जगदीश्वर चतुर्वेदी का आलेख 'सव्यसाची की डिजिटल फलक पर अनुपस्थिति क्यों?'


सव्यसाची 


साहित्य का संसार व्यापक है। तमाम ऐसे लोग हुए हैं जिन्होंने निःस्वार्थ भाव से साहित्य की सेवा करते हुए अपनी जिंदगी गुजार दिया। वे प्रचार प्रसार की दुनिया से अलग लगभग अनाम से रहते हुए चुपचाप अपना काम करते रहे। ऐसा ही एक नाम है सव्यसाची का। मार्कण्डेय जी सव्यसाची और उनकी पत्रिका उत्तरार्द्ध की अक्सर चर्चा किया करते थे। मैं इनके बारे में नहीं जानता था लेकिन मार्कण्डेय जी की चर्चा के पश्चात प्रदीप सक्सेना से सव्यसाची के बारे में जाना समझा। लोगों की धारणा है कि इंटरनेट पर सब कुछ उपलब्ध है। लेकिन यह अधूरा सच है। इंटरनेट पर आज भी बहुत कुछ उपलब्ध नहीं है। हाल ही में कथाकार अनन्त कुमार सिंह का जब निधन हुआ तब मैंने नेट पर उनकी रचनाओं के बारे में जानना चाहा। वहाँ निराशा हाथ लगी। नेट पर बिहार के माफिया अनंत कुमार सिंह के बारे में जानकारियां भरी पड़ी थीं। हमारे प्रिय कहानीकार हैं नीरज कुमार सिंह। इनकी कहानियां भी नेट पर दूर दूर तक कहीं नजर नहीं आयीं। सव्यसाची के बारे में भी असफलता ही हाथ लगी। शैलेन्द्र चौहान लिखते हैं 'सव्यसाची का जन्म 10 जुलाई 1932 को उत्तर प्रदेश के बुलन्दशहर जिले के खुर्जा में हुआ था। उनका मूल नाम श्यामलाल वशिष्ठ था। उनका प्रारंभिक जीवन अत्यंत साधारण था और वे जीवनपर्यंत सादगी और उच्च विचारों के सिद्धांतों पर चले। समाज के शोषित और कमज़ोर वर्गों को संगठित करने के लिए मथुरा और आसपास के क्षेत्रों में कई मज़दूर और कर्मचारी यूनियनों की स्थापना की। सव्यसाची ने अपने प्रगतिशील विचारों के प्रचार-प्रसार के लिए किसी व्यावसायिक या पूँजीवादी मीडिया का सहारा नहीं लिया, बल्कि उन्होंने स्वयं युगान्तर प्रकाशन की स्थापना की। इसके बैनर तले उन्होंने तीन दर्जन से अधिक लघु पुस्तकें और पुस्तिकाएँ लिखीं, जो सरल भाषा में आम जनता को मार्क्सवाद, समाजवाद और जनवाद से परिचित कराती थीं। उनके द्वारा संपादित त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिकाएं  "उत्तरार्द्ध" और "उत्तरगाथा"  देश और विदेश के प्रगतिशील वैचारिक हलकों में एक आंदोलन के रूप में स्थापित हुईं। जनवरी 1980 में उनके संपादन में प्रकाशित 'उत्तरार्द्ध' का "प्रेमचंद विशेषांक" साहित्यिक जगत में एक ऐतिहासिक संदर्भ ग्रंथ माना जाता है। कामरेड सव्यसाची द्वारा लिखित प्रमुख पुस्तकें और पुस्तिकाएँ निम्नलिखित हैं: 1. समाज को बदल डालो, 2. हम क्या करें?, 3. यह सब क्यों?, 4. एक ही रास्ता, 5. स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास, 6. सुबह होने से पहले (कविता संग्रह), 7. नौ जवानों से!, 8. कम्युनिस्ट क्या चाहते हैं?, 9. समाज कैसे बदलता है, 10. समाजवाद क्या है?, 11. आज़ादी से इमरजेंसी तक, 12. कम्युनिस्ट आंदोलन में भटकाव, 13. गौरबाचोव के बहाने मौत के सौदागरों से, 14. आपातकाल से आज तक, 15. रास्ता इधर है, 16. गाँव के गरीबों से, 17. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (R.S.S.), 18. राजसत्ता क्या है?, 19. इंदिरा गांधी से दो बातें, 20. कम्युनिस्टों ने देश मे क्या किया?, 21. उधर नहीं रास्ता इधर है, 22. हिंदी फिल्में, 23. राष्ट्रीय एकता की समस्या, 24. महिलाओं से, 25. भागो मत दुनिया को बदल लो, 26. कहा शहीद भगत सिंह ने, 27. शहीदे आज़म भगत सिंह, 28. धर्म, 29. राम मंदिर या राज सिंहासन, 30. साम्प्रदायिकता क्या? क्यों? कैसे?, 31. राजीव गांधी से दो बातें। 17 दिसम्बर 1997 को मस्तिष्क कैंसर (ब्रेन ट्यूमर/फोड़े) के कारण उनका निधन हो गया। सफेद कुर्ता-पायजामा पहनना और साइकिल से चलना उनकी जीवन शैली का हिस्सा था। वे अपनी आय का अधिकांश हिस्सा पत्रिकाओं के प्रकाशन और निर्धन व कमज़ोर छात्रों की कॉलेज फीस देने में लगा देते थे।' सव्यसाची के जन्मदिन 10 जुलाई के अवसर पर जगदीश्वर चतुर्वेदी ने कुछ मूलभूत सवालों के साथ उन्हें  शिद्दत के साथ याद किया है। सव्यसाची की स्मृति को हम नमन करते हैं। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं जगदीश्वर चतुर्वेदी का आलेख 'सव्यसाची की डिजिटल फलक पर अनुपस्थिति क्यों?'


जन्मदिन विशेष : सव्यसाची 

'सव्यसाची की डिजिटल फलक पर अनुपस्थिति क्यों?'


जगदीश्वर चतुर्वेदी


आज कॉमरेड सव्यसाची का जन्म दिन है। उनका हिन्दी के साहित्य जगत और ख़ासकर आंदोलनकारी नौजवानों में एक ज़माने में व्यापक असर था। उनके व्यक्तित्व की खूबी थी कि वे सामान्य लोगों, लेखकों, युवाओं को जोड़ने में गहरा विश्वास करते थे और उसके लिए वे उन सभी साधनों का उदारता से इस्तेमाल करते थे जो उनके हाथ में थे। उनके लेखन और व्यक्तित्व ने मथुरा और उसके बाहर बड़ी संख्या में युवाओं को एक ज़माने में आकर्षित किया था। वह शानदार वक्ता थे। सरल-सहज भाषा में अपनी वक्तृत्व कला से आकर्षित करते थे। उनको जनप्रिय मार्क्सवाद के प्रचारक के रुप में देखा जाना चाहिए।

हम सब उनको प्यार से मास्साब कहते थे। मास्साब तमाम क़िस्म की सामाजिक रुढियों से मुक्त थे लेकिन स्वयं मार्क्सवाद और ख़ासकर पार्टी के बंधनों में बंधे थे। पार्टी के नियमों और ऊपरी पार्टी संस्थाओं और नेताओं के निर्देशों का कड़ाई से पालन करते थे। अनेक बार उनको अपने लेखन के कारण पार्टी के बड़े नेताओं की तीखी आलोचना का भी सामना करना पड़ा। उनके व्यक्तित्व की मुश्किल यह थी कि वे किसी भी युवा कॉमरेड की सामयिक सक्रियता से बहुत जल्दी प्रभावित हो जाते और उसके बारे में अतिरंजित ढंग से राय बना लेते थे। कालांतर में यदि उस युवा में परिवर्तन होता था तो बड़े दुखी होते थे।जबकि यह एक हक़ीक़त है कि युवा में जल्दी परिवर्तन होते हैं। उनमें संख्या में बहुत कम ऐसे होते हैं जो टिक कर एक ही विचारधारा का पालन करें। 

युवाओं के अंदर मेहनत करने और अनुकरण करने की प्रवृत्ति तो होती लेकिन वैचारिक रुपान्तरण करने, मार्क्सवाद की बुनियादी धारणाओं को मानने-समझने और उनके अनुरूप जीने की बहुत कम क्षमता होती है। मार्क्सवाद जिस तरह के आंतरिक-वैचारिक परिवर्तन की माँग करता है और उसके लिए जिस तरह की निरंतर वैचारिक भूख होती है उसे समझने और और उसके अनुरुप दिमाग़ को  पुख़्ता बनाने की उसमें क्षमता होती है उसके लायक़ हिंदी में बहुत कम लोग हैं।

सव्यसाची युवाओं को अपनी लगन और ईमानदारी से प्रभावित करते थे लेकिन उनको समुचित विचारधारात्मक खुराक देने में असमर्थ थे। लगी वजह है उनके व्यक्तित्व का तब तक असर रहता था जब तक युवा उनके संपर्क में रहता, बाद में धीरे धीरे उनके आभामंडल से बाहर निकल जाता। वे ही युवा मार्क्सवाद की क़तारों में रह गए जो स्वयं मार्क्सवाद को अर्जित करने में सफल रहे।

सव्यसाची अपने व्यवहार से आकर्षित करते थे, जोड़ते थे। लेकिन विचारधारा के खूँटे से बांधते नहीं थे। उस तरह वे एक तरह से परंपरागत प्रगतिशील जनसंपर्क शैली के ज़रिए जोड़ने की कला में माहिर थे। 

मास्साब, बीएसए कॉलेज, मथुरा  में राजनीति विज्ञान के प्रोफ़ेसर थे लेकिन मार्क्स-एंगेल्स -प्लेखानोव आदि का उनकी रचना और विचार दृष्टि में बहुत कम उपयोग मिलता है। उनको जनप्रिय खड़ी बोली हिन्दी में प्रचार सामग्री निर्मित करने में मज़ा आता था और उसके लिए उन्होंने एक ज़माने में बहुत मेहनत की, हजारों युवाओं को पार्टी कक्षाओं के माध्यम से अपनी प्रभावशाली मार्क्सवादी शिक्षण शैली से प्रभावित किया। उनकी मास मीडिया, खासकर फ़िल्मों में गहरी रुचि थी। वे अपनी शैली में फ़िल्मों का बातचीत में सहारा भी लेते, साथ ही समाचार पत्रों में प्रकाशित प्रासंगिक ख़बरों का सामाजिक विश्लेषण के लिए सहारा लेते थे। 

मथुरा में आपातकाल में उनके प्रयासों से ही जन सांस्कृतिक मंच का गठन हुआ जिसमें अन्य युवाओं के साथ मुझे भी शामिल होने और काम करने का मौक़ा मिला। तक़रीबन दो दशक से भी अधिक समय तक मंच ने मथुरा में नियमित रुप से बहुत काम किया और मथुरा के माहौल में प्रगतिशील नज़रिए से युवाओं को प्रभावित किया। कालांतर में मंच कुछ वर्ष निष्क्रिय रहा।बाद में पुनः सक्रिय हुआ लेकिन तब तक मंच के युवा साथी बूढ़े हो चुके थे और उसमें पहले जैसी सक्रियता और वैचारिक ओज नहीं रहा। कहने को मंच आज भी है। पर, उसकी पुरानी आभा ख़त्म हो गई है। 


सव्यसाची


मास्साब के व्यक्तित्व में सादगी कूट-कूट कर भरी हुई थी। कुर्ता-पायजामा उनकी नियमित पोशाक थी। सामान्य भोजन और सामान्य रहन-सहन उनकी प्रकृति थी। आरंभ में मास्साब शादी न करने के पक्ष में थे, लेकिन अकेले रहने की मुश्किलों से वाक़िफ़ थे, फिर अंत में उन्होंने लंबा अर्सा बीत जाने के बाद अपनी पसंद से शादी की और व्यवस्थित गृहस्थ जीवन का आरंभ किया।लेकिन गृहस्थ जीवन को आरंभ करने के पहले उनके जीवन में अनेक कमज़ोरियाँ आ चुकी थीं जिनको ले कर वे सचेत थे, अनेक बार हम सबकी आलोचना सुन कर दुरूस्त करते, कमज़ोरियों से लड़ते, पर, मथुरा का परिवेश, एक छोटे शहर का परिवेश था। इसमें कमज़ोरियों पर विजय पाना और नए आधुनिक व्यक्तित्व का निर्माण करना बहुत ही मुश्किल काम है। मास्साब जैसे व्यक्ति के लिए तो यह और भी मुश्किल काम था।

मास्साब, बार बार कहते थे मैं बहुत कमजोर आदमी हूँ। लेकिन मनुष्य हो और कमज़ोरियों न हों यह हो नहीं सकता। हम सबमें कमज़ोरियाँ थीं और आज भी हैं। कुछ उनसे लड़ते हैं, कुछ लड़ नहीं पाते। मास्साब कमज़ोरियों से लड़ने की पूरी कोशिश करते लेकिन बार बार उनका शिकार होते। यह उनके संस्कार और आदतों की वजह से होता था। मास्साब ने अपने को, बहुत बदला लेकिन वे अपने जीवन को अनेक सामंती संस्कारों से मुक्त नहीं कर पाए। सामंती संस्कार और मार्क्सवादी आवरण ने उनके जीवन को बेहद जटिल और अनेक मुसीबतों से घेर दिया।सामंती संस्कारों का ही परिणाम था कि उनका युवा विशेष के बारे में सब्जेक्टिव निष्कर्ष होता था और वह अमूमन ग़लत साबित होता था।इसके वाबजूद मास्साब में आलोचना-आत्मालोचना की विलक्षण क्षमता थी जिसे उन्होंने मार्क्सवाद से सीखा था। हम सबको वे बहुत अच्छे लगते और आकर्षित करते। सभी लोग उनका बहुत सम्मान करते थे। आज उनका जन्मदिन है। कम से कम आलोचना-आत्मालोचना को तो हम सब एक सिरे से अर्जित करने, अपने संस्कारों में ढालने की कोशिश करें।

मास्साब ने पत्रिका, पर्चे, लघु पुस्तिका, पुस्तक और भाषण कला के जरिए जनप्रियता हासिल की थी। ये सभी क्षेत्र आज भी प्रासंगिक हैं।खासकर डिजिटल पत्रिका का प्रकाशन करना महत्वपूर्ण है। हिंदी में अनेक डिजिटल पत्रिकाएं नेट पर उपलब्ध हैं, उनको जनप्रिय बनाने की जरूरत है। अभी इन पत्रिकाओं के पास पाठक कम हैं। इस प्रसंग में डिजिटल पत्रिकाओं की समस्याओं पर विचार करना जरूरी है। अभी तक मास्साब का लेखन और 'उत्तरार्द्ध' पत्रिका के सभी अंक इंटरनेट पर नहीं आ पाए हैं, कायदे से माकपा और जलेसं को इनको इंटरनेट पर लाने का प्रयास करना चाहिए।

असल में, डिजिटल की दुनिया ने हमारे रचना संसार के सभी उपकरणों पर कब्जा जमा लिया है। लघुपत्रिका अथवा साहित्यिक पत्रकारिता जब शुरू हुई थी तो हमने यह सोचा ही नहीं था कि ये पत्रिकाएं क्या करने जा रही हैं। हमारी पत्रकारिता और पत्रकारिता के इतिहासकारों ने कभी गंभीरता से मीडिया तकनीक के चरित्र की गंभीरता से मीमांसा नहीं की। हम अभी तक नहीं जानते कि आखिरकार ऐसा क्या घटा जिसके कारण लघु पत्रिकाएं अभी भी निकल रही हैं।

आर्थिक दृष्टि से लघु पत्रिका निकालना घाटे का सौदा साबित हुआ है। लघु पत्रिका प्रकाशन अभी भी निजी प्रकाशन है। इस अर्थ में लघु पत्रिका प्रकाशन को निजी क्षेत्र की गैर-कारपोरेट उपलब्धि कहा जा सकता है। संभवत: निजी क्षेत्र में इतनी सफलता अन्य किसी रचनात्मक प्रयास को नहीं मिली। लघु पत्रिकाओं के प्रकाशन को वस्तुत: गैर-व्यावसायिक पेशेवर प्रकाशन कहना ज्यादा सही होगा। समाज में अभी भी अनेक लोग हैं जो लघुपत्रिका को व्यवसाय के रूप में नहीं देखते, बल्कि उसे लघुपत्रिका आंदोलन कहना पसंद करते हैं। वे क्यों इसे लघुपत्रिका आंदोलन कहते हैं, यह बात किसी भी तर्क से प्रकाशन की मीडिया कसौटी पर खरी नहीं उतरती।

लघु पत्रिका प्रकाशन की अपनी दुनिया वहीं है जो प्रकाशन की दुनिया है। फ़र्क इसके चरित्र और भूमिका को ले कर है। आप जितना बेहतर और वैज्ञानिक ढ़ंग से प्रिंट टैक्नोलॉजी के इतिहास से वाकिफ होंगे। उतने ही बेहतर ढ़ंग से लघुपत्रिका प्रकाशन को समझ सकते हैं। लघु पत्रिकाओं की आवश्यकता हमारे यहां आज भी है, कल भी थी, भविष्य में भी होगी। लघुपत्रिका का सबसे बड़ा गुण है कि इसने संपादक और लेखक की अस्मिता को सुरक्षित रखा है। हमें जानना चाहिए कि कैसे संपादक की सत्ता और लेखक की पहचान का प्रतिष्ठानी प्रेस अथवा व्यावसायिक प्रेस में लोप हो गया?



आज प्रतिष्ठानी प्रेस में संपादक है, लेखक हैं, किंतु उनकी कलम और बुद्धि पर नियंत्रण किसी और का है, विज्ञापन कंपनियों का है। संपादक लेखक, स्तंभकार और संवाददाता की सत्ता को विज्ञापन एजेंसियों ने रूपान्तरित कर दिया है। आज विज्ञापन एजेंसियां तय करती हैं कि किस तरह की खबरें होंगी, किस साइज में खबरें होंगी, किन विषयों पर संपादकीय सामग्री होगी? किस तरह की भाषा का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। इस समूची प्रक्रिया के व्यवसायिक समाचारपत्र और पत्रिका जगत पर क्या असर हुए हैं, इसके बारे में हमने कभी गंभीरता के साथ विचार नहीं किया। हमने कभी यह सोचा ही नहीं कि जब पहली बार समाचारपत्र आया तो उसने क्या किया और जब समाचारपत्र में विज्ञापन दाखिल हो गया तो क्या बदलाव आने शुरू हुए, लघु पत्रिका प्रकाशन भी इस प्रक्रिया से प्रभावित हुआ है। इन सबको ले कर हमारे पास कुछ अनुभव हैं, कुछ संस्मरण हैं। कुछ किंदन्तियां हैं। किंतु भारत के कम्युनिकेशन तकनीक के इतिहास और उसके परिणामों की कभी गंभीरता से पड़ताल नहीं की। लंबे समय तक हम साहित्य के एक हिस्से के तौर पर लघुपत्रिकाओं अथवा साहित्यिक पत्रिकाओं को देखते रहे, उनमें प्रकाशित सामग्री का हमने मीडिया सैद्धांतिकी अथवा आलोचना के नजरिए से कभी मूल्यांकन ही नहीं किया। यहां तक कि एक स्वतंत्र मीडिया रूप के तौर पर पत्रिकाओं की सत्ता को हमने कभी स्वीकार नहीं किया।

आज जब हम बातें कर रहे हैं तो स्थिति में कोई मूलगामी किस्म का परिवर्तन नहीं आया है। सिर्फ एक परिवर्तन आया है हमने पत्र-पत्रिकाओं के इतिहास को साहित्य के इतिहास से अलग करके स्वतंत्र रूप से पत्रकारिता के इतिहास के रूप में पढ़ाना शुरू कर दिया है। पत्र-पत्रिकाओं को स्वतंत्र रूप से पढ़ाने से मामला हल नहीं हो जाता, बल्कि और भी पेचीदा हो उठा है।

समाचारपत्र का इतिहास हो या लघुपत्रिका का इतिहास हो, इसकी सही समझ तब ही बनेगी जब हम कम्युनिकेशन तकनीक के इतिहास से वाकिफ होंगे। हमारी मुश्किल अभी यहीं पर बनी हुई है, हमें साहित्य से प्रेम है, पत्रिकाओं से प्रेम है, किंतु तकनीक से प्रेम नहीं है। अगर हमारा तकनीक से प्रेम होता तो हम उसके इतिहास को जानने की कोशिश करते।

हिन्दी में संपादक-लेखकों का एक तबका तैयार हुआ है जो धंधेखोरों की तरह लघुपत्रिका आंदोलन के नाम पर टटुपूंजिया दुकानदारी कर रहा है। इसके बावजूद ये स्वनाम-धन्य विद्वान यह मानकर चल रहे हैं कि लघुपत्रिकाओं के सबसे बड़े हितचिन्तक वे हैं। जबकि सच यह है कि ऐसे संपादकों की बाजार में कोई साख नहीं है। वे अपनी किताबों की बिक्री तक नहीं कर पाते। अपनी पत्रिका को बेच तक नहीं पाते। हमें यह देखना होगा कि लघु पत्रिकाएं क्या साहित्यिक अभिरूचि पैदा करने का काम कर रही हैं अथवा कुछ और काम कर रही हैं? क्या हमारी लघु पत्रिकाओं ने कभी इस तथ्य पर गौर किया कि कैसे विगत तीस सालों में भारत के पत्रिका प्रकाशन में विस्फोट हुआ है।




आज पत्रिका प्रकाशन सबसे प्रभावी व्यवसाय है। एक जमाना था जब सारिका, दिनमान, धर्मयुग आदि को विभिन्न बहाने बना कर बंद किया गया था, किंतु आज स्थिति यह है कि पत्रिका प्रकाशन अपने पैरों पर खड़ा हो चुका है। आज बाजार में सभी भाषाओं में पत्रिकाओं की बाढ़ आई हुई है। बड़े पैमाने पर पत्रिकाएं बिक रही हैं। अपना बाजार बना रही हैं। लघुपत्रिका का प्रकाशन अभी कम मात्रा में होता है। हंस, पहल, उद्भावना, आलोचना जैसी पत्रिकाएं पांच-सात हजार का आंकड़ा पार नहीं कर पायी हैं। जबकि छोटे से कस्बे से निकलने वाली धार्मिक पत्रिका लाखों की तादाद में बिक रही हैं। हमें बेचने की कला को धार्मिक पत्रिकाओं से सीखना चाहिए। बड़े प्रतिष्ठानी प्रेस ने धार्मिक पत्रिकाओं से यह गुण सीखा है और आज बाजार में हर विषय की एकाधिक पत्रिकाएं मिल जाएंगी, जिनकी साधारण तौर पर इनकी बिक्री हमारी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं से कई गुना ज्यादा है। धार्मिक पत्रिकाओं से सीखने की बात मैं इसलिए कर रहा हूँ कि आप पत्रिका निकालना यदि चाहते हैं तो दूसरों से सीख लें।

लघुपत्रिका की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि वह अपने पाठक की अभिरूचियों को नहीं जानती, अपने पाठक को नहीं जानती, वह सिर्फ साहित्य, विचारधारा और साहित्यकार को जानती है, उसमें भी वह संकुचित भाव से चयन करती है। यह तो कुल मिला कर कंगाली में आटा गीला वाली कहावत चरितार्थ हो गयी।

हमारी लघु पत्रिकाओं का समूचा नजरिया विधा केन्द्रित सामग्री प्रस्तुति पर ही केन्द्रित रहा है। हमने विधा केन्द्रित पैमाना 19वीं  शताब्दी में चुना था, वह पैमाना आज भी बरकरार है, उसमें परिवर्तन की जरूरत हमने महसूस नहीं की। हम यह भूल ही गए कि पाठक की भी अभिरूचियां होती हैं। पाठक का भी नजरिया होता है, हम संपादक की रूचि जानते हैं, लेखक का नजरिया जानते हैं किंतु लघु पत्रिकाओं को पढ़ कर आप पाठक को नहीं जान सकते। हमें इस सवाल पर गंभीरता के साथ विचार करना चाहिए कि क्या गैर-पेशेवर ढ़ंग से लघु पत्रिका प्रकाशन संभव है? क्या उसका कोई भविष्य है।

हमें पाठक की अभिरूचि और साहित्य की स्वायत्तता को केन्द्र में रख कर लघुपत्रिका प्रकाशन करना चाहिए। साथ ही इस पहलू पर भी गौर करना चाहिए कि साहित्य की परिभाषा बदल गयी है? आज साहित्य की वही परिभाषा नहीं रह गई है जो आज से पचास या पच्चीस साल पहले थी। लघु पत्रिका का संसार साहित्य के बदले हुए स्वरूप को परिभाषित किए बिना आगे चला जा रहा है। इस संदर्भ में आलोचना पत्रिका के पुनर्प्रकाशन को प्रस्थान बिंदु के रूप में विश्लेषित करने की जरूरत है। आलोचना पत्रिका का जब पुनर्प्रकाशित हुई तो उसका पहला अंक फासीवाद पर आया। सवाल किया जाना चाहिए कि इस अंक से पहले भी अनेक राजनीतिक फिनोमिना आए किंतु उन पर कभी आलोचना पत्रिका के संपादक का ध्यान नहीं गया। मेरा इशारा आपात काल की तरफ है, आलोचना पत्रिका के द्वारा आपात काल के बारे में एकदम चुप्पी और साम्प्रदायिकता पर  विशेष अंक इसका क्या अर्थ है? इस प्रसंग को इसलिए सामने पेश कर रह हूँ कि आप यह जान लें कि विगत पच्चीस वर्षों लघु पत्रिकाएं आम तौर पर उन विषयों पर सामग्री देती रही हैं जो सत्ता प्रतिष्ठानों ने हमारे लिए तैयार किए हैं।

लघुपत्रिका का विमर्श सत्ता विमर्श नहीं है। लघुपत्रिकाएं  पिछलग्गू विमर्श का मंच नहीं हैं। ये पत्रिकाएं मौलिक सृजन का मंच हैं। साम्प्रदायिकता का सवाल हो या धर्मनिरपेक्षता का प्रश्न हो अथवा ग्लोबलाईजेशन का प्रश्न हो हमारी पत्रिकाएं सत्ता विमर्श को ही परोसती रही हैं। सत्ता विमर्श कैसे परोसा जाता है इसका आदर्श नमूना है लघु पत्रिकाओं में चलताऊ ढ़ंग से सामयिक प्रश्नों पर छपने वाली टिप्पणियां। लघु पत्रिका का चरित्र सत्ता के चरित्र से भिन्न होता है, यह बात सबसे पहले भारतेन्दु ने समझी किंतु हमारे नए संपादकगण अभी तक नहीं समझ पाए हैं। लघुपत्रिका की हमारी अवधारणा में भी गंभीर समस्याएं हैं। लघु पत्रिकाओं में कारपोरेट जगत की पत्रिकाओं की समस्त बीमारियां घर कर गयी हैं। जिस तरह कारपोरेट घरानों की पत्रिकाओं में पक्षपात होता है, खासकर रचना के चयन को ले कर, लेखक के चयन को ले कर, जिस तरह कारपोरेट पत्रिकाओं के लिए विज्ञापनदाता महत्वपूर्ण और निर्णायक होता है। उसके आधार पर पक्षपात होता है, ठीक वैसे ही लघु पत्रिकाओं में भी पक्षपात का गुण विचारधारा विशेष के प्रति आग्रह के रुप में कैंसर की तरह घर कर चुका है।

लघुपत्रिकाओं को दो कमजोरियों से मुक्त करने की जरूरत है, पहला है 'विचारधारात्मक पक्षपात', दूसरा है 'निर्भरता'। ये दोनों ही तत्व लघुपत्रिकाओं के स्वाभाविक विकास में सबसे बड़ी बाधा हैं। दूसरी प्रधान समस्या है जो लघुपत्रिका की धारणा से जुड़ी है। अभी हम जिस लघुपत्रिका को निकाल रहे हैं उसके केन्द्र में संस्कृति है। संस्कृति को ही संदर्भ बना कर हम साहित्य का चयन करते हैं। जबकि सारी दुनिया में संस्कृति के संदर्भ के आधार पर चयन नहीं हो रहा, बल्कि अभिरूचि और जीवनशैली के आधार पर सामग्री चयन हो रहा है।

यदि लघुपत्रिकाएं साहित्य, राजनीति, अर्थनीति, विज्ञान आदि पर केन्द्रित सामग्री प्रकाशित करती हैं तो उन्हें इस संदर्भ में पेशेवर और विशेषज्ञता को ख्याल में रखना चाहिए। हिन्दी के लेखकों का आलम यह है कि वे सभी विषयों के ऊपर लिख सकते हैं और वे किसी भी क्षेत्र की विशेष जानकारी हासिल नहीं करना चाहते। मौलिक लेखन के नाम पर प्रतिष्ठित लघुपत्रिकाओं में जिस तरह की घटिया और स्तरहीन सामग्री प्रकाशित होती है इसने पाठकों को लघुपत्रिकाओं से दूर किया है। आज स्थिति यह है कि विशेषज्ञान के बिना काम चलने वाला नहीं है। विशेषज्ञता हासिल किए बिना आप स्वीकृति नहीं पा सकते।

आखिरी समस्या सबसे गंभीर समस्या है जिस  पर गौर किया जाना चाहिए। आज हम डिजिटल के युग में आ गए हैं। हमें पत्रिका को डिजिटल रूप में प्रकाशित करना चाहिए, सीडी और वेबसाइट पत्रिका के रूप में प्रकाशित करना चाहिए।  डिजिटल प्रकाशन पत्रिका प्रकाशन से सस्ता और व्यापक है। इसकी पहुँच दूर-दूर तक है। आप चाहें तो अपनी वेब पत्रिका के लिए सस्ते विज्ञापन भी ले सकते हैं। हमें यह तथ्य ध्यान में रखना चाहिए कि मौजूदा दौर लाइब्रेरी का नहीं है, डिजिटल लाइब्रेरी का है।


जगदीश्वर चतुर्वेदी 


सम्पर्क


मोबाइल : 9331762360

टिप्पणियाँ

  1. हिंदी साहित्यकार की सबसे बड़ी समस्या पत्रिका का अभाव नहीं है। समस्या यह है कि साहित्यकार अपने समाज से कटा हुआ है। बात बात केवल साहित्यकार की नहीं हैसाहित्यकार की नहीं है पश्चिमी शिक्षा ने शिक्षित वर्ग को अपने ही देश में उपनिवेशवाद

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