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शैलेन्द्र कुमार शुक्ल की कविताएं

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  शैलेन्द्र कुमार शुक्ल समय के अनुसार प्रतिमान बदलते रहते हैं। यह जरूरी नहीं कि जहां बेहतर चल रहा हो वहां बदतर घटित नहीं हो सकता। कहा जा सकता है कि समय का भी प्रति समय होता है। आज जो सत्ता में प्रतिष्ठित हैं उनके प्रतिमान बिलकुल अलग हैं। यह बात सबको पता है कि गांधी जी ने राष्ट्रीय आन्दोलन का नेतृत्व किया। लेकिन यह दुखद है कि आज उन लोगों को प्रतिष्ठित करने का प्रयास किया जा रहा है जिन्होंने न केवल गांधी जी की हत्या की बल्कि उनके सिद्धांतों और आदर्शों की हत्या कर दी। कवि शैलेन्द्र कुमार शुक्ल अपने ढब के कवि हैं। उन्होंने कविता की छन्दात्मकता को बचाए रखने का प्रयास किया है। शैलेन्द्र वर्तमान स्थितियों से आक्रोशित होते हुए लिखते हैं : 'एक हत्यारे की सहज मृत्यु से भयावह/ क्या हो सकता है महाराज!/  यह उत्तर सत्य का जमाना है/ सूचनाओं में गुम होता एक हत्यारा/ क्या अब सिर्फ विभत्स श्रद्धांजलि/ का हकदार रह गया/ अपने मुंह पर थूको/ नहीं थूक सकते तो/ शर्म को शर्मसार करो।' शैलेन्द्र ने हिंदी कविताओं के साथ-साथ अपनी बोली अवधी में भी उम्दा कविताएं लिखी हैं। आज पहली बार पर हम उनकी कुछ हिंदी कवि...

शैलेन्द्र कुमार शुक्ल की कविताएँ

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जन्म- 01 जुलाई 1986 (उत्तर प्रदेश के जनपद सीतापुर में गाँव साहब नगर ) । शिक्षा- प्राथमिक शिक्षा गाँव के सरकारी स्कूल से तथा उच्च शिक्षा लखनऊ , बनारस , हैदराबाद , और वर्धा विश्वविद्यालयों से। प्रकाशन- ‘ बया ’, ‘ वागर्थ ’, ‘ संवेद ’, ‘ जनपथ ’ और ‘ परिचय ’ आदि पत्रिकाओं में कुछ कवितायें प्रकाशित। कविता और कला का एक अन्तर्सम्बन्ध होता है । इस सम्बन्ध के बावजूद इधर की कविता ने अपने को अधिकाधिक स्वायत्त किया है । कला से अपने को यथासंभव मुक्त कर यथार्थवाद की जमीन पर उतर कर कविता लोगों के अधिकाधिक नजदीक आई है । यह सुखद है कि हमारे युवा कवि इस निकटता को और संघनित करने के प्रयास में शिद्दत से जुटे हुए हैं । युवतर कवि शैलेन्द्र कुमार शुक्ल की कविताएँ इस मायने में आश्वस्तिकारी हैं कि वे साहस के साथ यह कहने का दम-ख़म रखते हैं कि 'कला आना चाहती है/ तो आये/ मेरी कविता में/ चिर परिचित सी/ मैं कला को न्योता नहीं दूंगा। ' ऐसी ही तेवर वाली कविताओं के साथ आज आपके सामने हैं कवि शैलेन्द्र कुमार शुक्ल । शैलेन्द्र कुमार शुक्ल की कविताएँ  लखनऊ जब भी मिलता है अके...