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शैलेन्द्र चौहान का आलेख 'कविता में वैचारिक प्रतिबद्धता : कात्यायनी की कविताएं'

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  कात्यायनी हर जमाने के अपने कुछ मूल्य, कुछ आदर्श और कुछ प्रतिबद्धताएं होती हैं। बदलते समय के साथ इन तीनों के प्रतिमानों में गिरावट आई है। आज के समय में जब सब कुछ लाभ लोभ और स्वार्थ के तराजू पर तौला जाने लगा है तब लगता है कि प्रतिबद्धता अब बीते दिनों की बात होती जा रही है। साहित्य में भी अब प्रतिबद्धता कोई मूल्य नहीं रह गई है। ऐसे समय में भी कोई कवि अगर अपनी प्रतिबद्धताएं बचाए हुए हो तो सहज ही हमारी नजर उसकी तरफ जाती है। कात्यायनी ऐसी ही कवयित्री हैं जिनके लिए वैचारिक प्रतिबद्धता सर्वोपरि है। कात्यायनी के कविताओं की पड़ताल करते हुए शैलेन्द्र चौहान लिखते हैं ' यह प्रतिबद्धता किसी नारेबाज़ी या घोषित वैचारिक घोषणापत्र के रूप में नहीं आती, बल्कि जीवन की ठोस स्थितियों, संबंधों और संघर्षों के भीतर से उभरती है। उनकी कविताएँ सामाजिक अन्याय, पितृसत्ता, वर्ग-विभाजन, श्रम के शोषण और स्त्री की असुरक्षा जैसे प्रश्नों को अत्यंत सहज लेकिन तीखे ढंग से उठाती हैं। यहाँ ‘स्त्री’ कोई अमूर्त प्रतीक नहीं, बल्कि एक जीती-जागती, सोचती-समझती और प्रतिरोध करती हुई सत्ता है।' आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते है...