कर्मेंदु शिशिर का आलेख 'अवधेश प्रधान के गद्य के साथ छोटी सी सहचर यात्रा'


वर्तमान साहित्य के नवंबर 2024 जुलाई 2026 संयुक्तांक से साभार लिया गया है।


'अवधेश प्रधान के गद्य के साथ छोटी सी सहचर यात्रा'


कर्मेंदु शिशिर


डॉ. रामविलास शर्मा ने नवजागरण की जिस अवधारणा को प्रस्तुत किया था, वह तमाम तरह के विरोध, आरोप-प्रत्यारोप के बावजूद न सिर्फ स्वीकृत हुआ बल्कि अनेक विचार कनछियों के साथ एक विराट वट वृक्ष की तरह स्थापित हुआ। अब नवजागरण की अवधारणा में इतने विचार वैविध्य का समावेश हो चुका है, उसका इतना विस्तार हो चुका है कि उसे नकारना किसी के लिए संभव नहीं। बावजूद उसके विरोध के स्वर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुनाई देते रहे हैं। विचारणीय बात यह है कि ऐसा क्यों हो रहा है? दरअसल नवजागरण की अवधारणा अपनी मूल प्रकृति में ही उपनिवेशवाद के विरोध में थी। उपनिवेशवाद से मुक्त होने के बावजूद नवजागरण का विरोध इस बात का सबूत है कि इसके जीवाश्म अभी भी मौजूद हैं, जिसकी उपस्थिति हम राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देख सकते हैं। राष्ट्रीय स्तर पर ये पाश्चात्य आधुनिकतावादियों की शक्ल में मिलते हैं। इनकी जड़ें इस देश में नहीं होती, ये हथेलियों पर ठगे जड़विहीन लोग हैं। इनकी कोशिशें भारतीय नवजारण के आधार-स्तंभों पर लगातार चोट कर उसे संदिग्ध करने की है। यह अकारण नहीं है कि उनकी कोशिश राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतेन्दु, निराला, प्रसाद या रामचंद्र शुक्ल में हिन्दुवादी तत्त्व ढूँढ़ कर उन्हें हिन्दू फासीवाद के जनक की शक्ल में प्रस्तुत करने की है। यह अकारण नहीं है कि आज भारतीय नवजागरण पाश्चात्य अकादमिक जगत् का मुख्य विषय बना हुआ है। यह दूरगामी और कुटिल सोच का हिस्सा है। इनकी मूल मंशा है मौलिक और देशज भारतीयता के तत्त्वों को खत्म करने की, क्योंकि बिना इसे खत्म किये ये अपनी आधुनिकता को यहाँ रोप नहीं सकते। उनकी इस कोशिश का सिलसिला बहुत पुराना है और अकादमिक दुनिया में इसकी घुसपैठ अब भी कायम है।


बार-बार भिन्न-भिन्न तरीकों से धर्म का इस्तेमाल कोई नई चीज नहीं है। बेशक इस दुनिया को पूरी तरह धर्मविहीन नहीं किया जा सकता। धर्म का निर्णायक प्रभाव शताब्दियों से रहा है। उसका हमारी चेतना, संस्कार, जीवन-शैली, साहित्य, संगीत, कला बल्कि कहिये, पूरी संस्कृति और सभ्यता पर गहरा असर है। इसका इतिहास सकारात्मक रहा है और नकारात्मक भी। इसमें करुण मानवीय पक्ष मौजूद रहा है तो रक्तरंजित हिंसा भी। भारतीय साहित्य में हिन्दुवादी तत्त्वों की तलाश करने वालों से आप पूछिये कि यूरोप या दुनिया के जितने महान् रचनाकार हुए हैं, उनके जीवन और सृजन से क्या उनके धर्म को पूरी तरह हिगराया जा सकता है? विश्व का इतिहास ईसाई और इस्लाम के वर्चस्ववादी फासीवाद से मुक्त रहा है? क्या वह फासीवाद ईसाई और इस्लाम में यकीन रखने वाले रचनाकारों ने पैदा किये थे? ऐसी बेतुकी और असंगत बातें इसलिए की जा रही हैं कि आप अपने को पिछड़ा, असभ्य और बर्बर स्वीकार कर लें। जिस तरह हमने आपको सभ्य और आधुनिक बनाया, उसी तरह आपका भविष्य आगे भी हमसे ही सँवर सकता है। आपकी आधुनिकता आपकी मिट्टी, विरासत और इतिहास से विकसित हो ही नहीं सकती। आप बिना विरोध और प्रतिकार के हमारे मूल्यों और हमारी आधुनिकता की कलमें अपने यहाँ रोप लो। आप गौर कीजिए विश्व पूंजी से बन रही सभ्यता और संस्कृति के तत्त्व हम नहीं, वे ही तय करते हैं।


इसलिए भारत और भारत के बाहर की समर्थ दुनिया चाहती है, और इस बात की निरंतर कोशिश करती है कि आप हथियार डाल दें, अपनी शिक्षा, संस्कृति और विरासत का औपनिवेश स्वीकार कर लें। इसलिए कि आपका भविष्य अंततः पश्चिम में हाथों में ही है। आपका भाग्य उनकी मुट्टी में है। आप इस बात को न भूले कि आपने ब्रिटिश साम्राज्यवाद से आजादी ली नहीं थी, बल्कि उन्होंने सत्ता हस्तांतरित की थी। उनका शैक्षणिक और बौद्धिक उपनिवेश यथावत बना रह गया था। फिर भी हमारे पास भारतीय नवजागरण का ऐसा विपुल साहित्य था जो उपनिवेशीकरण से मुक्त था। उसके गर्भ में स्वाधीनता संग्राम, विभिन्न क्षेत्रों में हुए दीर्घ आंदोलनों के तमाम दस्तावेज मौजूद थे। यह बात पश्चिम को बाद में समझ आयी कि नवजागरण तो उनके उपनिवेशीकरण से बाहर ही रह गया। यह अकारण नहीं है कि आज हम यूरोप के अनेक अकादमिक परिसर में सबसे अधिक उपस्थिति इसी भारतीय नवजागरण की पाते हैं। उनकी पहली कोशिश यह है कि नवजागरण की चेतना और स्वाधीनता संग्राम की चेतना के बीच फर्क बना रहे। इसके जुड़ने का मतलब है बचे हुए उपनिवेशिक तत्त्वों का खात्मा। इस आलोक में आप देखें कि वे क्यों भारतीय नवजागरण के महानायकों को परस्पर एक-दूसरे के विरुद्ध करते हुए, उनको हिन्दू फासीवाद के बाड़े में धकेलने की कोशिशें करते हैं। इस षडयंत्र को गहराई से समझने की जरूरत है।


आज इस आलोक में नये सिरे से नवजागरण के महत्त्व को समझने की जरूरत है। साथ ही उसे नयी और आगामी भूमिका के लिए लगातार समृद्ध करते जाने की भी जरूरत है। यह सुखद है कि रामविलास जी के बाद इसको समृद्ध करने वालों की हिन्दी पट्टी में एक ऐसी सशक्त पीढ़ी आयी जिसने नये इलाकों का संधान कर रह इसे अभिनव विस्तार दिया। उसमें डॉ. अवधेश प्रधान का नाम अत्यन्त प्रमुख है। प्रधान जी ने साहित्यिक अनुषंगों से बाहर निकल कर धार्मिक और अध्यात्मवादी इलाकों की खाक छानी, जिससे अमूमन हिन्दी विचारक परहेज करते हैं। प्रधान जी इस बात को अच्छी तरह समझ रहे थे कि बिना ऐसा किये भारतीय संस्कृति, सभ्यता और परंपरा की पहचान मुश्किल है और न ही भारत के मौलिक वैशिष्टय को प्रकाशित किया जा सकता है। इसके लिए वे विवेकानंद, एनी बेसेण्ट, महात्मा गाँधी, तुलसी, कबीर, जायसी गोरख नाथ तक जाते हैं। साहित्य में उनकी यात्रा तो और वैविध्यपूर्ण हैं। उनको न वेदों से परहेज है और न गीता से। वे इतिहास, संस्कृति से भाषा विज्ञान तक में जिस दक्षता और अधिकार से प्रवेश करते हैं, बहस और विश्लेषण करते हैं, वह रामविलास जी की याद ताजा कर देती है। यह संभव नहीं कि एक आलेख में आप उनकी सृजनात्मक यात्रा के विवरण को प्रस्तुत कर सके, विचार और विश्लेषण का आकलन तो दूर की बात है। हमारी कोशिश इतनी भर है कि हम एक सहयात्री की तरह उनकी सृजनात्मक यात्रा के सहचर हो सकें। उनको ठीक से समझ सकें।

(नवजागरण और स्वाधीनता संग्राम के फर्क की बात प्रो. हितेन्द्र पटेल की बातचीत के क्रम में आयी। आभार!)


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प्रधान जी के लेखन से गुजरते हुए आप उनके विशाल अध्ययन और विषय-विधागत वैविध्य से बार-बार विस्मित हो जायेंगे। वे सीमित और प्रचलित अर्थों में आलोचक नहीं हैं। वे साहित्य की विविध विधाओं और विषयों की ओर अकारण या प्रदर्शनप्रियता के लिए नहीं जाते, सभ्यता और संस्कृति की उलझनों, समस्याओं और संकटों के कारण ज्ञान की व्यापक दिशाओं तक यात्रा करते हैं। यह उनकी विवशता नहीं, बल्कि लेखन के मूल आशय की जरूरत है। धर्म, दर्शन, इतिहास, राजनीति, भाषाशास्त्र के साथ-साथ साहित्य की लगभग हर विधा में दखल रखने की दक्षता कोई साधारण बात नहीं होती। वे एक तरफ ऋग्वेद के अनुष्टुप छंद के सौन्दर्य की चर्चा करते हैं तो दूसरी ओर भिखारी ठाकुर के ठेठ नाटकों में अनुस्यूत लोक की, ऐसे परस्पर भिन्न ध्रुवांतों के लेखकीय उदाहरण उनमें अक्सर देखने को मिल जायेंगे। गौर करने वाली बात यह है कि शास्त्र और लोक के बीच यह कोई अंतर्विरोध नहीं है बल्कि वे भारतीयता में समन्वित हो कर एक-दूसरे के पूरक हो जाते हैं। वे इसमें जिस समन्वय का संधान करते हैं, बिना इस दृष्टि और मानस को समझे आप भारत और भारतीयता को नहीं समझ सकते।


बेशक अवधेश प्रधान मार्क्सवादी विचार और भाव-भूमि पर गहरी आस्था रखने के बावजूद परस्पर भिन्न आसंग और विचार विश्वासों से कभी परहेज नहीं करते। वे हमेशा जनपक्षीय यथार्थ की तलाश में रहते हैं और इसकी पहचान के लिए उनके पास बहुत खिड़कियाँ हैं। शायद इसीलिए उनमें कहीं संभ्रम और जड़त्व नहीं दिखता। न कही उलझाव या अस्पष्टता और न ही अनावश्यक अतिक्रमण। लेखकीय व्यक्तित्व का ऐसा संतुलन बहुत कम देखने को मिलता है। दुनिया और समाज वैविध्यपूर्ण है, उसके विविध यथार्थ को आप एक ही खिड़की से नहीं देख सकते लेकिन दृष्टि में वैचारिक विचलन हुआ और समन्वित समझ का विवेक गड़बड़ाया तो आप गंभीर उलझन के शिकार हो सकते हैं। प्रधान जी के पास यथार्थ संधान की अनेक आँखें हैं जरूर, लेकिन उनको इस बात की सही समझ है कि कब, किस यथार्थ को किस आँखों से देखना है। जैसे देखने और देखने में भी फर्क आ जाता है वरना कुछ विचार आग्रही जूते के नाम के अनुरूप पैर की ही कटाई-छंटाई करने लगते हैं।


प्रधान जी अमूमन उत्स से शुरू करते हैं और उसके अधुनातन फैलाव तक जाते हैं। उत्स को जानना एक तरह से उसके डी एन ए से परिचित होने जैसा है। फिर उसकी डालियों, टहनियों, तनों, पत्तियों और फूलों-फलों को जानना ज्यादा आसान और विश्वसनीय हो जाता है। यह भी एक कारण है कि उनके लेखन में असहमतियों की गुंजाइश कम से कम होती है। आप चाहे तो उनको एक आजादख्याल और सतत गतिशील विचारक मान सकते हैं। मगर उनकी आजादी उनकी तय मान्यताओं और मूल्यों से कसी होती है। उनको न मार्क्स से परहेज है और न गाँधी से, न ही रवीन्द्र नाथ टैगोर या एनी बेसेण्ट से। विवेकानंद पर उनके लिखे और छपे व्याख्यान से गुजरते हुए आप जिस विचारोत्तेजकता को महसूस करते हैं, उसे आप मार्क्स और गाँधी के विचारों से नहीं समझ सकते। उसे आप भाव और ज्ञान, की समन्वित चेतना से महसूस कर सकते हैं और समझ सकते हैं। दोनों की सजगता एक साथ होना एकदम जरूरी है। वेद हो या गीता-वे इतने अंदरूनी गह्वर तक जा कर परखते और विश्लेषण करते हैं कि आप विस्मित हो जाते हैं। मेरे देखे ऐसी मेधा हमारे समकालीनों में शायद किसी और में दिखती नहीं। उनके पास एक साधक की दृष्टि है।


यह बात मैं किसी भावातिरेक में नहीं लिख रहा। आप उनके लेखन को देखिये। मार्क्सवाद से गाँधीवाद तक गुजरते हुए न तो उनमें कोई वैचारिक टकराव दिखता है और न वैचारिक विचलन। इस आदमी को आध्यात्मवाद पर चर्चा, विचार और विश्लेषण करते हुए आप रत्ती-भर हिचक महसूस नहीं करेंगे। न वैचारिक उलझन, टकराव और ही विचलन। इतना सधा, संतुलित और सतर्क। ऐसा अमोघ दृढ़ विश्वास ! आपको बार-बार विस्मित कर देता है। दरअसल इसके पीछे मूल भूमिका उनकी समन्वित दृष्टि की है, जो परस्पर भिन्न दिखते तत्त्वों को भारतीयता की विराट्‌ता में अनुस्यूत कर देते हैं। वे इस बात को गहराई से महसूस करते हैं कि भारतीय संस्कृति, परंपरा, इतिहास से अलग कर न तो हम भारतीय समाज को समझ सकते हैं और न भारतीयता को। इसलिए वे आध्यात्मिक महानायकों की तरह साहित्य में रवीन्द्र नाथ टैगोर, भारतेन्दु, वासुदेव शरण अग्रवाल, राहुल सांकृत्यायन, निराला, प्रसाद, रामविलास शर्मा, दिनकर, हजारी प्रसाद द्विवेदी या त्रिलोचन तक आते हैं। उसी तरह भक्त कवियों तुलसीदास, कबीर, जायसी, गोरखनाथ को लेते और विचार-विश्लेषण करते हुए आप उनको देखते हैं। ऐसी बात तो नहीं कि उनको इनकी भिन्नता और अलग-अलग भक्ति धाराओं का ज्ञान न होगा? बल्कि इतना प्रामाणिक ज्ञान है कि वे इनको भारतीय संस्कृति की विशाल विरासत मान कर ही उस समन्वित दृष्टि का संधान कर लेते हैं, जिसकी मैंने पहले चर्चा की है। परस्पर भिन्नता के बीच उस तात्त्विक एकत्व की तलाश सुनने में जितना आसान लगता है आयत्त कर साधने में उतना ही दुष्कर है। प्रधान जी की खूबी यह है कि वे उस एकत्व और ज्ञान-तत्त्व को विश्लेषित करते हुए उसे एकदम आधुनिक आसंग में प्रासंगिक बना देते हैं। महात्मा गाँधी के सर्वधर्म समभाव को। यह विलक्षण वैशिष्ट्य है कि तमाम भिन्नताओं के बावजूद भारतीयता को यौगिक रूप में नहीं वे तात्त्विक शक्ल में प्रस्तुत करते हैं। 

जिन विचारकों, रचनाकारों और विषयों पर विचार हुए प्रायः लोग ठिठकते हैं, असमंजस महसूस करते हैं, उन विषयों को उनके इलाके में जा कर उनकी मर्यादा को कायम रखते हुए, वे निर्द्वंद्व भाव से विचार या बहस करते हैं। इस बात को वे किसी दूसरे से ज्यादा बेहतर समझते हैं कि नवजागरण को साहित्य का कभी उपनिवेशीकरण नहीं हुआ। विचार और रचनात्मक स्तर पर वह हल्का या कमजोर हो सकता है लेकिन भाव और निष्ठा में तनिक संदेह नहीं। तनिक प्रदूषित नहीं। यही विश्वास हम नवजागरण के बाहर के साहित्य को अथवा आज के साहित्य को ले कर नहीं व्यक्त कर सकते। प्रधान जी को ऐसा करने में हिचक क्यों नहीं होती? इसलिए कि वे समझते हैं कि समुदाय की चेतना, जब राष्ट्रीय चेतना के रूप में विकसित होती है तो उसकी पूरी शक्ल अंदर-बाहर से बदल जाती है। उसके तत्त्व घुल मिल जाते हैं। इसलिए सनातन धर्म अथवा हिन्दुवादी तत्त्वों के संकेत-साक्ष्य भारतेन्दु, निराला से प्रसाद तक में मिलते हैं। बिलकुल मिलते हैं, लेकिन वे उनकी सोच में यथावत नहीं रहते। उसे संकीर्ण नहीं करते और न ही वे प्रतिक्रियावाद में तब्दील होते हैं। इसलिए आप गौर कीजिए, भारतेन्दु, निराला, प्रसाद, दिनकर या त्रिलोचन पर लिखते हुए प्रधान जी उनमें निहित देशज राष्ट्रीय चेतना की तलाश कर लेते हैं। जो लकीर के फकीर होते हैं और वैचारिक मौलिकता से जिनका दिमाग शून्य रहता है, वे पहली निगाह में ही धार्मिकता को सांप्रदायिकता में रिड्यूस कर भड़क जाते हैं। यही आयातित आधुनिकता वाले लोग हैं जो समझते हैं कि उनसे ही इस देश के आधुनिक इतिहास और समझ की शुरुआत हुई है। अगर वे नहीं होते तो देश और हिन्दी भाषा, पिछड़ी, संकीर्ण और सांप्रदायिक ही रह जाती।


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अवधेश प्रधान जी ने ऐनी बेसेण्ट को भारतीय नवजागरण के आसंग में रख कर विचार किया है, अगर आप में व्यापक समन्वित दृष्टि का अभाव होगा तो यह बात आपको गहरे असमंजस में डाल देगी। आप पायेंगे उन्होंने अपने लेख की शुरुआत प्रेमचंद की उन पर लिखी श्रद्धांजलि से की है। प्रधान जी ने लक्ष्य-बेधक विचार-विन्दु का चयन इस तरह किया है जो गौर करने लायक है। "ब्रिटिश साम्राज्यवाद के अनन्य भक्त और अंग्रेजी के प्रसिद्ध लेखक रूडयार्ड किपलिंग ने कहा था-'पूरब पूरब है, पश्चिम पश्चिम है और दोनों में एकता संभव नहीं है।' वे समझते थे कि पश्चिम पूर्व पर अनंत काल तक अपना प्रभुत्व जमाये रहे, यही भगवान् की इच्छा है!" (पृ. 17) दरअसल यही वह सोच है जिसे आज तक यूरोप वाले मानते आ रहे हैं। इसी कारण वे नवजागरण के नायकों को हिन्दुवादी विश्वासों से जोड़ कर उनको पिछड़ा सिद्ध करते हैं और उनमें आधुनिकता और प्रगतिशीलता का अभाव दिखा कर उनको संदिग्ध बना देते हैं। मूल बात यह है कि वे चाहते हैं कि नवजागरण के अस्तित्व को पूरी तरह नकार दिया जाय। भारतीय स्वाधीनता आंदोलन से उनको कोई एतराज नहीं, क्योंकि वे मान कर चलते है कि वह सामान्यतः उनकी सोच और इच्छा के अनुरूप ही घटित हुआ। लेकिन नवजागरण में भारत की विराट संस्कृति, इतिहास और परंपरा का जो समृद्ध वैभव है, वह उनको बौना बनाता है। इसलिए वे इस बात पर जोर देते हैं कि भारत एक बर्बर और असभ्य देश था, जिसे अंग्रेजों ने सभ्य, सुसंस्कृत और आधुनिक बनाया। आज के भारत का भविष्य यूरोपीय के हाथों ही सुधर सकता है। इसलिए भारत में यूरोपीय साम्राज्यवाद और ईसाई धर्म का अबाध प्रसार अत्यन्त जरूरी है।


प्रधान जी 1893 को भारतीय नवजागरण के लिए बहुत निर्णायक मानते हैं। इस वर्ष स्वामी विवेकानंद ने शिकागों में विश्व सर्व सम्मेलन में ऐसा अद्भुत व्याख्यान दिया, जिसकी गूंज पूरे विश्व में दशकों तक बनी रही। दूसरी ओर एनी बेसेण्ट अपना घर-बार छोड़ कर काशी आयी और रामायण, महाभारत और गीता जैसे भारत के प्राचीन ज्ञान कांड का गंभीर अध्ययन किया। इस अध्ययन ने उसके मानस को आमूलचूल बदल दिया और वे सच की पक्षधर बन कर अपना संपूर्ण जीवन भारतीय नवजागरण को समर्पित कर दी। दरअसल एनी बेसेण्ट का व्यक्तित्व इंग्लैण्ड में भी सरकार विरोधी और रेडिकल रहा था। यहाँ उनका संबंध थियोसोफिकल सोसाइटी से बना। लेकिन प्रधान जी मानते हैं कि एनी बेसेण्ट का विचार और मानस थियोसोफिकल विचारों की चादर में अँट नहीं पा रहा था। उनका मन भारत की जनता के जीवन-संघर्षों को देखकर उद्वेलित था। वे भारतीय जनता के प्रति प्रेम और करुणा का भाव रखती थीं। अब वे धार्मिक और सांस्कृतिक चादर से बाहर निकल कर राजनीतिक समरभूमि में सक्रिय होने के लिए तैयार हो चुकी थी। प्रधान जी इस संक्रमण के दौर को और उनके व्यक्तित्व में आये परिवर्तनों को बहुत ही दक्षता से रखते हैं। 


"एनी बेसेण्ट की मुख्य दिलचस्पी भारत के धार्मिक और अध्यात्मिक आदर्शों में थी। वह उस समय चलने वाले भारतीय नवजागरण की लहरों से भी गहरे प्रभावित थीं। भौतिकवादी इंग्लैण्ड के मुकाबले अध्यात्मवादी भारत का उत्थान उन्हें एक आश्वासन-सा प्रतीत होता था। भारत की स्वाधीनता और उसकी राष्ट्रीय गरिमा को कायम करने के पक्ष में वे इसीलिए थीं ताकि उसके अध्यात्मिक व्यक्तित्व को और निखरने का अवसर मिले। भारत का सांस्कृतिक जागरण उनकी मुख्य चिंता थी।" (पृ. 20)


प्रधान जी एनी बेसेण्ट के मनोभावों के समानान्तर उस युग के परिदृश्य पर चल रही धार्मिक हलचलों को दिनकर जी के चार अध्याय के हवाले से रखते हैं। राजा राममोहन राय से स्वामी दयानंद सरस्वती तक तमाम धार्मिक नायकों की सक्रियताओं से देश में मचे भारी उथल-पुथल से परिदृश्य पर बहुत हलचल थी। दिनकर जी ने सभी धर्मों की एकता का समर्थन करने वाले एनी बेसेण्ट के विचारों को लक्षित किया था। प्रधान जी ने दिनकर जी के इस आसंग में उनके कथन को ही उद्धरित किया है- "चालीस वर्षों के सुगंभीर चिंतन के बाद मैं यह कह रही हूँ कि विश्व के सभी धर्मों में हिन्दू धर्म से बढ़ कर पूर्ण, वैज्ञानिक, दर्शनयुक्त एवं अध्यात्मिकता से लिए परिपूर्ण धर्म दूसरा और कोई नहीं है।" (पृष्ठ 22) राजा राममोहन राय, ईश्वर चन्द्र विद्यासागर, केशव चन्द्र, दयानन्द, विवेकानंद सहित सभी ने हिन्दू धर्म को यथावत स्वीकार नहीं किया था। सभी के पास आलोचनात्मक दृष्टि थी, सभी ने अपने विचारों को समाज में विनियोग करते हुए उसके गलित और मृत तत्त्वों को छोड़ कर उसके जीवंत और पोषक तत्त्वों को ले कर आगे बढ़े थे। इसमें खासतौर पर दयानंद सरस्वती से सनातनियों के बड़े उग्र शास्त्रार्थ होते थे। इसकी समाज में भी बड़ी तीखी प्रतिक्रिया होती थी। दयानंद सरस्वती एक बार सनातनी नगरी काशी आये तो अघोषित बहिष्कार जैसा वातावरण था। स्टेशन पर उनके स्वागत में कोई नहीं था सिवाय भारतेन्दु हरिश्चंद के। आप कल्पना कर सकते हैं हिन्दी नवजागरण के इस महान् नायक के व्यक्तित्व वैशिष्टय का। विचार विरोधी का ऐसा ससम्मान, आत्मीय स्वागत! ऐसी उदारता, ऐसी लोकतांत्रिकता बहुत कम ही देखने को मिलती होगी। 


प्रधान जी ने दिनकर जी के उद्धरणों से तनिक परहेज नहीं किया है। उनका उद्देश्य एनी बेसेण्ट की सोच और सक्रिय भूमिकाओं को प्रस्तुत करने का है। दिनकर जी के हवाले से वे कहते हैं कि एनी बेसेण्ट ने "संशोधित हिन्दुत्व के बजाय अखंड हिन्दुत्व का वीरतापूर्ण आख्यान किया।" बिना मुखर हुए, बिना शास्त्रार्थ और विवाद के, बिना किसी हस्तक्षेप के वे भावनिष्ठ हो कर सनातन धर्म की ओर झुकी रही। प्रधान जी ने उनकी इस अवस्था का सही आकलन इस प्रकार किया है-"वह भारतीय नवजागरण के भीतर हिन्दू पुनरुथानवाद की उस धारा का प्रतिनिधित्व करती हैं, जिसे सनातन हिन्दू धर्म का समग्र स्वरूप काम्य था। इसीलिए यह बिलकुल स्वाभाविक था कि भारत में उनके अत्यन्त घनिष्ठ सहयोगी एक ओर लोकमान्य तिलक हुए तो दूसरी ओर महामना मदन मोहन मालवीय।" (पृ. 22) लेकिन एनी बेसेण्ट का भारत, भारत की जनता और हिन्दू धर्म को ले कर पूर्ण सहमति ऐसी थी जिसे हम बिना आलोचनात्मक विवेक के स्वीकार नहीं कर सकते। उनमें धर्म को ले कर ऐसा झुकाव था कि सामाजिक चेतना और न्याय की वे पूरी अनदेखी कर जाती थीं। एक तरह से कह सकते हैं कि वे धर्म को ले कर ऐसी रूढ़िग्रस्त थीं कि आप उन्हें परंपरावादी और एक तरह से दक्षिणपंथी विचारों वाली मान सकते हैं। दान, यज्ञ, अक्रोध, त्याग, दया, सत्य, अहिंसा या क्षमा वाले सदाचार उनके आदर्श थे। लेकिन प्रधान जी ने उनका आकलन आलोचनात्मक नजरिये से करने में कोई संकोच नहीं किया है-"अवतार, पुनर्जन्म, कर्म, परलोक, आश्रम, वर्ण, पुरुषार्थ, संस्कार, श्रद्ध, पंच महायज्ञ आदि का आख्यान करते हुए शायद ही एनी बेसेण्ट के मन में कभी कोई संशय या प्रश्न उठा हो।" (प्र. 23) आगे वर्ण-व्यवस्था को ले कर उनकी समक्ष और स्वीकृति को प्रधान जी ने विस्तार से बताने की था। वे वर्ण-व्यवस्था तक को अपनी ओर से भरसक जस्टीफाई करने की कोशिश करती हैं। क्या आयरलैण्ड की होने के कारण वे वर्ण-व्यवस्था के अत्याचार और यातना को ठीक से समझ नहीं पा रही थी? लेकिन अनेक यूरोपीय इस व्यवस्था को ज्यादा बेहतर ढंग से समझ कर इस पर गंभीर काम किये हैं और इस कलंक की तीखी आलोचना भी की है? फिर क्या वे हिन्दू धर्म से इस कदर प्रभावित हो गई थीं कि वर्ण-व्यवस्था को इसका अनिवार्य हिस्सा मान कर इसे बनाये रखना चाहती थीं? प्रधान जी मानते हैं कि ये उनकी सोच की गड़बड़ी थी। भारत के विभिन्न धार्मिक नायकों ने हिन्दू धर्म को आलोचनात्मक नजरिये से देखा फिर भी एनी बेसेण्ट की सोच में कोई बदलाव नहीं आया। प्रधान जी लिखते हैं- "एनी बेसेण्ट हिन्दू समाज को एक आधुनिक समाज के रूप में परिवर्तित करने के बजाय उसे वर्ण-व्यवस्था के ही कल्पित खाँचे में जकड़ देना चाहती हैं। इस मामले में राजा राममोहन राय, विवेकानंद और दयानंद के विचार उनसे कोसो आगे थे।" (पृ. 24)

यह बात गौर करने वाली है कि इस कमजोर और नकारात्मक पक्ष के बावजूद आखिर एनी बेसेण्ट का नवजागरण नेत्री के रूप में लेने की प्रधान जी की कौन-सी विवशता थी? यही बात खासतौर से सीखने वाली है कि संक्रमण के दौर में बड़े से बड़े व्यक्तित्व में अनेक अंतर्विरोध होते हैं। वे अंतर्विरोधी तन्तु इतने उलझे होते हैं कि उनकी सोच और मानस की जटिलताओं को समझना बहुत मुश्किल हो जाता है। ऐसी स्थिति में अनेक विचारक ऐसे व्यक्तित्व को ले कर साफ-साफ पूरे नकार या पूरे स्वीकार की पद्धति अपना लेते हैं और उसके अनुरूप अपना तर्क प्रस्तुत कर देते हैं। यह एक अलग विचार रूढ़ि और बहस का सबब बन जाता है। इससे समाज में समन्वित विचारों के विकास में अवरोध पैदा होता है। आप लोकमान्य तिलक को लीजिए। उनमें ब्रिटिश साम्राज्यवाद विरोध का स्वर अत्यधिक उग्र था जबकि उनकी सामाजिक सोच अत्यन्त पिछड़ी हुई थी। कुछ उन्हें पूरा नकारते हैं तो कुछ उन्हें पूरा स्वीकार करते हैं और वे अब भी बहसतलब नायक बने हुए हैं। प्रधान जी ने नकार और स्वीकार की इन दोनों विचार पद्धतियों से एकदम परहेज किया है। वे गहरी अंतर्भेदी दृष्टि से एक अलग राह की तलाश करते हैं और एनी बेसेण्ट के सकारात्मक और नकारात्मक प्रवृत्तियों में संभावनाशील और जीवंत पक्षों को हिगरा कर अलग कर देते हैं। सामान्य और विशिष्ट आलोचकीय दृष्टि की पहचान ऐसे स्थलों से की जाती है। एनी बेसेण्ट में कुछ ऐसी सकारात्मक खूबियाँ थीं कि उनको पूरे विश्व में जैसी ख्याति मिली वैसी बहुत कम महापुरुषों को मिलती है।" वक्तृत्व के लिए मशहूर बर्नाड शॉ जैसा महान् नाटककार एनी बेसेण्ट की वक्तृत्व कला का भारी प्रशंसक था। संभवतः समूचे यूरोप में उनके जोड़ का वक्ता दूसरा नहीं" था। काशी उनका प्रिय शहर था और सामाजिक-राजनीतिक सक्रियता के अलावे शिक्षा के क्षेत्र में उनकी गहरी रुचि थी। उन्होंने 7 जुलाई 1898 को किराये के मकान में जिस सेंट्रल हिन्दू शिक्षण संस्था की शुरुआत की, वही 1912 में महामना मदनमोहन मालवीय और काशी नरेश प्रभुनारायण सिंह के सहयोग से काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के रूप में मूर्त हुआ। एनी बेसेण्ट ने उस अवसर पर अपने भाषण में यह कहा कि "धर्म की शिक्षा के बिना राष्ट्र जीवित रह सकता है और मनुष्य उन्नति कर सकते हैं, यह कहना और कुछ नहीं केवल बुद्धिहीनता की बात है। हम यह कहते हुए इतिहास की दुहाई देते हैं कि इंग्लैण्ड के सभी बड़े-बड़े स्कूल और कॉलेज धार्मिक व्यक्तियों के द्वारा ही स्थापित हुए थे।" इसकी पहली बैठक में उन्होंने एक महत्वपूर्ण बात कही "हिन्दू विश्वविद्यालय का यह कार्य होगा कि पूर्व और पश्चिम की संस्कृति में जो-जो अच्छी बाते हैं उनको मिला दिया जाय।" (पृ. 25) भारतीय नवजागरण में उनके विचार जिस धारा का प्रतिनिधित्व करते हैं काशी हिन्दू विश्वविद्यालय उसकी साकार और मूर्त अभिव्यक्ति है।

प्रधान जी ने एनी बेसेण्ट के प्रत्यक्ष व्यक्तित्व के प्रभाव को ले कर एक प्रसंग की बड़ी आत्मीय चर्चा की है। साड़ी पहने हुए उनके भव्य व्यक्तित्व का वर्णन करते हुए वे लिखते हैं कि जब वे मंच पर आती थीं तो लगता था- साक्षात सरस्वती आकाश से उतर कर विराजमान हुई हैं। काशी के एक पंडित ने कहा- 'सर्व शुक्ला सरस्वती'। अकारण नहीं था कि प्रेमचंद ने उनकी 86वीं जयंती और महाप्रयाण के बाद उन पर अत्यन्त प्रशंसात्मक टिप्पणी लिखी। वे उनके व्यक्तित्व से इतने प्रभावित थे कि अपने प्रसिद्ध उपन्यास 'रंगभूमि' में जिस ईसाई लड़की सोफिया का वर्णन किया है, वह एनी बेसेण्ट ही थी। आखिर में प्रधान जी ने उनके समग्र व्यक्तित्व को बड़े ही सधे हुए लेकिन आलोचनात्मक विवेक के साथ रखते हैं-"एनी बेसेण्ट का जीवन, विचार और व्यवहार एक रेखीय विकास का दृष्टांत न हो कर अनेक उतार-चढ़ावों, अंतर्विरोधों और विरोधाभासों से भरा हुआ है। उनका जीवन भौतिकवाद और अध्यात्मवाद, धर्म और राजनीति, हिन्दू धर्म और थियोसोफी के द्वंद्व की समर भूमि बन गया है। वे आमूलवादी और समाजवादी विचारों तथा होमरूल आंदोलन की ऊँचाइयों तक जा कर एक तार्किक परिणति तक पहुँचे बगैर वापस नीचे लौट आती हैं। ब्रिटिश उपनिवेशवादियों के अन्याय-अत्याचार के खंडन और विरोध में उनका साहस और उत्साह देखते बनता है लेकिन हिन्दू धर्म की कुरीतियों, अंधविश्वासों और सड़ी-गली रूढ़ियों के सामने वे हथियार डाल देती हैं।" (पृ. 26) प्रधान जी ने जिस तरह उनके समग्र जीवन का सार-संक्षेप रखा है- उसमें उनके व्यक्तित्व का एक तरह प्रतिबिम्बन हो जाता है। प्रधान जी ने उनके विचारों और उनकी भूमिका को भारतीय नवजागरण की एक खास धारा के रूप में लिया है। मसलन वे बताना चाहते हैं कि भारतीय नवजागरण में अनेक छोटी-बड़ी विचारधाराएँ थीं। जाहिर था उसमें अंतर्विरोध और परस्पर विरोधाभास हो सकते हैं बल्कि थे ही। फिर भी वे समन्वित दृष्टि से समग्र भारतीय नवजागरण को समृद्ध और विस्तार देते हैं। दरअसल इसी आलोचनात्मक और समन्वित दृष्टि के अभाव के कारण बहुत लोग भारतीय नवजागरण की प्रकृति को समझ नहीं पाते। वे या तो नकारते हैं अथवा विरोध करते हैं। इसलिए यहाँ सबसे महत्त्वपूर्ण और गौर करने वाली बात है अवधेश प्रधान की समन्वित दृष्टि!


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भारतीय नवजागरण में प्रधान जी ने स्वामी विवेकानंद की भूमिका का जितना भव्य वर्णन किया है और जो उनको जगह दी है, वैसा इसके पहले संभवतः किसी ने नहीं किया है। विवेकानंद पर लिखना एक अलग पक्ष है लेकिन नवजागरण में उनकी महती और केन्द्रीय भूमिका को स्थापित करना बिलकुल दूसरी बात है। इसलिए वे विवेकानंद के पास बार-बार जाते हैं। वे भगिनी निवेदिता की पुस्तक 'मेरे गुरु स्वामी विवेकानंद जैसा उन्हें देखा' के नाम से अनुवाद भी कर चुके हैं। बेशक भारतीय नवजागरण के अन्य अध्येताओं ने भारतीय नवजागरण और धर्म के रिश्ते को ले कर विचार किया है लेकिन उसे जो महत्त्व प्रधान जी ने दिया है और उसकी भूमिका को सोदाहरण प्रामाणिकता से प्रस्तुत किया है, वह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। उनके विचार-विश्लेषण में उनकी विशिष्ट दृष्टि एकदम नयी और विलक्षण है। जबकि धार्मिक मामलों में उसके सपाट होने की गुंजाइश ज्यादा होती है। रामविलास शर्मा ने भारतीय नवजागरण का जो विचार-विश्लेषण किया है, प्रधान जी की दृष्टि क्या उससे अलग और स्वतंत्र है? क्या रामविलास शर्मा के भारतीय नवजागरण को 1857 के सापेक्ष देखने और विचार करने का जो रास्ता था, उससे भिन्न प्रधान जी का रास्ता है? वह मौलिक और नवीन दृष्टि है तो जाहिर है भिन्न भी होगी। लेकिन वह रामविलास शर्मा के विपरीत नहीं है। भारतीय नवजागरण को ले कर वे रामविलास शर्मा से कहीं असहमत नहीं होते। वे भारतीय नवजागरण के विशाल क्षितिज का किंचित् विस्तार ही करते हैं, कुछ नया जोड़ कर उसे और समृद्ध करते हैं। एक तरह से उसका ये पूरक बन कर भारतीय नवजागरण के पाठ को और पूर्णता देते हैं।

प्रधान जी अपनी बात की शुरुआत यूरोपीय नवजागरण से करते हुए उसके और भारतीय नवजागरण के फर्क को हिगराते हैं। वे बताते हैं कि "यूरोपीय नवजागरण के पीछे चर्च की निरंकुशता के विरुद्ध विज्ञान द्वारा प्रेरित उद्बुद्ध जागरण का तीखा संघर्ष" था। यूरोप के इस आंदोलन ने "धर्म के स्थान पर विज्ञान को, श्रद्धा-विश्वास के स्थान पर तर्क को, चर्च के स्थान पर राज्य को और ईश्वर के स्थान पर मनुष्य को प्रतिष्ठित किया।" भारत में धर्म और विज्ञान को ले ले कर वैसा तीखा संघर्ष न था। यहाँ था ब्रिटिश राज की पराधीनता, ईसाई धर्म का प्रचार-प्रसार और अंग्रेजी सभ्यता का गहरा दबाव। यहाँ सबसे गहरी समस्या छुआछूत, जातिवाद, अंधविश्वास, कुप्रथा, पुरोहित-प्रपंच और रूढ़िवाद का था। इन सबकी जड़ें धर्म के नाम पर चल रही थीं। इसलिए प्रधान जी मानते हैं कि इनको उखाड़ फेंकने की पुकार भी धर्म के भीतर से उठी।"(पृ. 11) पूरे भारतवर्ष में राजा राममोहन राय, केशवचंद्र सेन, देवेन्द्रनाथ ठाकुर, स्वामी दयानंद, राना डे, रामकृष्ण, विवेकानंद, नारायण गुरु से ले कर महात्मा गाँधी तक ने जागरण और सुधार का तेज अभियान चला रखा था। इसमें पहली सफलता राजा राममोहन राय को मिली जब 1829 में लार्ड विलियम बेटिक ने सती प्रथा पर रोक लगा दी। राजा राममोहन राय के इस आंदोलन का विरोध बंगाल के ही राधाकांत देव कर रहे थे। उनका तर्क था कि यह मामला हिन्दू समाज का है, इसलिए सरकार को इसमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। इसे हम सुलझायेंगे।


राजा राममोहन राय का व्यक्तित्व बहुत बड़ा और बहुआयामी था। उन्होंने दुनिया के विभिन्न धर्मों का गहन अध्ययन किया था और इसमें वे एकत्व तत्त्व की तलाश कर रहे थे। हिन्दू, इस्लाम और ईसाई धर्मों के गहन विश्लेषण से उन्होंने एकेश्वरवादी ब्रह्म की बात खोज निकाली थी, जिससे इन तीनों धर्मों के बीच समन्वय और समझ स्थापित हो सके। चिंतक के स्तर पर सच पूछिये तो विभिन्न धर्मों में इतना अंतर और मतभेद नहीं होता है लेकिन जब धर्म संस्थागत रूप ग्रहण कर लेता है तो उसकी एक स्वायत्त सत्ता बन जाती है, जिसके पास धन, ताकत और अपने अनुयायिओं का प्रबल समर्थन होता है। तब धर्म का मूल तत्त्व गौण पड़ जाता है और स्वायत्त सत्ताएँ वर्चस्व-विस्तार और सशक्तिकरण के अभियान में लग जाती हैं। दूसरे धार्मिक विचारक केशव चंद्र सेन ने 1828 ई. में ब्रह्म समाज की स्थापना की। प्रधान जी यहाँ दिनकर जी का यह कथन उद्धरित करते हैं "ब्रह्म समाज यूरोप का भारतीयकरण नहीं, प्रत्युत भारत के ही यूरोपीयकरण का प्रयास था।" प्रधान जी महाराष्ट्र के प्रार्थना समाज को ब्रह्म समाज का ही महाराष्ट्रीय संस्करण कहते हैं। स्वामी दयानंद का रास्ता अनेक वाद-विवादों और आलोचनाओं के तीखेपन से भरा हुआ था। उन्होंने ईसाई, इस्लाम, जैन, बौद्ध, चार्वाक मत के साथ-साथ बैष्णव, शैव, शाक्त, तांत्रिक-सभी मतों की तीखी आलोचना की। प्रधान जी उनकी भूमिका का आकलन करते हुए लिखते हैं "उनके आर्य समाजी सुधारवाद के भीतर मतांधता का एक जबर्दस्त पहलू मौजूद था। जब मान लिया गया कि सभी प्रकार के ज्ञान का स्रोत वेद में है तो फिर वैदिक युग के बाद के, विशेष रूप से 19वीं सदी के हर प्रकार के नये ज्ञान को, विशेष रूप से विज्ञान की खोजों को समझने, उनसे सीखने और नया सोचने का रास्ता ही बंद हो गया।" (पृ० 12)

इन तमाम धार्मिक नायकों की तुलना में प्रधान जी को रामकृष्ण परमहंस के प्रिय शिष्य स्वामी विवेकानंद के तेजस्वी व्यक्तित्व, ओजस्वी भाषण और आधुनिक युग में तर्कशीलता अगर ज्यादा प्रभावित करती है तो यह अकारण और असंगत नहीं है। रामकृष्ण परमहंस ऐसे संत थे जिनका ईश्वर से साक्षात्कार हो चुका था। प्रधान जी विवेकानंद के हवाले से बताते हैं कि उन्होंने अनुभूत किया था कि सभी धर्म-संप्रदाय 'एक ही आत्मा, एक ही ईश्वर की शक्ति से परिचालित हो रहे हैं। उनका व्यक्तित्व तमाम धर्मों के बीच एक अद्भुत समन्वय देख रहा था।" उन्होंने एक हृदय और मस्तिष्क के सार्वभौम धर्म को प्रकट किया।" (पृ. 13) उनके शिष्यत्व में ही विवेकानंद के मानस का निर्माण हुआ था। विवेकानंद ने भी सभी पैगम्बरों के प्रति श्रद्धा व्यक्त की। अपने गुरु की तुलना में विवेकानंद में प्रत्यक्ष पार्थिवता ज्यादा थी। जो देश-प्रेम और सामाजिक सेवा के रूप में दिखाई देती है। प्रधान जी लिखते हैं- "स्वामी जी के इस आदर्श का राष्ट्रीय और वैश्विक महत्त्व इस बात में है कि यह सभी धर्मों को मानने वाले जनगण को क्रमशः निकट लाने का काम करते हैं और इस प्रकार राष्ट्रीय और वैश्विक एकता को मजबूत करते हैं। यह अद्वैत वेदांत के विचार का ही विस्तार है। जो हमें भिन्नता में अभिन्नता, भेद में अभेद, अनेक में एक का दर्शन करना सिखाता है, एक के साथ बहु का समन्वय करना सिखाता है। आज का बहुधर्मी भारत स्वामी जी के इसी आदर्श पथ का पथिक है।" (पृ. 13-14) समन्वय की यह चेतना प्रधान जी के आलोचनात्मक दृष्टि का सबसे प्रमुख वैशिष्ट्य है। इसे आप उनके तमाम वैचारिक विश्लेषण में बार-बार पायेंगे। विवेकानंद के व्याख्यान में जो तेजस्विता, ओज और अमोघ असर दिखाई देता है, उसके मूल में उनके निःस्वार्थ और पवित्र, भाव और विचार ही हैं। प्रधान जी ने उनके वांग्मय से ऐसे अनेक उद्धरणों को रखा है। "धर्म का रहस्य आचरण से जाना जा सकता है, व्यर्थ के मतवादों से नहीं। भले बनना तथा भलाई करना इसी में सारा धर्म निहित है।" (पृ. 14)

विवेकानंद ने धर्म के मूल सत्त्व को अपनी चेतना और अभिव्यक्ति में विन्यस्त किया था। वे हर व्यक्ति, हर समाज से ऐसी ही अपेक्षा रखते थे। देश और समाज के प्रति उनके कर्तव्य-बोध को प्रधान जी बार-बार और विस्तार से बताते हैं। "प्रत्येक आत्मा अव्यक्त है।" यह सत्य सारे मनुष्य को सारे प्राणी जगत् को समान मानने को प्रेरित करता है। मतवाद, भिन्न पूजा-पद्धति या मंदिर, गिरजाघर, मस्जिद या गुरुद्वारा ये सब, वाह्य क्रियाएँ हैं। आप उनके कथन पर गौर करें "भारत का मेरुदंड धर्म है और इसलिए उन्होंने निद्रा और आलस्य में मग्न भारत को जगाने के लिए धर्म की भाषा का प्रयोग किया। अगर सभी मनुष्य आत्म स्वरूप हैं तो फिर उनमें संप्रदाय का, जाति-बिरादरी का, लिंग का, ऊँच-नीच का भेदभाव क्या? स्वामी जी ने छिटपुट समस्याओं को लेकर अलग-अलग पैबंद लगाने के बजाय मानव-चित्त को ही क्रांतिकारी रूप से बदल डालने का आह्वान किया।" (पृ. 14) प्रधान जी आधुनिक आसंगों में भयानक धार्मिक मतवादों के टकराव और खतरों को भली-भाँति समझते हैं। उनकी कोशिश इसे खत्म कर समन्वित भाव और विचारों के प्रसार की है। इसमें उन्हें सबसे कारगर और प्रभावशाली विवेकानंद लगते हैं। इसलिए विवेकानंद को ले कर उनका विश्लेषण और उनकी आकांक्षा सकारात्मक ढंग से फलीभूत होने की है।

भारत के पास धर्म और अध्यात्म का विशाल वैभव है तो यूरोप के पास विज्ञान का अपार उत्कर्ष। वे कहते हैं कि हमको भाववादी रोमान में लिपटे रह कर नहीं, बल्कि ठोस जमीन पर मजबूती से पैर जमा कर उन्नति करनी होगी। विवेकानंद कहते हैं कि "हमें अपने स्वभाव के अनुसार उन्नति करनी होगी।" क्योंकि "सबके लिए एक मार्ग हो ही नहीं सकता।" विवेकानंद की प्रासंगिकता को प्रधान जी गरीब और पीड़ित जनता और स्त्री समुदाय की दुर्दशा को ले कर जो वे गहरी पीड़ा महसूस करते हैं प्रधान जी वहाँ से विवेकानंद को समझने-समझाने की कोशिश करते हैं। उनका घोषित नारा था- "पहले रोटी और तब धर्म।" उन्होंने कहा "जो भगवान् मुझे यहाँ पर रोटी नहीं दे सकता वह स्वर्ग में मुझे अनंत सुख देगा? उनका आह्वान था "भारत को उठाना होगा, गरीबों की बुराइयों को दूर करना होगा। पुरोहित-प्रपंच और सामाजिक अत्याचारों का कहीं नामो-निशान तक न रहे। सबके लिए अधिक अन्न और सबको अधिकाधिक सुविधाएँ मिलती रहें। (पृ. 16) यह धार्मिक नहीं एक सामाजिक क्रांतिकारी का स्वर है। प्रधान जी विवेकानंद को धर्म, अध्यात्म और दार्शनिक उपलब्धियों के परे जा कर उनके व्यक्तित्व के मानवीय पक्ष को उठाते हैं। मनुष्य की भौतिक पीड़ा की प्राथमिकता विवेकानंद को अन्य धार्मिक नेताओं से अलग करती है। भारत को उस युग में झकझोर कर जगाने वाले विवेकानंद अगर भारतीय नवजागरण के अग्रदूत न होंगे तो और कौन होगा?

विवेकानंद ने 11 सितंबर 1893 को शिकागो में जो व्याख्यान दिया था उसकी 125वीं वर्षगांठ भारत सहित दुनिया के अनेक देशों में मनाई गई। मुझे नहीं लगता कि आधुनिक विश्व के इतिहास में किसी महापुरुष के व्याख्यान को इतने लंबे अंतराल पर विश्व व्यापी अहमियत दी गई हो। आखिर इस व्याख्यान को इस तरह याद करने की प्रासंगिकता क्या है? प्रधान जी ने उस व्याख्यान को सटिप्पण उद्धरित करते हुए यही विवेचन किया है। वे विवेकानंद के इस व्याख्यान के हवाले से बताते हैं कि स्वामी जी की यह स्वीकृति अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है कि हम लोग न सिर्फ सारे धर्मों के प्रति सहिष्णुता में यकीन करते हैं, बल्कि सभी धर्मों को सच्चा मान कर स्वीकार करते हैं। 'स्वामी जी के लिए सभी धर्मों की सार्वभौम स्वीकृति' मात्र विचार और शब्द न थे बल्कि उन्होंने अपने गुरुदेव के आध्यात्मिक जीवन में इसे प्रत्यक्ष देखा भी था। उन्होंने सांप्रदायिक संकीर्णता से आगाह करते हुए कहा कि कोई एक उपाय, एक रास्ता पकड़ कर चलते रहो, लेकिन किसी अन्य उपाय, मत या मार्ग है निन्दा मत करो।" (पृ. 50-51) यह विश्व के रक्तरंजित इतिहास की आवृत्ति से बचाव का पहला सूत्र था।" सांप्रदायिकता, हठधर्मिता और उनकी बीभत्स वंशधर धर्मान्धता इस सुंदर पृथ्वी पर बहुत समय तक राज्य कर चुकी है।" आप इन शब्दों के उस आयोजन में पड़ने वाले असर की सहज ही कल्पना कर सकते हैं। अपने व्याख्यान के आखिर में उन्होंने कहा- "मैं आंतरिक रूप से आशा करता हूँ आज सुबह इस सभा के सम्मान में जो घंटा ध्वनि हुई है वह समस्त धर्मान्धता का तलवार या लेखनी द्वारा होने वाले सभी उत्पीडनों का तथा एक ही लक्ष्य की ओर अग्रसर होने वाले मानवों की पारस्परिक कट्‌टरताओं का मृत्यु निनाद सिद्ध हो।" (प्र. 51) जाहिर है कि विभिन्न धर्मों से अपने धर्म की श्रेष्ठता सिद्ध करने के विवाद पर वे चोट कर रहे थे। इसमें कोई किसी से कुछ सीखने के लिए तैयार नहीं। सभी कूपमंडूक बने हुए हैं। विश्व के मंच से जब पूरी ओजस्विता से ये बातें कही जा रही होंगी तो भारत और विश्व में इसके गहरे असर और हलचल की हम कल्पना कर सकते हैं। यह गुलाम भारत के एक युवा संन्यासी का स्वर था। स्वामी जी की यह स्पष्ट धारणा थी कि "किसी एक धर्म की विजय और बाकी सब धर्म के विनाश" के द्वारा यह संभव नहीं। वे धर्मान्तरण पर चोट करते हैं। स्वामी जी धर्मों के आपसी वैमन्यस्य और इससे उत्पन्न युद्ध और विनाश को समझ रहे थे इसलिए उन्होंने आखिरी दिन के अंतिम संबोधन में इसे समाप्त करने की उनमें गहरी आतुरता और उम्मीद दिखाई देती है कि "शीघ्र ही सारे प्रतिरोधों के बावजूद, प्रत्येक धर्म की पताका पर लिखा रहेगा- 'सहायता करो लडो मत। पर भाव-ग्रहण न कि पर भाव विनाश।' समन्वय और शांति न कि मतभेद और कलह।” (पृ. 52) बेशक ये विचार मानव स्वभाव, कृत्य ओर इतिहास को बदल नहीं पाते लेकिन विवेकशील मानवता के लिए आत्मशोधन का एक द्वार तो खोल ही जाते हैं।

उनके इस व्याख्यान का प्रभाव भारत के भीतर विभिन्न धर्मों के मतवादों और विवादों पर भी पड़ा। वे बार-बार और सार-रूप से विभिन्न धर्मों के बीच समन्वित एकता की बात कर रहे थे। उन्होंने ईसाई धर्म मानने वाले प्रचारकों की कड़ी आलोचना की। वे इनको संबोधित कर कहते थे कि आप अकाल और भूख से मर रहे लोगों के लिए अपने यहाँ से धर्म प्रचारकों को भेजते हैं लेकिन भूख से मनुष्य को बचाने के लिए कुछ नहीं करते। भारतवर्ष में भूख से भयानक अकाल में लाखो लोग मारे गये। लेकिन अपने धर्म को करुणा का धर्म कहने वाले ईसाइयों ने उनके लिए कुछ नहीं किया। वे उनको लज्जित करते हुए, कोसते हुए बड़ी निर्भीकता से कहते हैं - कि आप सारे हिन्दुस्तान में गिरजे बनाते हैं लेकिन पूर्व का प्रधान अभाव धर्म नहीं, उनके पास धर्म पर्याप्त है- जलते हुए हिन्दुस्तान के लाखों दुःखार्त भूखे लोग सूखे गले से रोटी के लिए चिल्ला रहे हैं। वे हमसे रोटी माँगते हैं और हम उन्हें देते हैं पत्थर। क्षुधातरों को धर्म का उपदेश देना उनका अपमान करना है, भूखों को दर्शन सिखाना उनका अपमान करना है। "(पृ॰ 53) गाँधी जी ने उनके और आदर्श को अपनी ओर से मूर्त्त करने की कोशिश की। उन्होंने सर्वधर्म समभाव के द्वारा धर्मों के बीच आपसी कटुता खत्म करने की भरसक कोशिश की लेकिन जो धर्म को आंतरिक स्तर पर महसूस नहीं करता, धर्म उसके लिए प्रदर्शन की तरह है। वह धर्म को एक धंधा बना चुका है। विवेकानंद और गाँधी के आदर्शों का उनके लिए क्या महत्व? कुछ अन्य भी कमजोरियाँ हैं जिनके कारण मनुष्य बार-बार अपनी पुरानी प्रवृत्तियों में ही लौट जाता है। 

वह युग पूर्व और पश्चिम के टकराव का था। पश्चिम एक विजेता था और पूर्व पराजित उपनिवेश। स्वामी जी ने इस अहम् मुद्दे पर महत्त्वपूर्ण बात कही है। विश्व मानवता का हित इस बात में है कि पश्चिम और पूर्व के बीच आदान-प्रदान की संस्कृति विकसित हो जिसमें पश्चिम भारत की आर्थिक, भौतिक, वैज्ञानिक, सामाजिक प्रगति में सहायता करे और भारत पश्चिम की आध्यात्मिक प्रगति में।" (पृष्ठ 54)  प्रधान जी उनके समन्वित एकता के विचार और भाव को बार-बार रेखांकित करने की कोशिश करते हैं क्योंकि धर्मों के बीच वैमन्यस्य मानवता के लिए भयावह खतरा है। धार्मिक द्वेष, श्रेष्ठता का बोध और वर्चस्व की भावना से इतिहास सबसे अधिक लहूलुहान हुआ है। स्वामी जी ने इससे दुनिया को मुक्ति का एक नया रास्ता सुझाया। यह अत्यन्त उल्लेखनीय बात थी। यह अकारण नहीं है कि प्रधान जी ने भारतीय नवजागरण के इस सबसे उदात्त स्वर को केन्द्रीय महत्त्व दिया। दरअसल ऐसा करने के पीछे उनके पास ठोस साक्ष्य मौजूद थे। वे इतने सशक्त थे कि उसको छोड कर भारतीय नवजागरण के केन्द्र में दूसरा और कौन-सा स्वर होता? आखिर नवजागरण है क्या? तंद्रा में आलस्य में पड़ी हुई जनता को जगाना, उनमें नया ओज, तेजस्विता और सकर्मक उत्साह भरना।

प्रधान जी ने स्वामी विवेकानंद के व्याख्यानों को ले कर एक ऐतिहासिक महत्त्व का व्याख्यान दिया था। उनकी वक्तृता शैली में जबर्दस्त सम्मोहन है। जब वे बोलते हैं तो श्रोता बिलकुल मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। इसमें उन्होंने स्वामी जी के जाग्रत् उद्बोधन को उसी अंदाज में प्रस्तुत करने की चेष्टा की है।" महानिद्रा में निमग्न वह शव मानों जाग्रत हो रहा है।... देखो, वह निद्रित भारत अब जागने लगा है। जो अंधे हैं वे ही देख नहीं सकते और जो विकृत बुद्धि हैं वे ही समझ नहीं सकते कि हमारी मातृभूमि अपनी गंभीर निद्रा से अब जाग रही है। अब कोई उसे रोक नहीं सकता। अब यह फिर सो भी नहीं सकती। कोई बाह्य शक्ति इस समय इसे दबा नहीं सकती क्योंकि यह असाधारण शक्ति का देश अब जाग कर खड़ा हो रहा है।" (पृ० 56) आखिर नवजागरण का इससे ज्यादा आशा और विश्वास से भरा ओजस्वी स्वर और किसका हो सकता है?

प्रधान जी इस स्वर की अन्य भूमिकाओं को भी रेखांकित करते हैं। वे कहते हैं कि इसके बाद भारतीय कविता में जो रोमांटिक उत्थान आया उसमें स्वाजी जी के इसी स्वर की प्रतिध्वनि थी। रवीन्द्र नाथ टैगोर की अनेक कविताओं का उन्होंने उदाहरण दिया है और उल्लेख किया है। यह भारतीय नवजागरण में एक नया और अलहदा स्वर था। वे विश्व बंधुत्व को वैज्ञानिक आधार देने की तार्किक कोशिश करते हैं।" जिस प्रकार आधुनिक विज्ञान सारे संसार का एकत्व सिद्ध कर रहा है उसी प्रकार वेदांत मानता है कि समस्त विश्व के इस एकत्व के पीछे जो आत्मा है, वह भी एक ही है। समस्त ब्रह्मांड में केवल एक आत्मा ही विद्यमान है- सब कुछ एक उसी की सत्ता है।' इस सत्य को आचरण में उतारने की जरूरत है। यह समझने की जरूरत है कि हम और तुम भाई-भाई ही नहीं, बिलकुल एक हैं।” (पृ. 60) सभी के बीच एकत्व का यह आधार ही उनको विभाजित करने वाली व्यवस्थाओं के खत्म करने का विवेक और ताकत देती है। इसलिए वे आनुवंशिक वंशानुक्रम के सिद्धांत का विरोध करते हैं। जाति-पाँत के भेद को खत्म करने का आह्वान करते हुए कहते हैं कि हर एक को यह समझने की सख्त जरूरत है कि "ऊँच-नीच, अमीर-गरीब और बड़े-छोटे सभी में उसी एक अनंत आत्मा का निवास है... वास्तव में कोई भी दुर्बल नहीं है। आत्मा अनंत, सर्वशक्ति संपन्न और सर्वज्ञ है। इसलिए उठो, अपने वास्तविक स्वरूप को प्रकट करो। उतिष्ठत जाग्रत प्राप्य वारान्निबोधत।" (पृ. 61) प्रधान जी बताते हैं कि भारतीय नवजागरण की इसी दार्शनिक पृष्ठभूमि के आधार पर वे धर्म और विज्ञान के बीच द्वेष और विवाद को व्यर्थ मानते हैं। इससे परस्पर संवाद और मैत्री होनी चाहिए।विवेकानंद के विचार और उनकी दृष्टि बिलकुल साफ थी। वे जहाँ एक ओर पुरानी रूढ़ियों को खत्म करना चाहते थे, वहीं वे किसी भी तरह के धार्मिक रहस्यवाद और चमत्कारवाद का भी निषेध करते थे। वे सुधार नहीं बुनियादी बदलाव चाहते थे। इसलिए वे आधुनिक शिक्षा में विज्ञान और वेदांत की बात करते हैं। आगे चल कर उनके व्याख्यान में गरीब जनसाधारण और स्त्रियों की जीवन-दुर्दशा को सबसे अधिक जगह मिली। वे विधवा-विवाह की समस्या को उच्च वर्ण की समस्या मानते थे। मसलन वे चाहते थे स्त्रियाँ शिक्षित हो कर वे खुद तय करें कि उनको क्या करना है! जाति भेद और छुआछूत के प्रति उनकी प्रतिक्रिया बहुत तीखी थी। उनका आदर्श था "सब ब्राह्मण बने, सब ऋषि बने।" ज्ञान पर सभी का समान अधिकार है। उन्होंने नारा दिया "चांडाल को उठा कर ब्राह्मण बनाना है।" 

प्रधान जी ने स्वामी विवेकानंद के शिकागो वक्तृता को ले कर एक बहुत ही दिलचस्प और दुर्लभ जानकारियों से भरा लेख लिखा है। मैं ही नहीं, मेरा ख्याल है इससे विवेकानंद पर लिखने वाले कुछ लेखक भी अनभिज्ञ होंगे। शिकागो वक्तृता की जो भारत के तत्कालीन पत्रों में व्यापक चर्चा हुई उसका संकलन और विश्लेषण करते हुए शंकरी प्रसाद बसु ने छह खंडों में एक अत्यन्त श्रमसाध्य और अद्भुत काम किया- 'विवेकानंद ओ समकालीन भारत वर्ष'। यही काम अमेरिका में उनके धर्म प्रचार के बारे में तत्कालीन अमेरिकी पत्रों से उपलब्ध सामग्री की खोजबीन कर के मेरी लुईबर्क ने भी छह खंडों में ही एक अविस्मरणीय शोध ग्रंथ लिखा था- 'स्वामी विवेकानंद इन अमेरिका न्यू डिस्कवरी'। प्रधान जी ने इन दोनों ग्रंथों का बहुत ही विस्तार से विचार-विश्लेषण किया है। उनका सारा विश्लेषण भारतीय नवजागरण के आसंग में है। बिना विस्तार में गये इसमें कुछ की चर्चा इसलिए अपेक्षित है कि इसके चयन और प्रस्तुति में प्रधान की सोच और नजरिये का भी पता चलता है। उनकी सबसे बड़ी खूबी है- स्पष्टता! इस मामले में रामविलास शर्मा उनके आदर्श हैं। वे इतने स्पष्ट हैं कि उनकी बातें एक सामान्य नागरिक भी समझ लें और कुटिल बुद्धिमत्ता वाले बुद्धिजीवी कोई इच्छित अर्थ आरोपित न कर सकें। 


उन्होंने 7 मई 1897 को 'मिरर' में प्रकाशित हेलेन हाटिंगटन के पत्र की चर्चा की है जो नियमित गिरजाघर जाने वाले एक धार्मिक ईसाई थे। वे विवेकानंद से गहरे प्रभावित हुए थे। लिखते हैं, "उन्होंने हमारे बीच एक ऐसे धर्म का प्रचार किया जो मत और बंधन को स्वीकार नहीं करता, जो उन्नत करता है, पवित्र करता है, हृदय को अनंत आश्वासन से पूर्ण कर देता है और निंदा बिलकुल नहीं करता। उनका धर्म मनुष्य और ईश्वर के प्रति प्रेम द्वारा गठित है और पूर्ण चारित्रिक पवित्रता के ऊपर निर्भर है।" (पृ.32) इंडियन मिरर के संपादक नरेन्द्र नाथ सेन ने भी स्वामी जी की वक्तृता के अमेरिकन समाचार पत्रों में छपे 'तथ्यों का संग्रह कर के' पाठकों के बीच प्रसारित करने की कोशिश की थी। 6 दिसंबर 1893 के अंक में उनका यह कथन बहुत ही महत्त्वपूर्ण और मानीखेज है। यह उनकी वक्तृता के गहरे असर को भी बताती है। "जब वे बोलना शुरू करते हैं, खोल को हटा कर भीतर का मनुष्य बाहर निकल आता है, देखते हैं कि अब शक्ति कई गुना हो उठी है और विशाल श्रोतामंडली हिंदुओं के वैदिक धर्म की प्राणोत्तप्त व्याख्या भाव-विह्वल हो कर सुने जा रही है।" (पृ. 33) इससे उस दौर के हलचलों को काफी हद तक महसूस किया जा सकता है।


मिरर ने स्वामी जी की वक्तृता को ले कर लंबे समय तक लिखा और उसे सार्वजनिक बहस का विषय बना दिया। वह काफी उत्साहित और आशावान लग रहा है। 12 मार्च 1894 के संपादकीय में उसने इसे धर्म का महान नवयुग कहा और इसके निकट भविष्य में आने की आशा व्यक्त की।" जो सहिष्णुता और वैचारिक उदारता हिन्दू धर्म का अन्यतम वैशिष्ट्य है और जो अन्य धर्मों से उसको बहुत कुछ अलग विशिष्टता प्रदान करती है उसको विवेकानंद से पहले विश्व की दृष्टि में इतने स्पष्ट और सजीव रूप से किसी और ने नहीं रखा था।" (पृ. 34) दरअसल अन्य धर्मों में सहिष्णुता और उदारता का ऐसा अभाव था कि स्वामी जी के ये विचार लोगों को और गहरे आकर्षित करते थे। स्टेट्समैन और इंगलिशमैन ईसाई समर्थन पत्र होने के बावजूद उनकी वक्तृता की अनदेखी नहीं कर पा रहे थे। यही हाल बेंगाली, लाहौर ट्रिब्यून, बाम्बे गजट और टाइम्स ऑफ़ इंडिया का था। मद्रास मेल और मद्रास टाइम्स ने भी खुल कर प्रशंसा की। हार्वेस्ट फील्ड मिशनरी पत्र था, जो इसे हिन्दू नवोत्थान के रूप में देख रहा था। नेटिव ओपिनियन, इंपीरियल एण्ड एशियाटिक क्वार्टरली, बाम्बे कैथोलिक एकजामिनर जैसे पत्रों ने जो ईसाई धर्म के प्रति कट्टर थे और जो प्रशंसा में कंजूसी भी कर रहे थे और भारत में  इसके प्रभाव से आये उछाह की प्रकारांतर से आलोचना भी कर रहे थे। लेकिन प्रधान जी ने 'एक ऐंग्लो इंडियन पत्र' के साहस की प्रशंसा करते हुए उसके लिखे को उद्धृत किया है। "भारत जाग रहा है। भारत में रेनेसों के लक्षण दिखाई दे रहे हैं। चाहे जिधर देखिये, भारत के लोगों ने अपने ढंग से सोचना और काम करना शुरू कर दिया है। शिल्प, वाणिज्य, राजनीति पत्रकारिता और विज्ञान में भारत आगे बढ़ रहा है, लेकिन अफसोस कि अंग्रेज शासक डॉ. जगदीश चंद्र बसु के समान मौलिक प्रतिभा सम्पन्न वैज्ञानिक का समादर करना नहीं चाहते और साथ ही भारतीयों में मौलिकता के अभाव का शोर भी मचाते हैं।" (प्र. 40) ये सारे प्रकरण भारतीय नवजागरण की हलचलों के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। यह भारतीयों की भीतरी कसमसाहट के प्रत्यक्ष संकेत हैं। इस विस्तृत लेख को पढ़ना न सिर्फ विवेकानंद की वक्तता के असाधारण असर को ले कर बल्कि भारतीयों में नवजागरण की सुलगती आग को भी बताती है। यह उस दौर की जीवंत हलचलों का सजीव और चाक्षुष दस्तावेज है।


(5)

नवजागरण पर लिखने वाले शायद ही किसी अध्येता ने भारतेन्दु हरिश्चंद्र पर न लिखा हो। डॉ. अवधेश प्रधान भी इसके अपवाद नहीं। भारतेन्दु पर उनके लिखे मेरे सामने दो लेख हैं। पहले लेख में कि उन्होंने 'कवि वचन सुधा' का 150 साल के बाद पीछे मुड़ कर मूल्यांकन किया है। प्रधान जी ने जो कुछ लिखा है वे समकालीन जो समय आसंग को कभी नहीं छोड़ते। अतीत के पृष्ठप्रेषण और विलास-व्याख्या में उनका तनिक विश्वास नहीं। वे लेख की शुरुआत कवि वचन सुधा के प्रत्येक अंक में छपने वाले मोटो जो पद्य में है उसकी व्याख्या से करते हैं। पद्य इस प्रकार है-

"खलगनन सों सज्जन दुखी मति होंहि हरि पद मति रहै।

अपधर्म छूटै स्वत्व निज भारत गहै कर-दुख बहै।

बुध तजहिं मत्सर नारि नर सम होहिं जग आनंद लहै।

तजि ग्राम कविता सुकविजन की अमृतवाणी सब कहै।"

'हरिपद मति रहै' और 'अपधर्म छूटे' में धर्म और धार्मिक सुधार की मंशा है तो 'नारि नर सम होहि' में समाज सुधार से आगे बढ़ कर स्त्री-पुरुष संबंधों में समानता की क्रांतिकारी घोषणा है। विद्वान आपसी ईर्ष्या-द्वेष छोड़े, लोग अश्लील और फूहड़ कविता का त्याग करें और सुकवि जन की अमृत वाणी का आस्वादन करें। यह साहित्य-संस्कृति के क्षेत्र में नए जागरण की पुकार थी। अंगरेजी राज के टैक्स का बोझ दूर हो- यह फौरी माँग थी। लेकिन 'स्वत्व निज भारत गहै' तो मानो समग्र नवजागरण के स्थायी कार्यक्रम का केन्द्रीय नारा था।" (पृ. 84) मसलन भारतेन्दु की शुरुआत से ही नवजागरण के अंकुर फूटने का संकेत था। नये स्वर और दृढ़ संकल्प की घोषणा थी। प्रधान जी की कोशिश होती है कि वे अपने उपजीव्य महापुरुष या रचनाकार के मूल तक जाय। उसके डीएनए की परख करें। बेशक डॉ. रामविलास शर्मा से डॉ. शंभुनाथ जैसे बड़े अध्येताओं ने भारतेन्दु पर स्वतंत्र पुस्तकें लिखी हैं और शायद ही किसी के लिए किसी नये संधान की गुंजाइश छोड़ी हो। लेकिन प्रधान जी की सूक्ष्म दृष्टि अपना स्पेस ढूँढ ही लेती है। उनकी सबसे बड़ी खूबी है अपने अनुभव-संधान को मौलिक रूप में प्रस्तुत करने का अंदाज। भारतेन्दु ने एक लेख लिखा 1874 में, और 'अंधेर नगरी' 1881 ई. में। प्रधान जी ने अंग्रेजी राज के अंधेर मचाने को ले कर इस सिलसिले की चर्चा की है कहना न होगा कि उनकी टिप्पणियों और लेखों में अंधेर, अंधेर गर्दी, अंधेर नगरी जैसी पदावली अक्सर दिखाई देती है और वह भी शुरू से।" (पृ. 87) जाहिर है भारतेन्दु पर इतना अधिक लिखा जा चुका है उसमें किसी प्रसंग, विचार अथवा घटना की आवृत्ति से बचना मुश्किल है।

अंग्रेजों ने ऐसी फौजदारी दंड संहिता बनाई जिसमें अंग्रेज अपराधियों के मुकदमें अंग्रेज जज ही सुनेंगे। यहाँ के कला-कौशल को खत्म कर देश का धन-धान्य लूट कर अपने देश ले गये। हमारे यहाँ जो अकाल मौतें लाखों की संख्या में होती थी भारतेन्दु उसे दैवी प्रकोप नहीं मानते थे। यह अंगरेजी राज की अनीति का कुफल था। प्रधान जी इन तमाम मुद्दों की चर्चा करते हैं। उन्होंने दादा भाई नौरोजी की इंग्लैण्ड की एक सभा में दिये व्याख्यान को उद्धरित किया है कि महमूद गजनी ने भारत में 18 बार हमला किया और उसे लूटा लेकिन जितना तुम एक साल में लूट कर ले जाते हो उतना वह 18 बार में न ले सका।" (पृ. 90) लूट की चर्चा का पहला उल्लेख भारतेन्दु ने ही किया था। भारतेन्दु की देशभक्ति जज्बाती नहीं थी। उसके पीछे ठोस कारण गहरी समझ थी। 23 मार्च 1874 की कवि वचन सुधा में भारतेन्दु ने पहली बार स्वदेशी वस्तुओं के व्यवहार की अपील की थी। वह जिन शब्दों में था, उसमें जो भाव और समझ थी उसकी चर्चा डॉ. रामविलास शर्मा ने बहुत ओजस्वी और ऊँचे स्तर पर की थी। प्रधान जी उस अपील के बाद डॉ. शर्मा की उस टिप्पणी को ही देते हैं। "हिन्दुस्तान के स्वाधीनता संग्राम में यह प्रतिज्ञापत्र स्वर्णाक्षरों में लिखे जाने योग्य है।" रामविलास जी ने लिखा है कि तरुण हरिश्चंद्र ने इस प्रतिज्ञा पत्र से समूचे भारत के लिए नए युग का द्वार खोल दिया था।' यह ब्रिटिश साम्राज्यवाद पर पहली चोट थी। लिखते हैं- "उस दिन हरिश्चंद्र की कलम से भारतीय जनता ने अंग्रेजी राज के विनाश का वारंट लिख दिया था।" आप सोच सकते हैं कि रामविलास शर्मा ने कितनी उदारता और विश्वास से ये बातें लिखी।" (पृ. 91)

प्रधान जी ने भारतेन्दु के हवाले से उन तमाम पक्षों को उठाया है. जिस पर कमोबेश रामविलास जी सहित अन्य अध्येताओं ने लिखा है। कला-कौशल पर ध्यान देना, विज्ञान की उन्नति के लिए धनी और विचारवान लोगों को आगे आने के लिये प्रेरित करना। प्रधान जी ने उनकी हरिद्वार यात्रा में रुड़की के शिल्प विद्या कारखाने के वर्णन का भी हवाला दिया है जिसमें उन्होंने जलचक्की और पवनचक्की संयत्रों की विस्तार से चर्चा की है। उन्होंने सैय्यद अहमद खान को कहा कि वे अरबी पढ़ा कर मुसलमानों का भला क्या करेंगे? वे उनको कला सिखावें। उनकी इच्छा हिन्दी विश्वविद्यालय के साथ, इंजीनियरिंग कॉलेज खोलने की भी थी। सबसे अधिक गौर करने वाली बात यह थी कि वे इनकी शिक्षा का माध्यम हिन्दी रखना चाहते थे। वे नीतिप्रकाश नाम से हिन्दी में विधि और कानून की एक पत्रिका निकालना चाहते थे। प्रधान जी ने इस सबकी विस्तार से चर्चा करते हुए लिखा है कि "भारतेन्दु का हृदय अत्यन्त उदार था। उसमें देश की चिंता के आगे किसी प्रकार की धार्मिक, सांप्रदायिक या आंचलिक या प्रांतीय संकीर्णता के लिए स्थान नहीं था।" (पृ. 94) उन्होंने खानदेश के बाढ़ पीडितों की सहायता के लिए कवि वचन सुधा (2 अक्टूबर 1872) में अपील करते हए इश्तिहार भी प्रकाशित किया था। उन्होंने स्त्री शिक्षा के महत्त्व बताने वाले लेख भी छापे। जैसा कि मैंने ऊपर कहा प्रधान जी अपने विवेचन में कभी आज के समय संदर्भ की अनदेखी नहीं करते। वे अपने समय की विसंगतियों के आलोक में नवजागरण की आवाज को जोड़ कर प्रस्तुत करते हैं।

"भारतेन्दु की कवि वचन सुधा हमारे इतिहास की एक महत्त्वपूर्ण कड़ी है जो 1857 के गदर को राष्ट्रीय स्वाधीनता संग्राम के आधुनिक दौर से जोड़ती है। इतना ही नहीं, 150 साल बाद कवि वचन सुधा हमें नवजागरण और स्वाधीनता संग्राम के अधूरे सपनों की याद दिलाती है और हमारी आत्मा को कुरेद कर पूछती है- क्या आजादी के 70 साल बाद भी भारत को अपना खोया हुआ स्वत्व प्राप्त हुआ ?... ... कवि वचन सुधा हमें उदारीकरण (उधारीकरण?) और भूमंडलीकरण की मोहनिद्रा से कोंच कर जगाती है और साम्राज्यवाद और कारपोरेट पूंजी के खिलाफ बायकाट और स्वदेशी का हथियार उठाने की प्रेरणा देती है। कवि वचन सुधा एक ऐसा आदर्श पत्र है जिसमें आर्थर मिलर के शब्दों में देश स्वयं से संवाद करता दिखाई देता है।" (पृ. 97) सच पूछिये तो प्रधान जी के इस लेख के पीछे उनकी मूल मंशा यही है कि 'आज की राजनीति के घमासान में इंडिया के मुकाबले भारत का झंडा ऊँचा' रखने वाले जूझते भारतवासी प्रेरित हो सकें।


(6)

अवधेश प्रधान के लेखन और विचारों का भूगोल इतना विस्तृत है कि एक लेख में बहुत कुछ छूट जाना स्वाभाविक है। 'परंपरा की पहचान' में एक लेख 'भारत में सर्वधर्मसमभाव की परंपरा' पर भी है, जिस पर हम संक्षिप्त चर्चा भले करें लेकिन इस विषय पर विस्तृत चर्चा होनी चाहिए।

सवाल यह नहीं है कि ईसाई या इस्लाम क्या करते हैं, क्या मानते हैं। इससे भारतीय परंपरा की न समझ बनेगी और न विकास। हमारी दीर्घ परंपरा की सोच, गति, परिवर्तन या समय के साथ संगति का एक गंभीर संगीत रहा है। उसके लय, ताल को उसी की प्रकृति में समझना चाहिए। प्रधान जी की पहली गंभीर असहमति इस बात से है कि हिन्दुवादी वर्चस्ववाद के "विचार के प्रवर्तकों और समर्थकों के पास न तो भारत की बहुधर्मी-बहुरूपी परंपरा को समझने लायक इतिहास-दृष्टि है, न भारत की सुदीर्घ महनीय सांस्कृतिक परंपरा को आधुनिकता के प्रकाश में निखारने और संवारने लायक भविष्य दृष्टि।" (75) लेकिन प्रधान जी पश्चिमी धर्मनिरपेक्ष अवधारणा को भी नकारते हैं जिसकी वकालत वामपंथ करता है। वे राज्य को पूरी तरह धर्म से विच्छेद करने की बात, उन्हें दुनिया को देखते हुए संभव नहीं लगती। बात विचारणीय इसलिए है कि क्या राज्य हर धर्म को मनमानी की छूट दे? अगर नहीं तो उसको सामाजिक समस्या पैदा होने पर हस्तक्षेप करना ही होगा। इस्लाम में उसके प्रोफेट और कमांडर एक ही हैं। अबुल कलाम आजाद साहब ने खुल कर कहा हम धर्म से निरपेक्ष रह कर राज्य में रह ही नहीं सकते। इस्लाम को सिर्फ सूफीवाद में रिड्यूस कर सोचते हैं तो गलती इस्लाम की नहीं आपकी है। धर्म से राज्य की पूरी निरपेक्षता एक काल्पनिक बात है अथवा खुद के लिए भ्रम पैदा करना। वामपंथ सर्वधर्मसमभाव की तीखी आलोचना करता है। "उसकी दृष्टि में सर्वधर्मसमभावी धर्मनिरपेक्षता वस्तुतः सांप्रदायिक धर्मनिरपेक्षता या धर्मनिरपेक्ष सांप्रदायिकता है।" (76) पश्चिम में यह विचार चर्च की निरंकुशता के विरुद्ध आया। भारतीय नवजागरण में धर्म की रूढ़ियों, कर्मकांड, ढकोसला और छुआछूत के विरुद्ध तीखी आलोचना हुई लेकिन इसके लिए राजसत्ता के विरुद्ध न जाना पड़ा। यह पश्चिम और पूर्व के बीच एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक यथार्थ है।

प्रधान जी बताते हैं कि भारत में धर्म और दर्शन की प्रकृति मूलतः लोकतांत्रिक थी। यहाँ एक विचार, एक मत या एक संप्रदाय का कोई दुराग्रह न था। इतना ही नहीं, इसके कारण ही हमारे यहां सहजीवन-सहअस्तित्व का आदर्श भारतीयों के मनोभाव और आचरण में विन्यस्त था। "एकं सद् विप्रा बहुधा वदंति (ऋग्वेद 1/164/46) बहुत्व के भीतर एकत्व की खोज या एक ही सत्य की बहुत प्रकार से व्याख्या करना यह चीज वैदिक साहित्य में बार-बार दुहराई गई है।" (77)  इस' बहुधापन' के अनेक साक्ष्य रखते हुए प्रधान जी विवेकानंद तक इस परंपरा को ले गये हैं। भारत की यह ऐसी महानता है, जिसकी पूरी दुनिया की सभ्यता में और कोई मिसाल नहीं। उन्होंने अथर्ववेद की ऋचा 12/1/45 को उद्धरित किया है-

जनं विभ्रती बहुधा विवाचसं

नानाधर्माणां पृथिवी यथौकसम्।

सब एक साथ रहते हैं, इसका मतलब यह तो नहीं कि सब एक जैसा सोचें, एक जैसा बोलें, एक जैसा मानें। 'नानात्व' और 'बहुधापन' है, इसीलिए किसी चीज को कई तरह से देखने, समझने बरतने की संभावना भी है। (77) इस परंपरा को कालिदास से ले कर संस्कृत के अनेक साहित्य से उदाहरण देते हुए प्रधान जी ने यह तक लिखा है कि "समन्वय की यह भावना केवल वैदिक धर्म के विभिन्न संप्रदायों के ही बीच नहीं थी वरन् अवैदिक धर्मों के भीतर भी क्रियाशील थी।" (78) मसलन यह भारत की मिट्टी की ही उपज थी। ऐसी और इतनी महान् परंपरा की बदौलत ही भारत, वह भारत बना था जिसकी प्रतिष्ठा अंग्रेजों की गुलामी के बावजूद दुनिया में रही। अगर संदेह है तो आप यह बात लियो तोल्स्तोय, रोमां रोलां या मैक्समूलर से पूछ कर तस्दीक कर लीजिए।

प्रधान जी ने बौद्ध धर्म के हवाले से भी अपनी बात की पुष्टि की है। सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म स्वीकार करने के बाद अपने राज्यादेश में यह कहा- 

"1. किसी अन्य धर्म की चर्चा करते हुए बाणी पर संयम (वाचि गुती) अर्थात् किसी अन्य धर्म की आलोचना न करना। 

2. सभी धर्मों की बातें ध्यान और आदरपूर्वक सुनना (बहुश्रुत) या परिचय प्राप्त करना।" (79) 

महाभारत में भी कहा गया है कि किसी धर्म को बाधित करने वाला धर्म, धर्म नहीं है, कुधर्म है। प्रधान श्री रामकृष्ण परमहंस और विवेकानंद के विचारों की फिर आवृति करते हैं। अंत में वे इस बात पर जोर देते हैं कि इस संवेदनशील मुद्दे पर विचार बहस होना चाहिए और इसे सुलझाना चाहिए। यही भारत, भारतीयों के लिए आज भी जरूरी है और आगे भी।

"धर्म की समस्या को मूदहुँ आँख, कतहुँ कछु नाहीं' वाले ढंग से हल नहीं किया जा सकता। खासतौर से भारत में जहाँ इतने अधिक धर्म हैं, जहाँ धर्मों की परंपराएँ अत्यंत पुरानी हैं- धर्म एक बेहद संवेदनशील मुद्दा है। धर्मांधता और धर्म की राजनीति के बढ़ाव के दौर में सर्वधर्मसमभाव की आलोचना करने से धर्मोन्मादी शक्तियों को ही बल मिलेगा।" (83)

यह बात आज के संदर्भ में और महत्त्वपूर्ण हो गई है। अवधेश प्रधान जी इस बात की अहमियत को गंभीरता से समझते हैं और इसके विविध पक्षों को ले कर एक से अधिक लेखों में चर्चा करते हैं। "हिन्दी नवजागरण और भारतेन्दु की वैष्णवता" में भी उन्होंने इसके कुछ पहलुओं पर विचार किया है। इस लेख में वे रामविलास शर्मा जी की इस बात से असहमति जताते हैं, जहाँ वे हिन्दी नवजागरण को बंगाल नवजागरण और गुजरात नवजागरण से अलग बताने की कोशिश करते हैं। मेरी समझ से हिन्दी नवजागरण या अन्य प्रदेशों के नवजागरण की अलग-अलग विशेषताएँ होना कोई अनहोनी बात नहीं है लेकिन एक दूसरे से सर्वथा मौलिक होने अथवा बिलकुल अप्रभावित होने की बात भी उचित नहीं। बहरहाल! यहाँ महत्त्वपूर्ण बात है प्रधान जी का मूल्यांकन। वे कहते हैं कि भारतेन्दु बल्लभीय वैष्णव मत के अनुयायी थे लेकिन उन्होंने अन्य धर्मों के और सामने सिर झुका कर अपनी विशाल हृदयता और सत्यनिष्ठा का प्रमाण भी दिया है। "कहुँ ईश्वर कहुँ बनत अनीश्वर नाम अनेक परो।" यह उनकी उदारता का उत्कर्ष है।

उन्होंने 'जैन कौतूहल' कविता के हवाले से अपनी बात को विस्तार देते हुए इसकी पुष्टि की है। धर्मों के बीच आपसी कटुता अज्ञानता और असत्य की पक्षधरता के कारण है। "सांप्रदायिक झगडे सबके सब शुष्क तर्कों और थोथी पोथियों पर टिके हैं। इनका सत्य और प्रेमस्वरूप भगवान से कुछ लेना-देना नहीं है। इन्होंने धर्म को सिर्फ झगड़े में, अपनी प्रशंसा और अन्य कई निन्दा में अटका रखा है।

'धरम सब अटको याही बीच, 

अपुनी आपु प्रसंसा करनी 

दूजेन कहनो नीच।"

मूल सवाल सच्ची आस्था और उदारता का है। अगर ईश्वर में सच्ची आस्था होगी तो उदारता भी होगी। भारतेन्दु ज्ञानमार्ग, भक्तिमार्ग या जैन-बौद्ध तक ही नहीं जाते। वे 'पंचपवित्रात्मा' से इस्लाम तक जाते हैं। उन्होंने मुहम्मद साहब, बीबी फातिमा, हजरत अली, इमाम हसन और हुसैन की भी जीवनियाँ लिखी। उन्होंने कुरआनशरीफ का अनुवाद करना भी शुरू किया था। उन्होंने मुहम्मद साहब को बहुत ही ऊँचे शब्दों में याद किया है। भारतेन्दु ने कहा "धन्य! ईश्वर के विश्वास किंकर मुहम्मद। आज मुसलमान धर्म के प्रवर्तक ईश्वर के आज्ञाकारी विश्वस्त भृत्य मुहम्मद के नाम और उनके प्रवर्तित पवित्र एकेश्वर के धर्म में एशिया से योरोप, अफ्रीका तक कोटि-कोटि मुसलमान एक सूत्र में ग्रथित हैं। वह ऐसा आश्चर्य धर्म का बंधन जगत् में संस्थापन कर गए कि आये दिन उसको खोलने की किसी को सामर्थ्य नहीं है।" प्रधान जी कहते हैं कि गोपाल जी के निष्ठावान भक्त वैष्णव धर्म में दीक्षित भारतेन्दु चरम एकेश्वरवादी इस्लाम धर्म के प्रवर्तक मुहम्मद साहब के बारे में जिन शब्दों का इस्तेमाल किया है वह उनकी असाधारण उदारता का परिचायक है। उनको हिन्दी में तुलनात्मक धर्म मीमांसा का पहला आचार्य मानते हैं।

भारतेन्दु वैष्णव धर्म को भारत का सबसे प्राचीन मत मानते हैं। वे इस बात में विश्वास करते हैं कि पूरे संसार में धर्म का मुख्य मार्ग भक्ति ही है। राधाकृष्णन का तो यह कहना था कि दुनिया के सारे धर्म इसी के बने बिगड़े रूप हैं। भारतेन्दु इसके साथ यह भी कहते हैं कि जब इसके बाह्य व्यवहार और आडम्बर में न्यूनता आयेगी आंतरिक उपासना की उन्नति की जायेगी। 'आंतरिक उपासना' पर गौर कीजिए। ढोंग नहीं, आंतरिक उपासना। असल विवाद इसी सच्चाई की जगह ढोंग से पैदा होती है। अपने धर्म की श्रेष्ठता, वर्चस्ववाद को बढ़ावा देता है। रजोगुण और तमोगुण छोड़े बिना सच्ची भक्ति संभव नहीं। विधि-निषेध और कर्मकांड तो उपधर्म हैं। इसी की प्रधानता के कारण विवाद और नफरत फैलती है। यह बात सभी धर्मों के लिए जरूरी है। जब सब मूल रूहानी तत्व की आकांक्षा के मूल तत्त्व को समझेंगे तो उनको पता चलेगा कि यही भक्तिमार्ग उनका भी है, यही दूसरे और सबका है। प्रधान जी कहते हैं कि इसी मनोभूमि पर सर्वधर्मसमभाव की आधुनिक अवधारणा विकसित होती है। इसलिए सनातनी, इस्लामी या क्रिस्चियन अथवा बौद्ध-जैन होना महत्त्वपूर्ण नहीं। महत्त्वपूर्ण है- भक्ति के मूल तत्त्व, मूल मार्ग को अपनाना जो सभी धर्मों का मुख्य स्वर है। धर्म का एकत्व भी यही है।


(7)

अवधेश प्रधान ने प्रसाद जी की कामायनी पर जो लेख लिखा है- उसका शीर्षक है- कामायनी की भविष्य-दृष्टि। आप शीर्षक की अर्थ-व्यंजकता पर गौर करें। कामायनी महाकाव्य देवताओं की सभ्यता के महाप्रलय के बाद मानव सभ्यता के नवोन्मेष और निर्माण की चिंता से शुरू होता है। इसलिए इसके भविष्य दृष्टि का संधान और महत्त्वपूर्ण हो जाता है। इसमें एक कथा-तत्त्व भी मौजूद है जो सजीव भी हैं और प्रतीकात्मक भी। लेकिन इसका महत्त्व इसके निहित विचार और दर्शन में है। प्रधान जी प्रारंभ में ही स्पष्ट कर देते हैं कि "प्रसाद को बुद्ध की करुणा स्वीकार है दुःखवाद नहीं।" क्योंकि दुःखवाद हमें निराशा, अकर्मण्यता और पलायन की ओर ले जायेगा। ... ...

"तप नहीं केवल जीवन सत्य, 

करुण यह क्षणिक दीन अवसाद।" 

दीनता और अवसाद न सत्य के लक्षण हैं, न शक्ति के।" (पृ. 214) तो सत्य बल्कि जीवन सत्य और शक्ति- इन दोनों का स्वीकार ही सार्थक है। प्रधान जी की खूबी यह है कि वे विचार करते हुए कभी समय, समाज और समकालीन संदर्भ को नहीं भूलते। वे लिखते हैं कि "आशा और उत्साह, निर्माण और संघर्ष की जो ओजस्वी पुकार श्रद्धा सर्ग में है, वह भारतीय नवजागरण और स्वाधीनता संग्राम के भीतर से आयी थी। उसमें एक ऐसी स्फूर्तिदायक मानवीय प्रेरणा है, जो हमेशा मूल्यवान और सार्थक बनी रहेगी।"(पृ. 215) कामायनी में श्रद्धा का तकली गीत अमूमन पाठक को ऐतिहासिक विपर्यय के असमंजस में डाल देता है लेकिन अवधेश प्रधान इसे श्रम के सृजन और आनंद के संगीत से जोड़ देते हैं। आप गौर कीजिएगा वे कहीं भी विचार विश्लेषण करते हुए पाठ का आधार नहीं छोड़ते। इसलिए कहीं भी इच्छित अर्थ आरोपण नहीं करते। खासतौर से कविता के आसंग में वे बड़ी सहजता से परत उकेर देते हैं। वे कहीं भी जटिल, उलझे या अस्पष्ट दिखते स्थलों अथवा प्रसंगों को बहुत आलोचकों की तरह न तो और उलझाते हैं और न उसकी अनदेखी कर आगे बढ़ जाते हैं और न ही उसके इच्छित अर्थ संधान कर बलात आरोपित कर देते हैं। इतनी स्पष्टता हिन्दी आलोचना में कम ही देखने को मिलती है। जैसे मनु और श्रद्धा की परस्पर विरोधी सोच, विरोधी जीवन दर्शन को सामिष-निरामिष भोज्य की अभिधा में नहीं लाते। इसे वे मनुष्य और प्रकृति के बीच साहचर्य और सामंजस्य के रूप में देखते हैं। ध्यान दीजिए प्रलय बाद निर्माण में मनुष्य का सबसे प्रमुख सहचर प्रकृति ही है। इसलिए उसके साथ विवेकशील रिश्तों की खास अहमियत है। मनु और श्रद्धा की इस प्राचीन कथा में प्रधान जी को आधुनिक समय की संगति तलाशने के लिए कोई द्राविड़ प्राणायाम नहीं करना पड़ता। उनको पता है कि प्रसाद जी की मूल मंशा कामायनी में विश्व के आधुनिक संकट को रेखांकित करने की है। श्रद्धा प्रकृति को जीवन का अनिवार्य सहचर मान चुकी है। मगर मनु में जो मृगयावादी दुर्ललित लालसा है, उसमें पूँजीवाद की राक्षसी पिपासा की झलक मिलती है। यह पिपासा प्रकृति के पूरे पर्यावरण-मंडल को ही तहस-नहस कर देगी। प्रसाद जी की इस दूर दृष्टि को प्रधान जी ने स्पष्ट रूप से लक्षित कर लिया है और इस पर उनकी टिप्पणी किंचित् लंबी लेकिन अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।

'गोर्की ने लिखा है कि बुर्जुवा वर्ग का इतिहास आत्मिक विपन्नताओं का इतिहास है। इस वर्ग की आत्मिक विपन्नताएँ अपने भयावह रूप में जितनी आज सुस्पष्ट है, उतनी कामायनी के रचना काल में न थी। फिर भी प्रसाद ने अपने तीक्ष्ण अनुभव और अंतर्दृष्टि से उसकी लाक्षणिक विशेषताएँ साफ देख ली थीं। पूंजीवादी सभ्यता के व्यक्ति स्वातंत्र्यवाद का असली चेहरा दिखाते हुए उन्होंने इड़ा सर्ग में लिखा है-

"हा! अब तुम बनने को स्वतंत्र 

सब कलुष ढाल कर औरों पर 

रखते हो अपना अलग तंत्र।"

... ... व्यक्तिगत स्वार्थ ही पूंजीवादी संस्कृति का सार है, उसमें सारी विकृतियों जन्म लेती हैं।" (पृ. 217) कामायनी का मूल स्वर यही है। प्रधान जी ने अन्य उदाहरणों से भी इस अवधारणा को पुष्ट किया है। स्पष्ट है कि मस्तिष्क और हृदय, बुद्धि और भावना का परस्पर विरोध आधुनिक सभ्यता की ही देन है। आप वर्तमान सभ्यता के अनुभव आसंग में स्पष्ट देख सकते हैं कि "अवसाद, तनाव, कुंठा, घबराहट, व्यक्तित्व का विघटन, परपीड़ा, रति, आत्मघाती कल्पनाएँ सब पैसे पर टिकी वर्तमान सभ्यता की उपलब्धियां हैं। सरल प्रेम संबंधों के बजाय व्यभिचार और बलात्कार के नये-नये रूप इसी सभ्यता की नेमत हैं।" (पृ. 218) बुद्धि और पूँजी के इस मेल ने मानव सभ्यता को ही पूरी तरह बदल दिया है। मार्क्स भी कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो में कहते हैं कि किस तरह पूँजी मनुष्य के काव्यात्मक रिश्तों को खत्म कर देती है और हमें पता तक नहीं चलता। मनु ईड़ा के प्रेम में पड़ कर जिस संकट में पड़ते हैं, वहाँ से उनको श्रद्धा ही मुक्त करती है। यह अर्थ-बोध उसी कथात्मक प्रसंगों के गर्भ से निकला है। प्रधान जी ने बताया है कि यह स्वार्थ जिस तरह संघर्ष सर्ग में भयावह लड़ाई के रूप में दिखता है वस्तुतः उसमें प्रथम विश्व युद्ध की छाया आसन्न विश्व-युद्ध की आहट है।

श्रद्धा की भूमिका कामायनी में हमेशा सकारात्मक रही है। जब प्रारंभ में मनु चिंता में हैं, वे दुःख विरक्ति, अवसाद और विषाद को  तप और त्याग समझ कर उसे एक दार्शनिक रूप देने की कोशिश करते हैं तो प्रधान जी ने लिखा है  "श्रद्धा इसी दार्शनिक छद्म पर प्रहार करती है"। ... 

तप नहीं केवल जीवन सत्य, 

करुण यह क्षणिक दीन अवसाद।" (पृ. 221) 

श्रद्धा उनके भीतर मानवता के विजयिनी होने का विश्वास भरती है, जैसा निराला जी ने राम की शक्ति-पूजा में किया है-'होगी जय, होगी जय हे पुरुषोत्तम नवीन!' प्रसाद जी ने इसी विजय-विश्वास की बात की है- 

'शक्ति के विद्युत्कण जो व्यस्त,

विकल बिखरे हैं हो निरुपाय 

समन्वय उनका करे समस्त, 

विजयिनी मानवता हो जाय।'

प्रधान जी ने कहा है- "मनु के अवसाद के विरुद्ध यह अपराजेय जीवन को स्वीकार करने वाले आनंदवाद का विजय घोष है।" (पृ. 225) प्रधान जी ने कामायनी के जिस भविष्य दृष्टि के संधान की शुरुआत की है, उसका निष्कर्ष यही है कि "युद्ध और आतंक की जिस संस्कृति को प्रसाद ने 'भय की उपासना' कहा है उसका उद्गम स्रोत है "पूंजी की उपासना, मुनाफा की बलिवेदी और  श्रम की लूट का नरमेघ!" (पृ. 219) प्रसाद जी का स्वप्न था समतामूलक समाज का। सच्चे अर्थों में एक मानवीय सभ्यता का सपना था। जिस छायावाद और छायावादी कवियों को ले कर यह आम धारणा थी कि वे रोमानी या कुछ-कुछ आदर्शवादी होते हैं, उनमें समकालीन यथार्थ से दूरी रखने की प्रवृत्ति थी- इसको प्रधान जी भंग करते हैं। प्रसाद जी की भविष्य दृष्टि में एक सर्वोत्तम और बेहतर समतामूलक समाज की आकांक्षा थी।


(8)

प्रधान जी के लेखन में सीखने वाली अनेक बाते हैं। वैविध्य और विस्तार में यह असमंजस बना रहता है कि आप उसे किस तरह शुरू करें, किस तरह समेटे। प्रधान जी ऐसा कुछ नहीं करते। उनके पूरे लेखन में कहीं शंका, दुविधा, उलझाव या अस्पष्टता है ही नहीं। वैविध्य या विस्तार चाहे जैसा हो वे एक ऐसे केन्द्रीय तत्त्व की तलाश कर बेहिचक उसके सहारे गहरे उतर जाते हैं। जैसे निराला की कविताओं को ही लीजिए। इसमें उन्होंने केन्द्रीय सूत्र लिया है- मुक्ति की गहरी आकांक्षा। वे इसी अर्थ-सुरंग से निराला-काव्य में प्रवेश करते हैं। उनका सहचर बन, थोड़ा सहज हो कर चलिए तो आप निराला-काव्य के उदात्त से सहज ही रू-ब-रू हो जाते हैं।

निराला ने जितनी बंदिशों, रूढ़ियों और वर्जनाओं को तोड़ा है उतना शायद ही किसी और ने। निराला का यह विद्रोह बहुआयामी था। "अंग्रेजी साम्राज्यवाद के विरुद्ध राष्ट्रीय मुक्ति, सामंती रूढ़िवाद के विरुद्ध सामाजिक-सांस्कृतिक मुक्ति, रीतिवाद के विरुद्ध साहित्यिक मुक्ति, मोह और अज्ञान के विरुद्ध आध्यात्मिक मुक्ति। मुक्ति के विविध स्वरों का संधान जैसा निराला ने किया है, वैसा अन्यत्र दुर्लभ है।" (पृ. 226) प्रधान जी ने मुक्ति के विविध स्वरों का प्रयोग किया है। आगे वे मुक्ति-चेतना की प्रकृति को भी बताते हैं-"उनकी मुक्ति-चेतना को स्वाधीनता संग्राम, किसान आंदोलन, वामपंथी उभार के अनुभवों के साथ-साथ उनका विशिष्ट सौन्दर्यानुभव और भक्ति तथा बेदांत के संस्कार भी घुल-मिल गए हैं। इसलिए उनके काव्य में एक ओर उसमें अनेक अंतर्विरोध भी गुंथे हुए मिलते हैं।" (पृ. 226) आप इस उद्धरण के रग-रेशे को उकेर सकते हैं तो समग्र निराला-काव्य का मुखर सार दिख जायेगा। प्रधान जी की आलोचना शैली विन्दु के विस्तार वाली है। यह उनका ऐसा वैशिष्ट्य है जिसे सीखने और अपनाने की जरूरत है।

निराला ने कविता को छंदों से मुक्त किया। तमाम बाहरी अनुशासनों से मुक्ति। "निराला ने शब्द-विन्यास, भाव-बोध और छंद-योजना-सभी दिशाओं में चली आती हुई रूढ़ियों से कविता को मुक्त किया।" प्रधान जी का आग्रह है कि इसे कविता की समग्र मुक्ति के प्रयास से जोड़ कर देखना चाहिए। उनके गीत भी उसी समग्र मुक्ति-प्रयास के परिणाम हैं।" (पृ॰ 228) समग्र मुक्ति से प्रधान जी का आशय क्या है? शब्द-विन्यास और छंद-योजना तो समझ में आती है- मगर भाव-बोध की मुक्ति से क्या तात्पर्य? भाव और विचार को ले कर पता नहीं चलता लेकिन उस पर सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक बंदिशें अप्रत्यक्ष रूप से लगी होती हैं। भाव-बोध को प्रकृत रूप में या नैसर्गिक रूप में अभिव्यक्त करना हर समय, हर काल में आसान नहीं होता। प्रधान जी संभवतः इसी बात की ओर संकेत करते हैं। सामाजिक बंधनों को ले कर निराला जी में जो विद्रोही भाव था, उसकी उनको बड़ी कीमत चुकानी पड़ी।

वर्णाश्रम की कठोर वर्णव्यवस्था में एक छोर पर शूद्र गण तो दूसरे पर द्विज समुदाय। इनके बीच के प्रबल अंतर्विरोधों को प्रधान जी ने तुलसीदास कविता के विश्लेषण में उठाया है। इस कविता में तुलसीदास असली भारत की तस्वीर देख रहे हैं कि किस तरह द्विज समुदाय चाटुकार हो गया है। मुगल शासन की सुखद छाया उसके सूक्ष्म मनोनभ तक छा चुकी है। उसके भीतर स्वाधीनता की आकांक्षा संभव ही नहीं। दूसरी ओर गाँव-गाँव में शूद्र वैसे ही कुचले जा रहे हैं और फौजें फसलों को रौंद देती हैं।

शूद्र गण क्षुद्र जीवन संबल, पुर-पुर में 

वे शेष-श्वास, पशु मूक भाष 

पाते प्रहार अब हतश्वास 

सोचते कभी, आजन्म ग्रास द्विजगण के 

होना ही उनका धर्म परम, 

वे वर्णाधम, रे द्विज उत्तम 

वे चरण-चरण बस वर्णाश्रम रक्षण के। 

(तुलसीदास पृ. 239)

प्रधान जी ने यहाँ रत्नावली के फटकार की बात की है। 

करने को ज्ञानोद्धत प्रहार, 

तोड़ने को विषम वङ्का द्वार 

उमड़े भारत का भ्रम अपार हरने को

-यह अकारण नहीं है कि प्रधान जी को स्वाधीनता आंदोलन के दौर में जो भारतीय व्यक्तित्व सबसे ज्यादा प्रभावित करता है तो वे हैं- विवेकानंद! जिस विवेकानंद से प्रधान जी परिचित कराते हैं वे समन्वित मानवता के प्रेरक पुरुष हैं, वे मनुष्यों के बीच समानता के प्रबल पैरोकार हैं, वे अद्वितीय महापुरुष और असाधारण रूप से प्रेरक हैं। वे याद दिलाते हैं कि निराला विवेकानंद को भारत का मुक्त ज्ञानछंद कहते हैं। वर्णाश्रम के प्रति निराला के भीतर जो तीव्र आक्रोश और सामाजिक रूढ़ियों को ध्वस्त करने का उत्ताप है, उसके प्रेरक स्त्रोत विवेकानंद ही हैं। 

"दूर तो तम-भेद यह जो वेद बनकर वर्णशंकर। 

यह तम-भेद या कलुष भेद-तम है- सामाजिक अन्याय की कठोर वर्ण-व्यवस्था जिसे दूर किये बिना राष्ट्रीय जीवन को निरोग और स्वस्थ नहीं बनाया जा सकता।" (पृ. 240)

इस लेख में मुक्ति के स्वर संधान से प्रधान जी कभी विचलित नहीं होते, इधर-उधर कहीं नहीं भटकते। इस केन्द्रीय स्वर के अगल-बगल वे लगभग पूरे निराला-काव्य को समेटते हैं और इसके वैविध्यपूर्ण इलाकों का संधान करते हैं। मुक्ति का स्वर भारतीय नवजागरण की मूल आकांक्षा है। इसलिए इसके संधान में और खुद निराला को समग्रता में समझने के लिए उनके संपूर्ण सृजन से गुजरना जरूरी है क्योंकि उनमें परिवर्तन और विकास हुआ है। वे छायावादी चेतना का अतिक्रमण करते हैं। प्रधान जी ने बताया है कि उन्होंने 'सुधा' में ब्राह्मणवाद के विरोध में लगातार टिप्पणियाँ लिखी और शूद्रों तथा स्त्रियों के समर्थन में भी काफी लिखा। वे क्रमशः नये यथार्थ की ओर बढ़ रहे थे। "निराला कविता में छायावादी भावबोध और काव्यभाषा के संस्कारों के विरुद्ध सचेत संघर्ष करते हैं और विषय से ले कर भाषा तक में बिलकुल नई जमीन तैयार करते हैं जिसे कुकुरमुत्ता के संघर्ष में दूधनाथ सिंह ने काव्य आभिजात्य से मुक्ति कहा है।" (पृ. 241) प्रधान जी ने कुकुरमुत्ता,, वेला और नये पत्ते से गुजरते हुए परिवर्तित निराला-काव्य में नये यथार्थवाद के बदलाव को रेखांकित किया है। उन्होंने बताया है कि वे किस तरह पुरानी आस्थाओं के टूटने का संकेत देते हैं। वे विस्तार में जा कर यह दिखाते हैं कि किस तरह कांग्रेस, जमींदार और साहूकारों का गंठजोड़ होता है। किसानों की बात इसीलिए करते हैं, वे उनको भ्रम में रख कर समझौता कर सकें। इनका दुहरा चरित्र उजागर हो चुका है। इसके शीर्ष नेता नेहरू के पाखंड से दुःखी लुकुआ घबरा जाता है और महगू से पूछता है, "अब हम कहाँ जायेंगे?" महगू वामपंथी विकल्प की ओर इशारा करता है। निराला की काव्य-चेतना में यह बड़ा बदलाव था, इसमें स्पष्ट राजनीतिक दृष्टि थी। "सामंती और साम्राज्यवादी जुए को एक साथ ही अपने कंधे से उतार फेंक कर किसानों को नए भविष्य की ओर पैर बढ़ाने का आह्वान निराला ने किया है। उन्होंने मुक्ति का ऐसा भविष्य चित्र प्रस्तुत किया जिसमें स्वाधीन भारत को जनवाद की धरती पर प्रतिष्ठित होना था और अपने राष्ट्रीय जीवन का समाजवादी रूपांतरण करना था।" (पृ० 250) जाहिर था निराला कोई राजनीतिक कर्मी, राजनीतिक विचारक या चिंतक नहीं थे कि उनके विचार इतने स्पष्ट रूप से दिखे लेकिन इतना तो तय है कि उनका संकेत और दिशा इसी ओर था।

प्रधान जी ने निराला के गीतों को ले कर एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण बात कही है। "गीतों की घनी बुनावट ऐसी है कि निराला के निजी जीवन की वेदना और टूटन में राष्ट्रीय जीवन की वेदना और टूटन ध्वनित होने लगती है। कभी-कभी तो पता ही नहीं लगता कि वे कब व्यक्ति जीवन की वेदना व्यक्त करते हैं और कब राष्ट्र जीवन की।" (पृ. 252) मुझे स्मरण नहीं कि किसी और ने उनके गीतों में निजता और राष्ट्रीयता के एकत्व को इस तरह लक्षित किया है। इसे प्रधान जी ने विस्तार देते हुए उदाहरण सहित विश्लेषण कर बताया है। यह बात सही है कि निराला की धार्मिकता और आध्यात्मिकता की ओर पर्याप्त झुकाव था लेकिन न तो उनमें सामाजिकता से कभी अलगाव होता है और न ही वे रहस्यवादी गुह्यता में भटकते हैं। बेशक प्रबल संघर्ष के कारण नैराश्य और पराजय के अनेक झकझोर देने वाले भाव उनके जीवन में बार-बार आते हैं। लेकिन उनके "जीतने के संकल्प, प्रकृत और मानव सौन्दर्य के प्रति जबर्दस्त आकर्षण, जीवन के प्रति अमोघ विश्वास अर्चना के गीतों से ले कर जीवन का विष बुझा हुआ है तक निराला में बराबर मौजूद रहा।" (पृ. 255) मुक्ति का स्वर और विजयिनी विश्वास का स्वर निराला काव्य में न सिर्फ मुखर और प्रबल रहा है बल्कि केन्द्रीय स्वर भी रहा है। यही स्वर भारतीय नवजागरण का भी है।

प्रधान जी का महत्त्व इस बात में नहीं है कि वे हमारे समय के एक बड़े विचारक हैं। वे ऐसे दुर्लभ अनुसंधित्सु प्रस्तोता हैं जो ज्ञान के महासमुद्र से मोती की तरह विचारों का अद्भुत संग्रह कर इस तरह प्रस्तुत करते हैं कि मन मस्तिष्क चौंधिया जाय। आप विस्मय से ठगे रह जाय। भारतीय ज्ञान की विरासत में सबसे कठिन है चयन विवेक। एकदम प्रासंगिक, कारगर और सटीक विचारों के चयन का विवेक। एकदम प्रासंगिक, कारगर और सटीक विचारों के चयन का विवेक। यह लोकमंगलकारी और सात्विक दृष्टि के बिना संभव नहीं है। भारतीय ज्ञान की विरासत में रहस्यवादी भटकाव की संभावन सबसे अधिक है। आत्मकल्याण के लक्ष्य में भटकते लोग जिस भारतीय संस्कृति का प्रतिनिधित्व करते हैं, वह कृत्रिम है, वह मनोगत है, कल्पित है, उसका कभी कहीं कोई अस्तित्व नहीं रहा। जो संस्कृति लोकमंगल और परहित की भावना से शून्य है, वह असल में भारतीय संस्कृति नहीं है। उसमें समन्वित एकता और विश्वबंधुत्व नहीं है। क्षुधित मनुष्य के लिए धर्म बिलकुल प्राथमिकता नहीं है। इसलिए प्रधान जी ने जिस वेदांत की बार-बार चर्चा की है, उसे सम्यक ढंग से समझने की जरूरत है। इसलिए प्रधान जी को समझने के लिए उनके उद्धरित चयन विवेक पर भी गौर करना जरूरी है क्योंकि इसके पीछे उनके मानस और उनकी दृष्टि की आरोपित विशिष्ट और मौलिक भूमिका है। उन्होंने वैदिक युग से, वेदों की ऋचाओं के उदाहरण दे कर यह बताया है कि हमारे यहाँ बहुत्व के भीतर एकत्व के खोज की परंपरा पुरानी है। 


सम्पर्क:


बी-301, किंग्स टन कोर्ट अर्पाटमेंट

गैलेरिया मार्केट के पीछे, क्रासिंग रिपब्लिक

गाजियाबाद-201016


मोबाइल : 8669029763


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