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सुभाष राय का आलेख 'मरै सो जीवै'

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    आज का जो हिंदुस्तान है, आज के हिंदुस्तान की जो जिजीविषा है, उसकी निर्मिति में एक बड़ी भूमिका भक्त सन्तो की है। भक्त सन्तों में कुछ पर तो काफी बात की गई है लेकिन कुछ सन्त ऐसे भी हैं जिन पर अपेक्षाकृत कम बात की गई है। दादू दयाल ऐसे ही भक्त सन्त हैं। दादू की कबीर पसन्द हैं और वे उनके अनुवर्ती हैं।  वह कबीर की तरह हरदम लुकाठा हाथ में लिए तो नहीं फिरते पर जहां कड़वा सच कहना जरूरी हो जाता है, वहां चूकते भी नहीं। कटु बात भी वह इतनी सहजता से कह देते हैं कि सामने वाला घायल हो जाता है, बार-बार अपनी चोट सहलाता है और फिर इलाज के लिए लौट कर दादू के पास ही आ जाता है।  यह आलेख  शिवनारायण जी के संपादन में निकलने वाली साहित्यिक पत्रिका 'नयी धारा' में प्रकाशित है। आइए आज पहली बार पर पढ़ते हैं  सुभाष राय का आलेख 'मरै सो जीवै'।  मरै सो जीवै  सुभाष राय भक्ति काल हिंदी का स्वर्णकाल रहा है। यही समय था जब ईश्वर की सत्ता पर न केवल संदेह किया गया बल्कि उसे अस्वीकार कर दिया गया। इसी समय में मनुष्यता और प्रेम की प्रतिष्ठा के लिए सबसे गंभीर प्रयास हुए। वर्ण और जाति व्यवस्था...