रवि रंजन का आलेख "पतंग की उड़ान से सूर्यास्त की गोधूलि तक : आलोक धन्वा की कविता का समाजशास्त्र और सौंदर्यशास्त्र"
आलोक धन्वा कविता उस आइसबर्ग की तरह होती है जो दिखने से ज्यादा अपने पंक्तियों और व्याख्याओं में छिपी होती है। जरूरत होती है किसी सुधी आलोचक की जो कविता की पड़ताल करते हुए उन गहराइयों में डूबे और अर्थ भरे मोती खोज कर लाए। ऐसे आलोचकों की आज भारी कमी है। इस परिस्थिति में रवि रंजन एक उम्मीद की तरह दिखते हैं। रवि रंजन जी का जितना अधिकार हिन्दी साहित्य पर है उतना ही संस्कृत और अंग्रेजी साहित्य पर भी। साहित्य का यह गहन अध्ययन उन्हें और आलोचकों से अलग करता है। रवि रंजन ने इस बार प्रख्यात कवि आलोक धन्वा की कविता 'पतंग' की गहन पड़ताल की है। इस क्रम में वे लिखते हैं : "आलोक धन्वा की 'पतंग' कविता में शरद ऋतु वर्षा ऋतु की 'भादों' जैसी भारी और अंधेरी स्थिरता के बाद आने वाली 'चेतना' और 'सक्रियता' का प्रतीक है। शरद यहाँ एक ऐसे 'मुक्त समाज' का प्रतीक है जहाँ सब कुछ पारदर्शी और चमकीला है। "पुलों को पार करते हुए" शरद का आना उस सामाजिक संक्रमण को दिखाता है जहाँ बाधाओं को पार कर एक नई पीढ़ी (बच्चे) अपने खेल के मैदान तैयार करती है। सौंदर्यशास्...