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धूमिल की कविताएं

धूमिल की कविताएं अकाल-दर्शन भूख कौन उपजाता है :  वह इरादा जो तरह देता है  या वह घृणा जो आँखों पर पट्टी बाँध कर  हमें घास की सट्टी में छोड़ आती है?  उस चालाक आदमी ने मेरी बात का उत्तर  नहीं दिया।  उसने गलियों और सड़कों और घरों में  बाढ़ की तरह फैले हुए बच्चों की ओर इशारा किया  और हँसने लगा।  मैंने उसका हाथ पकड़ते हुए कहा—  'बच्चे तो बेकारी के दिनों की बरकत हैं'  इससे वे भी सहमत हैं  जो हमारी हालत पर तरस खा कर, खाने के लिए  रसद देते हैं।  उनका कहना है कि बच्चे  हमें बसंत बुनने में मदद देते हैं।  लेकिन यही वे भूलते हैं  दरअस्ल, पेड़ों पर बच्चे नहीं  हमारे अपराध फूलते हैं  मगर उस चालाक आदमी ने मेरी किसी बात का उत्तर  नहीं दिया और हँसता रहा—हँसता रहा—हँसता रहा  फिर जल्दी से हाथ छुड़ा कर  'जनता के हित में' स्थानांतरित  हो गया।  मैंने ख़ुद को समझाया—यार!  उस जगह ख़ाली हाथ जाने से इस तरह  क्यों झिझकते हो?  क्या तुम्हें किसी का सामना करना है?  तुम वहाँ कुआँ झा...

धूमिल की लम्बी कविता मोचीराम

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आज की एक बड़ी समस्या यह है कि हम अन्त तक समझ ही नहीं पाते हैं कि हमारे जीवन का उद्देश्य क्या है? वस्तुतः किसी भी व्यक्ति के जीवन जीने का एक उद्देश्य तो होना ही चाहिए। दूसरे पर दोषारोपण करना दुनिया का सबसे आसान काम होता है। दूसरी तरफ अपने आप को साबित करना सबसे कठिन होता है। अगर हम उदासीन या तटस्थ बने रहे तो आज जो दुनिया की स्थिति है, वह और बदतर होती जानी है। दिक्कत यह है कि हम आजीवन अपने संकीर्ण स्वार्थों से बाहर ही नहीं निकल पाते। अपने लाभ और स्वार्थों में कुछ इस कदर मशगूल रहते हैं कि अच्छे बुरे का विवेक तक नहीं कर पाते। इस क्रम में कवि धूमिल याद आते हैं जिन्होंने अपने अलग अंदाज, चुटीली भाषा और तीखे तेवरों से ध्यान आकृष्ट कराया था और समाज व्यवस्था पर करारा प्रहार किया था। हमने अपने पाठकों को कालजयी रचनाओं से परिचित कराने का एक क्रम शुरू किया है। इसी कड़ी में  आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं धूमिल की चर्चित लम्बी कविता 'मोचीराम'। मोचीराम धूमिल राँपी से उठी हुई आँखों ने मुझे क्षण-भर टटोला और फिर जैसे पतियाए हुए स्वर में वह हँसते हुए बोला- बाबूजी! सच कहूँ मेरी निगाह में न कोई छोटा...