तुषार धवल की कविताएँ
तुषार धवल जिन्दगी के चलने का ढर्रा बेतरतीब होता है । अपनी बेतरतीबी में ही यह वह तरतीब रचती है जिसे कवि, चित्रकार और समाज विज्ञानी अपनी-अपनी तरह से उकेरने का प्रयास आजीवन करते रहते हैं । एक अर्थ में कलाकार जो ललित रचनाओं से जुड़े होते हैं समाज के सजग पहरेदार होते हैं । अपनी रचनाओं के द्वारा वे विसंगतियों का खुलेआम विरोध करते हुए वह प्रतिपक्ष रचते हैं जिस पर आम जनता को पूरा और पक्का भरोसा होता है । यह भरोसा ही किसी भी कृतिकार की कृति को कालजयी बनाता है । इसी भरोसे की रक्षा के लिए दुनिया के बर्बर आतंकवादी संगठन अल कायदा को निर्भीकता के साथ सीख देते हुए कवि तुषार धवल कहते हैं - ' अल-क़ायदा ?/ तू भी आ यार/ इन्सान हो ले ।' तुषार धवल को पढ़ते हुए यह स्पष्ट तौर पर लगा कि वे अपनी तरह के अलग बनक के कवि हैं । आज जब कविताओं के कवि के पहचान के संकट की बात की जाने लगी है ऐसे में तुषार धवल की कविताएँ पढ़ कर हम उस में उनका अक्स अलहदा तौर पर पहचान सकते हैं । हमने जब 'पहली बार' ब्लॉग के लिए उनसे कविताएँ भेजने का आग्रह किया तो अरसे तक संकोच में पड़े रहे । मेरे बार-बार...