अंजू शर्मा की कहानी 'पहला लुकमा'


अंजू शर्मा


हर माता पिता को अपनी संतान प्रिय होती है। पारम्परिक तौर पर पुत्र के प्रति मां पिता का यह लगाव कुछ अधिक ही होता है। क्योंकि मान्यता है कि लड़कियां शादी के बाद घर छोड़ कर अपने पति के घर चली जाएंगी। ऐसे में मां पिता को वृद्धावस्था में देखने सँभालने की जिम्मेदारी पुत्र ही निभाएगा। बदलते समय ने सारे प्रतिमानों को बदल दिया है। और लड़कियों ने वह सारी जिम्मेदारियां बखूबी निभाई हैं जो अभी तक सिर्फ पुत्र उठाया करते थे। अपनी कहानी पहला लुकमा में अंजू शर्मा एक परिवार की उस दर्द भरी कहानी को बयां करती है जिसमें एक मां अपने बेटे जुल्फिकार की मौत को स्वीकार नहीं कर पा और एक सियापा पूरे घर में पसरा रहता है। इसकी कीमत जुल्फिकार की बहन जेबा को चुकानी पड़ती है। मां की इस स्थिति से वह खुद भी मानसिक तौर पर परेशान है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं अंजू शर्मा की कहानी 'पहला लुकमा'।


'पहला लुकमा'


अंजू शर्मा


मैंने दस्तरख़ान लगाया तो हमेशा की तरह अम्मी को ज़ुल्फी भाई की प्लेट की तरफ़ ताकते पाया. पता नहीं वे प्लेट को देख रही थीं या ज़ुल्फी भाई को या फिर दोनों को।

हमेशा की तरह अम्मी ने बेख्याली में रोटी का पहला लुकमा तोड़ कर सालन में डुबोया और ज़ुल्फी भाई की ओर बढ़ा दिया। उनका बढ़ा हाथ बढ़ा ही रह गया हमेशा की तरह और लुकमा नीचे प्लेट में गिर गया, हमेशा ही की तरह।

छह साल हो गये मेरे ज़ुल्फी भाई को इस दुनिया-ए-फानी से गये। मेरे ज़ुल्फी भाई, ज़ुल्फ़िकार अली, आज रहे होते तो पूरे पच्चीस के हो गए होते। शायद दुनियादार हो गये होते और उनका भी कोई नन्हा ज़ुल्फी या कोई मुझ सी नन्हीं ज़ेबा भी यहाँ खेल रही होती और अम्मी लुकमा हाथ में लिए हुए उनके पीछे हलकान होती हुईं, अपनी कमर या घुटनों को कोसते हुए, कभी मुझे और कभी अपनी दुलहिन समरीन को पुकार रही होतीं। मेरी भाभी बन चुकी समरीन और मैं इस पूरी कवायद पर मुस्कुरा रहे होते लेकिन ये न हो सका।

मेरा ये ख्व़ाब, महज ख्व़ाब ही बन कर रह गया. अम्मी बेचारी तो इतनी बेखुद हुईं कि ख़्वाब और हक़ीकत के बीच फ़र्क करना भी उनके अख़्तियार में न रहा। ज़माना बदल गया लेकिन ज़ुल्फ़ी भाई का जाना उनकी याददाश्त के किसी सफ़े पर दर्ज न हो सका। उनके लिये जुल्फी भाई आज भी यहीं हैं।

आज भी हमारे दस्तरख़ान पर पहली प्लेट भाई के लिये ही लगती है। आज भी बावर्चीखाने में किसी वक़्त उनकी पसंद की कोई चीज न बनी हो तो अम्मी बेचैनी से पहलू बदलने लगती हैं। मैं फौरन से पेश्तर एक रकाबी में शहद उड़ेलने लगती हूँ। ज़ुल्फ़ी भाई को शहद बहुत पसंद था न! 

बाज़दफ़ा दस्तरख़ान पर उनकी पसंद का कुछ न होता या खाना मसालेदार होता जो कि उन्हें कतई पसंद न था, तो अम्मी शहद में डुबो कर पहला लुकमा उन्हें अपने हाथ से खिलातीं और वो बिला शिकायत बाकी खाना खा लेते। रही मेरी बात तो मैं पहला नहीं वो आखिरी लुकमा थी, जिसे खाना पसंदगी नहीं रवायत होता है और जिसे इंसान पेट भर जाने के बाद खाता है, या चाहे तो छोड़ कर उठ जाता है।

फिर एक दिन दस्तरख़ान पर बैठ कर पहला लुकमा अम्मी के हाथ से खा कर बिस्मिल्लाह करने वाले मेरे जुल्फी भाई नहीं रहे।

ये क्यों हुआ, कब हुआ का तब्सिरा यानी पूरी कहानी जानने के लिए हमें छह साल पीछे लौटना होगा। मेरे ज़ुल्फी भाई में अम्मी की रूह बसती थी। हम दो ही भाई बहन थे क्योंकि मेरी पैदाइश के कुछ अरसा बाद अब्बू का एक एक्सीडेंट में इंतकाल होने से किसी और ज़ुल्फिकार या ज़ेबा के हमारे छोटे से खानदान में जुड़ने की गुंजाइश ही बाकी न रही।

अब्बू खानदानी हकीम थे और बहुत नाम था उनका। कहने वाले कहते हैं कि उनके हाथ में बहुत शिफ़ा थी और ये करामात पीढ़ियों से हमारे खानदान को मिलती आ रही थी। अब्बू ने अपने अब्बू से ये इल्म सीखा और उनके अब्बू ने अपने अब्बू से। बाकी मेरे आलिम फ़ाज़िल अब्बू तो बाकायदा ट्रेनिंग भी ले कर लौटे थे लेकिन हमारे यहाँ कमाई से ज्यादा खिदमत को तरज़ीह दी जाती थी ऐसा मुझे लियाकत खालूजान ने बताया। तो बस रोजी रोटी अल्लाह के फ़ज़ल से अच्छी चल रही थी और हमारी माली हालत भी ठीकठाक थी।

अब्बू के जाने के बाद हमारी निचली मंजिल में चलने वाला खानदानी शिफ़ाखाना बन्द होने की नौबत आ जाती लेकिन ऐसे में मेरे लियाकत खालूजान आगे आए और अम्मी ने शिफ़ाखाना उन्हें सौंप दिया। लीजिये मैं ये तो बताना भूल ही गई कि समरीन के अब्बू, मेरे लियाकत खालूजान दूर के रिश्ते में मेरे चचा भी होते हैं. यानी शबनम खाला से हमारा दोतरफ़ा नाता था।

अब्बू चले गए पर अम्मी फिर वैसी न रहीं। मुझे बचपन में अम्मी का दूध तो मिला पर इसके बाद वे बदल गईं। उनकी मुहब्बत की बारिश के असली हकदार महज ज़ुल्फी भाई ही रहे। पता नहीं क्या वजह रही कि अम्मी की मुहब्बत का सोता मुझे तक पहुँचने में अक्सर सूख जाता रहा। इसकी माकूल वजह मैं कभी नहीं जान पाई। शायद इसलिए कि अब्बू के इंतकाल ने उन्हें तोड़ कर रख दिया था या फिर इसलिए कि मैं उन पर आयद एक जिम्मेदारी की मानिंद थी और ज़ुल्फी भाई में वे अपना मुस्तकबिल देख पा रही थीं।



अम्मी सौ जान से ज़ुल्फी भाई पर निसार रहतीं।. कभी मौसम की बदनीयती से उनकी तबियत एक पहर भर को नासाज होती तो अम्मी दीवानी हो उठतीं। कभी मौलवी साहब से फूंका हुआ पानी ले कर आतीं तो कभी कुरआन की आयतें पढ़ते हुए पीर बाबा की मजार से ताबीज पढ़वा कर भाई के बाजू में बांध रही होतीं। ऐसे में उन्हें डॉक्टर, हकीम पर कम ही यकीन रहता। वे तो सीधे अल्लाह के पास अपनी दुआ पहुँचाने की फ़िराक में लग जातीं। डॉक्टर और खालूजान को उन्होंने मेरी नासाज़ हुई तबियत के लिए छोड़ दिया था। पर मुझे उनकी कभी जरूरत ही नहीं पड़ी चूंकि तबियत मेरी माशाअल्लाह इतनी सख़्त थी कि कभी नासाज़ी की गली से गुजरना तक पसंद नहीं करती थी। 

खैर… उनकी इस नजरंदाज़ी या तहक़ीर की वजह जो भी रही हो पर आखिर को वे मेरी अम्मीजान थीं और मेरी उनके लिए मुहब्बत और इज्जत अफज़ाई में कोई लेकिन-वेकिन शामिल नहीं हो सकता था। मैं बिला शक़ उनसे और अपने ज़ुल्फी भाई से बेइंतहा मुहब्बत में मुब्तिला थी। इस हद तक कि उम्र के सोलहवें साल की आहट भी न महसूस कर सकी। वही सोलहवां साल जो किसी हसीना पर आता है तो देह और मन दोनों का मौसम बदल जाता है।

याद आता है मुझे कि वे कुछ दिन कितने खूबसूरत थे। यकबयक मैं अम्मी की तवज्जो के काबिल जो हो गई थी। ज़ुल्फ़ी भाई के अलावा भी कोई उनकी नज़रों का बायस हो सकता है, ये ख़्याल अपने आप में खासा मजेदार था। फिर यूँ होने लगा कि शाम का किरमिजी रंग जब आसमान में उतर कर स्याही की ओर बढ़ना चाहता, अम्मी की नजरें मुझे ढूंढने लगतीं।

मुझे नजरों के सामने देख कर सुकून की सांस भरतीं और ठीक उसी समय उनकी नज़र मेरे उभरते सीने और बदन के कटावों पर पड़ती और मेरा बेदाग़ हुस्न और चढ़ती जवानी उनके जरा देर के सुकून के लिए दियासलाई साबित हो जाते। जो खूबसूरती दूसरों की आँखों में तारीफ़ बन कर चमक जगाती, अम्मी की बेनूर आँखों में वह एक नामालूम डर में बदल जाती।

उनकी सुकून की सांस अब गहरी उन्सांस में बदल जाती। वे पहलू बदलते हुए कुछ भी औल फौल बड़बड़ाना शुरू कर देतीं और मैं अपने दुपट्टे से करीने से सीने को ढकते हुए दौड़ कर किसी काम को सर कर लेती। कुछ न होता तो कभी धुली हुई रकाबियों को फिर से धोने लगती तो कभी साफ़ शफ्फाक चादरों को पानी में खंगालने लगती और इस तरह उनकी नजरों से दूर हो कर मैं उस सुकून को वापिस लपकने की कोशिश करती जो अम्मी की रूह से फ़ना हो चुका था।

“अल्लाह गरीबों की लड़कियों को यूँ जल्दी जवान क्यों कर देता है?” ये सवाल मेरा नहीं मेरी खालाज़ाद कजन समरीन का था और ये उसने तब कहा जब अक्सर ये होने लगा कि हमारे रास्ते में खड़े नामालूम शोहदे हमें ललचाई नज़रों से घूरते और बाज़दफ़ा लगता वे अपनी आँखों से ही निगल जाने का मंसूबा रखते हैं। हम दोनों खुद को समेटते हुए नज़रें झुका कर निकल तो जातीं लेकिन मुझे यूँ महसूस होता मानो मेरी पीठ उनकी शोलों सी आँखों से सुलग गई हो।

फिर एक दिन उनमें से एक ने अपनी हद तोड़ दी और मैंने अपनी। उसने एक शाम सूनी गली में मेरे दुपट्टे को खींचा और अगले ही पल उसका गाल मेरे जोरदार तमाचे से लाल हो गया। मुझे लगा अब वो तो क्या उनमें से कोई भी ऐसी हिमाकत नहीं करेगा। ऐसी हर बात ज़ुल्फ़ी भाई से छुपा ले जाने का हुनर हम में कूट कूट भरा था। हमने ये बात भी घोल कर पी ली जैसे कुछ हुआ ही न हो। बात आई गई हो गई।

समरीन मुझसे एक करीबन साल बड़ी थी लेकिन ये एक साल हमारे बीच किसी तरह का कोई तकल्लुफ पैदा न कर सका और जवानी की सीढ़ियाँ चढ़ते हुए हम एक दूसरे की हमनिवाला और राजदार बन गईं। मैं ये तो जानती थी कि ज़ुल्फी भाई समरीन को मसें भीगने के शुरुआती दिनों से पसंद करते थे। लेकिन उन्हीं दिनों मुझ पर ये खूबसूरत राज फाश हुआ कि समरीन और ज़ुल्फ़ी भाई पसंदगी की सीढ़ी कब की पार कर चुके। दोनों दीवानों की तरह एक दूसरे के इश्क़ में गले तक डूबे हैं।

वो एक दूसरे के लिये ऐसे तड़पते जैसे जोड़े से बिछड़ा अबाबील पंछी चक्कर काटता है। बर्फीली हवाओं से ठिठुरती सर्दी की रातों में इश्क़ में उन्हें पसीना पसीना होते देखना मेरे दिल में अजीब सी हलचल पैदा कर देता। तब जा कर मुझे एहसास होता कि मैं भी जवानी की उसी दहलीज पर खड़ी हूँ जिस पर समरीन खड़ी है. पर उसके पास मेरे ज़ुल्फ़ी भाई जैसा दीवानावार चाहने वाला आशिक़ था और मैं ठहरी अम्मी की फरमाबरदार बच्ची जिसे इश्क़ के नाम से भी कंपकंपी होने लगती थी। लिहाजा बहार के मौसम में भी मेरे दिल की गली में दाख़िल होने का मौका किसी को नहीं मिल पाया।

ज़ुल्फ़ी भाई और समरीन के बीच इश्क़ परवान चढ़ने के उन दिनों में उन दोनों के बीच खुशबू से लबरेज़ गुलाबी ख़तों की आवाजाही की चश्मदीद बनी हुई, मैं बारहा भूल ही जाती कि ये सोलहवाँ साल मुझ पर भी उतरा है। वही सोलहवाँ साल जो किसी लड़की की आँखों में चमक, बातों में मिठास और चाल में लचक भर देता है। पर अभी जवानी की पहली अंगड़ाई लेने को मेरे बाजू उठे भी नहीं थे कि यही सोलहवाँ साल मेरे लिये सबसे मनहूस साल साबित हो गया।

ये उतरती सर्दियों र्की एक सुस्त सी शाम थी जब मैं समरीन के साथ अपने कॉलेज से घर लौट रही थी। देखने में सब दुरुस्त ही लग रहा था लेकिन ये दुरुस्तगी इस शहर के लिए एक वहम साबित हुई जब एकाएक शहर में भयंकर तूफ़ान आ गया। आँधी और तूफान का ये आलम था कि हाथ को हाथ सुझाई दे तो बड़ी गनीमत।

“ऐ लड़कियों, भागो यहाँ से… कहाँ घूम रही हो, देखती नहीं जलजला आमद है… अपने घर जाओ…।” बाज़ार में अपनी चूड़ियों की दुकान बढ़ाते रहमत चचा की आवाज़ सुन कर हमारे पैरों में जैसे बिजली की सी तेज़ी भर गई। हम तेजी से दौड़ने लगे. खाला का घर हमसे एक गली पहले था। समरीन मुझे भी अंदर खींचना चाहती थी, शबनम खाला ने पुकार भी दी पर मुझे लगा मैं घर नहीं पहुँची तो अम्मी और भाई परेशान हो जाएंगे।

वैसे भी सामने सब खाली पड़ा था. इतने भारी आँधी तूफ़ान में किसकी शामत आयी थी कि घर से बाहर कदम रखता। मुझे लगा बस चंद कदमों में मैं घर पहुँच ही जाऊँगी। समरीन को उसके घर छोड़ कर मैं तेज़ी से अपनी गली में पहुँची और बस मेरी किस्मत ने यहाँ आ कर दम तोड़ दिया। गोया सबसे तेज़ दौड़ने की मेरी सारी कोशिश मेरी बर्बाद किस्मत के आगे महज कुछ पल पीछे रह गई।

इधर मैंने गली में पैर रखा और उधर सामने जाने कहाँ से दो मुश्टण्डे आन पहुँचे। इससे पहले कि मैं दौड़ते हुए अपने घर पहुँचती वे मुझे देख चुके थे। वे मेरी ओर ऐसे लपके जैसे किसी मासूम परिंदे की ओर बाज़ लपकता है। उनमें से एक ने मुझे कंधे पर उठाया और वे तेज़ी से मेरे घर से उलटी दिशा में भागने लगे। ये न मेरे इल्म में था और न उनके कि उन्हें ऐसा करते हुए मुझे तूफ़ान में ढूंढने निकले मेरे ज़ुल्फी भाई ने देख लिया था. मैं चीखी चिल्लाई पर उस तूफ़ान भरी शाम में मेरी चीखें ऐसे जाया हो गईं जैसे बड़ी लहरें पछाड़ खा कर साहिल पर दम तोड़ देती हैं।

वे जालिम मुझे उठाये हुए कुछ दूर पर वीरान पड़े एक मकान में जा पहुँचे और उनके पीछे मेरे ज़ुल्फी भाई भी वहाँ पहुँचे। ज़ुल्फी भाई ने उस एक को परे धकेला जो मुझ पर झुका मेरे कपड़े फाड़ने पर आमादा था।

“ज़ेबा… भागो यहाँ से… सीधे घर की तरफ भागो…।” मेरा दुपट्टा जिस दूसरे के हाथ में लहरा रहा था, उसे धक्का देते हुए अपने हाथों से खुले सीने को ढकते हुए, मैं वहाँ से भाग निकली और मेरे घर में ऊपर जाती सीढ़ियों पर जा कर ढेर हो गई। इसके बाद मुझे कुछ याद नहीं क्या हुआ। जानती हूँ तो महज इतना कि छज्जे पर खड़े हो कर ज़ुल्फ़ी भाई की राह देखती अम्मी के होश पत्थर हो गए पर ज़ुल्फ़ी भाई फिर कभी नहीं लौटे। तूफ़ान में गायब लोगों की फेहरिस्त में दर्ज एक नाम में बदल चुके थे ज़ुल्फ़ी भाई।

इस हादसे का असर ये हुआ कि अम्मी दीन दुनिया से ग़ाफ़िल हो चुकी थीं। पहले वे ज़ुल्फ़ी भाई के प्यार में जिंदा थीं, अब उनके इंतज़ार में एक जिंदा लाश में बदल गई थीं। मेरे साथ क्या हुआ क्या नहीं, ये कैसे जानतीं वे। उनकी याददाश्त में तो ज़ुल्फ़ी भाई का जाना तक दर्ज न हो सका। उनकी पथराई आँखों से आँसू का एक कतरा भी नहीं टपका और उनके गले लगकर जी भर रो लेने ख़्वाहिश दिल में पाले हुए मैं अपनी जवानी में दाखिल होने से पहले ही उजाड़ कब्रिस्तान हो गई।



साल भर खालू के इलाज से अम्मी कुछ ठीक हो गईं। ख़ुदा का बड़ा करम था उन पर कि वे बीते वक्फे के बारे में सब भूल चुकी थीं। याद रखतीं तो जीना जहन्नुम हो जाता। लेकिन जेहन के किसी हिस्से में पोशीदा इंतज़ार को वे भूल नहीं पायीं। खुली आँखों से सोने, जागने वाली अम्मी बस अक्सर छज्जे पर खड़ी गली के मुहाने को टकटकी लगाकर देखा करतीं। वे थक गई होंगी सोच कर मैं बेंत की एक पुरानी कुर्सी वहाँ रख कर उन्हें बैठा देती तो बैठ जातीं।  

सूरज डूबने पर उनका ये इंतज़ार घर में लौट आता और कोने कोने को अपने आगोश में ले लेता। तब मुझे लगता इस बेरंग और ख़ामोशी भरे पुराने घर की हर शय गोया एक इंतज़ार में बदल चुकी है। कभी न खत्म होने वाला तवील इंतज़ार। अम्मी के सारे अल्फ़ाज़ फ़ाख्ता बनकर जाने कहाँ कौन से मुल्क के अनजान सफ़र पर निकल गए। उनके जेहन की किताब से ज़ेबा नाम का सफ़ा हमेशा के लिये मिट गया।

और मैं, जो उस दहशत भरी शाम के मनहूस साये से ज़िंदा और महफूज़ लौट आयी थी, मेरी तमाम ज़िन्दगी एक अफ़सोस के हवाले हो गई कि मेरे ज़ुल्फ़ी भाई ने मेरी अस्मत की कीमत अपनी जान से चुकाई। यूँ मेरा बाख़ैरियत लौट आना लोगों को हजम नहीं हुआ। मेरी पाकीज़गी के लिये भी लोग तरह तरह के किस्से कहानियाँ गढ़ा करते लेकिन अपनी पारसाई का यकीन दिलाने का मेरे पास न तो वक़्त था और न ही कोई ख़्वाहिश।

न ज़ुल्फ़ी भाई लौटे और न पत्थर के दिखाई न पड़ने वाले किसी शिकंजे में कैद अम्मी के होश और मैं खुद भी सरापा एक तवील इंतज़ार में बदल चुकी अपने दिन पूरे करने लगी।

वक़्त का एक और कहर मुझ पर उस दिन टूटा जब मेरी खालाजाद बहन और मेरे ज़ुल्फ़ी भाई की महबूबा समरीन किसी और के घर की ज़ीनत बन गईं। उस दिन मेरी उम्मीद का आखिरी सिरा भी छूट गया। समरीन चली गई और जाते जाते हर भरम से मुझे आज़ाद कर गई। मैंने तस्लीम कर लिया कि ज़ुल्फ़ी भाई अब कहीं नहीं हैं. ज़ुल्फ़ी भाई कहीं रहे होते तो क्या किसी और की डोली में बैठने देते अपनी समरीन को?

छह साल गुज़र चुके थे ज़ुल्फ़ी भाई को गए. खालूजान हमारी जरूरतों के हिसाब से एक माकूल रकम हर महीने मुझे थमा जाते और कुछ मेरा कशीदाकारी का हुनर काम आया। लिहाजा हम माँ बेटी की रोजी रोटी कभी सवाल बन कर सामने खड़ी नहीं हुई। वैसे भी हमारी जरूरतें ही कितनी थीं। दो वक़्त हाथ मुँह को चला जाए इससे ज्यादा क्या चाहिये था हमें। कुल मिला कर ज़िन्दगी कट रही थी लेकिन ज़िन्दगी को जीना हम कब का भूल चुके थे।

साल बीतते गए, मैं बड़ी होती गई, उम्र की सीढ़ियाँ चढ़ती रही, पर मेरा दिल और ये पुराना घर वहीं ठहरा रहा, वही दस्तरखान, वही ज़ुल्फी भाई की खाली प्लेट, और वही अम्मी की बेखुद निगाहें। हर दिन वही रस्म, वही इंतज़ार, और वही अधूरा ख्वाब। मैंने अपनी जवानी को कशीदाकारी के धागों में उकेरना सीख लिया, और अम्मी ने अपने जेहन से मेरे वजूद को मिटाना।

लेकिन ख़ुदा जाने, मेरा मुक़द्दर किस मनहूसियत की सियाही से लिखा गया था कि एक मरहला अभी भी बाकी था। एक दिन, शहर एक अजीब सी आग में सुलग उठा. दंगे भड़क उठे थे। दंगों की आग ने गलियों को निगलना शुरू किया. शोर, चीखें, और धुंए की गंध हवा में तैर रही थी. मैंने दुमंजिले की सीढ़ी से कपड़े समेट कर खूब अच्छी तरह जीने के दरवाज़े में जंजीर से लिपटा ताला लगा कर तसल्ली की और नीचे उतरने लगी। अभी मैं जीने से उतर ही रही थी कि मेरी निगाह छज्जे पर खड़े हो कर गली के मुहाने को टकटकी लगा कर देखती अम्मी पर पड़ी।

“या अल्लाह! ये अम्मी कब दरवाज़ा खोल कर छज्जे पर आ गईं। ख़ुदा न ख़्वास्ता कोई पत्थर, गोली कुछ भी लग सकता है।” 

“अम्मीssss” उन्हें आवाज़ देते हुए मैं सीढ़ियों से इतनी तेज़ी से उतरने लगी कि एकाएक मेरा तवाज़ुन बिगड़ा और मैं लुढ़कते हुए सीढ़ियों से नीचे आ गिरी। गिरते हुए मेरे सिर में शायद शदीद चोट लगी और सिर फटते ही खून की धार बह निकली। मैंने बमुश्किल आँखें खोलनी चाहीं तो अधखुली आँखों से क्या देखती हूँ कि मेरा सिर अम्मी की गोद में है। उनका आँचल मेरे खून से तरबतर हो चुका था।

बेहोशी मुझ पर बेतरह छाती जा रही थी और मेरी आँखें मुंदती जा रही थीं। दर्द की लहरें मेरे जिस्म को निगल लेना चाहती थीं। मैंने अम्मी को पुकारना चाहा, पर मेरी आवाज़ मेरे गले में ही दम तोड़ रही थी। दुनिया धुंधली हो रही थी, और कहीं दूर से एक स्याह धुंध मेरी ओर रफ़्ता-रफ़्ता बढ़ते हुए मुझे अपनी गिरफ्त में ले रही थी। मौत कितनी भी दर्दनाक क्यों न हो, ज़िन्दगी से ज्यादा आरामदेह हो तो उसे तस्लीम करना मुश्किल नहीं होता।

शायद इसलिये जब मौत मेरी ओर रफ़्ता रफ़्ता कदम बढ़ा रही थी, जब ज़िन्दगी दामन छुड़ाने पर आमादा थी। तो मैं ज़िन्दगी का दामन छोड़ कर किसी जादू की तरह मौत की ओर खिंचती जा रही थी कि तभी मेरे कानों ने एक पुकार सुनी…।

“ज़ेबा…” इस महीन सी पुकार पर मैंने फिर से आँखें खोलनी चाहीं।

“ज़ेबा… मेरी बच्ची…।” ये अम्मी थीं जो मुझे पुकार रही थीं। हाँ ये मेरी अपनी अम्मी थीं।

मेरी धुंधली आँखों के सामने अम्मी का ग़मगीन अश्क़बार चेहरा था। जाने क्यों मुझे लगा वे आज फिर से दस्तरख़ान पर बैठी हैं और मुझे पुकार रही हैं। उनके हाथों में वही शहद में डूबा पहला लुकमा है जो आज सिर्फ़ मेरे लिये है।

ये पुकार मैंने सदियों बाद सुनी। ये पुकार जिसे सुनने को मेरी रूह तरस गई थी। मेरे जिस्मोजां  का जर्रा जर्रा इस पुकार को सुनने को बेताब था। इस पुकार को मैं कैसे अनसुना कर सकती थी? मेरे रोम-रोम ने उस पुकार को सुना। मैंने मौत से अपना दामन छुड़ाया और अम्मी से लिपट गई।

मेरी बन्द आँखों ने फिर एक मंजर देखा, अम्मी के हाथ का वो शहद डूबा पहला लुकमा आज थाली में गिर कर जाया नहीं हुआ, वह आज अपने हासिल को पहुँच गया था।


(वनमाली कथा, सितंबर 2025 अंक से साभार।)


(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग्स कवि विजेन्द्र जी की है।)

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