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यादवेन्द्र का आलेख 'जब उजाले यादों के स्याह हो जाएँ'

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यादवेन्द्र  आत्मीय सम्बन्ध हमें जीवन की ऊष्मा प्रदान करते हैं। ये सम्बन्ध हमें निराशा के बियाबान से बाहर निकाल कर उम्मीद की किरणें बिखेरते हैं। इन सबके मूल में स्मृति का बड़ा हाथ होता है। रोजमर्रा की जिन्दगी जीते हुए हमें इसका अहसास ही नहीं होता कि स्मृतिलोप हो जाने पर क्या परिस्थितियों बनेंगी। स्मृतिलोप होने पर व्यक्ति खुद अपना होशो हवाश खो बैठता है। आत्मीय लोगों यहाँ तक कि पति, पत्नी, मां, पिता, भाई, बहन, बेटे, बेटी तक को पहचान नहीं पाते। आप इस त्रासद स्थिति की कल्पना कर सकते हैं कि आपका अपना कोई अजीज ही आपको पहचानने की क्षमता खो चुका होता है। डिमेंशिया ऐसी ही बीमारी है जिसमें व्यक्ति अपने अतीत की सारी स्मृतियों को विस्मृत कर जाता है। यादवेन्द्र जी ने जी बी प्रभात की कहानी चॉकलेट के साथ साथ लवीनिया ग्रीनलॉ की कविताएँ प्रस्तुत की हैं जो डिमेंशिया की भयावह त्रासदी को व्यक्त करते हैं। लवीनिया ग्रीनलॉ अपनी कविता 'मेरे पिता का जानना न जानना' में लिखती हैं  ' वे पेंसिल के बारे में सोचते हैं/   उसी तरह जुराब के बारे में भी/  जब बाथरूम में घुसते हैं/  तो अपने हाथ...

यादवेन्द्र का आलेख 'वतन से दूर भी जिंदा है वतन'

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रजिया सज्जाद जहीर  मनुष्य जिस मिट्टी में जन्म लेता और पलता बढ़ता है उसे वह कभी भुला नहीं पाता। एक लगाव अपनी मिट्टी अपने वतन के प्रति हमेशा बना रहता है। बँटवारे प्रायः कृत्रिम ही होते हैं। भारत का बंटवारा ऐसा ही कृत्रिम बंटवारा था जिसे धर्म के नाम पर अंजाम दिया गया। लेकिन लोगों की भावनाओं और संवेदनाओं पर भला किस तरह रोक लगाई जा सकती है। बंटवारे के दर्द को तमाम रचनाकारों ने अपनी रचनाओं में शिद्दत से व्यक्त किया है। ऐसी ही एक कहानी है रजिया सज्जाद जहीर की कहानी 'नमक'। प्रतिबन्ध के बावजूद मुस्लिम स्त्री साफिया अपनी दिवंगत माँ की सहेली के लिए लाहौर से नमक लाने में कामयाब होती है। यादवेन्द्र जी ने अपने इस महीने के कॉलम जिन्दगी एक कहानी है, में इस कहानी के बहाने से महत्त्वपूर्ण विश्लेषण किया है। यादवेन्द्र जी लिखते हैं "यह कहानी भूगोल की किताबों में लिखित कृत्रिम बँटवारे के बरक्स मन में स्थायी रूप से बसी वतन की स्मृति के ज्यादा मुखर होने की बात कहती है। फ्रेडरिक एंगेल्स ने कहा भी था कि 'समाजवाद की परिणति अंततः राष्ट्रों की सरहदों के मिट जाने में होगी'।" आइए आज पहली ब...

यादवेन्द्र का आलेख 'भूखे पेट रहेंगे पर सिनेमा जरूर देखेंगे'

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यादवेन्द्र  सिनेमा मनोरंजन का ही नहीं, ज्ञान का भी एक प्रमुख माध्यम रहा है। हालांकि एक अरसा पहले हमारे हिन्दी समाज में सिनेमा देखने को अच्छा नहीं माना जाता था। तमाम घरों के लड़के तब छुप छुपा कर ही सिनेमा देखने जाया करते थे। कई ऐसे भी जुनूनी होते थे जो पहले शो का पहला टिकट हासिल कर ही सिनेमा देखने में यकीन करते थे। चाहें इसके लिए कोई भी परेशानी झेलनी पड़े। तब सिनेमा का टिकट लेने के लिए लम्बी लम्बी लाइन लगा करती थी। भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पुलिस की व्यवस्था करनी पड़ती थी। तब अखबारों का एक पूरा पन्ना शहर के सिनेमाघरों में लगी फिल्मों के उल्लेख से ही भरा होता था। यादवेन्द्र जी उस दौर को याद करते हुए उचित ही लिखते हैं 'हमारे अपने जीवन में बीस साल पहले तक सिनेमा हॉल के दरवाज़े जितनी शिद्दत से खुलते थे उसका प्रभाव एकदम जादुई होता था। चालीस पैतालीस साल तक के और उससे बड़े लगभग सभी लोगों की स्मृति में सिनेमा हॉल का जादू ज़रूर जिंदा होगा, सिनेमा हॉल भौतिक रूप में भले ही बंद हो गए हों। तब सिनेमा का साहित्य से एक अटूट रिश्ता हुआ करता था।  लेकिन जमाना बदला और सिनेमा का चरित्र भी बदल गय...

यादवेन्द्र का आलेख 'देखने में सिर्फ़ वस्तु नहीं शामिल होती'

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यादवेन्द्र  देखना मनुष्य द्वारा बरती जाने वाली सबसे महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। देखने से हम कई चीजें अनुभूत करते हैं और उसे अपनी बातों या रचनाओं में अभिव्यक्त करते हैं। लेकिन जब किसी व्यक्ति के देखने का तरीका ही वासनमय हो तो क्या किया जा सकता है। खासकर स्त्री के सन्दर्भ में परंपरागत सोच आज भी दकियानूसी बनी हुई है। स्त्री की कोई भी तस्वीर देख कर सस्ती सी टिप्पणी कर देना ऐसे लोगों के लिए आज आम है। ऐसे लोगों के लिए राजा रवि वर्मा की पेंटिंग अनावृत स्त्री को समझ पाना उनके समझ के बाहर की बात है। जिसके दिल दिमाग में वासना ही भरी हुई हो वह स्त्री सौंदर्य, स्त्री वस्त्रों या साज सिंगार के बारे में क्या सोचेगा या क्या बात करेगा? मधुसूदन आनन्द की कहानी 'देखना' के बहाने यादवेन्द्र जी ने अपने आलेख में इसी पहलू पर कुछ गम्भीर विमर्श प्रस्तुत किया है। आजकल पहली बार पर हम प्रत्येक महीने के पहले रविवार को यादवेन्द्र का कॉलम 'जिन्दगी एक कहानी है' प्रस्तुत कर रहे हैं जिसके अन्तर्गत वे किसी महत्त्वपूर्ण रचना को आधार बना कर अपनी बेलाग बातें करते हैं। कतिपय कारणों से पिछले महीने हम यह कॉलम प्रस...

यादवेन्द्र का आलेख 'कविता से सिनेमा, बरास्ते (पट) कथा'

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रबीन्द्र नाथ ठाकुर  आमतौर पर विधाएं रचनाकार की अभिव्यक्ति का माध्यम होती हैं। हरेक विधा की अपनी विशिष्टता होती है जो उसे खास बनाती है। खुद एक ही रचनाकार अलग अलग विधाओं में आवाजाही करता दिखाई पड़ता है। सिनेमा अभिव्यक्ति का एक सशक्त माध्यम है। इसके मूल में पटकथा होती है जिसे पटकथा लेखक किसी कहानी, कविता या उपन्यास को आधार बना कर लिखता है। गुरुदेव रबीन्द्र नाथ ठाकुर की बांग्ला कविता 'फाँकी' को आधार बना कर चर्चित बाँग्ला फ़िल्मकार बुद्धदेब दासगुप्ता ने एन एफ़ डी सी की आर्थिक मदद से हिंदी में छोटी सी फ़िल्म बनाई है जो रबीन्द्र नाथ ठाकुर की डेढ़ सौवीं वर्षगाँठ के अवसर पर तेरह कविताओं पर आधारित फीचर फ़िल्म "त्रयोदशी" का हिस्सा है।  यह आम धारणा है कि इस कविता में उद्धृत 'मैं' स्वयं कवि रबीन्द्र नाथ ठाकुर हैं और बीनू उनकी दिवंगत पत्नी मृणालिनी देवी हैं जिन्हें वे इलाज के लिए पेंड्रा रोड के टीबी सेनेटोरियम ले कर आए थे। मृणालिनी देवी (पूर्व नाम भवतारिणी देवी) का जन्म   1 मार्च 1874 को हुआ था। आज 1 मार्च को  मृणालिनी देवी की स्मृति को  सम्मानपूर्वक स्मरण करते...