्पताल आयेंगे और अस्पताल के मालिक एवं सर्जन डा. विनोद जैन से बातचीत करेंगे। तीन की सुबह ग्यारह बजते न बजते मामाजी वैशाली सेक्टर 04 के 'पारस अस्पताल' पहुँच गये थे। मामाजी और मैं डाक्टर विनोद जैन से मिले। मिलते ही डॉक्टर जैन ने ने कहा "एक बेहद अच्छी खबर है कि आंतों का ब्लॉकेड खुल गया है। अब हम उन्हें दो तीन दिन में प्राइवेट वार्ड में शिफ्ट कर देंगे।"

मामाजी और मैं खुशी-खुशी डॉक्टर के कमरे से बाहर निकले। हमारी मामी जी श्रीमती गीता पंत भी डॉक्टर हैं और भारत सरकार की केन्द्रीय सरकार स्वास्थ्य योजना (CGHS) से वरिष्ठ चिकित्सा अधिकारी के पद से सेवानिवृत्त हुई हैं। मामा जी के साथ वह भी आयी हुई थीं। लंच के लिये हम लोगों ने संजय के घर का रुख किया जो अस्पताल से लगभग चार-पाँच किलोमीटर दूर है। लंच पर मैंने कहा कि पिछले दस दिन में पहली बार मैं तनावमुक्त हो कर भोजन कर रहा था। मामा जी चूँकि एक वरिष्ठ डॉक्टर हैं, वह स्थिति की गंभीरता को जानते थे। उन्होंने कहा कि मामला केवल बीस फीसदी नियंत्रण में है, अस्सी फ़ीसदी उस समय भी क्रिटिकल परिस्थिति में था।

आशा और निराशा के बीच झूलते हुए किसी तरह 03 अक्तूबर की रात कटी। पापा की आंतों का ब्लॉक खुल चुका था। इसका अर्थ था शरीर के मल द्वार से गैसों का पास होना। हम परिवार के सदस्यों के मध्य एक लम्बे समय के पश्चात् क्षीण सी आशा की किरण जगी थी। इस शुभ समाचार को हम लोगों ने अपने कुछ रिश्तेदारों और खै़रख़्वाह लोगों के बीच साझा भी किया। मैं  अट्ठाइस सितंबर से ग़ाज़ियाबाद में था। दो दिन के लिये देहरादून जाने के अलावा, मेरा क्रम संजय के घर से अस्पताल जाना और अस्पताल से घर आने के मध्य ही सीमित था। 04 अक्टूबर की सुबह मैंने सोचा कि अब तो पिता जी स्वास्थ्य लाभ की राह पर हैं, तो मुझे आकाशवाणी और दूरदर्शन दिल्ली के अपने मित्रों से मिलना चाहिये।

मैं सुबह 09 बजे पारस हास्पिटल पहुँच गया। ICU में गया तो पिता जी की हृदय गति देख कलेजा मुंह को आ गया। मॉनीटर उनकी हृदय गति 140 बता रहा था।

यानी सामान्य से बिल्कुल दुगुनी। मैंने ICU इंचार्ज से पूछा "इतनी ज़्यादा गति?" इंचार्ज ने बड़े धैर्य से समझाया कि बुखार की वजह से हृदय गति इतनी तीव्र हो गई थी। पिता जी बेड पर लम्बी-लम्बी सांसें लेते हुए दिखाई दे रहे थे। वर्तमान भारतीय समाज का सच यह है कि जब आप अपने किसी नाते-रिश्तेदार को या स्वयं को अस्पताल वालों के हाथों में सौंप देते हैं तो फिर उनके रहमोकरम पर आश्रित हो जाते हैं। जो डॉक्टर कहे, वही सही। 140 की हृदय गति को अगर डॉक्टर बता रहा है कि यह एक की सामान्य परिघटना है और ऐसा बुखार के वजह से हो रहा है, तो भी हमारे पास डॉक्टर की बात मानने के अलावा विकल्प ही क्या है? मैं डॉक्टर की बात पर विश्वास कर अस्पताल से सीधे दूरदर्शन महानिदेशालय अपने मित्र डॉ. महेन्द्र पाठक से मिलने पहुँच गया। विचार था कि दूरदर्शन महानिदेशालय से आकाशवाणी भवन भी जाऊँगा और वहाँ रेडियो के अपने सहकर्मियों से मिलूँगा। 

दूरदर्शन महानिदेशालय में डॉ. महेन्द्र पाठक के कमरे में मैंने चाय ख़त्म ही की थी कि मोबाइल पर छोटे भाई का नंबर देख एक अज्ञात आशंका ने घेरे में ले लिया।

"अस्पताल से फ़ोन आया है। पापा को वेंटिलेटर पर रख रहे हैं।"

"उफ़्फ़। लगता है मामला ख़तरनाक दिशा की ओर मुड़ रहा है।" मैंने महेन्द्र से अपने विचार साझा किये।

जल्दी-जल्दी मंडी हाउस से मैट्रो पकड़ मैं वैशाली, हॉस्पिटल पहुँचा। अस्पताल में संजय पहले से मौजूद था। ICU इंचार्ज से बात की तो उन्होंने बहुत ही निराशाजनक उत्तर दिया। कहने लगे स्वास्थ्य सूचकांक बहुत अच्छी स्थिति में नहीं हैं। रक्तचाप लगातार गिर रहा है। साथ में डॉक्टर ने यह भी संकेत दे दिया कि पिताजी का बचना मुश्किल था। ICU -इंचार्ज ने हम लोगों से कहा कि आप घर जायें और शाम को सात बजे तक आयें।

डॉक्टर की बातों से हम लोगों को स्पष्ट हो गया था कि परिस्थितियाँ हम सब के नियंत्रण के बाहर  हो चुकी थीं।

उस समय हम सब भाई-बहनों को पिताजी के देहावसान के बाद की परिस्थितियों के बारे में सोचना था। कुछ वर्ष पूर्व पिता जी ने देहदान का एक फॉर्म लखनऊ में भरा था।

हम लोगों ने तय किया कि पिता जी के शरीर को किसी मेडिकल कॉलेज को सौंप दिया जाएगा। मैंने इस हेतु अपने मित्र और पत्रकार संजय श्रीवास्तव को फ़ोन किया जो उन दिनों News18 के डिजिटल प्लेटफॉर्म के लिये कार्य कर रहे थे और उनसे किसी संस्था अथवा व्यक्ति का नाम बताने का आग्रह किया। संजय ने 'दधीचि' नाम की एक संस्था और उसके कर्ता-धर्ता किन्हीं शर्मा जी का मोबाइल नंबर मुझे आधे घंटे के भीतर भेज दिया। मैंने शर्मा जी से कहा कि हमारे पिता जी अपने जीवन के अंतिम क्षणों में हैं और हम परिवारीजनों की इच्छा है कि उनकी मृत्यु के पश्चात् हम इनका देह दान करें।

शर्मा जी ने बताया कि वह मृतक के परिवारीजन एवं मेडिकल कॉलेजों के मध्य एक समन्वयक की भूमिका का निर्वाह करते हैं। उन्होंने कहा कि हम पिता जी की मेडिकल रिपोर्ट उन्हें तुरंत whatsapp पर प्रेषित करें, जिसे वह किसी सरकारी मेडिकल कॉलेज को भेजेंगे। पुनः शर्मा जी ने कहा कि अगला दिन विजयादशमी का दिन था। हो सकता है छुट्टी के चलते मेडिकल कॉलेज में कर्मचारी उपलब्ध न हों। शर्मा जी की बातों ने हमारे सामने असमंजस की स्थिति खड़ी कर दी। यानी अगर मेडिकल कॉलेज से कोई कर्मचारी उपलब्ध नहीं हुआ तो क्या हम लोग अपने पिता जी की देह ले कर एक दिन और प्रतीक्षा करेंगे? मैने तुरंत  शर्मा जी से क्षमा मांगी और डॉक्टर मामा जी को फ़ोन लगाया। चूँकि मामा जी दिल्ली में ही रहते हैं और उनकी प्रतिष्ठा एक बेहद कुशल रेडियोलॉजिस्ट की है। उनके ढेर सारे जानने वाले दिल्ली और NCR में विभिन्न चिकित्सा संस्थानों में वरिष्ठ चिकित्सक के पद पर हैं।

मामा जी जब तक हमें कोई सूचना देते, अस्पताल से पिता जी के न रहने का समाचार आ गया। 04 अक्टूबर को दोपहर 03:20 पर उन्होंने देह त्यागी। एक युग का अवसान हो चुका था। इसी मध्य मामा जी ने ग्रेटर नोएडा के शारदा मेडिकल कॉलेज में देहदान की व्यवस्था भी कर दी थी।

संजय और मैं तुरंत अस्पताल पहुँचे। पिता जी की छोटी नीली आँखें जो मुझे बेहद पसंद थीं, वह हमेशा के लिये बंद हो चुकी थीं। बेड पर पिता जी निस्तेज पड़े थे। जिस कड़कदार आवाज़ में वह हम लोगों से संवाद स्थापित करते थे, वहाँ पूरी तरह ख़ामोशी थी। अपने 90वें जन्म दिवस के अवसर पर उन्होंने हँसते हुए हम लोगों से कहा था "क्यूं मेरा 90वां जन्मदिन मना रहे हो। मुझे 100 वर्ष जीना है। 100वां मनाना।" उनकी सौ वर्ष जीने की इच्छा पूरी न हो सकी थी।

अपनी मृत्यु से पहले भी वह कई बार अस्पतालों में भर्ती हुए थे लेकिन हर बार वह स्वस्थ हो कर बाहर आये। इस बार भी हम परिवारीजनों को यही लग रहा था कि वह एक बार फिर अस्पताल से लौट कर साहित्य सृजन में लग जायेंगे। लेकिन इस बार इतिहास ने अपने को नहीं दुहराया। 'कोसी का घटवार' अपनी यात्रा पूर्ण कर, जीवन के घट पर सक्रिय शेष लोगों को अलविदा कह चुका था।

फ़ेसबुक के मार्फ़त पिता जी की मृत्यु की ख़बर जैसे ही वायरल हुई, हिन्दी साहित्य प्रेमियों के द्वारा शोक संदेशों का तांता लग गया। वर्तमान में यह बहुत ही सामान्य सी चीज़ है। सभी के देहावसान पर ऐसा ही होता है। हम परिवारीजनों को व्हाट्सएप पर लगातार शोक संदेश प्राप्त हो रहे थे। बहुत सारे परिचितों, रिश्तेदारों के फ़ोन भी आ रहे थे।

पिताजी शव में तब्दील हो चुके थे। उनको संजय के फ़्लैट में एक पारदर्शी AC ताबूत में रख दिया गया था। बहुत से परिचित, रिश्तेदार उनके अंतिम दर्शन के लिये आने लगे थे।

अगली सुबह देहदान के लिये गाड़ी को आना था। रात भर पिता जी पहली और अंतिम बार शव के रूप में संजय के अपार्टमेंट के ड्राइंगरूम में हम लोगों के बीच रहे। पत्नी लक्ष्मी 03 तारीख को ही आ गयी थी। अपने दादा जी /नानाजी के अंतिम दर्शन हेतु बेटी गार्गी मुंबई से, बहन कृष्णा का छोटा बेटा देवराज पुणे से, ममेरे भाई का बेटा पारितोष शिमला से सुबह-सुबह पहुँच गये। साथ ही इलाहाबाद (वर्तमान प्रयागराज) से वरिष्ठ कवि हरीश चन्द्र पांडे जी, अमरकांत जी के कनिष्ठ पुत्र अरविन्द 'बिन्दु' एवं उनकी पत्नी रीता अपार्टमेन्ट में पहुँच चुके थे।

अपने प्रिय लेखक के अंतिम दर्शनों के लिये दिल्ली-गाजियाबाद से ढेर सारे साहित्यकार, पत्रकार जनसत्ता अपार्टमेन्ट सुबह-सुबह पहुँच गये थे। उनमें जनसत्ता अपार्टमेन्ट में रहने वाले कवि-पत्रकार प्रियदर्शन, कहानीकार योगेन्द्र आहुजा, कवि देवी प्रसाद मिश्र, 'पक्षधर' पत्रिका के संपादक विनोद तिवारी, आंग्ल भाषा के कवि सरबजीत, 'हिन्दुस्तान' समाचारपत्र के संपादक प्रताप सोमवंशी, पापा के निकटस्थ रहे पत्रकार अनुराग शर्मा, पत्रकार संजय श्रीवास्तव, इलाहाबाद विश्वविद्यालय में मेरे सहपाठी रहे सुबोध भटनागर, सहकर्मी और दूरदर्शन महानिदेशालय में उस वक्त पदस्थ डॉ. महेन्द्र पाठक, रेडियो कॉलोनी लखनऊ में हमारे पड़ोसी एवं पापा के अत्यंत प्रिय डॉ. सुशील राय के भांजे नोएडा निवासी हनी, दिल्ली विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर एवं कवि मृत्युंजय, हमारे ताऊ जी की ज्येष्ठ सुपुत्री भारती एवं उनके पति अतुल पांडेय, मौसी की सुपुत्री अनुमेहा आदि थे।

एक रोचक तथ्य यह था कि इलाहाबाद के 100 लूकरगंज के हमारे पड़ोसी मिश्रा जी के परिवार के ढेर सारे सदस्य भी पापा के अंतिम दर्शन के लिये उपस्थित थे। उनमें मिश्रा जी की बड़ी बेटी बेबी दीदी, उनके दोनों भाई गुल्लू एवं हन्नू (बचपन से इन दोनों भाइयों को हम इसी नाम से ही जानते रहे हैं), मिश्रा जी के बड़े बेटे राजेश दादा का बेटा रचित, बेबी दीदी का पुत्र पवित्र वहाँ थे। पिताजी की मृत्यु ने हम भाई-बहनों को अपने बचपन के 100 लूकरगंज में पहुँचा दिया था।

चार तारीख़ की शाम टीवी पत्रकार इरफ़ान, एक न्यूज़ चैनल के पूर्व पत्रकार पंकज श्रीवास्तव, हमारे मामा-मामी, मौसी मौसा जी, हमारी एक चचेरी बहन ममता दीदी, उनके पत्रकार पति पियूष पंत मौजूद थे। इस सूची में और भी ढेरों नाम हैं जो छूट रहे होंगे।

देहदान के लिये ले जाने से पहले युवा कवि 'मृत्युंजय' ने उनकी कविता 'नवें दशक की दहलीज़ पर' का पाठ किया। यह पाठ उन्होंने संजय के  घर पर किया।

जब पापा के शव को देहदान के लिये आयी गाड़ी में रखा जाना था, उस वक़्त इस कविता का पुनर्पाठ हुआ। मृत्युंजय की बड़ी प्रभावशाली आवाज़ है। उनकी आवाज़ ने कविता के शब्दों के प्रभाव को कई गुना कर दिया। पिताजी के देहदान के अवसर पर उनके कविता संग्रह 'पार्वती' से इस कविता का चुनाव बेहद सामयिक था। पिताजी ने कविता लिखते समय कभी नहीं सोचा होगा कि उनकी इस कविता का इस्तेमाल उनके प्रशंसक उनकी अंतिम यात्रा में करेंगे। संजय ने मृत्युंजय के इस कविता पाठ का वीडियो बना कर बाद में फ़ेसबुक पर डाल दिया। देखते-देखते वह वीडियो इतना वायरल हो गया कि लगभग तीस हज़ार लोगों ने इस वीडियो को देखा और लगभग दो सौ ने शेयर किया। मैं उस कविता को यहाँ प्रस्तुत कर रहा है।


नवें दशक की दहलीज़ पर


मुझे ग्यारह रन और बनाने हैं

 सिर्फ़ ग्यारह रन 

एक छक्का एक चौका और एक रन 

या दो चौके और तीन एकल रन मेरा शतक पूरा हो जाएगा


नहीं थका हूं मैं अभी

 डटा रहूंगा मैदान में 

पूरे दमखम के साथ


कितनी पारियां खेली हैं इस जीवन में 

बटोरी कितनी तालियां

 कितने गुलदस्ते! 

और कितने धनादेश भी


मैंने खेला है अनेक शहरों में 

अनेक देशों में 

जिन्होंने हमारी टीम को 

चौके और छक्के लगाते देखा है मैदान में

 या टी.वी. के परदे पर 

या सुने हैं हमारे कारनामे अपने ट्रांजिस्टर पर

या पढ़ा है अखबारों की सुर्ख़ियों में उन्होंने हमें गले लगाया

 प्यार दिया 

मैं उनका आभारी हूँ


बारहा, मैंने संभाली है कप्तानी भी बद से बदतर पिच पर भी 

दर्ज कराई है जीत 

यह कमाल मेरे सहयोगियों का था मैं तो निमित्त मात्र था

 उनकी प्रतिभा की सही पहचान कर सका 

यह मेरा दाय है


यह तो खेल है 

प्रतिपक्ष का कोई फिरकी गेंदबाज़ यदि मेरा विकेट गिरा दे 

या कोई शातिर फ़ील्डर 

बाउंड्री पार करती गेंद को लपक ले और मेरा शतक अधूरा रह जाए

 तो भी मुझे अफ़सोस न होगा


मैं मुस्कुराता हुआ पैवेलियन लौट जाऊँगा 

अपने अग्रज खिलाड़ियों के साथ बैठूंगा 

जिन्होंने हमेशा मेरा हौसला बढ़ाया है 

जिनसे मैंने बहुत कुछ सीखा है।

पिता जी के देहदान के अगले दिन हम लोगों ने आर्यसमाज के एक पंडित जी को बुलाकर संजय के फ़्लैट में एक हवन का आयोजन किया और हवन के पश्चात् दोपहर के भोजन का। माता जी की मृत्यु के पश्चात् भी हम लोगों ने एक हवन का आयोजन किया था।

लगातार बहुत से लोग हम लोगों से पूछते रहे हैं कि पिता जी की मृत्यु के पश्चात् आपने उनके अंतिम संस्कार में क्या किया? हम लोगों का उत्तर होता रहा है कि चूँकि हम लोग किसी भी तरह के धार्मिक कर्मकांडों दीक्षित नहीं हुए हैं, इसलिये मृत्यु के पश्चात् के  पारंपरिक धार्मिक संस्कारों के लिये हम भाई बहन मानसिक तौर पर कभी भी तैयार नहीं रहे। कुमाऊंनी परिवारों में बारह दिनों का 'पीपल पानी' धार्मिक संस्कार है। इसमें मृतक के एक परिवारीजन (मुख्यतः पुरुष) को बारह दिनों तक आसन में बैठे रहना पड़ता है। हवन को ले कर हम लोगों का विश्वास रहा है कि इससे शोक के वातावरण से उबरने में एक सहायता मिलती है। साथ ही वैदिक परंपराओं वाले हवन को हम लोग, बारह तेरह दिन के मृत्यु उपरांत कर्मकांड के विकल्प के तौर पर पाते रहे हैं।

एक बात और है कि वर्तमान समाज व्यवस्था में अनीश्वरवादी एवं मार्क्सवादी ऐसे किसी विधि-विधान को जन्म नहीं दे पाये हैं जो मृत्यु उपरांत के बारह तेरह दिनों वाले धार्मिक कर्मकांडों के विकल्प के तौर पर सामने आये। 

इस आलेख के अंत में दो बातें और। पहला, हमारे पिता जी की मृत्यु शारदीय नवरात्र की महानवमी को हुई  थी। यह एक दुर्लभ संयोग ही था कि हमारी माता जी की मृत्यु दस वर्ष पूर्व शारदीय नवरात्र की महानवमी को ही हुई थी। जिनके भी संज्ञान में यह तथ्य आया, सभी ने हर्षमिश्रित आश्चर्य प्रकष्ट किया। मैंने इसको इस तरह व्याख्यायित किया कि हमारी माता जी ने पिता जी को ठीक दस वर्ष की ज़मानत दे रखी थी, "जाओ, तुम्हें मुक्त करती हूँ, अगले दस वर्ष के लिये। इस बीच में जितना लिखना पढ़ना है, लिख पढ़ लो। लेकिन ठीक दस वर्ष बाद तुम्हें मेरे पास फिर वापस लौटना होगा।" ऐसा लग रहा था जैसे माता जी द्वारा पिता जी को ज़मानत पर दी गयी अवधि ठीक दस वर्ष पश्चात् पूरी हो गई थी।

आख़िर में पिता जी से जुड़ी एक अन्य जानकारी। पिता जी ने जुलाई 2022 के पहले सप्ताह तक अपनी वसीयतनुमा एक स्क्रिप्ट पूरी कर ली थी। 'मन की बात' पैटर्न पर लिखी इस वसीयत की जानकारी बहन कृष्णा ने हम भाईयों को पिता की मृत्यु के पश्चात् दी। यह वसीयत उन्होंने पुणे में जून के अंतिम सप्ताह से ले कर जुलाई के पहले सप्ताह के दौरान लिखी थी। अपनी हस्तलिपि में टेढ़े-मेढ़े अक्षरों में उन्होंने जो लिखा वह उनकी व्यापक दृष्टि का एक उदाहरण है। 

पिताजी अब इस भौतिक जगत में नहीं हैं। उनकी अनुपस्थिति बहुत शिद्दत में हम सब परिवारीजन महसूस करते हैं। उनकी उपस्थिति मात्र से घर में एक भराव रहता था। चाहे वह लखनऊ में हों, ग़ाज़ियाबाद या पुणे में। हर तीसरे चौथे दिन फ़ोन से हम लोगों के हालचाल लेते रहते थे। वह जीवन से इतना ज्यादा संपृक्त थे कि 90 वर्ष की उम्र में भी विराग जैसी कोई चीज़ दूर-दूर तक उनके पास नहीं फटकती थी। जो व्यक्ति जीवन से इतना संपृक्त हो, उसका उम्र के दबाव के आगे हार जाना और फिर एक दिन हमेशा के लिये इस दुनिया से चले जाना। इस एक घटना ने पिता जी के सभी मिलने वालों को भीतर तक बेहद दुःखी किया। लेकिन हम सभी ने इसे नियति की एक परिणति के तौर पर स्वीकार किया। सब यह सोच कर खुश हैं कि पिता जी ने एक सार्थक जीवन जिया और अपनी अनूठी कहानियों से हिन्दी साहित्य में अपना कभी समाप्त न होने वाला मुक़ाम स्थापित किया।

टिप्पणियाँ

  1. Bahut badhiya lekh or memoir Putul👍🌺🎉

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  2. बहुत विस्तार से शेखर जी के आखिरी बरसों और आखिरी दिनों पर लिखा है। वाकई उन्होंने जितना जिया अर्थपूर्ण जिया। अंतिम समय तक चैतन्य और अपने साहित्य सृजन को लेकर सजग रहें। आप कह सकते हैं आखिर के दस साल आपकी इच्छा ने उन्हें बोनस के तौर पर दिए कि जो और रचनात्मक करने को शेष है, वो इस दौरान कर डालें। अच्छा लिखा है

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