धूमिल की कविताएं
धूमिल की कविताएं अकाल-दर्शन भूख कौन उपजाता है : वह इरादा जो तरह देता है या वह घृणा जो आँखों पर पट्टी बाँध कर हमें घास की सट्टी में छोड़ आती है? उस चालाक आदमी ने मेरी बात का उत्तर नहीं दिया। उसने गलियों और सड़कों और घरों में बाढ़ की तरह फैले हुए बच्चों की ओर इशारा किया और हँसने लगा। मैंने उसका हाथ पकड़ते हुए कहा— 'बच्चे तो बेकारी के दिनों की बरकत हैं' इससे वे भी सहमत हैं जो हमारी हालत पर तरस खा कर, खाने के लिए रसद देते हैं। उनका कहना है कि बच्चे हमें बसंत बुनने में मदद देते हैं। लेकिन यही वे भूलते हैं दरअस्ल, पेड़ों पर बच्चे नहीं हमारे अपराध फूलते हैं मगर उस चालाक आदमी ने मेरी किसी बात का उत्तर नहीं दिया और हँसता रहा—हँसता रहा—हँसता रहा फिर जल्दी से हाथ छुड़ा कर 'जनता के हित में' स्थानांतरित हो गया। मैंने ख़ुद को समझाया—यार! उस जगह ख़ाली हाथ जाने से इस तरह क्यों झिझकते हो? क्या तुम्हें किसी का सामना करना है? तुम वहाँ कुआँ झा...