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गौरीनाथ से आशीष सिंह की बातचीत

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  'कर्बला दर कर्बला' गौरी नाथ द्वारा लिखा गया हमारे समय का एक महत्वपूर्ण उपन्यास है। यह महज उपन्यास ही नहीं बल्कि समय का एक जीवन्त दस्तावेज भी है। गौरी नाथ उन रचनाकारों में से हैं जो फौरी तौर पर ही कोई रचना नहीं रच देते बल्कि उसके पीछे उनका एक सुदीर्घ चिंतन और ग्राउंड लेवल का शोधकार्य भी होता है। यह उपन्यास पढ़ते हुए पाठक को खुद ब खुद महसूस होने लगता है उपन्यास प्रकाशित होने से पहले गौरी नाथ जी ने पांडुलिपि  भागलपुर के वरिष्ठ पत्रकार, संस्कृतिकर्मी डॉ. चंद्रेश को भेजी। अपनी टिप्पणी में  चंद्रेश जी  लिखते हैं -  लेखक-पत्रकार गौरीनाथ का लिखा 'कर्बला दर कर्बला' एक अलग क़िस्म का दस्तावेज़ी उपन्यास है, जो यथार्थ की खुरदुरी ज़मीन और कल्पना की रूमानी उड़ान के बीच संतुलन की जोखिम के बीच ताना-बाना बुनने की एक ईमानदार कोशिश है। पश्चिमी देशों में लीक से हट कर डॉक्युड्रामा, दस्तावेज़ी उपन्यास लिखने का चलन कोई नया नहीं है, हमारे यहाँ के लेखक इस तरह के जोखिम से थोड़ा परहेज करते हैं। गौरी नाथ ने बिहार के भागलपुर शहर को केन्द्र में रख कर लगभग दस साल के कालखण्ड में हुए उन चर्चित ...

गौरीनाथ से आशीष सिंह का साक्षात्कार

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  गौरी नाथ  आलोचक आशीष सिंह दुनिया की शोरोगुल से दूर चुपचाप अपना काम करते रहते हैं। उनका काम अलग दिखाई पड़ता है। कई एक ऐसे कहानीकारो की कहानियों पर उनके आलेख हमें सोचने के लिए बाध्य करते हैं, कि लेखन का यह भी एक तरीका है। ऐसे कहानीकार जिनकी तरफ आलोचकों का ध्यान प्रायः नहीं जाता। आशीष ने हाल ही में महत्त्वपूर्ण कथाकार गौरी नाथ से एक लम्बा साक्षात्कार लिया है। कई मायनों में यह साक्षात्कार कुछ अलग है। यह साक्षात्कार यह दिखाता है कि कैसे किसी से बातचीत करने के लिए तैयारी करनी पड़ती है। फौरी तौर पर लिए गए साक्षात्कार इसीलिए पाठक के मन मस्तिष्क पर कोई छाप नहीं छोड़ पाते। यह साक्षात्कार लंबा होते हुए भी कहीं पर उबाऊ नहीं लगता। इस  साक्षात्कार का अगला हिस्सा हम अपने पाठकों के लिए अगले महीने प्रस्तुत करेंगे।  तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं  गौरीनाथ से आशीष सिंह का साक्षात्कार। गौरीनाथ से आशीष सिंह का साक्षात्कार साक्षात्कार एक चुनौतीपूर्ण विधा है। यह विधा जितनी सहज और सामान्य लगती है उतनी ही असहज भी करती है। ‘कृति से साक्षात्कार’ करता एक पाठक अपनी जानी हुई दुनिय...