अर्चना वर्मा की कहानी पर रोहिणी अग्रवाल का आलेख
(चित्र: रोहिणी अग्रवाल) आलोचना उतनी आसान विधा नहीं जितना लोग समझते हैं और तुरत-फुरत लिखने के लिए आसन मार कर बैठ जाते हैं। आलोचना अपने आप में अत्यन्त कठिन कर्म है। रचना के समानान्तर उसका एक प्रति-पाठ तैयार करने की प्रक्रिया होती है आलोचना। आज के दौर में जिन कुछ गिने चुने आलोचकों ने इस कठिन दायित्व का बखूबी निर्वहन किया है उनमें रोहिणी अग्रवाल का नाम अग्रणी है। अपने इस आलेख में रोहिणी जी ने कथाकार अर्चना वर्मा की कहानियों की आलोचकीय पड़ताल किया है। आईए पढ़ते हैं रोहिणी जी का यह आलेख ‘अंधेरे तहखानों में छिपे आलोक वृत्त उर्फ सह-सर्जक पाठक संग संलाप’ अंधेरे तहखानों में छिपे आलोक वृत्त उर्फ सह-सर्जक पाठक संग संलाप रोहिणी अग्रवाल “उसी आवाज में आज भी वही कहती है बार-बार। तलब किसी को नहीं छोड़ती न? हिम्मत नहीं होती न? अपनी ही तलब से जिंदगी भर का डर! अब तो सब देना-पावना चुक गया। अब भी नही तो फिर कब?’ ( अर्चना वर्मा, राजपाट तथा अन्य कहानियां, पृ 0 56 ) बैठे-बैठै अचानक...