सुमन शेखर की कहानी 'अनहद अविचल मोगेश बाबू'
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| सुमन शेखर |
संवेदनशीलता सही मायने में मनुष्य को मनुष्य बनाती है। लेकिन दुनिया की चालाकियाँ कुछ इस तरह की होती हैं ऐसे मनुष्य का जीवन प्रायः कठिन हो जाता है। यही नहीं सरकारें भी अपने राजनीतिक हितों के अनुरूप घटनाएं गढ़ लेती हैं और उसी के अनुसार उसे क्रियान्वित कर अपने समर्थकों को खुश रखने में लगी रहती हैं। आदिवासियों जैसे भोले भाले लोग इसके आसान शिकार बनते रहते हैं। मीडिया न्यूज रूम में ही समाचार गढ़ने लगती है और अपना निर्धारित काम छोड़ कर सरकार का गुणगान करने में लगी रहती है। मोगेस बाबू ऐसे ही पात्र हैं जो तमाम वजहों से स्मृतिहीनता के शिकार बन जाते हैं। युवा कहानीकार सुमन शेखर की कहानी पढ़ते हुए हम सिहरते रहते हैं। कहीं कहीं हम खुद मोगेस बाबू के पात्र में तब्दील होते जाते हैं। सुमन शेखर की यह कहानी “पाठ” पत्रिका के जनवरी अंक से साभार ली गई है। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं सुमन शेखर की कहानी 'अनहद अविचल मोगेश बाबू'।
कहानी
'अनहद अविचल मोगेश बाबू'
सुमन शेखर
“कभी कभी लगता है जैसे अपनी ही देह पराई है। अपनी ही देह पहेली है, जिसके बारे में कुछ भी कहना खुद को आने वाले ‘चौंकन’ के लिए तैयार करना है।” इन दिनों वह लगातार यह भी सोच रहा था। सोचने का मुख्य विषय कुछ और है।
पार्क में बेंच पर बैठे हुए अकेले वह अपनी मौत के बारे में सोच रहा था, सामने घास पर दो सफ़ेद कुत्ते खेल रहे थे, लड़ रहे थे, लेट रहे थे, उठ रहे थे, दौड़ रहे थे, वह तब भी अपनी मौत के बारे में सोच रहा था। शांत। मौन। उदास। पथराई आँखें लिए। इसी पार्क में कभी बूढ़े बतियाते होंगे, बच्चे पौधों-पेड़ों के ओट मे लुकाछिपी खेलते होंगे, छोटे बच्चे बिछी हुई घास पर लेटते होंगे… लेकिन अब न बच्चे नजर आते हैं, न बूढ़े, न ही वैसी हँसी, न ही वैसा जीवन, न ही वैसी स्मृति। हर जगह केवल उदासी पसरी है। उसके लिए यकीन करना मुश्किल था- दुनिया इतने कम समय में इस हद तक बदल सकती है!
बड़ी दाढ़ी, घनी मूंछ, पतली काया, मटमैले से उधड़े हुए कपड़े में वह मौत के बारे में इन दिनों सोचता रहा। फिलहाल यही सोचना ज्यादा जरूरी हुआ, यह सोचना कहाँ से और क्यों आया, यह उसे खुद भी नहीं पता। अगर पता कर याद रख पाता, तब शायद यहाँ नहीं होता। या केवल सोच नहीं रहा होता।
उसे सारे दृश्य जाने पहचाने से लगते, सारे दृश्य उसे अनजान भी लगते। उसकी स्मृति में सब कुछ था, केवल कुछ दिनों-महीनों को छोड़ कर, और यही भूले हुए कुछ दिन उसे सबसे ज्यादा तबाह करने वाले दिन बनने वाले थे।
उसने दिमाग में एक पन्ना रखा था, जिस पर वह सब लिखता, जो वह सोचता था और फिर पन्ना फिर से कोरा हो जाता। लिखा हुआ पानी हो जाता। एक ही चीज़ बार बार लिखी जाती, भूली जाती, एक ही जीवन बार-बार के दुहराव में जिया जाता, भूला जाता।
उसे लगने लगा था कि जिस उम्र में वह है, वहाँ अब बोलने के लिए बहुत कुछ बचा नहीं है।
वह मानने लगा था कि एक समय के बाद आदमी दूसरों से ज्यादा खुद से ज्यादा बातें करता है।
उसे इस बात का यकीन था कि दुनिया में सारे मिले हुए लोग अंततः बिछड़ते ही है, जीते हुए में मिलने से ज्यादा बिछुड़ने की कला पचाना होता है।
उसके हाथ में बारह अंगुलियाँ थीं, दों अंगुलियाँ, जो ज्यादा थीं, उन्हें यकीन था कि एक दिन दोनों अंगुलियों का महत्व सामने आएगा। वह एक दिन बुढ़ापा के पहले तक ‘एक दिन’ ही रहा। और फिर एक शाम ताप्ती नदी के किनारे बैठे हुए एकांत में, उस बूढ़े के पास उन अंगुलियों के महत्व की तिथि आई। अंगुलियों ने गर्माहट महसूस किया। उसके भीतर की हलचल उसके चेहरे पर नहीं, अंगुलियों से ज़ाहिर होती थीं।
कहते हैं उसके साथ हमेशा संभावनाओ के पैर चलते थे। पैर को किसी ने नहीं देखा, संभावनाओं को भी नहीं देखा, माना जरूर कि संभावना जैसी कोई चीज है जो उसके साथ रहती है।
उसने माना था कि कुछ चीजें, जिसका हम लंबे अरसे से इंतजार करते हैं, वह ऐसे घटित होती है कि घटते हुए में उसका एहसास नहीं होता, घटने के बाद होता है, जैसे उसकी आँखों सी गिरी चमक, उसके पैरों पर चढ़ती थकान, उसके देह में भरता दर्द, स्मृति से गायब होते सपने, जीवन और दृश्य, और मन में धँसता एकांत का जड़… इस सब का एहसास उसे उस दिन हुआ, जब उसने नदी के तट पर प्रेम करते युगल को देखा था, और भीतर एक सिहरन हुई। जीवन का सारा दृश्य, सारा प्रायश्चित, सारा बिखराव, सारी ऊष्मा एक साथ गड्डमड्ड से रेल की तरह बिखरने लगी। उसी दिन उसने जाना- ‘देखे हुए केवल एक दृश्य में कितनी ताकत है....।’
कलकत्ता की गलियों में, जहां वह कभी गया नहीं, उसे अपने जीवन की धड़कती शाम दिखती थी, उसे कान में आती हुई एक आवाज़ सुनाई पड़ती थी- ‘तुम कितना भी भागो, ये गलियां तुम्हारे भीतर और धँसती जाएंगी…। तुम न यहाँ तक पहुँच पाओगे, न ही तुम्हें यहाँ आए बिना चैन पड़ेगा।’
उसके आँखों की रौशनी दिन में बाहर का देखती थी, रात मे भीतर का। बाहर की आँखें फिर भी मजबूत थी, बुढ़ापा अपना पैर जमा चुका था, साथ एक सूक्ति वाक्य उसके भीतर उपजा- ‘बुढ़ापा और अंधापन एक साथ आ जाना जीवन का आपके ऊपर अट्टहास है।’ वह अपने आस पास हर वक़्त डरावनी हँसी सुनता था।
उसकी उम्मीद ‘टाइटेनिक’ की तरह डूबती जा रही थी, उसका उन्माद जिद में उगे बीज सा बढ़ता जा रहा था। जिसे फिर से डूबना ही था रोज़ रोज़।
..और उसकी आँखों के सामने दूर तक नमक फैला था। और फिर दिन-ब-दिन इसके संवाद की शुरुआत ‘मौ’ से शुरू हो कर ‘त’ पर दम तोड़ देती।
अकेलेपन की चादर कितनी भी छोटी और न दिखने वाली हो, वह तुरंत भांप जाता था। वह जानता था- ‘जरूरत ही सबसे बेरहम चीज़ है, जीवन का सारा अवसाद वहीं से शुरू होता है, हालांकि शुरू होते हुए उसका चेहरा सुख की शक्ल में दिखता है।’
उसे लगातार कई कई वर्षों से एकांत में बैठे हुए नदी, पेड़ और पक्षियों को देखने की आदत थी। पहले उसके पास बोलने की भाषा थी, बोलने की भाषा मौन हुई, सोचने और देखने की भाषा का उदय हुआ। अब वह पार्क में बैठता है। जंगल, नदी और पक्षी एक रात अचानक से छूट गए, जैसे पर्दे से गिरती है फिल्म।
चिरूडीह कांड के समय वह पत्रकारिता शुरू करने की पूर्व की तैयारी में था, चिरूडीह कांड के सुनवाई तक वह सफल पत्रकार बना, चिरूडीह के दोषी (जो बाद में निर्दोष साबित हुए) की मृत्यु के समय वह खुद मौत के बारे में नहीं बोल सोच रहा था।
जब उसका जन्मदिन हुआ था, वंश का पहला बच्चा था, सबको उसे ले कर बहुत उम्मीद थी। उसके जन्म के बाद उसे नाना ने प्यार से ‘मोगरा’ कहा। बड़े नाना (नाना के पिता) ने आशीर्वाद दिया- ‘यह बच्चा सुख के आसन पर बैठेगा, इसकी खुशबू मोगरे की फूल सी फैलेगी और इसकी महक दूर देश तक लोगों को आकर्षित करेगी।’ हाथों में छह छह अंगुलियाँ देख दादा की आँखों में चमक थी, बोले - ‘लड़का हमेशा संभावनाओं से घिरा रहेगा।’ पिता उदास थे, उनकी आँखें घर में बेटी की गूंज की चाहत लगाए बैठी थी। मोगरा आई लेकिन पुरुष की शक्ल में। और इस तरह मोगरा, मोगेश ‘बाबू’ बने। बच्चे बूढ़े हर किसी के बाबू।
मोगेश बाबू के आस पास माँ, दादा, दादी, नाना, नानी और दो बुआ का प्यार हमेशा भर-भर कर आता, बाप का प्यार कुछ दिन बाद मिलना था। सुबह से रात तक सबकी आँखों के तारे मोगेश बाबू, जब कभी थोड़ी देर के लिए भी अलग होते- उनकी खोजाई शुरू हो जाती। छोटे बच्चे मोगेश बाबू के दुहरे अंगूठे से खासा लगाव रखते थे।
ठीक से पढ़ाई शुरू हुई। मोगेश बाबू चार साल के थे जब नाना के कहा- इसे संगीत की भी जानकारी हो, उस्ताद हामिद शाह के यहाँ भेजा गया। उस्ताद हामिद, मोगेश बाबू की सीखने की लगन और मीठी आवाज़ से पहले दिन ही खुश हो गए। रात में सोते समय माँ उन्हें उनके नाना की ही ज़्यादातर कहानियाँ सुनाती। कहानी में नेपाल के राजा का अक्सर ज़िक्र आता। नाना तबला अच्छा बजाते थे और बनारस के संगीत घराने में मशहूर पंडित राम सहाय की पीढ़ी के साथ लंबे समय तक रहे। देश भर मे घूमे और नाम कमाया।
मोगेश ने एक दिन पूछा- “माँ, तुम नाना की कहानी सुनाती हो या बिरजू और लच्छु महाराज की या तबले की!”
माँ ने मुस्कुरा कर माथा सहलाते हुए कहा- “तीनों में एक भी कड़ी छूट जाए तो तीनों एक दूसरे के बिना अधूरे हो जाएंगे।”
इस तरह मोगेश बाबू के जीवन में जुड़े हुए ‘परिवार का प्यार’ के साथ ‘संगीत’ शब्द जुड़ा गया।
हालांकि अब मोगेश बाबू जब पार्क में बैठे हैं, बहुत पुराना अतीत ही ठीक से याद है। चाह कर भी यह याद नहीं कर पा रहे हैं कि यहाँ इस पार्क में कैसे आए, यह शहर कौन सा है, उनका नाम क्या है, और उनके जीवन के हिस्से से पिछला वह सारा समय कहाँ गायब हो गया!
शहर अजनबी सा लग रहा है, जितना खुद ही खुद को। बहुत ज्यादा बीते हुए अतीत और वर्तमान के अतीत में उनको एक लंबी दूरी नजर आती है। और इस तरह अतीत की खिड़की फिर से मौत के दरवाज़े तक पहुँच पहुँच जाती है।
एक औरत ने पीछे से उनके कान्धे पर हाथ रखा, मोगेश बाबू संभलते हुए पलटे। उनको देखने में दिक्कत हो रही थी।
“चलो, यहाँ ज्यादा देर नहीं रुक सकते।”
“लेकिन कहाँ, और तुम कौन हो?”
“अभी इसका वक़्त नहीं है, मैंने इंतजाम कर दिया है। पास ही एक कमरा है, उसमें रहेंगे हम”
“हम!!!!”
और दोनों छोटी छोटी अंतहीन गलियों में घूमते हुए एक पार्क के सामने वाले मकान तक आए। मकान पूरा खाली था। अंधेरी सीढ़ी पर चलते हुए दोनों तीसरे मंज़िल कमरे के सामने खड़े हुए। चारो तरफ सन्नाटा पसरा था। कमरे का उस औरत ने दरवाज़ा खोला। दोनों अंदर आए। ऐसा लग रहा था जैसे इसमें कोई कुछ दिन पहले तक रहता था, रहने वाला अभी नहीं रहता है, अब उसके होने का अंदेशा भर रहता है। कमरे में दो बिस्तर, एक खाली टेबल, एक टूटी हुई आलमारी जिसमें कुछ दवाइयाँ रखी हैं, झिलमिलता बल्ब और बहुत धीमा चलता पंखा लटका है। औरत ने अपना बैग बिस्तर पर रखा, पानी गरम करने के लिए गीजर ऑन किया, खिड़की खोल कर बाहर झाँका, दुबारा बंद किया, बिस्तर पर बैठ गई। मोगेश बाबू सामने वाली बिस्तर पर बैठे औरत को देखते रहे।
“तुम नहाओ सबसे पहले, मैं कुछ कपड़े देखती हूँ तुम्हारे लिए। इस तरह तुम नहीं रह सकते। और सुनो, तुम्हें बाहर नहीं निकलना है।”
“मुझे पिछला कुछ दिन, ठीक ठीक महीना और साल शायद.. याद क्यों नहीं है? तुम कौन हो और मैं यहाँ क्या कर रहा हूँ? मेरे आदिवासी लोग कहाँ हैं, लीमा कहाँ है!!!”
बिस्तर के नीचे पड़े बक्से से एक सफ़ेद कुर्ता और काले रंग की पैंट निकला। बिस्तर पर बैठा।
मोगेश बाबू का सवाल अब भी उनके चेहरे पर बार-बार दुहराया जा रहा था।
उस औरत ने सब कुछ सुना, उत्तर के हवाले केवल इतना इशारा किया कि अभी चुप, दिमाग पर ज़ोर मत डालो, नहाओ पहले। जानने की इतनी जल्दी भी क्या है!
इशारा बहुत छोटा था, जवाब बड़ा था। उसने जाते हुए दरवाजा बाहर से बंद कर दिया।
इस तरह ‘भूलना’ याद रखने से ज़्यादा जरूरी बनता गया, भूलना याद रखा जाए या याद रखना!
मोगेश बाबू ने पानी चलाया, अभी ठण्डा ही था, गीजर बंद पड़ा था।
वापस बिस्तर पर आ कर बैठ गए। दूसरे बिस्तर पर पड़े बैग को देखा, कुछ सोचा, बैग को उठाया, खोला।
ऊपरी खटाल में ही एक फ़ोटो और एक चिट रखा था। फ़ोटो मोगेश बाबू की थी, चिट में लिखा था- “इनका बहुत ध्यान रखना।”
“कौन ध्यान रखने को कह रहा है और क्यों! लिखावट किसकी है!”
मोगेश बाबू को कुछ समझ नहीं आया। न ही वह लिखा हुआ अक्षर पढ़ कर लिखने वाले का चेहरा पहचान पा रहे थे, वो खुद को भी कहाँ पहचान पा रहे थे!
नल चलाने की जगह ही बेसिन पर नई कैंची, नया ब्लेड और रेज़र रखा था। शीशा कहीं नहीं था। एक बार को सब यूं ही छोड़ देने का ख्याल आया, फिर अपने सर और दाढ़ी पर हाथ फेरा, काट लेने का भाव उबाल मार गया।
नहा कर बाहर निकले मोगेश बाबू ने कुर्ता और पैंट पहना, सर पर हाथ फेरा, फिर चेहरे पर। सब सपाट। उनको अपनी देह के ऊपर किसी और का चेहरा चिपका सा लगा। किसी नौजवान का। मुस्कान उनके चेहरे से उनकी याद्दाश्त ने छिन ली थी, जैसे रेत से पानी गायब होता है।
औरत अंदर आई। उसको देखते ही मोगेश बाबू के चेहरे पर बेचैनी और संतोष का भाव घिर आया। मोगेश बाबू का मानना था- ‘कुछ लोगों के सामने होने पर किसी भी प्रकार की औपचारिक दूरी के बोझ तले संभावनाओं से भरे साथ का दोहन नहीं नहीं करना चाहिए। कम कम से कम लम्हों में हमें ज्यादा से ज्यादा जानने, समझने और जीने की इच्छा से भरा होना चाहिए। क्या पता कब दूरी संभावनाओं को खा जाए।‘ मौत की वजह से यह डर और ज्यादा था। लेकिन मौत उनके सोचने का विषय क्यों बनता गया!
औरत बहुत परेशान लग रही थी। उसने धीरे से खिड़की खोल कर बाहर देखा, फिर बंद कर दिया। उसकी सांसें फूल रही थीं।
“मैंने कुछ इंतजाम सोचा है। तुम सवाल नहीं करोगे। ये दवाइयाँ हैं, इन्हे सुबह और शाम खाना है, अभी एक खा लो, बाकी दवाई पर लिखा है ही।“
मोगेश बाबू ने बिना कुछ पूछे दवा लिया। अब भी उनके सामने वह तस्वीर घूम रही थी। जाना पहचाना चेहरा, लेकिन अनजान क्यों लग रहा था!
“हम सुबह यहाँ से निकल चलेंगे। तुम्हें कम बोलना होगा, और ज़्यादा भरोसा रखना होगा मुझ पर।” औरत ने कहा। कमरे की झिलमिलाती रौशनी बंद की। थोड़ी देर तक बल्ब की रौशनी बल्ब में चिपकी रही, फिर धीरे धीरे गायब होती गई, मोगेश बाबू एकटक गायब होती रौशनी का जाना देखते रहे।
“आखिरी कौन सी बात तुम्हें याद है मोरा?” औरत ने अंधेरे में पूछा। उसकी आवाज़ में कंपन थी।
“मोरा!!! तुम कैसे जानती हो इस नाम को!” मोगेश बाबू ने कौतूहलवश पूछा। उनकी आवाज़ में करुणा थी।
“लंबी कहानी है, वक़्त रहा तो बताऊँगी।“ औरत ने थकी आवाज़ में कहा।
“मैं.. खाना खा रहा था, उसके बाद.. आग का गोला.. चमका, सामने की झोपड़ी… सेकेंड भर में जल कर.. खाक हुई। लोगों के चीखने की आवाज़ आई…। जब तक मैं… उठ कर अपनी झोपड़ी में.. घुसता… वह भी जल गई.... फिर गोलियों की अंधाधुंध आवाज़.. आखिरी दृश्य.. लीमा की.. पाँच साल की बेटी..। कुछ लोगों ने पहले उस पर अंधाधुंध.. गोलियां चलाई.... फिर उसे… उस छोटी सी मासूम बच्ची को… पैर के सहारे उठा कर…जलती झोपड़ी में फेंक दिया...” मोगेश बाबू ने कहा। काफ़ी देर से रुका आँसू उनकी एक आँख से गिरा। “कौन थे वो लोग? तुम कौन हो?”
सामने से कोई जवाब नहीं आया। मोगेश बाबू ने रौशनी के लिए बल्ब जलाया, जला नहीं। पिया हुआ पानी फिर से भरपूर पिया। खिड़की खोल कर बाहर देखा, दरवाज़े की तरफ गए, दरवाज़ा खोला, अंदर चारो तरफ देखा, बाहर निकल रहे थे।
“अभी रात ही है” औरत ने कहा। “लेट जाओ”।
मोगेश बाबू चुपचाप दरवाज़ा बंद कर बिस्तर पर बैठ गए। चारो तरफ देखा, लेटने को हुए। आधा लेटे थे, तभी औरत ने कहा- “लीमा की मौसी... याद है!!” औरत ने आँसू का घूंट पीते हुए, उस एक बल्ब को एकटक देखते हुए कहा।
मोगेश बाबू उसी जगह उठ कर बैठ गए। फिर कुछ कहने पूछने सा बचा नहीं। लीमा की मौसी लूमी, जो बाद में लीमा की माँ बनी थी। कलकत्ता वाली लूमी। उतनी ही धुंधली लूमी की स्मृति, जितना अनजाना कलकत्ता।
और इस तरह जीवन में ‘दुहराव’ आया।
जब लीमा का जन्म हुआ, घर की तीसरी बेटी थी, लूमी ने लीमा की माँ से कहा- “बहन, बच्चा मुझे दे देगी! मैं इसे पालना चाहती हूँ।“
‘एक रुपये’ में लीमा को लूनी ने अपनी बहन से खरीद लिया। बहन जानती थी कि लूमी खुद कभी माँ नहीं बन सकती थी।
लूमी जब दस साल की थी, उसे भयंकर दमे की दिक्कत हुई, वैद्य ने महीनों दवाई दी, असर नहीं हुआ। डॉक्टर बदले, तब एक नई दवाई चलाई गई, जिसके बारे में उम्मीद थी कि इससे दमे में जरूर राहत मिलेगी। ग्लूकोकॉर्टिकॉयड। इसने दमे पर असर किया, दमे में राहत मिली। लूमी ठीक हो गई। चौदह साल की हुई, तब तक लूमी की माहवारी शुरू नहीं हुई। जब पता लगाया गया, डॉक्टर ने कहा दमे की दवाइयों का असर है, अब यह कभी माँ नहीं बन पाएगी। इस सदमे से लूमी बाहर नहीं निकल पाई। इसी वजह से उसकी शादी भी नहीं हुई। घर छोड़ यूकर कलकत्ता गई, कुछ ही समय में वापस आई, उसी समय लीमा और मोरा इसकी दुनिया का हिस्सा बने। समय बीता, कम उम्र में ही अब लीमा की शादी हुई, मोरा शांत होता गया, लूमी पूरी तरह अकेली पड़ती गई। उसके जीवन में तनाव बढ़ता जा रहा था। छत्तीस की थी, तब तक उसके सर पर बाल आधे बचे। वह सबसे छुप कर, मुंह बचा कर रह रही थी। कलकत्ता में पता चला, टेलिजेनिक इंफ्लुवियम नाम की बीमारी हुई है, यह तनाव के कारण होता है। जिसका इलाज मुख्यतया सिवाय तनाव कम करने के कुछ नहीं होता। लूमी की ज़िंदगी में तनाव बढ़ता जा रहा था, बाल कम होते जा रहे थे, चेहरे की झुर्रियां बढ़ती जा रही थी, घर मे सिमटना बढ़ता जा रहा था, समाज के ताने बढ़ते जा रहे थे। और अंततः लूमी ने फिर से गाँव छोड़ दिया। माँ के घर छोड़ने के छह महीने बाद लीमा वापस आई। उसके पति ने दूसरी शादी कर ली थी। यहाँ लीमा लूमी के बिना आधी थी, भूगोल में कहीं भी रह रही लूमी लीमा के बिना बची ही कितनी थी!
“लूमी... तुमने अपनी जान जोखिम मे क्यों डाली! और कहाँ हैं अभी हम!” मोगेश बाबू ने पूछा “तुम पहले से बहुत बदल गई, पहचान में ही नहीं आ रही।”
“अभी सोते हैं, तुम दिमाग पर ज्यादा ज़ोर मत डालो मोरा। मैं सब देख लूँगी। उसने मेरी ज़िंदगी तबाह की है।” बोलते ही लूमी का रोना छूटा।
“मुझे कुछ भी याद नहीं आ रहा.. वो लोग कौन थे!” मोगेश बाबू ने छत की तरफ ताकते हुए पूछा।
“मारने वाला कोई एक हो तो नाम लेना आसान भी है.. जिधर अंगुली घुमाऊँ, सारे लोग क़ातिल ही नजर आते हैं..सो जाओ…।”
थोड़ी देर तक चुप्पी रही, फिर खर्राटे की आवाज़ आई। कमरे में चुप्पी का संगीत बढ़ने लगा।
नींद गहरी थी। सपना हकीकत की तरह नींद में धीमा चहलकदमी करने लगा।
बचपन से नाना के कारण मोगेश बाबू को संगीत में रुचि थी ही, नृत्य में भी होने लगी। समय के साथ उनके शरीर और देह के भाव में जनाना जैसी लचक आने लगी थी। घर में सब बहुत प्यार देते, बाहर दोस्त यार ‘मोगरा’ कह कर चिढ़ाते। मोगरा दिनों दिन और छोटा हो कर ‘मोग’ और भी ‘मौगा’ बन गया। मोगेश बाबू के चाचा ने मोगेश बाबू के पिता को समझाते हुए कहा- “संगीत में जो नृत्य की कक्षा होती है, उसकी वजह से भी इसकी आदतें बिगड़ी हैं, इसे मत जाने दो।” बिना सोचे समझे मोगेश बाबू के पिता ने त्वरित कार्रवाई की, संगीत और नृत्य की पढ़ाई छुड़ा दी। वो सम्पूर्ण बेटी चाहते थे, बेटा के भीतर दिखती हुई आंशिक बेटी नहीं। मोगेश बाबू के घर में कोई संतान नहीं आया। जो थे यही थे। मोगेश बाबू और उनके पिता के बीच संगीत के पहले और संगीत के बाद कभी ठीक से बनी नहीं। कई बार किसी के सामने यह जाहिर करने से भी नहीं चूकते कि बेटी चाहा था, व्यथा पैदा हो गया। यह बात मोगेश बाबू को चुभती थी। दसवी की पढ़ाई के बाद संगीत छूटते ही मोगेश बाबू घर छोड़ कर बाहर चले गए, वहाँ ट्यूशन पढ़ाते और साथ में अपनी पढ़ाई भी करते। संगीत अब दिनों दिन छूटता जा रहा था, दोस्तों का दिया नाम छूटता जा रहा था, माँ बाप दादा दादी नाना सब एक एक कर छूटते जा रहे थे, घर छूटता जा रहा था, ज़िम्मेदारी बढ़ती जा रही थी, उम्र बढ़ती जा रही थी, मुस्कुराना छूटता जा रहा था। शुरुआत में चार-चार महीने पर घर जाते, बाद में जैसे-जैसे घर के लोग कम होते गए, यह अवधि दो साल से पाँच साल की तक खींच गई। फिर एक दिन लौटने का रास्ता बंद हो गया।
मोगेश बाबू लिखने में ठीक थे, एक राष्ट्रीय अखबार के लिए वर्षों से काम करते रहे थे, उनके लिखे कॉलम की खूब चर्चा भी होती, कभी-कभी साथी मित्रों के लिए भी लिख देते, जिसे मित्र अपने नाम से प्रकाशित करवाते। दिनों दिन उनका स्वयं पर भरोसा बनता जा रहा था, बचपन में जिस तरीके से प्यार मिलता था, मिलने लगा था। इस सब के बावजूद दोस्त कम, अकेलपान ज्यादा साथी रहा। जिस तरह की पत्रकारिता वह कर रहे थे, उसके लिए उन्हें शाबाशी मिलनी थी, लेकिन ट्रोल करने वालों और गालियाँ देने वालों ने कोई कमी नहीं छोड़ी। कैमरे की ठीक ठीक समझ भी थी। लिखने के साथ शौकिया तस्वीरें भी उतार लेते। काम में अच्छे मोगेश बाबू की पिछले ऑफिस की कलीग नैनिका से शादी हुई, शादी के एक महीने के भीतर ही दोनों तरफ़ से एक अपराधबोध उत्पन्न हुआ- ‘गलती हो गई।’ रिश्ता नाम को निभता चला, चाहते न चाहते हुए एक बच्चा हुआ लेकिन मोगेश बाबू को खुशी नहीं हुई। इसके बाद मोगेश बाबू की ‘घर’ वापसी का किस्सा यूं भी थमता गया। देर रात ऑफिस से निकल कर स्टेशन के पीछे पांडे जी की किताब की दुकान पर जाते, चाय पीते, दिन भर की बची खबरें और नई किताबें और पत्रिकाएं टटोल लेते।
उस शाम मोगेश बाबू ज़रा थके थे और अपने काम से ऊबे हुए थे, छुट्टी काफी दिनों से नहीं ली थी, दो दो शिफ्ट में खुद को खपा रहे थे उन दिनों। पांडे जी के यहाँ इसी ऊब में उस रात एक नामचीन अंग्रेजी अखबार की खबर उनसे टकराई। देश की अखबार और मीडिया में यूं भी ऐसी खबरें दबाने और मनचाहे खबरों की खेती करने का दौर चल रहा था, वह भी खबर एक से दो दिन में सिमट गई, लेकिन उनके भीतर बेचैनी कई दिनों तक बनी रही।
एक दिन ऑफिस से निकलते ही उन्होंने तय किया- इस खबर पर डोक्यूमेंट्री बनाएंगे। अखबार में कुछ दिन की छुट्टी की अर्जी डाली, और निकल पड़े- आदिवासियों की एक खबर को कवर करने।
आदिवासियों के लिए यह घटना नई घटना नहीं थी, देश के लिए थी। बारसूर में भी सालों पहले दो किशोर को नक्सली कह कर मार दिया गया था, बाद में पता चला दोनों आदिवासी थे, 16, 18 साल के बच्चे। आए दिन सरकार ने सेंध लगा कर नक्सलियों के नाम पर आदिवासियों के घराने उजाड़ने शुरू कर दिए थे। सरकार बिना लगाम का घोडा होती जा रही थी।
मोगेश बाबू को पता था कि उन लोगों के बीच पहुँचना खतरे से खाली नहीं हैं क्यूंकि लोग गुस्साये हुए थे, किसी से भी बात नहीं करना चाहते थे। मीडिया से खासकर उनकी दूरी थी। उनकी भाषा भी अलग थी और दुख भी। मोगेश बाबू किसी तरह उस बचते बचाते उस इलाके के पास पहुंचे। कैमरा लगाया, जैसे वाइल्ड फोटोग्राफी में घंटों सही फूटेज के लिए इंतजार करना पड़ता है, वो भी इंतज़ार करते रहे। शाम हुई, आदिवासियों के साथ जंगली जानवरों का खतरा भी मंडराने लगा। अब दो ही उपाय थे, लौट जाएं या थोड़ा और अंदर जाने की कोशिश करें। उनका मानना था- “जब पीछे लौटने का रास्ता बंद हो, हमें धीरे-धीरे आगे बढ़ने का रस्ता ढूँढना चाहिए।”
मोगेश बाबू ने मोबाईल निकाला, डिस्प्ले पर बेटे की तस्वीर देखने लगे। पत्नी इस तस्वीर में नहीं थी। पत्नी धीरे-धीरे यूं भी दिखने की तस्वीर से दूर रहने लगी थी।
“बाप बन जाने के बाद अपने बेटे को देख कर साला बाप इतना याद क्यों आता है!!!” मोगेश बाबू ने खुद से कहा, उनके सामने अपने पिता और अपने बेटे का काल्पनिक मिलन दृश्य दिखने लगा। दोनों ने एक दूसरे को नहीं देखा था। मोगेश बाबू दोनों के साथ दिख जाने की इच्छा को अपनी कल्पना में संभव करने की यूं ही लगातार कोशिश करते थे।
“होन दोका, नेमाख उठ (चलो उठ जाओ चुपचाप)” गर्दन पर कुछ नुकीला धँसता सा बैठा।
मोगेश बाबू ने संयम से काम लिया। उठ गए। धीरे-धीरे सामने मशाल की रौशनी चमकने लगी, रौशनी के साथ लोगों का झुंड भी चमका। लोग आपस में अजीब सी भाषा में कुछ बरबरा रहे थे। मोगेश बाबू उनकी भाषा समझने की नाकाम कोशिश कर रहे थे, तभी गर्दन में भीतर तक कुछ चुभा, मोगेश बाबू धम्म से जमीन पर गिर पड़े। एक लड़का था, जिसके भीतर गुस्सा भरा था, उसके दूसरे हाथ में कैमरा था।
लोगों ने लड़के को देखा, फिर मोगेश बाबू को। वह ज़मीन पर ढेर थे।
“छुप्काते लेताह, ऑरो गो (चलो उठो, चलो) “ एक औरत ने उठाते हुए कहा।
लोगों ने उनकी छानबीन की, जेब से एक बच्चे का तबला बजाता हुआ धूसर श्वेत श्याम पासपोर्ट साइज़ फ़ोटो निकला।
मोगेश बाबू को उठा कर गाँव में लाया गया। रात भर कोई नहीं सोया, सिवाय मोगेश बाबू के। सब उनके जागने का इंतजार कर रहे थे। हर किसी के भीतर डर भरा हुआ था, लड़के के चेहरे पर गुस्सा और ग्लानि का मिश्रित भाव।
सुबह मोगेश बाबू के बारे में उनकी पत्नी को खबर मिली- “एक पत्रकार को आदिवासियों ने मार दिया, और उसका माँस खा गए। पत्रकार के हाथ में बारह अंगुलियाँ थीं।” पत्नी थोड़ा सा रोई, थोड़ा सा गुस्सा हुई, पूरा ऑफिस गई, थोड़ा सा गम बनाया, बहुत ज़्यादा व्यस्त रही, और थोड़े दिन बाद दूसरी पूरी शादी कर ली। बच्चा घर से दूर पढ़ता था, उसको पता भी नहीं चला कि उसके घर में दूसरा बाप आ गया है। धीरे-धीरे अखबार के साथी और पढ़ने वाले पाठक सब भूलते गए। सब चुपचाप हुआ। जैसे उन दिनों चुपचाप सरकार फैसले लेती थी।
दो दिन बाद मोगेश बाबू को होश आया। उन्होंने आसपास के लोगों को देखा, अजीब सा चेहरा, अजीब से कपड़े और घरों के बीच। उनको कुछ भी याद नहीं था वो यहाँ कैसे आए!
“आप लोग कौन हैं?” मोगेश बाबू ने सवाल किया, सामने से कोई जवाब नहीं आया। सबकी गर्दन झुकी हुई थी, जिस लड़के ने मोगेश बाबू को घायल किया था, वह रोए जा रहा था। सबकी चुप्पी मोगेश बाबू को बेचैन करने लगी।
फिर दिनों दिन मोगेश बाबू की चुप्पी और बढ़ने लगी, शब्द फ़िज़ूल लगने लगे। याददाश्त बहुत टुकड़े में आती और झिल-मिला कर गुम हो जातीं। समय के साथ मोगेश बाबू उन्ही आदिवासियों के कपड़े मे दिखने लगे, उनके शब्द सीखने की कोशिश करने लगे, उनकी तरह जंगल जाते, लकड़ियाँ काट कर लाते, अपने लिए रोज़ थोड़ा थोड़ा घर बनाते, थोड़ा थोड़ा खाना जुटाते, इसमें मदद किया उनकी छठी अंगुली ने, जिसे थाम लिया था लीमा ने। लीमा ही थी जिसका फैसला था- “ एँ तेन हाला टे… आँहें रे सेताँक ना पठा सके हाँ…कोएँ हें, काहाँ हें… ना आमाक जाना… ना तेनक जाना…तेनक हिरेमाती… टुकड़ा–टुकड़ा रे गे… तितर बितर हो गे…अब तेन… यानी मोरा… आमाक ज़िम्मेदारी हाँ…देश आर मीडिया जानी गे… कि आमे तेनक ए हालात कले…ते आमे सब… बाँची न रहबे…(इन्हे इस हालात में वापस नहीं भेज सकते। कौन हैं, कहाँ से हैं, न हमें कुछ मालूम है, न इन्हे। इनकी याददाश्त टुकड़े में है और तितर बितर है.. अब ये यानि मोरा हमारी ज़िम्मेदारी हैं... देश की मीडिया को पता चला कि हमने इनकी यह हालत की है, हममें से कोई नहीं बचेगा।)” और इस तरह लीमा ने बीड़ा उठाया मोगेश बाबू को भाषा, कपड़े और रहन-सहन के साथ जंगल में रहना सिखाने का। थोड़े ही दिन में जब लीमा ससुराल गई, लूमी कलकत्ता, फिर उसी लड़के ने उनकी ज़िम्मेदारी उठाई। वह रोज़ रात को एक दवाई देता, ताकि याद्दाश्त ठीक रहे और मौके बे मौके हाल पूछता रहता।
(दवाई उसे शहर के कंपाउंडर ने दी थी बेचैन सर दर्द के लिए। उसे अक्सर दिक्कत होती थी। इस बार दवा बदल कर लाया था। )
मोगेश बाबू अब पूरी तरह वहाँ के तरीके मे ढल चुके थे। इतना कि अपनी भाषा भूल गए, अपना इतिहास भूल गए, अपनी पत्नी और बच्चा भूल गए। कुछ साल मे वो बिल्कुल वहीं के हो गए। सुबह उठते जंगल जाते, दिन भर वहाँ बिता कर वापस लौटते। पक्षी के प्रति उनकी रुचि बढ़ती जा रही थी। लीमा की मौसी लूमी ने एक दिन जंगल से लौटते हुए कहा था- ‘जिनसे हम प्यार करते हैं, उनकी आत्मा पक्षी बन कर लौटती है।‘
मोगेश बाबू चुप ज्यादा रहते। उम्र बढ़ने से ज्यादा देह पर दिखने लगी थी। कभी कभी अचानक उनकी सारी याददाश्त चली जाती। अब भूलने की वजह से कई बार एक ही काम बार-बार करने लगे थे, याददाश्त एक पहेली बन गई थी, जाती फिर जाने कैसे खुद ही आ भी जाती। लौटने में उनकी भाषा भी लौट आती। कब क्या लौटेगा, इसका कोई हिसाब नहीं था। उनका जीना हर वक़्त उनके खुद के लिए पहेली बनता जा रहा था। और एक रात वह खाना खा रहे थे, आग दिखी, आग मे फिंकता एक बच्चा दिखा, कराहते जलते लोग दिखे, जलता हुआ वह लड़का दिखा…।
सुबह देर से मोगेश बाबू की आँख खुली। उनका शरीर मोटे कंबल से ढंका था। उठते ही उनका सर भारी लग रहा था। उनकी आँखों के सामने आग की लपट हल्की होती जा रही थी, कमरे में किसी का होना आभासी होता जा रहा था।
मोगेश बाबू उठ कर बैठे, कमरा बिखरा हुआ दिखा, जैसे किसी को घसीट कर निकाला गया हो।
“मेरी आँख कैसे नहीं खुली!!!!” उन्होंने खुद से ही पूछा। “कौन गया यहाँ से!!!”
पिछली दो रात के बाद की सुबह में एक और घटना घटी, उनका बीता हुआ पुराना इतिहास उन्हे याद आने लगा था, टुकड़े में। उस इतिहास में कभी माँ आती, कभी पिता, कभी नाना और एक बच्चा। याद आते ही दृश्यों की भूल भी पड़ती जाती थी। कुछ भी स्थिर नहीं रह गया था। कमरे से निकल कर भटकते हुए वापस कमरे में आ जाते।
रात में लूमी को कुछ लोग उठा कर ले गए। अंधेरे और जल्दीबाज़ी में मोगेश बाबू पर किसी की नजर नहीं पड़ी। तीन दिन बाद नदी में लूमी की लाश तैर रही थी। साथ में वह बैग भी, जिससे बाहर आ कर झाँकती हुई मोगेश बाबू की तस्वीर और उन्हीं का लिखा हुआ पानी पर तैरता चिट, जो उन्होंने मन की डायरी से बाहर निकाल कर लिखा था। लूमी इस धरती पर, पूरे ब्रह्मांड पर उस जनजाति सभ्यता, और भाषा को बोलने वाली आख़िरी प्राणी थी, जिस भाषा को बचाने और उसकी लिपि को संरक्षित करने के लिए दूर देश के अंग्रेज़ी के एक बड़े पत्रकार ने कई दिनों तक स्पेशल ख़बर चलाई थी, अब वह अकेला प्राणी पानी में सड़ी हुई लाश थी, जिसके सड़े-गले हुए दिमाग़ में उस सभ्यता की भाषा और संस्कृति का आखिरी वजूद था। उस मरी हुई भाषा और संस्कृति का कोई लेखा-जोखा अब नहीं रह गया था, न ही इसकी किसी को परवाह थी। देश को मीडिया की आँख उस वक्त गांधारी की आँख थी, जिसने मौके पर बंद होना सीख लिया था।
मोगेश बाबू गाँव जलने की रात लूमी की मदद से जंगल से बाहर आए थे, छुपने के लिए दोनों शहर शहर भटकते रहे, शहर शहर में लूमी की तस्वीर टँगी मिलती, मोगेश बाबू शहर शहर लोग लोग लूमी लीमा सब भूलते रहे।
अब इन दिनों में अकेले मोगेश बाबू शहर में भटक रहे थे। सब ‘छूट’ चुका था (जीवन को छोड़ कर )।
बाहर निकलने का एक मात्र दरवाज़ा मौत की तरफ खुलती थी। दरवाज़ा खुलता, बंद होता, मोगेश बाबू बेचैन होते, गुम होते।
सरकार ने व्यापारियों से वादा किया था, तकरीबन मुफ़्त में अच्छी जमीन दिलाने का। सबसे आसान निशाना थे- आदिवासी। इससे जमीन के साथ नदी, पहाड़, और जंगल तीनों मिल जाते। और मारने का कारण- नक्सली घोषित करना। उस रात गाँव के अट्ठाईस लोग आग में झुलस गए, मीडिया ने खबर चलाया- “जंगल की आग से नक्सलियों की मौत।”
सबकी नज़र लूमी पर थी, क्यूं कि वह जंगल की सबसे पढ़ी लिखी थी और बाहर के कुछ एनजीओ से जुड़ी थी, लोगों के बीच रहती थी, कलकत्ता के एक पार्टी के साथ सक्रिय रूप से अपनी गाँव की रक्षा के लिए तैयारियां कर रही थी। सरकार और मीडिया को उससे खतरा था। सरकार के पास एनएसए का ब्रह्मास्त्र था, जिसे आगे कभी भी खर्चना उसके बाएं हाथ का काम था। ऐसे ख़तरे सरकारें यूं भी चुटकियों में पचा जाती थी।
उधर जंगल में बड़ी छोटी गाड़ियां दौड़ने लगी, जंगल जलाए जाने लगे, जानवरों और मोरों की लाश के ऊपर से देश की मीडिया माहौल बनाने में जुटी थी। दूर तक उन्माद ही उन्माद। जंगल से ज़्यादा न्यूज़ रूम में। न्यायालय आर्केस्ट्रा के मंच पर थी, रिमोट सरकार के हाथ में था।
मोगेश बाबू इतने बड़े भूगोल में एक फतिंगे की तरह भुला दिए गए। वह किसी अजनबी सी शहर में थे। उनमें नई स्मृतियों का निर्माण बंद हो चुका था, पुरानी स्मृति कहीं से भी रेंडम दौड़ लगाती हुई आती और भाग खड़ी होती, मोगेश बाबू को मौत के सपने ज्यादा आते थे। डर ज़्यादा लगता था। कारण- उन्हें बेंजोडाइजेपाइन की दवाई उस रात पड़ गई थी, जब लड़के ने (उस लड़के को मालूम था या नहीं पता नहीं) उनकी गर्दन पर हमला किया, इससे उनकी स्मृति पर गहरा असर हुआ। लीमा के जाने के बाद वह लड़का रोज़ रात को उसकी दवाई देता। पिछले दिनों लूमी ने भी वही दवाई दी।
और इस तरह स्मृति से उनका दिमाग धीरे-धीरे खाली होता रहा। अनहद अविचल संगीत, बचपन, पिता, लूमी, पक्षी, ताप्ती, जंगल और मोगेश बाबू सब शहर से धीरे-धीरे गायब होने लगे। उस सभ्यता का आखिरी बचा हुआ शब्द मोगेश बाबू के मुंह से बरबराता हुआ निकलता, छटपटा कर बार-बार मरता जाता।
उनका पक्षी बनना तय था, लेकिन किसके लिए!
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(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग्स कवि विजेन्द्र जी की हैं।)
संक्षिप्त परिचय
नाम- सुमन शेखर
शिक्षा-मास कम्युनिकेशन में स्नातकोत्तर।
जन्म- 13 जुलाई 1995
कई नाटकों का लेखन, अभिनय और निर्देशन।
ऑल इंडिया रेडियो, दिल्ली में उद्घोषक के तौर पर अल्पअवधि का कार्य।
फ़िल्मों के लिए पटकथा लेखन, निर्देशन के साथ ही अभिनय में निरत।
देश-विदेश के बड़े फ़िल्म फेस्टिवल्स में फ़िल्में प्रदर्शित, अभिनीत फ़िल्म “ख़्वाबिदा” को
एनएफ़डीसी द्वारा बेस्ट रोमांटिक फ़िल्म का अवार्ड, The Saddist फिल्म की भी खूब तारीफ।
दशक भर से रंगमंच में सक्रिय।
कथादेश ‘कथा-समाख्या’ में कहानी चयनित।
प्रकाशन- आलोचना, वागर्थ, कथादेश, बया, कथाक्रम, सरस्वती पत्रिका, मधुमती, राजस्थान पत्रिका, कृति बहुमत, उद्भावना, हिंदी चेतना, अहा ज़िन्दगी, जनसंदेश, पाठ, हिंदवी, जानकीपुल, इन्द्रधनुष वेब पोर्टल, गोल चक्कर, शब्द बिरादरी, समकालीन जनमत, स्वाधीनता शारदीय विशेषांक और कौशिकी सहित कई पत्रिकाओं में कविताएँ प्रकाशित।
वर्तमान पता-अंधेरी वेस्ट, मुम्बई में ठिकाना।
सम्पर्क
माँ, कृष्णा नगर,
खगड़िया-851204
मोबाइल-8877225078
ईमेल- Shekhers914@gmail.com




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