रवि भूषण का संस्मरण 'सरल, निश्छल और अपनत्व से लबालब साथी'
राजेन्द्र कुमार का प्रारम्भिक जीवन संघर्षों से भरा हुआ था। इन संघर्षों ने उनके जीवन को निखारने का काम किया। बचपन में ही उन्होंने कविताएं लिखना शुरू किया। छात्र वे विज्ञान के थे लेकिन रुचि हिन्दी साहित्य में थी। इसीलिए उनके लेखन में हमेशा एक तार्किकता दिखाई पड़ती है। कल्पना की उड़ान भरते हुए भी वे यथार्थ की जमीन पर मजबूती से अपने पांव जमाए रहे। सादगी उनके जीवन का पर्याय थी। समन्वय उनकी आदत में था और संघर्षों की आंच ने स्वाभिमान के साथ जीना सिखाया। एक साथ ये गुण कम लोगों में मिलते हैं। आलोचक रवि भूषण जी की राजेन्द्र कुमार से घनिष्ठता थी। अपने संस्मरण में रवि भूषण ने राजेन्द्र कुमार जी को आत्मीयता के साथ याद किया है। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं रवि भूषण का संस्मरण 'सरल, निश्छल और अपनत्व से लबालब साथी'। 'सरल, निश्छल और अपनत्व से लबालब साथी' रवि भूषण शायद वह बीसवीं शताब्दी के अंतिम दशक का कोई वर्ष था, जब हम लोग इलाहाबाद में मिले थे। पहली बार। उसके बाद कई बार कानपुर से ले कर इलाहाबाद तक के उनके जीवन के बारे में उनसे जाना। अस्सी के दशक के आरंभ से उन्होंने 'अभिप्र...