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प्रणय कृष्ण का आलेख 'जीवन-विवेक की उदात्त रागिनी'

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शेखर जोशी  अक्सर यह होता है कि एक लेखक एक साथ कई विधाओं में लेखन करता है। कहानी, कविता, उपन्यास, आलोचना, संस्मरण आदि विधाओं में परस्पर आवाजाही होती रहती है। इसका कोई एक सुनिश्चित कारण तो नहीं है। हां, यह कहा जा सकता है कि अभिव्यक्ति की सहजता की अनुभूति  जिस विधा में भी होती है, लेखक अपना लेखन उसी विधा में करता है। शेखर जोशी हिन्दी साहित्य के चर्चित कथाकार हैं। लेकिन कहानी के अलावा उन्होंने कविताएं और संस्मरण भी लिखे हैं। जब उनका कहानी लिखना बन्द हो गया, तब उन्होंने कविताएं लिखी। शेखर जी की ये कविताएं परिपक्व कविताएं हैं। उनके कविता संग्रह 'न रोको उन्हें शुभा' का प्रकाशन तब हुआ जब वे अस्सी वर्ष की उम्र पूरी कर चुके थे। प्रख्यात आलोचक प्रणय कृष्ण ने शेखर जी के इस संग्रह के बहाने शेखर जी के काव्य मर्म की गहन पड़ताल की है। यह आलेख अनहद के जनवरी 2014 अंक से आभार लिया गया है। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं प्रणय कृष्ण का आलेख 'जीवन-विवेक की उदात्त रागिनी'। 'जीवन-विवेक की उदात्त रागिनी' प्रणय कृष्ण अस्सी साल की उम्र में यदि किसी कवि का पहला कविता-संग्रह आए, वह भी ऐ...

प्रणय कृष्ण का यह आलेख : ‘एक खुली किताब है राजेन्द्र कुमार का जीवन’

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इलाहाबाद की पहचान एक लम्बे अरसे से भारत की साहित्यिक राजधानी के रूप में रही है. इस पहचान को बनाने में यहाँ के उन साहित्यकारों की विशिष्ट भूमिका रही है जिन्होंने अपने जीवन में प्रतिबद्धता बनाए रखी. प्रोफ़ेसर राजेन्द्र कुमार उनमें से एक हैं. प्रोफ़ेसर राजेन्द्र कुमार के जीवन पर एक नजर डाली है प्रणय कृष्ण ने जो उनके विद्यार्थी होने के साथ-साथ उनके नजदीक भी रहे हैं. तो आइए आज पढ़ते हैं प्रणय कृष्ण का यह आलेख : ‘एक खुली किताब है राजेन्द्र कुमार का जीवन’।                 एक खुली किताब है राजेन्द्र कुमार का जीवन प्रणय कृष्ण प्रो. राजेन्द्र कुमार, राजेन्द्र जी और राजेन्द्र सर - ये तीनों ही उनके बहुप्रचलित संबोधन हैं, लेकिन इलाहाबाद शहर और उससे बाहर भी ज़्यादातर लोगों के लिए वे 'राजेन्द्र जी' ही हैं, चार दशक के उनके अध्यापकीय जीवन से अर्जित प्रोफ़ेसर और सर जैसी उपाधियों के बगैर।   उनका अलंकरण मुश्किल है. उनके बारे में अतिशयोक्ति संभव नहीं. ध्यान से देखें तो उन्होंने अपने जीवन और अपनी रचना में कुछ भी अतिरिक्त, कुछ भी surplu surplus...