प्रभात पटनायक का आलेख 'नवउदारवाद और सांप्रदायिक फ़ासीवाद का उभार'
'देखन में छोटन लगें घाव करें गम्भीर' यह उक्ति आज की उस उदारवादी व्यवस्था पर शत-प्रतिशत लागू होती है जो दरअसल हमारे जीवन को दिन-प्रतिदिन दुश्वार बनाती जा रही है. लोकतन्त्र जब भी जनता की उम्मीदों पर खरा नहीं उतरता तब इसका अंजाम अन्ततः लोकतन्त्र की विफलता होता है जो लोगों को फासीवाद की तरफ आकृष्ट करता है। दुर्भाग्यवश हमारे नीति-नियंताओं की अदूरदर्शी नीतियों के चलते आज भारत कुछ इसी तरह के खतरे के मुहाने पर खड़ा है। देश के प्रख्यात अर्थशास्त्री प्रभात पटनायक ने इन्हीं सन्दर्भों को लेकर इलाहाबाद में 14 फरवरी 2014 को आयोजित 'साझा संस्कृति संगम' के उदघाटन सत्र में सारगर्भित बातें की थीं जो हमारे लिए एक दस्तावेज की तरह हैं। अर्थशास्त्र जैसे जटिल विषय को प्रभात जी ने अपनी मेधा और अपने सहज उद्बोधन से बोधगम्य बना दिया। हम अपने आलोचक मित्र संजीव कुमार के आभारी हैं जिन्होंने हमारे आग्रह को बेहिचक स्वीकार कर इस आलेख को उपलब्ध कराया। तो आईए पढ़ते हैं प्रभात पटनायक का यह अत्यन्त महत्वपूर्ण आलेख। नवउदारवाद और सांप्रदायिक फ़ासीवाद का उभार प्रभात पटनायक जनतंत्र की वैधता के लिए अवाम...