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ललन चतुर्वेदी का संस्मरण 'चिट्ठी ना कोई सन्देश, जाने ये कौन सा देस!'

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ललन चतुर्वेदी  आज मोबाइल के जमाने में भले ही पत्र लिखना और भेजना लगभग अप्रासंगिक हो गया हो, पत्र लिख कर सन्देश भेजने की परम्परा पुरानी है। इसके लेखन का एक तरीका होता था जो शुरुआती छात्र जीवन में सिखाया जाता था। और प्रेमी प्रेमिका के लिए ये पत्र रोमांच भरे होते थे । पत्र के उत्तर की बेसब्री से प्रतीक्षा करना और पत्र पाने पर हुलसना आज के प्रेमी प्रेमिकाओं को नसीब कहां। शब्द वैसे भी बहुत कुछ कह डालते हैं और पत्र के साथ स्पर्श भी तो जुड़ा होता है। पहले के जमाने में जब शिक्षा सीमित थी अशिक्षित लोग पत्र लिखवाने के लिए पढ़े लिखे लोगों के पास आ कर पत्र लिखवाते थे। उन अनुभूतियों को शब्दबद्ध करना आसान नहीं होता था। आज की पीढ़ी पोस्टकार्ड, अंतर्देशीय, लिफाफा और बैरंग पत्रों के मिजाज से शायद ही परिचित हो। साहित्य में तो इस पत्र लेखन से पूरे काल खण्ड की जानकारी मिल जाती थी। इसलिए रचनाकारों के पत्र प्रायः सम्भाल कर रखे जाते और प्रकाशित किए जाते। कवि ललन चतुर्वेदी ने अपने संस्मरण में उन दिनों को शिद्दत से याद किया है। यह आलेख कुछ व्यंग्यात्मक पुट भी लिए हुए है। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं ...

ललन चतुर्वेदी का व्यंग्य 'बाल की खाल'

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ललन चतुर्वेदी  मानव देह अपने आप में परफेक्ट मानी जाती है। सभी अंगों प्रत्यंगों के अपने अलग अलग महत्व और मायने हैं। मानव शरीर में बाल का अपना विशेष महत्त्व है। सिर के बालों को सजाने संवारने के साथ साथ मूंछ दाढ़ी के बाल भी लोग अलग अलग समयों में अपनी अपनी तरह संवारते रहे हैं। लेकिन कुछ लोगों के बाल जल्द ही साथ छोड़ने लगते हैं और वे गंजे हो जाते हैं। बालों को बचाने के तमाम प्रयास नाकाफी साबित होते हैं। नीबू और मट्ठा का उपयोग करने से ले कर बाल को बार बार छिलवाने की तरकीब भी काम नहीं आती और अन्ततः सिर पर जल्दी ही भरा पूरा चाँद दिखाई देने लगता है। कुछ लोग सिर पर विग लगा कर सच्चाई को नकारने का प्रयास करते हैं लेकिन पुणे की घटना ने विग लगाने वालों के मन में ऐसा खौफ भर दिया है कि क्या कहिए। अब वे विग पहनने के पहले सौ बार सोच रहे हैं। क्या ठिकाना कोई माशूका का मूड उसे देख कर उखड़ जाए और फिर वह न जाने क्या कर डाले। अब यह भी तो देखिए कि  पता नहीं किस भक्त ने किस प्रेरणा से भगवान शिव के भरे पूरे बालों के साथ चाँद को यूं ही टांक दिया। अब वे चाँद को सिर पर ढोते ही रहते हैं। चाँद को सिर से उतार...

ललन चतुर्वेदी का संस्मरण 'मेरा बचपन खो गया है'।

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ललन चतुर्वेदी  किसी भी व्यक्ति के बचपन के दिन उसकी ज़िन्दगी के सबसे खूबसूरत दिन होते हैं। माँ पिता की सघन छाया में बच्चे का विकास होता है। माँ पिता बच्चे में अपने अक्स ढूंढते हैं। बच्चे भी किसी तरह की फिक्र से दूर निश्छल मन अपनी कल्पना की दुनिया में खोए रहते हैं। धीरे धीरे बच्चों का विकास होता है और उनकी स्कूलिंग शुरू हो जाती है। यहीं पर बच्चों को वर्णमाला से परिचित कराया जाता है साथ ही उनकी सामाजिकता का भी विकास होता है। कवि ललन चतुर्वेदी ने अपने संस्मरण में खुद के बचपन को उसके खुरदुरेपन के साथ याद किया है। उनका सरस गद्य पाठक को खुद के साथ बहा ले जाता है। बांग्ला की एक कहावत है 'अभाव स्वभाव बदल देता है।' सामान्य घर परिवार की नियति होता है अभाव। लेकिन इसी अभाव के बीच जिस बच्चे का विकास होता है वह उसके अन्दर दृढ़ इच्छा शक्ति के बीज बो देता है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं ललन चतुर्वेदी का संस्मरण 'मेरा बचपन खो गया है'। संस्मरण 'मेरा बचपन खो गया है'                                    ...

ललन चतुर्वेदी के काव्य-संग्रह 'आवाज़ घर' की चारुमित्रा द्वारा की गई समीक्षा

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'कविता की आवश्यकता क्या है' आचार्य राम चन्द्र शुक्ल ने इस पर विचार करते हुए लिखा है ' मनुष्य के लिए कविता इतनी प्रयोजनीय वस्तु है कि संसार की सभ्य-असभ्य सभी जातियों में, किसी न किसी रूप में, पाई जाती है। चाहे इतिहास न हो, विज्ञान न हो, दर्शन न हो, पर कविता का प्रचार अवश्य रहेगा। बात यह है कि मनुष्य अपने ही व्यापारों का ऐसा सघन और जटिल मंडल बाँधता चला आ रहा है जिसके भीतर बँधा-बँधा वह शेष सृष्टि के साथ अपने हृदय का संबंध भूला-सा रहता है। इस परिस्थिति में मनुष्य को अपनी मनुष्यता खोने का डर बराबर रहता है। इसी से अंत:प्रकृति में मनुष्यता को समय-समय पर जगाते रहने के लिए कविता मनुष्य जाति के साथ लगी चली आ रही है और चली चलेगी। जानवरों को इसकी ज़रूरत नहीं।' इस बात में कोई दो राय नहीं कि मनुष्यता के सामने खतरे आज कहीं अधिक हैं। आज का कवि इस बात से भलीभांति अवगत है और वह उन सभी शक्तियों के विरोध में खड़ा हैं जो मनुष्यता के विरोध में खड़े हैं। ललन चतुर्वेदी की कविताएं बिना किसी शोरोगुल के अपना मूल काम करती हैं। कवि की कविताओं को पढ़ते हुए चारुमित्रा लिखती है ललन चतुर्वेदी की कविताए...

ललन चतुर्वेदी का व्यंग्य आलेख 'प्रेम सत्याग्रह की विषयवस्तु है'

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ललन चतुर्वेदी  किसी भी पुरुष के लिए जीवन का सुखद क्षण होता है उसका प्रेम में पड़ जाना। लेकिन जो परंपरावादी हैं उनके लिए तो यह प्रेम सारी व्यवस्था को तहस नहस करने वाला होता है। इसलिए प्रेम पर पहरे बिठा दिए जाते हैं। लेकिन प्रेमी भी कम जिद्दी नहीं होते। वे हर रास्ते की काट निकाल लेते हैं और प्रेम की पींगे मारते रहते हैं। कवि ललन चतुर्वेदी अपने व्यंग्य आलेख में लिखते हैं : 'प्रेम कोई हँसी-मजाक या दिल्लगी का विषय नहीं है- यह दिल लगाने का पुनीत काम है। प्रेम और प्यार में थोड़ा-बहुत या यूँ कहें कि मार्जिनल अंतर हो सकता है लेकिन मेरी दृष्टि से दोनों एक ही हैं। कुछ लोग कहते हैं कि प्यार किया नहीं जाता हो जाता है। बहुधा ऐसा होता नहीं है। सब कुछ चरणबद्ध तरीके से होता है। मान लीजिए कोई बहुमंजिली इमारत हो और लिफ्ट की व्यवस्था नहीं हो तो सीढ़ियों से ही आप ऊपरी मंजिल तक पहुँच सकते हैं। प्रेम में स्टेप-बाय-स्टेप बढ़ना होता है।' आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं ललन चतुर्वेदी का व्यंग्य आलेख 'प्रेम सत्याग्रह की विषयवस्तु है'। व्यंग्य                 'प्रेम स...

ललन चतुर्वेदी का व्यंग्य 'सफल वह है जो चिरकालिक सफल पति है'

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ललन चतुर्वेदी  हमारे शास्त्रों में कहा गया है कि पति और पत्नी एक गाड़ी के दो पहिए होते हैं। इनसे परिवार रूपी गाड़ी चलती रहती है। लेकिन सच का यही पहलू नहीं है। यह भी बात सरेआम कही सुनी जाती है कि शादी के दिन तक लड़का हँसता मुस्कुराता है लेकिन शादी के बाद लड़के को ताउम्र रोना पड़ता है। जबकि शादी के दिन लड़की रोती है लेकिन इसके बाद ता उम्र हँसती है। खैर बातें जो भी हों, यह बात तो स्वीकार करना ही पड़ेगा कि पति को पत्नी की हां में हां मिलानी ही पड़ती है अन्यथा बिजली गिरते देर नहीं लगती। पति बाहर कहां जाता है, क्या करता है, किन लोगों से मिलता है, इस पर पत्नी का नियंत्रण होता है। पत्नी के कहे अनुसार चले सो ठीक अन्यथा बे ठीक होने में कितनी देर लगती है। ललन चतुर्वेदी अब बाकायदा सेवानिवृत्त हो कर घर आ गए हैं। उनके पास अनुभवों की पूंजी जमा होनी शुरू हो गई है। इन्हीं अनुभवों को ले कर उन्होंने एक व्यंग्य लिखा है। उनके व्यंग्य में अनुभव की चाशनी को सहज ही महसूस किया जा सकता है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं ललन चतुर्वेदी का व्यंग्य 'सफल वह है जो चिरकालिक सफल पति है'। व्यंग्य  'सफल वह ह...