एकान्त श्रीवास्तव के उपन्यास 'पानी भीतर फूल.' पर जीतेन्द्र कुमार की समीक्षा
एकान्त श्रीवास्तव मूलतः कवि हैं. अभी हाल ही में उनका एक नया उपन्यास आया है 'पानी भीतर फूल.' इस उपन्यास की पृष्ठभूमि में छतीसगढ़ का ग्रामीण जीवन है जिसके साक्षी एकान्त खुद हैं. वे मूलतः उसी अंचल के रहने वाले हैं इसीलिए वहाँ के जीवन, प्रकृति और समस्याओं से भलीभांति अवगत हैं. एकान्त की अपने अंचल अपने गाँव की आवाजाही लगातार बनी हुई है इसीलिए उनके लेखन में वे देशज शब्द भी आते हैं जो अब लुप्तप्राय हो चले हैं. ये देशज शब्द किसी फैशन के तहत नहीं बल्कि जरूरतों के अनुसार ही आये हैं. इसलिए क्योंकि आज भी इनके लिए हिन्दी में हमें समानार्थी शब्द नहीं मिलते। और ये आज जो हिंदी है उसकी समृद्धि के लिए भी यह जरुरी है कि वह इन आंचलिक शब्दों को स्वीकार करे, अपने में समाहित करे. इस उपन्यास की एक समीक्षा लिखी है कवि-कहानीकार जीतेन्द्र कुमार ने. तो आईये पढ़ते हैं हैं यह समीक्षा। 'पानी भीतर फूल': प्रेम, शांति और आनंद का स्वप्न-संसार जितेन्द्र कुमार ‘‘हम दीवार पर जमें सारे कैलेंडर उतार दें और ब्रह्माण्ड की गति में चलने के पहले पूरी ताकत स...