यादवेन्द्र का आलेख 'वतन से दूर भी जिंदा है वतन'


रजिया सज्जाद जहीर 


मनुष्य जिस मिट्टी में जन्म लेता और पलता बढ़ता है उसे वह कभी भुला नहीं पाता। एक लगाव अपनी मिट्टी अपने वतन के प्रति हमेशा बना रहता है। बँटवारे प्रायः कृत्रिम ही होते हैं। भारत का बंटवारा ऐसा ही कृत्रिम बंटवारा था जिसे धर्म के नाम पर अंजाम दिया गया। लेकिन लोगों की भावनाओं और संवेदनाओं पर भला किस तरह रोक लगाई जा सकती है। बंटवारे के दर्द को तमाम रचनाकारों ने अपनी रचनाओं में शिद्दत से व्यक्त किया है। ऐसी ही एक कहानी है रजिया सज्जाद जहीर की कहानी 'नमक'। प्रतिबन्ध के बावजूद मुस्लिम स्त्री साफिया अपनी दिवंगत माँ की सहेली के लिए लाहौर से नमक लाने में कामयाब होती है। यादवेन्द्र जी ने अपने इस महीने के कॉलम जिन्दगी एक कहानी है, में इस कहानी के बहाने से महत्त्वपूर्ण विश्लेषण किया है। यादवेन्द्र जी लिखते हैं "यह कहानी भूगोल की किताबों में लिखित कृत्रिम बँटवारे के बरक्स मन में स्थायी रूप से बसी वतन की स्मृति के ज्यादा मुखर होने की बात कहती है। फ्रेडरिक एंगेल्स ने कहा भी था कि 'समाजवाद की परिणति अंततः राष्ट्रों की सरहदों के मिट जाने में होगी'।" आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं यादवेन्द्र का आलेख 'वतन से दूर भी जिंदा है वतन'।

आजकल पहली बार पर हम प्रत्येक महीने के पहले रविवार को यादवेन्द्र का कॉलम 'जिन्दगी एक कहानी है' प्रस्तुत कर रहे हैं जिसके अन्तर्गत वे किसी रचना या मुद्दे पर बेलाग टिप्पणी किया करते हैं। कॉलम के अंतर्गत यह उन्नीसवीं प्रस्तुति है। तो आइए पहली बार पर आज हम पढ़ते हैं यादवेन्द्र का आलेख 'वतन से दूर भी जिंदा है वतन'।


जिन्दगी एक कहानी है 

'वतन से दूर भी जिंदा है वतन'


यादवेन्द्र 


अपने बिछुड़े वतन के बारे में बचपन में सुने ये दो गीत कभी नहीं भूलते, हमारी पीढ़ी रेडियो पर इनको सुन कर और वक्त वक्त पर इन्हें गुनगुना कर बड़ी हुई है।


लाल किला (1960) फ़िल्म में बहादुर शाह ज़फ़र का लिखा और मुहम्मद रफ़ी का गाया गीत: 

लगता नहीं है दिल मिरा उजड़े दयार में किस की बनी है आलम-ए-ना-पाएदार में

इन हसरतों से कह दो कहीं और जा बसें इतनी जगह कहाँ है दिल-ए-दाग-दार में

कितना है बद-नसीब 'ज़फ़र' दफ़्न के लिए दो गज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में

काबुलीवाला (1961) फ़िल्म में प्रेम धवन का लिखा और मन्ना डे का गाया गीत:

ऐ मेरे प्यारे वतन ऐ मेरे बिछड़े चमन

तुझपे दिल क़ुरबान

तू ही मेरी आरज़ू तू ही मेरी आबरू

तू ही मेरी जान

छोड़ कर तेरी ज़मीं को दूर आ पहुँचे हैं हम

फिर भी है ये ही तमन्ना तेरे ज़र्रों की क़सम

हम जहाँ पैदा हुए उस जगह ही निकले दम

तुझपे दिल क़ुरबान.....

अभी हाल में घाटशिला में आयोजित प्रगतिशील लेखक संघ के कहानी लेखन शिविर के दौरान मैंने बच्चों को रजिया सज्जाद जहीर की कहानी "नमक" के बारे में बताया। बंटवारे के कुछ साल बाद एक मुस्लिम स्त्री साफिया अपने भाइयों से मिलने लाहौर जाती है तो अपनी दिवंगत माँ की सहेली से पूछती है आपके लिए लाहौर से क्या ले कर आऊं? 

लाहौर का गुणगान करती हुई वे कहती हैं कि और कुछ नहीं, मेरे लिए थोड़ा सा लाहौरी नमक लेकर आना।

एक महीना वहाँ रह कर साफिया जब लौटने को होती है तो उसके पास दोस्तों की प्रेम से दी हुई अपने बागों की कीनू की टोकरी और कुछ सामान है। जिस चीज को ले कर वह सबसे ज्यादा परेशान है वह है लाहौरी नमक की एक बुढ़िया - उसके भाइयों ने चेताया कि यहाँ से नमक ले कर सरहद पार जाने पर पाबंदी है इसलिए वह नमक की पुड़िया पाकिस्तान में ही छोड़ दे। 

लेकिन वह माँ की सहेली के साथ किए वायदे से बंधी हुई थी। उसने तय किया कि नमक को छुपा कर सरहद पार नहीं करेगी बल्कि कस्टम वालों को दिखा बता कर इजाज़त मांगेगी - वे कस्टम में काम करने वाले मुस्तैद कड़क अफ़सर हैं तो इंसान भी हैं। होता भी यही है। सरहद पार करने से पहले जब वह पाकिस्तानी कस्टम अफसर को नमक की पुड़िया दिखा कर पार जाने की इजाज़त माँगती है तो उसका दिल इसलिए पसीज जाता है कि वह उसके वतन दिल्ली जा रही है। भारतीय कस्टम अफ़सर उसकी बात इसलिए मान जाता है कि साफिया की लाहौरी नमक की पुड़िया देख कर उसे अपने वतन ढाका की याद आ गई। "साफिया सोचती जा रही थी: किसका वतन कहाँ है? कस्टम के इस तरफ है या कस्टम के उस तरफ?"

यह कहानी भूगोल की किताबों में लिखित कृत्रिम बँटवारे के बरक्स मन में स्थायी रूप से बसी वतन की स्मृति के ज्यादा मुखर होने की बात कहती है। फ्रेडरिक एंगेल्स ने कहा भी था कि 'समाजवाद की परिणति अंततः राष्ट्रों की सरहदों के मिट जाने में होगी'।

जब पटना में वरिष्ठ कथाकार संतोष दीक्षित तक यह खबर पहुंची कि मैं उनके जन्म स्थान भागलपुर में हूँ तो उन्होंने मुझे फोन कर के अपने बचपन की यादें साझा कीं और अफसोस जाहिर किया कि अब उनका भागलपुर जाना लगभग बंद सा ही हो गया है। मैंने बताया कि न मेरा जन्म भागलपुर में हुआ न भागलपुर में हमारा कोई पुश्तैनी घर है लेकिन मैं अपने आपको पूरी तरह से भागलपुर की मिट्टी से बना मनुष्य मानता हूँ। यूं तो तकनीकी तौर पर मैं बनारस का हूँ लेकिन मेरी निर्मिति का सबसे बड़ा हिस्सा भागलपुर में बना है जहाँ मैं नवीं कक्षा से ले कर इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी कर के बाहर निकला। इसमें दो साल का जे पी के नेतृत्व वाला आंदोलन भी शामिल है जिसने मुझे राजनैतिक और सांस्कृतिक तौर पर प्रशिक्षित किया।

संतोष जी के साथ मैं उन मोहल्लों की गलियाँ सड़कें नापता रहा जो अब उस रूप में नहीं हैं जैसे उनकी और मेरी स्मृतियों में बसे हुए हैं। लंबी बातचीत के बाद हमने तय किया कि एक बार हम दोनों साथ पटना से भागलपुर आएंगे और उन सारी जगहों को घूम घूम कर देखेंगे जहाँ हमारा बचपन बीता है।


मेरे एक मित्र ने कुछ दिनों पहले अपनी एक यात्रा का ज़िक्र किया। उन्होंने बताया कि जब वे पुणे से कोलकाता आने के लिए हवाई अड्डे पहुंचे तो वहाँ सामान की जाँच करने वाले स्टाफ ने एक नन्हे से पौधे को ले कर अड़ियल रवैया दिखाया - किसी भी कीमत पर वह उसे हवाई जहाज के अंदर ले जाने देने के लिए तैयार नहीं हो रहा था। दोस्त ने अपनी बगिया में बैंगनी रंग के इस सुंदर फूल का पौधा दिखाते हुए बताया कि पुणे में बहन के यहाँ देखते ही उसे लालच हो आया और उसने अपने सामान में पौधे का छोटा गमला शामिल कर लिया। लेकिन हवाई अड्डे पर उसे रोक दिया गया। उसने छोटे से गमले को दिखा कर बताया कि इससे किसी को भला क्या खतरा हो सकता है, उससे ज्यादा तो घड़ी और बेल्ट घातक हो सकते हैं। उसने बहुत मिन्नतें की लेकिन वहाँ जो जवान तैनात था उसने बिल्कुल ही नरमी नहीं दिखाई। इस हुज्जत में काफी समय बीत गया और तभी उसको किसी अफ़सर ने बुला लिया। उसकी जगह जो जवान आया उसके सामने दोस्त ने फिर से पुरानी कहानी दोहराई। जैसे ही उसे पता चला कि दोस्त को बिहार आना है तो उसके तेवर ही बदल गए... उसने पौधे के गमले को हाथ में उठा कर इधर-उधर देखा और दोस्त को थमाते हुए बोला कि ले जाइए, आप तो हमारे इलाके (वतन) के हैं। दोस्त की बात सुनते हुए मुझे याद आया कि मेरे साथ भी एक बार दिल्ली हवाई अड्डे पर ऐसा ही वाकया हुआ था और बिहारी होने का लाभ मिला था।


2013 में दिये प्रतिष्ठित "टेड (TED) लेक्चर” में अंग्रेजी के प्रख्यात लेखक पिको अय्यर कहते हैं:

हममें से अधिकांश लोगों के लिए घर की अवधारणा मिट्टी की तुलना में रूह (soul) से ज्‍यादा जुड़ी होती है. मुझसे कोई अचानक यह पूछ ले कि “आपका घर कहॉं है” तो मेरा मन फौरन मेरी प्रियतमा या अंतरंग मित्रों या उन गीतों की तरफ ताकने लगेगा जिन्‍हें साथ लिए-लिए मैं दुनिया भर में घूमता रहता हूँ।

दुनिया भर में बाईस करोड़ लोग ऐसे हैं अपने-अपने जन्‍म के देशों में नहीं बल्कि दूसरी धरती पर रहते हैं……। भले ही हमें यह संख्‍या अविश्‍वसनीय लगे पर यह वास्‍तविकता है कि कनाडा और ऑस्‍ट्रेलिया की आबादी को मिला दिया जाए, और इस मिली-जुली आबादी को दो गुना कर दिया जाए - एक नहीं दो बार - तब भी इंसानों की यह संख्‍या यहॉं–वहॉं आवारा बादलों की तरह विचरती आबादी से कम ही रहेगी।

वर्तमान आंकड़े बताते हैं कि लगभग 28 से 32 करोड़ लोग स्वेच्छा से (कम) या मजबूरी में (अधिक) अपने जन्म के देशों से अलग रहते हैं। पिछले तीस सालों में यह संख्या लगभग दो गुनी हो गई।

भारत में जन्मे साढ़े तीन करोड़ से ज्यादा लोग विदेशों में रहते हैं - यह संख्या किसी भी अन्य देश की तुलना में ज्यादा है।


सरदार सोज़ का एक शेर याद आता है:

वतन से दूर मुसाफ़िर चले तो जाते हैं

वतन को लौट के आने में देर लगती है।


रजिया सज्जाद जहीर के आलेख को आप इस लिंक के जरिए पढ़ सकते हैं।

https://pahleebar.blogspot.com/2026/07/blog-post_04.html





(यादवेन्द्र जी सीएसआईआर-सीबीआरआई, रूड़की में पूर्व मुख्य वैज्ञानिक रह चुके हैं।)


सम्पर्क : 


72, आदित्य नगर कॉलोनी

जगदेव पथ, बेली रोड

पटना - 800014


मोबाइल - +91 9411100294

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