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शैलेन्द्र चौहान का आलेख 'मेरी हवाओं में रहेगी, ख़यालों की बिजली'

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भगत सिंह  भारतीय इतिहास में भगत सिंह एक धूमकेतु की तरह आते हैं। अचानक अपनी चमक बिखेरते हैं और फिर रुखसत हो जाते हैं। भगत सिंह की क्रांतिकारी विचारधारा हालांकि क्षणिक दिखाई पड़ती है लेकिन उसने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की दिशा को मोड़ने का महत्त्वपूर्ण काम किया। भारत का हर युवा भगत सिंह की क्रांतिकारी चेतना से प्रभावित हुआ और शीघ्र ही वह वातावरण बनने लगा जिसमें अंग्रेजों के लिए यहाँ लम्बे समय तक टिक पाना दुष्कर हो गया। भगत सिंह प्रबुद्ध थे। वे ऐसे भारत की कल्पना करते थे जिसमें सामाजिक समरसता जैसी वास्तविक स्वतंत्रता हो।  शैलेन्द्र चौहान अपने आलेख में लिखते हैं 'भगत सिंह की राजनीतिक चेतना का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष था—शोषण और असमानता से मुक्त समाज की कल्पना। वे राजनीतिक स्वतंत्रता को अंतिम लक्ष्य नहीं मानते थे। उनके लिए स्वतंत्रता का अर्थ ऐसा समाज भी था जिसमें मनुष्य द्वारा मनुष्य का शोषण समाप्त हो। इसीलिए उनकी दृष्टि में राष्ट्रवाद केवल राष्ट्र की सीमाओं तक सीमित विचार नहीं था। उसमें सामाजिक न्याय और आर्थिक बराबरी का प्रश्न भी शामिल था।' आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं शैलेन्द्र चौ...

प्रभा मुजुमदार के कविता संग्रह की कौशल किशोर द्वारा की गई समीक्षा 'तटस्थता के विरुद्ध पक्षधरता'

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मनुष्य का एक सहज जुड़ाव अपनी मिट्टी के साथ होता है। परिस्थितियोंवश उसे निर्वासित होना पड़ता है। लेकिन जब निर्वासन किसी पर थोप दिया जाए तो यह त्रासद होता है। इस त्रासदी को हमारे समाज में प्रायः स्त्रियों के साथ जोड़ दिया जाता है। प्रभा मुजुमदार इस निर्वासन को दृढ़ता के साथ नकारती हैं। अपनी स्थिति को स्पष्ट करते हुए इस संग्रह की भूमिका में वे लिखती हैं ‘एक सजग रचनाकार राजसत्ता, धर्मसत्ता, बाजार की सत्ता या और किसी भी सत्ता की निरंकुशता के विरोध में विद्रोह और प्रतिरोध की आवाज को अभिव्यक्ति देता है। वह अनिवार्य रूप से मनुष्यता का पक्षधर होता है।’ यह एक कवि का होना है जो हमेशा मनुष्यता के पक्ष में और निरंकुशता के विरोध में खड़ा रहता है। हाल ही में प्रभा मुजुमदार का पांचवा कविता संग्रह ‘नकारती हूँ निर्वासन’ प्रकाशित हुआ है। इस संग्रह की समीक्षा लिखी है कौशल किशोर ने। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं प्रभा मुजुमदार के कविता संग्रह की कौशल किशोर द्वारा की गई समीक्षा 'तटस्थता के विरुद्ध पक्षधरता'। पुस्तक समीक्षा 'तटस्थता के विरुद्ध पक्षधरता' कौशल किशोर ऐसे कालखंड में जब पक्षधर...

राकेश कुमार गुप्त का आलेख 'भगत सिंह आज क्यों जरूरी हैं?'

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  भगत सिंह  भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन के कई आयाम थे। एक तरफ गांधी जी जहां अहिंसा को केन्द्र में रख कर अपनी नीतियां बना रहे थे तो वहीं दूसरी तरफ भगत सिंह जैसे क्रांतिकारी थे जो मानते थे कि बहरों को आवाज सुनाना जरूरी है। आश्चर्य होता है कि इतनी कम उम्र पाने के बावजूद भगत सिंह ने कितना कुछ पढ़ा लिखा था। उनके लेख और विचार पढ़ते हुए हम ताज्जुब से भर जाते हैं कि कितनी कम उम्र में ही वे धर्म की रूढ़ियों से बाहर निकल आए थे। इस क्रम में उनका आलेख 'मैं नास्तिक क्यों हूं' उनकी तार्किक क्षमता और प्रगतिशील सोच का अप्रतिम उदाहरण है। अपने आलेख में राकेश गुप्त लिखते हैं 'क्या राष्ट्र और सरकार एक ही चीज हैं? क्या सत्ता से असहमति राष्ट्र से असहमति है? और क्या देशभक्ति का प्रमाण सत्ता के प्रति निष्ठा है या देश के नागरिकों, संविधान और न्याय के प्रति निष्ठा? भगत सिंह की जयंती इन प्रश्नों को पूछने का अवसर है, क्योंकि भगत सिंह केवल एक शहीद नहीं थे; वे प्रश्न पूछने वाले, पढ़ने वाले, लिखने वाले और अपने समय की स्थापित धारणाओं को चुनौती देने वाले युवा थे।' आज भगत सिंह के जन्मदिन पर हम उनकी स्मृति ...

हितेन्द्र पटेल का आलेख 'बिपन चंद्र के बारे में सोचते हुए'

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बिपन चन्द्र  कुछ किताबें मील का पत्थर होती हैं। वे इतनी जरूरी होती हैं कि उनके बिना एक समय को मुकम्मल तरीके से जानना दिक्कत तलब हो सकता है। आधुनिक भारत के इतिहास की जब भी बात आती है 'इंडियाज़ स्ट्रगल फॉर इंडिपेंडेंस' का नाम आवश्यक तौर पर लिया जाता है। इसके लेखक बिपन चन्द्र, मृदुला मुखर्जी, आदित्य मुखर्जी, सुचेता महाजन और के ए पणिक्कर हैं। लेकिन इसके लेखक के तौर पर मुख्य तौर पर प्रायः  बिपन चन्द्र का नाम ही लिया जाता है।  बिपन चन्द्र ने अपनी इस किताब में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और गांधी जी के आंदोलनों को एक नए परिप्रेक्ष्य में देखने की कोशिश की है। हितेन्द्र पटेल से हमने अनहद के लिए बिपन चन्द्र पर एक स्मृति आलेख लिखवाया था। हाल में उन्होंने उस आलेख का पुनर्लेखन किया है। अपने आलेख में हितेन्द्र लिखते हैं 'गांधी के नेतृत्व में आंदोलन ने जनसाधारण को राजनीतिक बनाया, औपनिवेशिक शासन की वैधता को क्रमशः कमजोर किया, संघर्ष और विराम की लय के माध्यम से संगठन की शक्ति बचाए रखी और स्वतंत्रता के विचार को विस्तृत सामाजिक स्वीकृति दी। 'इंडियाज़ स्ट्रगल फॉर इंडिपेंडेंस' इसी दृष्टि ...