भरत प्रसाद का उपन्यास अंश 'धूप है कि मोह की आँखमिचौली'
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| भरत प्रसाद |
प्रकृति का अपना एक अलग मौसम चक्र हुआ करता है। भारत इस मामले में एक समृद्ध देश है जहां अलग अलग मौसम एकरसता को तोड़ते हुए जीवन को थोड़ा सरस बना देते हैं। सावन का महीना सारे महीनों से न्यारा होता है। बारिश की फुहारें एक तरफ जहां गर्मी से निजात दिलाती हैं वहीं दूसरी तरफ गुनगुने ठण्ड के मौसम का बीज बो देती हैं। धरती चारों तरफ शस्य श्यामला नजर आने लगती है। खेतों में धान की रोपाई बनिहारिनों के सुमधुर लोकगीतों के साथ आरम्भ हो जाती है। भरत प्रसाद अपने उपन्यास 'कालकलौटी' के प्रारम्भ में कुदरत के इस खूबसूरत नज़ारे का शब्द चित्र बनाते हैं। आजकल हर महीने के दूसरे रविवार को हम भरत प्रसाद के उपन्यास 'कालकलौटी' का धारावाहिक रूप से प्रकाशन कर रहे हैं। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं भरत प्रसाद के उपन्यास 'कालकलौटी' का चौथा अंश।
उपन्यास अंश 4 : कालकलौटी
'धूप है कि मोह की आँखमिचौली'
भरत प्रसाद
धूप मीठी कि छाया? बारिश में भीगना मोहक कि नदी में कूद जाना? बादलों की उमड़-घुमड़ जादुई या उनकी दिशा भेदी गर्जना? टिप-टिप बारिश का संगीत मादक या वर्षा की हरहराहट? जब दो संगीत एक साथ छिड़े हों, जब दो रंग एक साथ खिल उठें, जब दो रहस्य एक साथ प्रत्यक्ष हों, जब दो आकर्षण एक साथ ललचाएँ तो किंकर्तव्यविमूढ़ होना जरा भी अचरज की बात नहीं। आषाढ़ का महीना चढ़ते ही बादल मामा की मेहमानगिरी शुरू हो रहती है। उठेंगे, चलेंगे, ताव-भाव दिखाएँगे – जरा धमकाएँगे भी। मगर असल तेवर सावन-भादों में खुल कर प्रकट होता है। भोर खिलने से पहले मन पर नींद का नशा फेर देने वाली पूरबिया बयार बहेगी – मरहम जैसी नरम, टटका रस जैसी मीठी, नये प्यार जैसी शर्मीली। दरख्तों की नयी-नवेली फुनगियों को नचा मारती यही बयार बरखा रानी को चुपके-चुपके बुलाती है, भोरहरी में धरती के सुदूर कोने झाँकता हुआ चकचक सूरज दम के दम में विलुप्त हो चलता है – बरखा रानी के आगे। फिर क्या? बयार थम जाती है, पेड़-पालो ठिठक जाते हैं, पक्षियों की आवाजाही बंद। आकाश में रत्ती भर नीलापन नहीं। स्याह, जलमान, गर्जनाकारी, रोमहर्षक बादलों का नभजयी साम्राज्य। एक साथ भूखी मिट्टी के हृदय पर अंकित होती अरबों निर्मल बूँदें – छिम, छिम.....। चौथाई सेकेण्ड बाद – छिम्-छिम्-छिम्.....। फिर तो बस – पट, पट, पट, पट......। उत्तर दिशा में पचास किलोमीटर तक? शायद। दक्षिण की ओर कितनी दूर? यही कोई पचास-साठ और पूरब-पश्चिम में? कैसे पता चलेगा, बरखा रानी कहाँ तक मायाजाल, नहीं-नहीं – पानी का जाल फैलाए हुए हैं। बयार फिर तेज उठी, बादल और नीचे उतरे – बारिश का अंधेरा और गाढ़ा हुआ। बादलों के गर्भ से शून्यभेदी गर्जना और सर्वव्यापी हुई, बस फिर रह जाती है – एक नाच-ऋतु की अनहद नाच – पेड़, खलिहान, बाग, सीवान, जानवर, पक्षी सबके सब ठकुआए हुए, लुटे हुए बरखा-रानी की नाच पीते हैं।
मिट्टी के पोर-पोर में रस, कण-कण में अमृत, नस-नस में बल कहाँ से भर उठता है? धरती कैसे करवट बदलने लगती है – नवसृजन के लिए? कहाँ छिपाए घूमती है, इतने सारे रंग, इतने अज्ञात स्वाद, इतनी मादक गंध, शब्द-पार के रहस्य? भोरम्-भोर की बरखा रानी मादक नींद के नशे में डुबो देती है, दोपहर की बारिश वासनाओं की आग लहकाती है और सांझ की झर-हर बारिश एकांत में वैराग्य की हूक उठा देती है। कभी कानों को तृप्त करती, आंखों की भूख मिटाती, रोम-रोम में सिहरन की लहर भरती, मन को मोर बनाती और कल्पना में बीती यादों के सौ-सौ पंख लगाती बरखा चित्त पर माया बन कर राज करती है। पत्तियों को छूती है तो वे भार सह कर झुक जाती है, हवाओं में घुलती है तो हवाएँ खिल उठती हैं। जड़ों में समाती हैं तो उनमें ऊंचाई की अमरता लबालब भर जाती है, दरख्तों की छाल धोती है तो मानो श्रमिक का पसीना साफ होता हो। चिरई-चुरंग पानी पीने से असंख्य गुना विभोर होते हैं, बारिश की आहट पा कर। हद्द गुना अपलक रहते हैं, कायनात में जमे श्यामल बादलों को निरख कर। पंखों के भीतर नन्हा शरीर नृत्य करता है – वर्षा की बूँद-बूँद की झंकार जी कर।
बरखा रानी उठी तो थी – उत्तर-पूरब के लगभग बीचोंबीच से, मगर यह क्या, छा उठी दसों-दिशाओं में। जानवर भीग रहे या मन मार कर नहा रहे? धनहर पौधे खेतों में ओझल हो रहे या कि नंगे बच्चों की तरह डुबकी मार रहे? उतराए तालाब की मछलियाँ किस खुशी के पागलपन में जलधारा के विपरीत मचल रहीं? कहीं तो दूर के अपनों की याद जगी है, किसी से मिलने की धधक मची है, किसी बिसरे गीत को, गुनगुनाने की अहक उठी है। कहीं यह प्रकृति के सृजन की भूमिका तो नहीं? कहीं यह सृष्टि के विकास की शर्त तो नहीं? कहीं बारिश हमारे मन ही मन हमारा मन बरसने का दृश्य तो नहीं? बरखा जीवित है – तो हमारी आकांक्षा में तासीर है, हिय में हुलास है, आंखों में नमी और चित्त में विरह की लहर है।
मन तो बावरा पक्षी, वर्षा की तान सुन-सुन कर गुनगुनाने को मचलने लगता है –
कइसे खेले जइबू सावन में कजरिया
बदरिया घेरि आइल ननदी।
तू तौ जात है अकेली, कौनो संग न सहेली
गुंडा रोकि लैहें तोहरी डगरिया
बदरिया घेरि आइल ननदी
भौजी बोलेलू तू बोली
सुनिके लगल करेजे गोली
काहें पड़ल बाड़ू हमरी नगरिया
बदरिया घेरि आइल ननदी।।
कच्ची माटी की अटपट राहें, राहों पर बिछी हुई अमृत धूल, धूल में छिपा हुआ बनने-मिटने का रहस्य, रहस्यों से बेखबर सीधी-सादी मूरतों की सांवली दुनिया और दुनिया के कण-कण में समाई हुई प्रकृति की महिमा। धूल को छू लो, तो जैसे स्पर्श कर लिया अपने दर सत्य का, आत्मसात कर लिया – तो पा गये अपने वजूद की जड़, ध्यान में जी लिए तो उससे ज्यादा गहराई किसी में नहीं – न जड़ों में, न समुद्र में, न कल्पना में। जो है – तो बदरंग, पर सारे रंगों का भाग्य है, जो है तो बेस्वाद, परंतु सारे अलौकिक स्वाद वहीं से जन्म लेते हैं। जिसमें तनिक भी जान नहीं, मगर अरबों काया में प्राण का जादू उसी से पैदा होता है, जिससे छोटा और कोई कण नहीं, मगर हर शिखर एक न एक दिन उसके चरणों में लोटता है – नंगी, खांटी, नाचीज धूल। पानी से मिल कर जड़ों में जान ला देती है – हवा का साथ पा कर अपराजेय ताकत बनती है, रौशनी का सह पा कर अपनी रौनक में लौट आती है। पूर्वांचल के कोने-कोने में, गांव-गिरांव, सीवान, ऊसर, बंजर, ताल-तलैया, बाग, पुरवा-पट्टी, सब जगह, सब ओर लंबी-छोटी, दुबली-चौड़ी, समतल, बेडौल, सीधी खतरनाक पगडंडियों का अनंत जाल बिछा हुआ है – आज से नहीं, पिछले कल से नहीं, न जाने कितने कल से।
जिला गोरखपुर से सरपट निकल कर सहजनवा, खलीलाबाद छूते हुए बस्ती पहुँचने वाली पक्की सड़क के उत्तर-दक्खिन दिशा में दम के दम पर गाँव जमे हुए हैं, जैसे जमीन के भीतर चट्टान जमी रहती है, टीला उठा रहता है, पहाड़ी खड़ी रहती है। गांव गायब कर दीजिए तो धरती नंगी हो जाएगी, बेरौनक, बेरंग, बेप्राण और बांझ। ये गांव धूल से बने हैं, धूल से ढँके हैं, धूल से पटे हैं। सदर राह से चार कदम बाजू हट कर बढ़िए न! इंच-दर-इंच, धूल-माटी-कीचड़, कनई से मोर्चा न लेना पड़े तो कहिए। चिलेबिद्धर, खुराफाती और आफती लवंडों के लिए यह धूल-माटी स्वर्ग से सौ गुना बढ़कर सुख लुटाती है। गड़ही में ये उतर चले तो मजाल क्या कि भैंस के पंड़वा की तरह लोटमपोट मचाए बिना निकलें। निकलते भी हैं – तो चार-चार एक साथ अदृश्य गांठ जोड़ कर। हँसते हैं बेमतलब – तो एक साथ, भागते हैं बेवजह – तो साथ, पेट निपटाते हैं तो साथ-साथ, पाद मचाते हैं तो बारी-बारी एक साथ। पूछिए! क्या नहीं है – इस भुरभुरी धूल में। बचपन का सारा रस? हाँ – है। शरीर को तृप्त करने वाली शीतलता? वह भी है। पहलवानी का नशा जगाने वाला जादू? वह तो कण-कण में है। इसी धूल में तो पूर्वांचल की उम्मीदें पलती हैं, दुबली अतिपतली पगडंडियों का जाल बिछा रहता है। जहाँ-जहाँ यह धूल है – वहाँ-वहाँ सरलता है। जहाँ सरलता है – वहाँ खांटी भावुकता। जहाँ खांटी भावुकता है, वहीं समझिए असली आदमी है – और जहाँ असली आदमी, वहीं धरती की सच्ची इज्जत है, अनुराग है, मोह है – समर्पण है। यह धूल एक मंत्र है, अपनी असलियत याद रखने का, एक दवा है – ऊंचाई का अहंकार मिटा देने की, एक आश्रय है – अपने हृदय को छिपा लेने का, एक कसौटी है – अपनी कीमत को सृष्टि के लिए मिटा देने की। इस धूल में ऐसे न जाने कितने रहस्य छिपे हैं – जिसे एक जीवन में जाना ही नहीं जा सकता।
वह क्या है, जो पत्ती-पत्ती के होंठ पर मौन मुस्कान बिखेर देता है, वह है कौन? जो अंधकार में मिट चले दरख्तों को उनका स्वरूप लौटाता है, उसे क्या कहेंगे, जो पक्षियों के पंखों में लाता है – उड़ने की अंगड़ाई, जो नदियों, तालाबों, झीलों की बूंद-बूंद में भर देता है – सोनापन। आकाश को देता है – असीम होने की गरिमा, धरती को देता नाचने का अर्थ और हर निर्जीव के भीतर सींचता है – जीवन देने की ऊर्जा। धूप गिरती है, तो धरती जैसे इंच भर उठ जाती है, लौट आती है अपनी आदिम आभा में, सज उठती है अपने अपरूप जादू में, खींच लेती है – मन, प्राण, चित्त अपने एक-एक रूप के प्रति। धूप का रंग पा कर पत्थर भी खिल जाते हैं, जीवों के लिए जैसे मुक्ति का द्वार खुल जाए। पूर्वांचल की धरती धूप के सौ-सौ रूप, रंग, तेवर, कृपा और प्रकोप के बीच पलती है। भोर के ऐन पहले सुबह की छाया रौशनी की आहट देती हुई। ठीक सुबह की बेला दसों दिशाओं के रत्ती-रत्ती अस्तित्व में शक्ति का जाल बुनती हुई। सुबह से ले कर दुपहरिया तक फसलों, दरख्तों, घासों, जंगलों के पोर-पोर में प्रसाद बांटती हुई और गनगनाती दुपहरिया से लेकर सन्ध्या के ठीक पहले अपने अमर आतंक का लोहा मनवाती हुई। भोर होते ही हम इसी धूप की राह ताकते हैं। दिन चढ़ने पर इसी धूप में मंजिलें छूते हैं। ऐन सिर पर नाचते ही – जान बचाते-छिपते हैं और शाम को विदाई की बेला इसी धूप को हसरत भरी आंखों से निहारते हैं।
हर शाम धूप सिमटने के बाद देर रात तक शून्य में गरमाहट जमी रहती है। जमीन जरा कुछ पल की शीतल नींद में अभी डूबी नहीं कि अगली भोर की आहट आने लगी। यह धूप क्या है – मोह की आंख-मिचौली है, अंग-अंग को बांधे हुए कोई पहेली है। रोज सुलाती, रोज जगाती जीवनपर्यंत का खेला है। इस खेल में रमा हुआ देश का नन्हा सा अस्तित्व है – पूर्वांचल, जहाँ धूप पांव पसार कर ऐसे जमी रहती है – मानो यहाँ नहीं तो सारे जहाँ में भला और कहाँ?
एक पल रुको, जरा पत्तियों की नोंक पर अटकी ओस की पारदर्शी बूंदों से रौशनी का गुपचुप मिलन देखो। पियो इनके मिलन की आभा को। धुली हुई रौशनी का स्पर्श पा कर ओस-कण मोती के फूल हो गए हैं, अब झरे कि तब झरे? बच्चों की कच्ची-अलौकिक आंखें रौशनी में नहा कर खिल जाती हैं, मानो उनके निर्दोष हृदय में आह्लाद का झरना फूट पड़ा हो। भोरहरी में ऊपर सरकता सूरज बच्चों के हृदय में कैसा अचरज भरता है, कह पाने की ताकत शब्दों में कहाँ? उजास है – तो जीवन में हुलास है, उजास है तो कल-परसों की आस है, जीने की प्यास है, फेफड़े में सांस है। कहिए उसे दिन तो आंखों का अमृत है। कहिए उसे धूप तो हरियाली की खुराक है। हवा हर कहीं पृथ्वी पर, लेकिन जगह किसी का नहीं घेरती, आवाज की पहुँच कहाँ नहीं? परंतु वह किसी का हक नहीं छीनती। वैसा ही स्वभाव रौशनी का – बिछ जाती है – सब तरफ, मगर सबके लिए स्थान खाली कर देती है – पल भर में।
पूर्वांचल का कछारी इलाका। ऊंच, खाल, समतल, विकट, नयनहारी, हृदयपोषक जमीन से अंटा हुआ। कहीं तो दलदल माटी की गोद में गुलजार घासों के जंगल, कहीं चोर कांटों से सजी हुई गंवई ताल की झाड़ियाँ और कहीं गाँव-पुरवा के निचाट सीवान में सोते-जागते बाग-बगीचे। धूप के असीम फैलाव में इन्हें देखिए, तो कह उठेंगे, आश्चर्य दर हकीकत का दूसरा नाम तो नहीं? पास आते ही धरती के दृश्य अपनत्व भर देते हैं और दूर जाते ही अज्ञान का रोमांच जगा देते हैं। प्रकृति के मौन की अपनी वाणी है। सुबह बोलती है, यदि सुनने वाली आत्मा हो। दोपहर नाचती है – यदि देखने वाली आंखें हों। शाम पाठ पढ़ाती है – यदि सीखने वाला हृदय हो। पूर्वांचल की धरती पाठशाला है, जो पाठ सिखाती है, सबक देती है, श्रम बांटती है, चमत्कार करती है और अपने आगोश में विपन्नता की खुशहाली को पनाह देती है।
सम्पर्क
मोबाइल : 9077616022






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