रवि नन्दन सिंह का आलेख 'हमेशा वर्तमान में जीने वाला आदमी: कमलेश्वर'
कमलेश्वर लेखकों के अपने जीवन संघर्ष बिल्कुल अन्य लोगों जैसे ही होते हैं। प्रायः सामान्य घरों से आने वाले इन रचनाकारों का जीवन भी आम लोगों जैसा ही होता है। यह अलग बात है कि रचनात्मक प्रवृत्ति के लोग अपने जीवनानुभवों को शब्दबद्ध कर किसी न किसी विधा में ढाल लेते हैं। इन जीवनानुभवों में आम आदमी खुद का जीवन और संघर्ष देखता और महसूस करता है। इस तरह व्यक्तिगत पीड़ा या संघर्ष सार्वजनीन बन जाता है। कमलेश्वर का प्रारम्भिक जीवन अभाव और संघर्षों में बीता। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और अपनी जद्दोजहद जारी रखी। आगे चल कर नई कहानी के प्रवर्तक के तौर पर मोहन राकेश और राजेन्द्र यादव के साथ इन्हें रेखांकित किया गया। हालांकि इलाहाबाद में भी इनकी एक त्रयी दुष्यन्त कुमार और मार्कण्डेय के साथ बनी। इस त्रयी के अनेक कारनामे और स्मृतियां इलाहाबादी लोगों की स्मृतियों में करीने से दर्ज हैं। ’गर्मियों के दिन’, ’राजा निरबंसिया’, ’मुर्दों की दुनिया’, ’देवा की मां’, ’कस्बे का आदमी’ ’भटके हुए लोग’, ’बेकार आदमी’ जैसे बेजोड़ कहानी संग्रह और कितने पाकिस्तान जैसा बेजोड़ उपन्यास लिख कर इन्होंने ...