पंकज मोहन का आलेख 'धनकुबेर धनपत राय, हाजिर हो'
प्रेमचंद स्वाधीनता आन्दोलन केवल राजनीति के मोर्चे पर ही नहीं लड़ा गया। यह लड़ाई लेखन के जरिए भी लड़ी गई। प्रेमचंद ने लेखन के जरिए अपना काम किया। वे गांधी जी से प्रभावित थे। अपने आलेख में पंकज मोहन प्रेमचंद के उस कथन का जिक्र करते हैं जो राष्ट्रवाद की अवधारणा के बारे में है। अपने एक लेख में प्रेमचंद ने लिखा था कि “हम जिस राष्ट्रीयता का स्वप्न देख रहे हैं उसमें तो जन्मगत वर्णों की गंध तक न होगी, वह हमारे श्रमिकों और किसानों का साम्राज्य होगा, जिसमें न कोई ब्राह्मण होगा, न हरिजन, न कायस्थ, न क्षत्रिय. उसमें सभी भारतवासी होंगे, सभी ब्राह्मण होंगें या सभी हरिजन होंगे।” आगे उन्होने यह भी जोड़ दिया कि “हमारा स्वराज्य केवल विदेशी जुए से अपने को मुक्त करना नहीं है, बल्कि उस सामाजिक जुए से भी, उस पाखंडी जुए से भी, जो विदेशी शासन से कहीं अधिक घातक है।" प्रेमचंद ने अपने लेखन के जरिए वह प्रतिमान स्थापित किया जो अन्य लेखकों के लिए ईर्ष्या का विषय हो सकता है। आज प्रेमचंद जयंती पर उनकी स्मृति को हम नमन करते हैं। आइए इस अवसर पर हम पढ़ते हैं पंकज मोहन का आलेख 'धनकुबेर धनपत राय, हाजिर हो'। ...