रबीन्द्रनाथ ठाकुर के मृत्यु-गीत


रबींद्र नाथ ठाकुर 


जीवन के प्रारम्भ से ही मृत्यु दार्शनिकों, कवियों के लिए चिन्तन का विषय रही है। जहाँ जीवन है वहाँ मृत्यु अवश्यंभावी है। हिन्दू संस्कारों में मृत्यु को भी अन्तिम संस्कार के रूप में शामिल किया गया है। यक्ष के एक सवाल के जवाब में युधिष्ठिर ने बताया था कि मृत्यु अवश्यंभावी है, तब भी मनुष्य जीवन जीने की कामना में लगातार लगा रहता है। यह सबसे बड़ा आश्चर्य है। जयश्री पुरवार लिखती हैं 'रबीन्द्र नाथ विश्व साहित्य के एक ऐसे साहित्यकार थे जिनकी लेखनी से मानव जीवन दर्शन का कोई विषय नहीं अछूता नहीं रहा। किशोर कवि को मृत्यु प्रिय लगती है। मरण से कौन नहीं डरता। पर कवि के लिए तो मरण अपने प्रिय के समान है। जितना प्रिय राधा को श्याम है उतना ही प्रिय कवि को मरण। मृत्यु पर कवि के विचारों का भाव हमें आकर्षित करता है। कवि कहते है, "यदि आप जीवन को सत्य के रूप में जानना चाहते हैं, तो आपको मृत्यु के माध्यम से इसकी पहचान ढूंढनी होगी। जो व्यक्ति मृत्यु से भय खाता है और जीवन में अटका रहता है, उसे जीवन नहीं मिलता क्योंकि उसके मन में परलोक के प्रति उचित सम्मान नहीं है। जो मनुष्य मृत्यु को पकड़ने के लिए आगे बढ़ता है वह स्वयं पाता है कि उसने जो पकड़ा है वह मृत्यु नहीं बल्कि जीवन है।” मृत्यु अवश्यंभावी है उसकी पुकार से कोई नहीं बच सकता है। जन्म सुखद सत्य है पर मृत्यु है कठोर सत्य। मृत्यु की पुकार पर जाना ही होगा सब कुछ छोड़ कर, आत्मसमर्पण करना ही होगा। रबि ठाकुर ने अपने किशोर वय में मृत्यु का अमृत के रूप में आह्वान किया है जब वह सिर्फ 16-17 वर्ष के थे।' आज कवि गुरु की पुण्य तिथि पर हम उनकी स्मृति को नमन करते हैं। इस अवसर पर आइए आज पहली बार पर  हम पढ़ते हैं रबीन्द्र नाथ ठाकुर के मृत्यु-गीत। मूल बांग्ला से हिन्दी अनुवाद किया है जयश्री पुरवार ने। बांग्ला साहित्य को हिन्दी में अनुवादित कर उपलब्ध कराने में जयश्री लगातार प्रतिबद्धता के साथ लगी हुई हैं।


रबीन्द्र नाथ ठाकुर के मृत्यु-गीत


ऐ मृत्यु, तू मेरे श्याम के समान है।

(किशोरावस्था में लिखित ‘भानुसिंहेर पदावली से’)


ऐ मरण, तू मेरे श्याम के समान है।

तेरा रंग मेघ के समान है, मेघ की भाँति केश 

लाल कमल की भाँति हैं तुम्हारे हाथ,

दोनों अधर भी रक्तिम हैं,

तुम्हारी करुण दृष्टि ताप विमोचक है 

मृत्यु रूपी अमृत का दान करती है।।


जब निर्दयी माधव ने 

हमेशा के लिए भुला दिया -

क्या तू मेरी वाम नहीं बनेगी!

आकुल राधा का हृदय जर्जर है, 

दोनों नयन निरंतर झरझर बह रहे हैं -

ऐसे में तू ही मेरा माधव है, 

तू ही मेरा मीत है,

तुम आ कर मेरा ताप मिटाओ।

मरण तू आओ रे आओ।


‘भानु कहे — अयी राधा, छी छी 

तुम्हारा चित्त तो चंचल है।

क्या जीवनबल्लभ से मृत्यु 

अधिक महत्वपूर्ण है, 

अब तुम ही विचार कर देखो।’


मरना नहीं चाहता हूँ  मैं इस सुंदर भुवन में,


मरना नहीं चाहता हूँ  मैं 

इस सुंदर भुवन में,

जीवित रहना चाहता हूँ 

मैं मानव के बीच।

इन सूर्यकिरणों बीच 

इस पुष्पित उपवन में 

यदि जगह मिल जाये 

जीवंत हृदय बीच।


इस धरा पर प्राणों की 

खेला चिरतरंगित, 

यह विरह मिलन 

कितने हंसी-अश्रु-मय,

मानव के सुख दुख में गूँथ कर संगीत

धन्य मैं अगर रच सकूँ अमर-आलय।


यदि यह न कर पाऊँ 

जब तक रहूँ जीवित 

तुम्हीं सब के बीच 

ऐसे ही बना रहूँ 

तुम लोग चाहोगे इसलिए 

सुबह और साँझ 

नव नव संगीत के पुष्प

खिलाता रहूँ 

हँस कर लेना फूल, उसके बाद हाय

फ़ेक देना उन फूलों को, यदि वे सूख जाएं।


मृत्यु जिस दिन, आएगी तुम्हारे द्वार


मृत्यु जिस दिन, दिन के अंत में 

आएगी तुम्हारे द्वारे 

उस दिन कौन सा ख़ज़ाना दोगे उसे!

भरा हुआ है अपना हृदय 

सामने उसके ले आऊंगा,

खाली हाथ तो विदा न करूँगा उसे —

मृत्यु जिस दिन आएगी मेरे द्वारे।


कितने शरत्-वसंत-रात,

कितनी साँझ, कितने ही प्रभात 

जीवनपात्र में कितना ही है।

कितने ही फलों और कितने ही फूलों से 

हृदय अपना भर लेता हूँ 

सुख-दुःख की, धूप-छाँव के स्पर्श से।

जो कुछ मेरा संचित धन 

इतने दिनों का सब आयोजन 

अंतिम दिन सजा दूँगा उसके लिए 

मृत्यु जिस दिन आएगी मेरे द्वारे।


प्रेम आया था


प्रेम आया था, 

चला गया वह तो द्वार खोल - 

फिर नहीं आयेगा कभी।

शेष है सिर्फ़ आना एक और अतिथि का 

उसी के साथ है शेष पहचान॥ 

वह आ कर दीपक बुझा देगा एक दिन, 

ले जाएगा मुझे रथ पर—

ले जायेगा मुझे किस गृह से गृहहीन 

ग्रह तारका के पथ पर॥ 


उतने समय तक मैं द्वार खोल कर,

अकेले बैठा रहूँगा,

अपना काम ख़त्म कर लूँगा। 

दिन आयेगा जब एक और 

अतिथि के आने का, 

उसे नहीं होगी कोई बाधा लेशमात्र ।


पूजा आयोजन सब ख़त्म होगा एक दिन,

तैयार रहना होगा —

चुपचाप दोनों बाहें बढ़ाये, 

उस गृहहीन अतिथि 

का मैं वरण कर लूँगा।


जो आज चला गया द्वार खोल कर,

वही कह गया बुला कर,

“पोंछो अश्रुजल, अभी एक और 

अतिथि का आना है शेष।"

वह कह गया,

गूँथने का काम कर लेना शेष एक दिन 

जीवन के काँटों को बिन कर,

नवीन गृह बीच ले कर आना, तुम गृहहीन,

पूर्ण पुष्पमालाओं का गुच्छा।


रबींद्र नाथ ठाकुर की 'पेंटिंग फ्रॉम एक्रॉस द डार्क'


दुःख है, मृत्यु है, विरह की अग्नि चुभती है


दुःख है, मृत्यु है, विरह की अग्नि चुभती है

फिर भी शांति है, आनंद है,

अनंत शक्ति जागती है।

प्राण में है शाश्वत धारा,

हंसते हैं चन्द्र सूर्य तारा,

विचित्र रागों के साथ आते हैं वसंत कुंज में।


तरंगें बिला जाती, फिर उठती है तरंगें,

फूल झर जाते, फिर खिलते हैं।

क्षय नहीं, अंत नहीं, नहीं है दीनता का लेश—

मन उसी पूर्णता के चरणों में स्थान माँगे।


मुझे छुट्टी मिल गई, भाई


मुझे छुट्टी मिल गई, भाई

मुझे विदा कर दो आज

मैं सबको प्रणाम करता हूँ 

मैं चला जाता हूँ आज।


लौटा देता हूँ मैं घर की चाबी 

अब घर पर नहीं रखता हूँ  कोई दावा,

मैं सबका प्रसाद वाणी चाहता हूँ आज।

अनेक दिनों से मैं पड़ोसी था,

जितना दिया उससे भी अधिक लिया था। 

आज प्रभात बीता रात हो आई, 

कोने की बत्तियाँ बुझ गई -

पुकार आई इसलिए मैं चलता हूँ आज।


तुमने अपनी सृष्टि का पथ

(शेषलेखा से, कवि की अंतिम रचना)


तुमने अपनी सृष्टि का पथ घेर कर रख लिया है 

विचित्र छल के जाल में, 

हे  छलनामयी।

तुमने कुशल हाथों से झूठे विश्वास का जाल बिछाया है। 

एक सरल जीवन में।... 

इस प्रवंचना से तुमने महानता को किया है चिह्नित,

उसके लिए तुमने नहीं रखी गोपन रात्रि।

तुम्हारे ज्योतिष्क उसे

जो मार्ग दिखाते हैं,

वह उसके अंतर का ही मार्ग है,

वह सदा स्वच्छ है।

सरल विश्वास से वह तो 

उसे बनाये रखता है चिर-उज्जवल।


बाहर से चाहे कुटिल हो, भीतर वह सीधा है,

इसी में उसका गौरव है।

लोग भले ही उसे कहते हैं विडंबित।

सत्य को प्राप्त करता है वह 

अपने ही प्रकाश से धुले अंतरस्थल में।


किसी भी तरह से उसे प्रवंचित नहीं किया जा सकता,

वह अंततः अपना पुरस्कार ले जाता है,

अपने ही भंडार में। 

अनायास ही जिसने छल-कपट  सह लिया है। 

वह तुम्हारे हाथों से

शांति का अक्षय अधिकार पाता है।


सामने है शांतिपाराबार 

(पूर्व लिखित यह गीत उनके निर्देशानुसार उनकी मृत्यु के बाद प्रकाशित किया गया था) 


सामने है शांति पारावार - 

तैरा दो तरणी हे कर्णधार।

तुम ही होगे चिरसाथी, 

ले लो हे गोद फैला कर 

जलेगी ज्योति ध्रुवतारा की

असीम के पथ पर।


हे मुक्तिदाता,

तुम्हारी क्षमा, तुम्हारी दया 

चिरपाथेय बनेगी, चिरयात्रा की।

हो मर्त्य का बंधन क्षय, 

ले विराट विश्व बाहें पसार कर 

मिले अंतर्मन को निर्भय 

परिचय महान अनजान की।



जयश्री पुरवार 


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जयश्री पुरवार

4 सी, A2, 311, 

सिल्वर सिटी  2

विप्रो चौराहा के पास,

ग्रेटर नोएडा -  201310


मोबाइल - 7905220370



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