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युद्ध के विरुद्ध कविता : 5, कुबेर दत्त की कविता 'नंबर दो के मसखरे'

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  कुबेर दत्त  तुलसी दास की एक चौपाई है "प्रभुता पाई काहि मद नाहीं"। प्रभुता शासकों को न जाने कितने पाखण्ड रचने के लिए विवश करती है। खुद को मासूम, निर्दोष, जनता के लिए हर पल प्रतिबद्ध, लोकतन्त्र का प्रहरी, जनता का सेवक जैसे विरुद उसे धारण करने पड़ते हैं। लेकिन असलियत है कि इन सारे पाखंडों के बावजूद सामने आ ही जाती है। उनका उद्देश्य उजागर हो जाता है कि वर्चस्व बनाए रखना ही उनका प्रमुख उद्देश्य है। ऐसे शासकों का मसखरापन एक न एक दिन सामने आ ही जाता है। आज के परिस्थितियों के आलोक में  कुबेर दत्त की कविता  'नंबर दो के मसखरे' की  लगातार याद आ रही है। कविता हमेशा मनुष्यता की बात करती है और युद्ध के विरोध में खड़ी रहती है। इन दिनों हम 'युद्ध के विरुद्ध कविता' शृंखला का प्रकाशन कर रहे हैं। इस कड़ी में आज पहली बार पर प्रस्तुत है  कुबेर दत्त की कविता  'नंबर दो के मसखरे'। युद्ध के विरुद्ध कविता : 5 'नंबर दो के मसखरे' (लू शुन की रचनाओं को पढ़ते हुए) कुबेर दत्त ‘वे, मासूमियत निःसंगता और पाखंड के स्वच्छंद प्रतिनिधि हैं’- वे असल में सत्ता का सेन्सर हैं और निःशंक...