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स्मरण में है आज जीवन

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जितेन्द्र रघुवंशी इंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन (इप्टा) के राष्ट्रीय महासचिव कामरेड जितेन्द्र रघुवंशी का न रहना हम सब प्रगतिशील सोच के साथियों के लिए एक गहरा आघात है । वे देश के एक  प्रतिबद्ध नाट्यकर्मी थे । यह प्रतिबद्धता उन्हें अपने पत्रकार पिता राजेन्द्र रघुवंशी से मिली । प्रगतिशील लेखक संघ रायपुर ने उन्हें हार्दिक श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा है…. 'कामरेड जितेंद्र रघुवंशी ने छत्तीसगढ़ में इप्टा को शहरों कस्बों और गांवों में न केवल जिंदा और सक्रिय रखा बल्कि देश भर के रंगकर्मियों को जोड़ने में उनकी खास भूमिका रही है। वे इधर नाचा गम्मत के कलाकारों निसार अली जैसे रंगकर्मियों को लेकर छत्तीसगढ़ के सारे रंगकर्मियों और थिएटर और रंगकर्म से जुड़े हमर संगठन को एकजुट करने में लगे थे। हम रंग चौपाल शुरु करने की प्रक्रिया में, देश भर के रंगकर्मियों को मौजूदा हाल में जनमोर्चा बनाने के सिलसिले में उनके नेतृत्व के भरोसे थे। यह बहुत बुरी खबर है भारतीय रंगमंच और खास तौर पर केसरिया कारपोरेट राज के खिलाफ मोर्चाबंद रंगकर्मियों के लिए। अब हमें नये सिरे से किलेबंदी में लगना होगा औ...

प्रेम शंकर सिंह

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डूबते सूरज को प्रणाम करती कहानियां (प्रियदर्शन मालवीय की कहानियों पर एक नोट्स)       हिन्दी के कहानी संसार में पिछले सालों मे जिन लोगों ने चुपचाप अपनी जगह बनाई है, उनमें प्रियदर्शन मालवीय प्रमुख है. उनकी कहानियां हिन्दी की कई पत्रिकाओं, मसलन कथादेश, तद्भव, नया ज्ञानोदय, बहुवचन आदि में छपी हैं और खासी चर्चित और विवादित भी रही हैं. अभी पिछले दिनों आधारशिला से   "सुनिये घोड़ों की टापें" नाम से उनकी कहानियों का संग्रह प्रकाशित हुआ है जिसमें कुल आठ कहानियां संकलित है. ये कहानियां विषय वस्तु, भाषा और शिल्प की विविधता के कारण ध्यान आकर्षित करती है.        पिछले दो दशकों में भारतीय समाज कई तरह के संक्रमण और सामाजिक-राजनीतिक समस्याओं के बीच आगे बढ़ा है. 1990 के दौर से उदारीकरण की आहटें सुनाई पड़ने लगी थी. दूसरी तरफ सोवियत व्यवस्था के विघटन के कारण समाजवादी और पंथनिरपेक्ष समाज निर्माण की आकांक्षा रखने वाली ताकतें पस्त हिम्मती का शिकार हुई. ऐसी ही स्थिति में सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था अलोकतांत्रिक, साम्प्रदायिक होते हुए क्र...