भैरव प्रसाद गुप्त की कहानी 'गेंदा'


भैरव प्रसाद गुप्त


भैरव प्रसाद गुप्त ने मुंशी प्रेमचंद की यथार्थवादी परंपरा को आगे बढ़ाया और इस क्रम में उन्होंने दलित शोषित वर्ग, किसानों और मध्य वर्ग के संघर्षों को अपने लेखन का मुख्य विषय बनाया। हिन्दी साहित्य में 'नयी कहानी आन्दोलन' को दिशा देने और उसे प्रतिष्ठित करने में उनकी भूमिका ऐतिहासिक मानी जाती है। बाल मन और बाल हठ बड़ा रोचक होता है। कब किस बात पर रींझ जाए, कहा नहीं जा सकता। बच्चे खेल खेल में अपनी अलग ही दुनिया सृजित कर लेते हैं। वे सरल, सहज और उदरमना होते हैं। बच्चों के लिए लिखना आसान नहीं होता। पहले के कई प्रतिष्ठित लेखकों ने बच्चों के लिए भी विपुल लेखन किया है। भैरव जी की कहानी गेंदा बाल मनोविज्ञान का बारीकी से विश्लेषण करती है। आज भैरव जी के जन्मदिन पर हम उनकी स्मृति को नमन करते हैं। आइए इस अवसर पर हम पढ़ते हैं भैरव प्रसाद गुप्त की कहानी गेंदा।


'गेंदा'


भैरव प्रसाद गुप्त 


माघ का महीना, सबेरे का समय था। बहुत-से लड़के ओसारे में धूप खा रहे थे। पड़ोस में यही एक ऐसा ओसारा था, जहां सूरज की किरणें बहुत सबेरे आ जाया करती थीं, और यही कारण था कि लड़के बिस्तर से उठकर सीधे यहीं बिना हाथ मुंह धोये दौड़े चले आते थे। थोड़ी देर के बाद जब कुछ लड़के इकट्ठे हो जाते, तो कोई खेल शुरू हो जाता। लट्टू, ढेला, गोली और चकई मुख्य खेलों में से थे। जिनके पास लट्टू होता, वे एक तरफ गोला खींच कर अपना खेल शुरू करते और जिनके पास चकई होती वे एक तरफ खड़े हो चकई लड़ाना शुरू करते और जिनके पास इन दोनों में से कोई न होता या जिनके मां-बाप उनकी जिद की परवाह न करके उनके लिए लट्टू या चकई नहीं खरीद देते, वे बेचारे एक तरफ गोल-गोल कंकड़ या कच्ची मिट्टी की गोली ले कर अपना खेल शुरू कर देते।

इस समय ओसारे में खासी चहल-पहल हो जाती। चारों तरफ से आवाज आती- मैं जीता, मैं जीता, तुम बेइमानी करते हो, मैं तुम्हारे साथ नहीं खेलूंगा इत्यादि-इत्यादि। कभी-कभी गाली-गलौज की भी आवाज आने लगती और कभी-कभी तो मार-पीट की भी नौबत आ जाती। देखते-ही-देखते दो लड़के लड़ने लगते और बाकी लड़के उनके इर्द-गिर्द खड़े हो तमाशा देखने लगते और किसी न किसी को शाबाशी भी देने लगते। थोड़ी देर में रोने-पीटने की आवाजें आतीं, जिसे सुन कर सयाने लोग वहां आ जाते और रोने का सबब पूछने लगते। सब के सब लड़के वजह बताना शुरू करते, कोई एक का दोष बताता, तो कोई दूसरे का। अगर सयाने आदमी कुछ समझदार हुए, तो किस्सा खत्म हो जाता और नहीं तो अन्त यही होता कि दोनों के मां-बाप के यहां एक दूसरे के खिलाफ उलाहना पहुंचता और उन बच्चों की फिर दुबारा मरम्मत होती।

किन्तु जिस सबेरे से हमारा मतलब यहां है, उस दिन ऐसी कोई बात नहीं हुई, क्योंकि अभी हम खेल शुरू करने ही वाले थे कि एक साथी ने कहा 'भाई, सुनो, कहीं से 'कलबल-कलबल' की आवाज आ रही है?'

हम सब भौचक्के से हो इधर-उधर देखने लगे। हममें से कुछ डर भी गये। हम इधर-उधर देख ही रहे थे कि ग्वाले ने दूध का मटका मेरी ओर बढ़ाते हुए कहा- 'बाबू दूध घर में रख आओ और जल्दी लौट आओ तो हम तुम्हें एक बहुत बढ़िया चीज दिखाएंगे।'

हम लोग उस 'बढ़िया चीज' का नाम सुनते ही बेताबी से उसकी ओर देखने लगे। किन्तु बिना दूध पहुंचाये वह क्यों बताने वाला? जल्दी से दौड़ कर दूध घर पहुंचाया, और लौट कर बेचैनी में ही कहा- 'अच्छा, अब दिखाओ!!

उसने कहा- 'अच्छा, आप लोग मेरे साथ चलिए।'

यह कह कर वह गोरुआर (मड़ई) की ओर बढ़ा, और हम सब उसके पीछे-पीछे। पहुंच कर जो देखा, उससे दिल बाग-बाग़ हो गया। बात यह थी कि वहां कुतिया ने बच्चे दिए थे। बच्चे 'कलबल-कलबल' कर रहे थे। ग्वाला दिखा कर चलता बना। हमने देखा, कुतिया के उतरे हुए चेहरे पर नातवानी थी और उसकी सफेद आंखों से मुहब्बत में डूबी हुई नजरें निकल रही थीं। वह कुछ बोलना चाहती थी, और अपना मुंह खोलती थी, मगर उसके हलक से सिर्फ एक कमजोर, हल्की, बेशब्द की सांस निकलती थी। हम एड़ियों के बल कूदते हुए, अपनी सांस रोके बिना हिले-डुले उसके पास पहुंचे। उस समय हमारे साथियों की आंखें इन्तहाई खुशी से चमक रही थीं, कुतिया हमारी ओर रहम और हसरत-भरी निगाहों से देख रही थी।

'कैसे छोटे-छोटे ये पिल्ले हैं!' भरत ने हंसते हुए कहा- 'जैसे चूहे हों।'

'एक दो तीन चार' - भरत ने गिनना शुरू किया-'चार बच्चे हैं। अच्छा, तो एक हमारा, एक तुम्हारा एक महेश का, और एक?'

'एक कुतिया के लिए छोड़ दिया जायेगा !'- मैंने कहा।


(2)

दूसरे दिन से हम सारे खेल भूल गये। पिल्ले (कुत्ते के बच्चे) हमारे खिलौने बन गये। उसके साथ हम खेलने लगे। उनके सामने सारे निर्जीव खिलौने फीके पड़ गये। जिनके सामने आंख उठाने की भी तबीयत नहीं चाहती थी।

'यह अपनी आंखें नहीं खोलता है?' भरत ने बड़े गौर से अपने पिल्ले की आंखें देखते हुए कहा।

'तुम्हारा पिल्ला अन्धा है।'- मैंने झट से कहा।

'तुम अपने पिल्ले को देखो!' - भरत ने मेरे पिल्ले को देखते हुए कहा- 'यह भी तो अपनी आंखें नहीं खोलता।'

यह सुन कर मैं भी आश्चर्य में पड़ अपने पिल्ले की आंखें देखने लगा। सचमुच उसकी भी आंखें बन्द थीं। अब मैं उसकी आंखें खोलने लगा और देर तक उसके पपोटों को दोनों हाथों की अंगुलियों से ऊपर नीचे खींच कर मुंह से फूंकने और हवा देने लगा। मगर मेरी सारी कोशिशें बेकार गईं। हम सब आश्चर्य में पड़ गये। अभी हम सोचते ही थे कि बड़े भाई साहब पहुंच गये। मैंने उनसे पूछा- 'भैया, ये पिल्ले अपनी आंखें क्यों नहीं खोलते?'

'बाबू अभी, इनकी आंखें नहीं खुलेंगी। 20 या 25 दिन में ये अंखफोरू (खुली हुई आंख वाले) होंगे। तब ये खुद-ब-खुद देखने लगेंगे।'- भैया ने कहा।

आश्चर्य से पूछा। 'हम भी तो बच्चे हैं, फिर हम क्यों अंखफोरू हो गये?'- मैंने आश्चर्य से पूछा।

'तुम कुत्ते के बच्चे थोड़े ही हो। छोटे-छोटे जानवरों के बच्चे अधिकतर 20 या 25 दिन में अंखफोरू होते हैं। पैदा होने के वक्त उनकी आंखें बन्द होती हैं। समझे!' भैया ने जवाब दिया। इतने में कुतिया दौड़ी-दौड़ी आ निकली। हम तीनों अपने-अपने पिल्ले ले उसके पास पहुंच गये। फिर कुतिया को पकड़ कर हम सब अपने-अपने पिल्लों को एक साथ दूध पिलाने लगे। पिल्ले दूध पीने लगे। हम लोग 'चाभर चाभर' की आवाज सुन मन-ही-मन प्रसन्न होने लगे। थोड़ी देर बाद कुतिया ने पिल्लों को छुड़ा कर भाग जाना चाहा। मगर हम लोगों ने उसको जोर से पकड़ लिया। वह छटपटाने लगी। किन्तु हम लोगों ने न छोड़ा। उसे तब तक न छोड़ा, जब तक कि हमें पूरा विश्वास न हो गया कि हमारे पिल्लों का पेट भर गया।

शाम होने को आई, तो हम लोग बड़े सोच में पड़ गये कि आखिर ये बच्चे रात को सरदी में कहां रहेंगे? बहुत सोचने और समझने के बाद तय हुआ कि इनके लिए घर बनाना चाहिए। बच्चों को छोड़ हम लोग ईट के टुकड़े इकट्ठा करने लगे। जब काफी टुकड़े इकट्ठे हो गये, तो दो लड़के घर बनाने लगे, और मैं नरियों के लिए घर दौड़ा गया। चाहा कि बिना किसी के देखे की नरिए उठा ले चलू । मगर नरिया उठाते अम्मा ने देख लिया, और डांट कर बोली- 'नरिया क्यों उठा रहे हो?'

अब क्या, मेरे होश उड़ गये। मैं कुछ जवाब न दे सका। इतने में मां नजदीक आ कर मुझे डरा हुआ समझ कर नरमी से बोली- 'नरिया क्या होगी?'

मुझे साहस मिला। मैंने कहा- 'पुराने नरिए हैं। पिल्ले के लिए घर बनाना है।'

'पिल्ले के लिए घर बनाना है।' दुहराते हुए अम्मा ने कहा- 'पिल्ले के लिए घर की क्या जरूरत? जाओ नरिया मत छूना।'

मैं निराश हो गया। थोड़ी देर चुपचाप रहा और अन्त में रोने लगा। न जाने रुलाई कहां से आ गई। फिर मां लगीं आंसू पोंछने। मुझे अपनी मां पर पूरा भरोसा था और मैं यह भी बखूबी समझता था कि मेरे रोने के हथियार के सामने मां का कोई वश नहीं चलता। अन्त में नरिया ले आने की इजाजत मिली। मैं खुशी के साथ नरिया ले आया।

जब दीवारें तैयार हो गईं, तो उन पर नरियों का छाजन करने के लिए कड़ियों की जरूरत पड़ी। लकड़ियां कहां से मिलें, बड़े पसोपेश में पड़ गये। किन्तु महेश था बड़ा चालाक। उसने झट कहा- 'मैं लाता हूं, उस कोइरी के घर के पीछे कण्डे के बोझ रखे हैं, उन्हीं में से खींच लाता हूं।' वह दौड़ गया और थोड़ी ही देर बाद सात या आठ कंडे ले कर दौड़ता हुआ जा पहुंचा। 'बड़ी सफाई से खींच लाया हूं।' - उसने कहा।

दीवारों पर कंडे तोड़-तोड़ कर रखे गये। उन पर नरियों की सुन्दर छाजन लगी। अब बात रही बिछौने की। पास में ही कोदो के पुआल के गल्ले से थोड़ा-सा पुआल ला कर बिछाया गया। घर तैयार हो गया। अपने-अपने पिल्लों को आराम से सुला कर हम सब घर चले गये।




(3)

'किसका कुत्ता चोर है और किसका कुत्ता साह? '-भैया ने पूछा। 

हम सब लोग उनकी ओर देखने लगे। फिर मैंने पूछा- 'क्या कुत्तों में भी चोर और साह होते हैं?'

'और नहीं तो क्या?'

'तो फिर कैसे मालूम होता है कि कौन कुत्ता चोर है और कौन साह?'

'तुमको नहीं मालूम, अच्छा लाओ अपने पिल्ले, मैं बताता हूं।'- भैया ने हाथ बढ़ाते हुए कहा। हम लोगों ने अपना-अपना पिल्ला उनके सामने रखते हुए कहा- 'अच्छा बताइये।'

हम लोग विस्मय से उनकी ओर देखने लगे, और लगे सोचने कि आखिर ये कैसे बतायेंगे।

उन्होंने मेरे पिल्ले का कान पकड़ा और उसे उठा लिया। मैं चिल्लाने लगा यह क्या? यह क्या उधर पिल्ला 'कांय-कांय' करने लगा। भैया ने हंसते हुए कहा- 'तुम्हारा पिल्ला साह है।'

'यह कैसे?'- मैंने पूछा

'देखा नहीं, कान पकड़ते ही चिल्ला उठा, यही तो साह की पहचान है।' यह सुन कर मैं मारे खुशी के फूला न समाया।

इसी तरह से सबके पिल्लों की पहचान हुई। भरत का पिल्ला चोर निकला, क्योंकि कान पकड़ने पर भी वह चुप ही रहा। अब क्या, हम लोग, लगे उसको चिढ़ाने ।

सोने के समय एक दूसरा ही मंजर पेश हुआ। 'कांय-कांय' की आवाज सुनाई दी। सब लोग जिधर से आवाज आई थी, देखने लगे। पिता जी भी पास ही सोये थे। फिर 'कांय-कांय' की आवाज आई। आज मैंने सोचा कि पिल्ले को बहुत जाड़ा लगता होगा और उसे उस नन्हें-से घर में तकलीफ भी बहुत होती होगी, इसलिए अच्छा हो, अगर मैं उसे भी साथ ही रजाई में सुलाऊं। 'कांय-कांय' की आवाज सुन सब लोग मेरी ही तरफ देखने लगे मैंने रजाई के अन्दर ही पिल्ले पर हाथ फेरना शुरू किया, ताकि वह चुप हो जाये। मगर वह, ऐसा क्यों करने लगा?

'कायं-कांय'।

भैया बड़बड़ाते हुए उठे। और इधर-उधर देखने लगे। फिर 'कांय-कांय' की आवाज आई। उनको मेरे ऊपर शुबहा हो गया। उन्होंने मेरी रजाई खींची और पिल्ले को मेरे पास पाया। मैं मारे डर के सिटपिटा गया।

'देखो न, पिल्ले को छिपा कर रखे हैं और कहने पर कुछ नहीं बोलता है......।'

'बस, तुम बिस्तर छोड़ दो।'- पिता जी खफा हो कर बोले 'फिंकवा दूंगा। मैं इन गन्दी चीजों से बहुत नफरत करता हूं।'

मैं और भी डर गया। पिल्ले को फिंकवा देंगे। मैं तब किसके साथ खेलूंगा। इसे बाहर इस जाड़े में कितनी तकलीफें होंगी, बेचारा ठिठुर कर मर जाएगा। इसकी मां को कितना रंज होगा। मैं रोने लगा और रोते-ही-रोते कहा- 'इसको फेंकवाने की क्या जरूरत है? बेचारा बिना मौत ही मर जाएगा, और इसकी मां रोने लगेगी।'

मेरा रोना-गिड़गिड़ाना सुन कर पिता जी पिल्ले पर तो क्या, मुझ पर रहम खाया। उन्होंने कहा- 'अच्छा, तो सारी में रख आओ। तब छोड़ दूंगा।'

न जाने क्यों मैं ऐसा करने से मजबूर था। थोड़ी देर में भैया खुद उस पिल्ले को उठा कर सारी में फेंक आये। अब मेरी बेचैनी और भी बढ़ गई। न जाने उन्होंने कहां फेंक दिया होगा? कम-से-कम उसके घर में तो रख दूं। मैं सिसकते हुए उठा। देखा-बेचारा पिल्ला सारी की धूल में बेबसी से रेंग रहा था। उसे इस हालत में देख कर मेरा जी भर आया। उठा कर झाड़ा, पोछा और चूमा। फिर उसे उसके घर में उसके भाइयों के साथ सुला कर लौट आया। बहुत रात गये तक न जाने क्या-क्या सोचता रहा।



'बेटा, और खा लो।'- अम्मा ने कहा। 'नहीं अब मुझे भूख नहीं है।'- मैंने कहा।

'मैं समझती हूं। शायद तुम इसीलिए इतना छोड़ते हो कि बचा हुआ खाना गेंदा को मिलेगा।'- मां ने सर हिलाते हुए कहा।

पिल्ला अब बड़ा हो गया था। उसका नाम मैंने गेंदा रखा, क्योंकि गेंद की तरह ही वह भी खूब उछलता था और मेरा खिलौना भी तो था। उसके खाने का इन्तजाम यह था कि शाम और सबेरे घर के सब लोग खाना खाने के बाद एक-एक कौर ले कर बाहर आते और पुकारते- गेंदा, 'तू-तू'। गेंदा यह आवाज सुनते ही तुरन्त पहुंच जाता। कौर उसके सामने फेंक दिया जाता, और एक ही हबक्का में वह उसे निगल जाता। दूध तो शायद उसे कभी भी नहीं मिलता था। हां, कभी-कभी मट्ठा जरूर मिल जाता। लेकिन इस खाने से मुझे सन्तोष न होता। मैं अपने खाने से अधिक से अधिक हिस्सा बचाने की कोशिश करता। किन्तु जब मां बैठ कर खिलाने लगती, तो सारी अक्ल गुम हो जाती।

'नहीं, मां, भूख नहीं है, सच कहता हूं।'- मैंने हंसते हुए कहा।

'नहीं, नहीं, तुम खा लो, मैं तुम्हारे गेंदा के लिए और दे दूंगी।'

मगर मुझे विश्वास कहां? मैं न खाने पर जिद करता। लेकिन अन्त में अब मां और भी खाना ला कर रख देती, तो मैं मजबूर हो जाता और खाना खा लेता। मगर हां, गेंदा को भी तो पूरा खाना मिल जाता।

मैं बराबर स्कूल तो चला जाता, किन्तु मन सदैव गेंदा में ही लगता रहता। पढ़ने में बिल्कुल जी न लगता। मनाता रहता कि कब छुट्टी मिले और गेंदा से जा मिलूं। रोज उससे खेलने के नये-नये प्रोग्राम बनते। कभी उसे ले कर तालाब के किनारे जाता और 'लिहो-लिहो' कह कर स्वयं भी दौड़ता और गेंदा को भी दौड़ाता। कभी-कभी दो कुत्तों की लड़ाई भी होती। कुछ खाने की चीज दो कुत्तों के बीच रख देते और दूर खड़े हो तमाशा देखने लगते। कुत्ते देखते-देखते ही आपस में लड़ने लगते। उनकी लड़ाई में भी अजीब मजा आता था। उस समय हम लोगों का हाव भाव देखते ही बनता था कि मेरा गेंदा हमेशा ऐसी लड़ाइयों में फतह हासिल करता। मैं उसकी पीठ ठोंक ठोंक कर खुशी मनाने लगता। सब लड़के गेंदा के कारण मुझसे ईर्ष्या करते थे, लेकिन मुझे गेंदा का फख्र था।

रात को गेंदा सदैव जगा रहता। उसे न जाने क्यों, नींद नहीं आती थी। वह मेरी खटिया के नीचे पड़ा रहता और जब कोई आहट मिलती या कोई आदमी उधर से गुजरता, ती वह 'भू-भू' करके शान्त रात को सिर पर उठा लेता। सबकी नींद खुल जाती, और सब के सब लगते गेंदा को बद्‌दुआ देने। मुझे उन लोगों की बातें सुन कर गुस्सा आता था। मैं समझता था कि अगर कोई चोर होगा, तो कुत्ते की आवाज सुन कर लोगों को जगा हुआ समझ भाग जायेगा। इन लोगों को गेंदा के इस काम के लिए शुक्रगुजार होना चाहिए, न कि बद्दुआ देना चाहिए। मगर ये लोग न जाने क्या समझ कर उसको ऐसा कहते थे। जब उनकी बातें मुझसे सही नहीं जाती थीं, तो मैं गेंदा को खुद पुचकार कर बुलाता और उसकी पीठ पर हाथ सहलाते हुए कहता- 'गेंदा चुप हो जा, ये लोग गाली देते हैं।' गेंदा पूंछ हिलाते जम्हुआई ले, चुप हो फिर खटिये के नीचे पड़ कर सो जाता।


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मैं पीठ पर किताबों का बस्ता लिए लौट रहा था।

'तुम्हारे गेंदा को जगरनथवा अहीर ने मार दिया।'- भरत ने रास्ते में ही उत्सुकता से कहा।

मेरे होश उड़ गये मैंने पूछा- 'कैसे मालूम।'

हमने देखा है। वह बारी में पड़ा तड़प रहा है। बचने की कोई उम्मीद नहीं हैं।'- भरत ने मेरे मुंह की ओर देखते हुए कहा।

मैं दौड़ा-दौड़ा घर में घुसा और बस्ता फेंक कर, बिना किसी से कुछ कहे-सूने बारी की ओर दौड़ा। भरत मेरे पीछे-पीछे था।

सचमुच मेरा गेंदा बेहोश पड़ा था। उसे देखते ही मेरी आंखें नम हो गयीं। लेकिन मैं घबराया नहीं। अभी तो सांस चल रही है, मेरा गेंदा बच जायेगा। 'भरत' जरा चुल्लू में पानी तो लाओ।'- मैंने कहा।

भरत दौड़ा-दौड़ा पास के गड्ढे से पानी लाने गया। तब-तक मैं गेंदा को इधर-उधर से देखता रहा। मेरा दिल बैठा जा रहा था, परन्तु न जाने कौन-सी अन्तर्ध्वनि बार-बार मेरे कानों में कह जाती थी-तुम्हारा गेंदा तुम्हें नहीं छोड़ सकता।

पानी गेंदा के मुंह पर छिड़का। उसने जीभ निकाल कर चाटना शुरू किया। मेरी आशा बढ़ती गई और पानी लाया गया और उसके मुंह पर डाला गया। गेंदा उठ कर दौड़ा, बड़ी जोर से लेकिन फिर गिर कर बेहोश हो गया।

'बाई की झोंक में दौड़ा है।'- मां ने कहा। मां इस समय वहां पहुंच गई थी। जब उसने सुना कि गेंदा को किसी ने मार दिया, और मैं बिना कुछ खाये-पिये चला गया, तो उससे न रहा गया। वह भी मेरे पीछे-पीछे वहां आ गई।

'बाई क्या, अम्मा?' मैंने पूछा

'कुछ नहीं' गेंदा को गहरी चोट लगी है। उसकी कमर टूट गई है। अब बचेगा नहीं, देखो फिर बेहोश हो गया।' अम्मा ने सिर हिलाते हुए कहा।

'ऐसा न कहो, अम्मा, देखो, सांस चल रही है। गेंदा मरेगा नहीं। वह मुझे नहीं छोड़ सकता। वह मुझे छोड़ कर कहीं नहीं जा सकता !' - मैंने गेंदा को सहलाते हुए कहा। मेरी आंखों से आंसू टपकने लगे।

'बेटा, इसके लिए क्या कर सकते हो? तुमने इसका कर्ज खाया था, अब कर्ज पूरा हो गया, इसलिए वह तुम्हें छोड़ रहा है।' मां ने फिर समझाते हुए कहा।

'नहीं' मां, गेंदा कर्जा चुकाने के लिए मेरे साथ नहीं है। वह तो मुझसे प्रेम करता है।'

'अच्छा जाने भी दो, अब चलो। फिर कल आना। देखो, रात हो गई।'

'और गेंदा को इसी हालत में यहीं छोड़ दूं।'

'और नहीं तो क्या?'

'ऐसा तो न होगा, मां इसे मैं भी साथ ले चलूंगा। रात में उसे यहां और भी तकलीफ होगी'- मैंने जिद की, और सिसकती हुई आवाज में कहा।

मां न जाने क्यों, नहीं न कर सकीं।

फिर मैंने भरत को भेज कर घर से पीढ़ी मंगाई, और उस पर गेंदा को लाद कर घर लाया।

दो दिन तक गेंदा बुरी दशा में पड़ा रहा। मैंने स्कूल जाना बन्द कर दिया। उसकी बुरी हालत भी मेरी उम्मीद को खतम न कर सकी। मुझे अपनी मुहब्बत और सेवा पर भरोसा था। तीसरे दिन गेंदा ने आंखें खोल दीं। मेरा मुरझाया हुआ दिल हरा हो गया। फिर तो उसने स्वयं अपनी कमर के घाव को चाटना शुरू किया। धीरे-धीरे अब शक्ति भी आने लगी। फिर लंगड़ा कर चलने लगा। मेरी लाग के कारण मां को भी गेंदा से दिलचस्पी हो गई। वह उसे अच्छी तरह से खिलाने-पिलाने लगीं। उसे अब दूध भी मिलने लगा। थोड़े ही दिनों के बाद गेंदा मेरे साथ दौड़ने लगा। मेरी उजड़ती दुनिया फिर बस गई।

अच्छा होने के बाद बहुत दिनों तक गेंदा मेरे साथ रहा। ईश्वर ने एक दिन मुझसे उसे छीन लिया, लेकिन उसकी याद को कौन छीन सकता है?


(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग्स कवि विजेन्द्र जी की हैं।)

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