मधु कांकरिया की मेरी ढाका डायरी की शर्मिला जालान द्वारा की गई समीक्षा




बांग्लादेश दुनिया का एक ऐसा देश है जिसका निर्माण धर्म के आधार पर नहीं, बल्कि भाषा और संस्कृति के आधार पर हुआ था। राष्ट्र बनने की उसकी प्रक्रिया त्रासद थी और उसे इस क्रम में उसे भयावह नरसंहार का दंश भी झेलना पड़ा। जिस पाकिस्तान से वह लड़ाई लड़ कर वह अलग हुआ था उसकी नींव में ही धर्म था लेकिन इसके संस्थापक शेख मुजीबुर्रहमान ने धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के रूप में भविष्य के बांग्लादेश की परिकल्पना की थी। इसके बावजूद, यह विडंबना ही कही जाएगी कि शीघ्र ही एक सैनिक जनरल ने तख्ता पलट कर इसे इस्लामिक राज्य घोषित कर दिया। आज का बांग्लादेश कट्टरवाद की अंधी राह पर चल पड़ा है। बहरहाल वरिष्ठ लेखिका मधु कांकरिया ने अपना कुछ समय बांग्लादेश में बिताया जिसे उन्होंने 'मेरी ढाका डायरी' के रूप में शब्दबद्ध किया है। बकौल शर्मिला जालान 'डायरी में उनके चिंतक और विचारक रूप की झलक मिलती है जो उन्हें आत्मालोचक और आत्मान्वेषी बनाता है। इसी के साथ इस्लाम, राजनीति, गरीबी और अभाव से जुड़े प्रश्नों को वे मजबूती से उठाती हैं और अपने विचार स्पष्टता से रखती हैं। ढाका को जानने की प्रक्रिया में वे अपनी दुविधाओं और प्रश्नों के उत्तर भी खोजती चलती हैं।' शर्मिला जालान ने इस ढाका डायरी की समीक्षा लिखी है जिसे आज हम पहली बार के पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं। 



अनकहे दुख की साक्षी ढांका डायरी


शर्मिला जालान


‘मेरी ढाका डायरी’ में वरिष्ठ लेखिका मधु कांकरिया की बांग्लादेश की जमीनी सच्चाई को समाचारों से परे जा कर समझने की बेचैनी, ईमानदारी और प्रखरता स्पष्ट रूप से महसूस की जा सकती है। ढाका के विविध पहलुओं को समझने का प्रयास केवल विवरण और सूचनाएँ जुटाना नहीं है, बल्कि उस निमित्त समय को और लेखिका द्वारा स्वयं को देखने-परखने की एक गहरी प्रक्रिया भी है। लेखिका का यह प्रयास उन्हें एक दुर्लभ व्यक्तित्व के रूप में सामने लाता है, और उनका यह दुर्लभ होना पाठक को आक्रांत नहीं करता, बल्कि संवेदनशील और जागरूक बनाता है। भरोसा देता है।


ढाका के राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक जीवन के उतार-चढ़ावों के बीच लेखिका का मन लगातार विकल्पों की तलाश करता है।  डायरी में उनके चिंतक और विचारक रूप की झलक मिलती है जो उन्हें आत्मालोचक और आत्मान्वेषी बनाता है।  इसी के साथ इस्लाम, राजनीति, गरीबी और अभाव से जुड़े प्रश्नों को वे मजबूती से उठाती हैं और अपने विचार स्पष्टता से रखती हैं। ढाका को जानने की प्रक्रिया में वे अपनी दुविधाओं और प्रश्नों के उत्तर भी खोजती चलती हैं। साधारण लोग घरेलू सहायिका, ड्राइवर महमूद आदि से मिले विश्वास के सहारे वे ढाका को समझने की कोशिश जारी रखती हैं और पाठक के भीतर भी जानने की प्रेरणा जगाती हैं।


इस डायरी की विशेषता है ढाका के नारकीय जीवन और बदहाली वाले क्षेत्र को देखने की इच्छा, जेनेवा कैम्प जिन्हें बिहारी कैंप भी कहा जाता है, मदरसों आदि क्षेत्रों में जाने की लेखिका की जिद्द, शिया–सुन्नी में क्या अन्तर है, दाढ़ी, हिजाब और बुरका को समझने की जिज्ञासा, ज़कात, सूद-वर्जना, इस्लामिक बैंक क्या है, बहुविवाह और सुअर के मांस का विरोध, मूर्ति पूजा, देवी–देवताओं के हाथ में अस्त्र क्यों है, जाति भेद और बलि–प्रथा क्यों और क्या है आदि विषयों को गहराई से समझने की प्रौढ़ इच्छा। पाठक भी उनकी खोज-यात्रा का सहभागी बन जाता है। इतिहास की जटिल परतों के बीच, बुर्के जैसे प्रसंग, प्रकृति के चित्रण और जीवन्त अनुभव पाठक को कथा से जोड़े रखते हैं। यहीं इस कृति की पठनीयता सिद्ध होती है। कबीर की भांति हिन्दू और मुसलमान दोनों को फटकार आदि यहाँ पर हैं। कहीं हिंदू धर्म की रूढ़ियों पर तीखा प्रहार, तो कहीं बालक-सी सहजता से हनुमान चालीसा का पाठ। ये विविध रंग इस डायरी को जीवंत बनाते हैं।


बांग्लादेश आते ही लेखिका को एक मुस्लिम देश में आने का अनुभव होता है। महमूद नामक ड्राइवर उन्हें देश के विभिन्न रूपों से परिचित कराता है। डायरी की शुरुआत में ही बांग्लादेश मुक्ति संग्राम का उल्लेख है। एक ऐसा देश, जो धर्म नहीं, बल्कि भाषा और संस्कृति के आधार पर बना। 1971 के नरसंहार और धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के स्वप्न के बावजूद, बाद में इसे इस्लामिक राज्य घोषित किया गया।


बांग्लादेश के इतिहास, वर्तमान और समकालीन जीवन को समझते हुए यह महसूस होता है कि एक मुस्लिम देश में अल्पसंख्यक हिंदू के रूप में रहना कैसा होता है। धर्म यहाँ लोगों के जीवन से गहराई से जुड़ा है, और ढाका के गुलशन जैसे अभिजात इलाके में रहने के अनुभव सामने आते हैं। गुलशन, बारीधारा इलाके बेहद संवेदनशील और वीआईपी इलाके हैं, जहाँ पर अधिकांश विदेशी दूतावास और विदेशी रहते हैं। गुलशन में रहते हुए लेखिका को एक बार यह भी लगा किया कि वे ढाका में विदेशी हैं।


इन अनुभवों में हिंदुओं के साथ हुए भेदभाव और हिंसा, हिन्दू बस्तियों पर हमले, दुर्गा पूजा के समय हिंसा, हिन्दुओं की घटती जनसंख्या और पलायन आदि भी शामिल हैं, जहाँ इतिहास, यादें, वर्तमान और समकालीन जीवन एक साथ जुड़ते दिखाई देते हैं।


लेखिका अपने पुत्र आदित्य और पुत्रवधू के साथ कुछ वर्ष ढाका में रहती हैं। इस दीर्घ प्रवास का आरम्भ कोरोना पूर्व होता है और समापन वर्ष 2022 है। पुत्र कई स्थान पर उन्हें सावधान करता है। जब एक पत्रकार उनका साक्षात्कार लेना चाहता है तब उनका पुत्र उन्हें इस्लाम, हिन्दुत्व और राजनीति जैसे विषयों पर बात करने से बचने की सलाह भी देता है।


लेखिका अपने भीतर के जिप्सी या बंजारे भाव से प्रेरित हो कर ढाका के कोने-कोने को खंगालती-खोजती हैं। लंबे समय तक किसी स्थान पर रह कर ही उसे गहराई से समझा जा सकता है। ढाका में उनके बेटे की उपस्थिति ने उन्हें यह अवसर दिया। साथ ही, कोलकाता के अनुभवों के कारण बंगला भाषा और संस्कृति से परिचित होने ने भी ढाका को समझने में विशेष सहूलियत प्रदान की।


डायरी में इतिहास बिखरा हुआ है-ढाकेश्वरी मंदिर से ले कर शहर के बदलते स्वरूप तक। एक ढाका के भीतर दूसरा ढाका बनता हुआ दिखाई देता है। छोटे-छोटे प्रसंगों में भी दो दुनियाओं का टकराव उभरता है।


इस डायरी में विविध वर्ग, जातियाँ और समुदाय उपस्थित हैं-हिंदू मुसलमान, उच्च वर्ग, मध्य वर्ग और साधारण लोग। लेखिका की सहानुभूति स्पष्टतः उन लोगों के साथ है, जो अँधेरे में जीवन जी रहे हैं। ट्रैफिकिंग, सलमा-फातिमा की पीड़ा, बुर्कानशीं स्त्रियों के प्रसंग, और सांप्रदायिक भय से जुड़े अनुभव ये सब डायरी को गहरी संवेदना और सच्चाई से भरते हैं।


मेरी ढाका डायरी को मैंने उपन्यास की तरह पढ़ा है। इसमें अनेक चरित्र हैं। स्वयं मधु कांकरिया और उनका पुत्र भी। लेखिका जहाँ मूल्यों की बात करती हैं, करुणा, समता, सहिष्णुता पर अपने विचारों, कथनों और कर्म में बल देती हैं, वहीं उनका पुत्र व्यवहारिक दुनिया का प्रतिनिधि है। फिर भी वह संवेदनशील है। जिसका साक्ष्य दो जगहों पर देखा जा सकता है। पहला फ़ातिमा के खोए बेटे को खोजने निकल पड़ता है। दूसरा ढाका प्रवास खत्म होने पर लौटते समय लेखिका अपने पुत्र से पूछती हैं कि जीवन के बही-खाते में ढाका का हासिल क्या रहा। अपेक्षा के विपरीत पुत्र कहता है–‘ढाका उसके लिए उजाले की तरह रहेगा। मुंबई के दबाव, प्रतिस्पर्धा और आक्रामकता से अलग यहाँ उसे अधिक ईमानदारी, सहजता, विश्वास और पारदर्शिता मिली।’ इस तरह यह डायरी माँ और पुत्र के संवाद के रूप में भी खुलती है।


मधु कांकरिया 


इस डायरी को अपनी सुविधानुसार दो खंडों में भी पढ़ा जा सकता है। पहले खंड में वह ढाका है, जो गरीबी, अभाव और कंगाली से जूझता हुआ है, जहाँ धर्म विशेषतः इस्लाम का गहरा प्रभाव है। यहाँ लेखिका गलियों में जाती हैं, लोगों विशेषकर स्त्रियों से मिलती हैं और उनके जीवन को निकट से समझती हैं। फातिमा, फौजिया, नूरजहाँ–इशरत आदि के जीवन को समझती हैं। ढाका की साधारण स्त्रियों के जीवन, उनके दुख-दर्द को उन्होंने अत्यंत निकटता से देखा है; फातिमा जैसी स्त्रियों की कथा वही लिख सकता है, जो उनके जीवन के बहुत करीब गया हो। छात्राओं से संवाद के दौरान वे छात्र राजनीति और हिंसा को समझती हैं। अबरार की हत्या (फेसबुक पोस्ट के कारण), छात्र आक्रोश के दृश्य वहां हैं। कई प्रश्नों का सामना करती हुई आत्मविश्लेषण भी करती हैं। और एक जगह इस अनुभव से भी गुजरती हैं – ‘किसी मुस्लिम देश में सांप्रदायिक डर से मेरा वह पहला साक्षात्कार था।’


उनका जिज्ञासु मन दिन-रात सतत सक्रिय और सजग बना रहता है। घर के भीतर हो या बाहर। वे संवाद के माध्यम से इस्लाम को समझने की कोशिश करती हैं। कभी स्थानीय लोगों से तसलीमा नसरीन के प्रति उनकी राय जानती हैं, तो कभी तुलनात्मक दृष्टि से बिस्मिल्ला खान को याद करती हैं। यह भी कि उनके निधन पर हिंदू और मुसलमान, दोनों समुदायों का जनसमूह एक साथ उमड़ा था। छोटे-छोटे प्रसंगों के माध्यम से वे ढाका को धीरे-धीरे खोलती हैं-कभी दुर्गा पूजा, कभी दीपावली के अवसर, कभी मदरसे में जाने की इच्छा, तो कभी बिल्ली पालने की दिलचस्प कहानी। मच्छर मारने जैसे छोटे प्रसंग को दो बार लिखते हुए लेखिका यह दिखाती हैं कि साधारण घटनाएँ भी गहरी अंतर्दृष्टि दे सकती हैं। महमूद भाई बार-बार किसी न किसी कथा के साथ उपस्थित होते हैं। कभी अपनी पुत्री सायमा की, तो कभी बहन की कथा के माध्यम से और इन प्रसंगों में भाषा का सौंदर्य विशेष रूप से उभरता है।


मधु कांकरिया का अध्ययन व्यापक है। डायरी को पढ़ते हुए रिचर्ड बाख, मार्केस, रवींद्रनाथ टैगोर, मुक्तिबोध, श्रीकांत वर्मा, हैरी पॉटर और वर्जिनिया वुल्फ, गुलज़ार आदि की स्मृतियाँ भी उभर आती हैं, जब लेखिका सहजता से उनका उल्लेख करती हैं। साथ ही, शेर-ओ-शायरी के प्रति उनका प्रेम स्थान-स्थान पर स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।


दूसरे खंड में उनकी पुनः ढाका वापसी के साथ एक भिन्न संसार खुलता है। उच्चवर्गीय जीवन का खोखलापन उजागर होता है। गुलशन क्लब और अभिजात वर्ग का ढाका, जहाँ भव्यता, सुरक्षा और विशिष्टता है। पर लेखिका यह स्पष्ट करती हैं कि इस सीमित और सुरक्षित दुनिया से बाहर निकल कर ही ढाका की वास्तविक तस्वीर दिखाई देती है।

 

‘कुछ घर की, कुछ जग की, इक्कीसवीं सदी की महिला मंडली’ शीर्षक अध्याय में ढाका के बहुस्तरीय स्वरूप का परिचय मिलता है। यहाँ बहुराष्ट्रीय कंपनियों के उच्च पदस्थ लोगों और उनके परिवारों से मिल कर उनके जीवन, बच्चों की शिक्षा और परिवेश के जरिए एक अलग तरह के समकालीन ढाका के जीवन की झलक मिलती है। दीपावली मिलन के प्रसंग में लेखिका भारतीय ‘क्रीमी लेयर’ से भी परिचित होती हैं। यहाँ रईसी, समृद्धि के संसार की बातें मुलाकातें हैं तो अपनी पोती नविका के स्कूल दाखिले से ले कर उसके एआईएसडी दुनिया के सबसे मशहूर स्कूलों में एक एआईएसडी की समृद्धि और तामझाम का वर्णन है। इसी संदर्भ में एक अत्यंत ईमानदार निष्कर्ष उभरता है ‘गरीबी की तरह, एक सीमा के बाद समृद्धि भी मनुष्य की मजबूरी बन जाती है।’


डायरी में ‘घर’ का प्रश्न भी गहरे स्तर पर उभरता है। त्रासदी केवल घर का न होना नहीं, बल्कि घर का होना भी एक जटिल त्रासदी है। ऐसे कई अनुभव से भरे वाक्य इस कृति के मर्म खोलते हैं।


ढाका डायरी पढ़ते-पढ़ते मन बार-बार भारी होता है। भीतर अवसाद और विषाद उतरता है। हर पन्ना जैसे किसी अनकहे दुख का साक्षी है। लेखिका के निजी जीवन के पल और सुख-दुख भी यहाँ दर्ज है। बांग्लादेश की मिट्टी में उन्हें अपनी नवजात पोती को भी सुपुर्द-ए-ख़ाक करना पड़ा। दुःख के इसी क्रम में पहली बार सहज हँसी उस क्षण उभरती है जब वे कहती हैं, ‘सब गोलमाल है।’ प्रसंग साधारण है बहू को फूल चाहिए, और वे कहती हैं हम जैन हैं जैन धर्म में फूल छूने को पाप बताती हैं। पर इसी में एक गहरी सच्चाई सामने आती है कि हम सब सुविधा के अनुसार कभी जैन, कभी वैष्णव हो जाते हैं। यह हँसी हल्की नहीं, बल्कि आत्म-स्वीकृति की थोड़ी कड़वी, थोड़ी राहत देने वाली हँसी है। क्योंकि यह ‘गोलमाल’ केवल उनका नहीं, हम सबका है।


मधु कांकरिया की ढाका डायरी पढ़ते हुए इस्लाम, ढाका, इस्लामी समाज में स्त्रियों के जीवन  जैसे विषयों के बारे में तो जानते ही हैं साथ ही वहां पर राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक मुद्दे भी हैं। इन सभी स्तरों पर इस कृति को पढ़ा जाना चाहिए, किंतु इसके साथ-साथ इसकी भाषा के काव्यत्व में डूब कर पढ़ना भी उतना ही आवश्यक है।  प्रकृति का वर्णन करते समय उनकी भाषा का सौष्ठव देखते ही बनता है। जगह-जगह भाषा का ऐसा जादू दिखाई देता है कि पाठक मुग्ध हो उठता है।  कई प्रसंगों में ऐसा लगता है मानो वे एक कवि हों।इसी संदर्भ में तादेऊश रोजेविच की कविता की ये पंक्तियाँ स्मरण हो आती हैं-


‘कवि हुए वे जो लिखते हैं कविता,

और वे भी जो नहीं लिखते कविता।’


इस प्रकार ढाका डायरी में तीन प्रकार की भाषा का प्रयोग दिखाई देता है- एक वह जो प्रकृति, नदी, उदासी, संयोग-वियोग आदि का का वर्णन करते हुए काव्य में रूपांतरित हो जाती है। दूसरी वह जो ढाका के इतिहास, वर्तमान और इस्लाम को दर्ज करती है, जिसमें धर्म को अपने अस्तित्व का अभिन्न हिस्सा बनाए रखने वाले लोगों का है और तीसरी वह, जिसमें लेखिका स्वयं से संवाद करती हैं अपनी सीमाओं, जिज्ञासाओं और जानने की प्रक्रिया को व्यक्त करती हुई।


शर्मीला जालान 


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

हरिवंशराय बच्चन की नव वर्ष पर कविताएँ

मार्कण्डेय की कहानी 'दूध और दवा'

प्रगतिशील लेखक संघ के पहले अधिवेशन (1936) में प्रेमचंद द्वारा दिया गया अध्यक्षीय भाषण