सुरेन्द्र प्रजापति की कहानी 'टूटती शाखा'
सुरेन्द्र प्रजापति स्थानीय विभाजन के बावजूद दुनिया भर के समाज में मुख्य रूप से दो वर्ग होते हैं। पहला शोषक वर्ग है होता है जबकि दूसरा शोषित वर्ग। आभिजात्य वर्ग का चरित्र शोषक का होता है जबकि कामकाजी वर्ग का चरित्र शोषक का होता है। सामान्यतया शोषित वर्ग अपने रोजी रोजगार के लिए इस आभिजात्य वर्ग पर ही निर्भर रहता है। इस निर्भरता की वजह से उसे तमाम परेशानियों का सामना करना पड़ता है। दोनों वर्गों के बीच व्यवहारगत दिक्कतें भी दिखाई पड़ती हैं। इन व्यवहारगत दिक्कतों को सुरेन्द्र प्रजापति ने अपनी कहानी 'टूटती शाखा' में करीने से व्यक्त किया है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं सुरेन्द्र प्रजापति की कहानी 'टूटती शाखा'। 'टूटती शाखा' सुरेन्द्र प्रजापति सड़ाक! सड़ाक!!' सात वर्षीय छोटू पर जाह्नवी ने खजूर की छड़ी चलाई तो वह लड़का ऐसे चीखा जैसे जंगल की सूखी हुई लकड़ी चरमराई हो। वह चुड़ैल सी दिखने वाली औरत हाँफने लगी। उसके चेहरे पर नफ़रत और अवसाद के भाव थे जबकि छोटू बिल्कुल शांत था। ...