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गीताश्री की कहानी 'ट्रायल'

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गीताश्री हमारा समाज आधुनिक होने का चाहें जितना दावा कर ले, बहुत मामलों में वह आज भी पारम्परिक और पितृसत्तात्मक है। हमारे समाज में आज भी लड़कियों की शादी का दायित्व उस घर का पुरुष ही उठाता है। लड़की से उम्मीद की जाती है कि बिना ना नुकुर किए वह अपने घर के पुरुष सदस्यों के निर्णय को स्वीकार करे। अगर उसने ना कहा तो तुरन्त ही उस पर मनबढ़ होने का आरोप चस्पा कर दिया जाता है। लड़की कैसे रहे, क्या पहने, कैसा काम करे सब तय करने का अधिकार पुरुषों ने जबरन अपने हाथों में ले रखा है। शादी के बाद नव ब्याहता से अपेक्षा की जाती है कि वह घर परिवार की मर्यादा का ध्यान रखे और उसी के अनुसार काम करे। सिर झुका कर पति के साथ साथ सास ससुर, जेठ और देवर का आदेश माने और उनका हुकुम जगाएं। इस तरह शादी करने के बाद लड़की प्रायः अपना अस्तित्व ही खो बैठती है। लेकिन समय बड़ी तेजी से बदल रहा है। लड़कियों की सोच बदल रही है। वे आर्थिक मामलों में ही आत्मनिर्भरता नहीं चाहतीं बल्कि खुद अपने जीवन का निर्णय करना चाहती हैं। माहिया ऐसी ही लड़की है जो पारम्परिक ढाँचे में बंधने की बजाए शादी अपने मन के अनुकूल उस लड़के से करने की हिमा...