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सुरेन्द्र प्रजापति की कहानी 'टूटती शाखा'

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सुरेन्द्र प्रजापति स्थानीय विभाजन के बावजूद दुनिया भर के समाज में मुख्य रूप से दो वर्ग होते हैं। पहला शोषक वर्ग है होता है जबकि दूसरा शोषित वर्ग। आभिजात्य वर्ग का चरित्र शोषक का होता है जबकि कामकाजी वर्ग का चरित्र शोषक का होता है। सामान्यतया शोषित वर्ग अपने रोजी रोजगार के लिए इस आभिजात्य वर्ग पर ही निर्भर रहता है। इस निर्भरता की वजह से उसे तमाम परेशानियों का सामना करना पड़ता है। दोनों वर्गों के बीच व्यवहारगत दिक्कतें भी दिखाई पड़ती हैं। इन व्यवहारगत दिक्कतों को सुरेन्द्र प्रजापति ने अपनी कहानी 'टूटती शाखा' में करीने से व्यक्त किया है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं सुरेन्द्र प्रजापति की कहानी 'टूटती शाखा'। 'टूटती शाखा'                                     सुरेन्द्र प्रजापति सड़ाक! सड़ाक!!' सात वर्षीय छोटू पर जाह्नवी ने खजूर की छड़ी चलाई तो वह लड़का ऐसे चीखा जैसे जंगल की सूखी हुई लकड़ी चरमराई हो। वह चुड़ैल सी दिखने वाली औरत हाँफने लगी। उसके चेहरे पर नफ़रत और अवसाद के भाव थे जबकि छोटू बिल्कुल शांत था। ...

शैलजा की लम्बी कविता 'ऐसे कौन नाराज होता है'

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शैलजा दुनिया का शायद ही कोई कवि होगा जिसने माँ पर कविताएँ न लिखी हों। दुनिया का सबसे अप्रतिम रिश्ता होता है माँ और उसकी सन्तान का। यह अकथनीय होता है। भारतीय परम्परा में यह मान्यता है कि स्त्री सन्तान को जन्म देने के बाद ही स्त्रीत्व को पूर्ण करती है। माँ स्वाभाविक रूप से अपनी सन्तान के लिए आजीवन चिन्तित और परेशान रहती है और उसके बेहतर जीवन के लिए प्रयास करती रहती है। लेकिन एक दिन आता है जब माँ इस दुनिया से रुखसत कर जाती है। माँ की छत्र छाया के हटने से सन्तानों की दुनिया जैसे अधूरी हो जाती है। यह इसलिए भी कि माँ की जगह इस दुनिया में कोई ले ही नहीं सकता। शैलजा हमारे समय की समर्थ कवयित्री हैं। अपनी लम्बी कविता में उन्होंने माँ को शिद्दत से याद किया है। इस कविता को पढ़ते हुए वे तमाम स्मृतियां एकबारगी जैसे जीवन्त हो उठती हैं जो माँ के रहते हुए जी गई थीं। माँ की डांट फटकार, माँ का स्नेह और प्यार दुलार, पिता के साथ उनकी नोक झोंक सब एक एक कर याद आते हैं। इस रिश्ते में कोई औपचारिकता नहीं बल्कि अनौपचारिकता होती है। यह कविता इस अनौपचारिकता की ही दास्ताँ है। भावनात्मक अहसासों को शब्दबद्ध करना आसान...