कमलेश भट्ट कमल का आलेख 'नये मिज़ाज की ग़ज़ल के शायर बशीर बद्र'
बशीर बद्र बीते 28 मई 2026 को नामचीन शायर बशीर बद्र का निधन हो गया। बशीर बद्र ऐसे शायर थे जिनकी लिखी पंक्तियां लोगों के जुबान पर बस गईं हैं। ऐसा सौभाग्य कम रचनाकारों को प्राप्त हो पाता है कि वे जब अपनी पढ़ाई करने के लिए जाएं तो उनकी रचनाएँ खुद उनकी कक्षा के पाठ्यक्रम में शामिल हों। बशीर साहब को यह सम्मान प्राप्त था। उनकी लिखी पंक्तियां 'लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में/ तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में' उस संवेदनशीलता को दर्शाती हैं जो एक आम आदमी से शिद्दत से जुड़ी हुई हैं। बद्र साहब को अपने लेखन पर इस कदर यकीन था कि उस जमाने की मशहूर पत्रिका शबे खून के सम्पादक शम्सुर्रहमान फारूखी ने जब अपनी पत्रिका में उनकी गजलों को प्रकाशित नहीं किया तो बद्र साहब ने किसी से कहा था कि 'क्या समझते हैं उनके रिसाले में नहीं छपेगा तो बशीर बद्र शायर नहीं बन पाएगा?' उनके लेखन के दम खम से आज दुनिया परिचित है। उनके पहले संग्रह पर लिखते हुए कवि रामेश्वर शुक्ल अंचल ने लिखा था- 'डॉ. बशीर बद्र की गजलों का यह संकलन भाषा और भाव दोनों की दृष्टि से पारंपरिक उर्दू-गजल से हट कर है। भाषा में सरल...