रवि नन्दन सिंह का आलेख 'हमेशा वर्तमान में जीने वाला आदमी: कमलेश्वर'

 

कमलेश्वर


लेखकों के अपने जीवन संघर्ष बिल्कुल अन्य लोगों जैसे ही होते हैं। प्रायः सामान्य घरों से आने वाले इन रचनाकारों का जीवन भी आम लोगों जैसा ही होता है। यह अलग बात है कि रचनात्मक प्रवृत्ति के लोग अपने जीवनानुभवों को शब्दबद्ध कर किसी न किसी विधा में ढाल लेते हैं। इन जीवनानुभवों में आम आदमी खुद का जीवन और संघर्ष देखता और महसूस करता है। इस तरह व्यक्तिगत पीड़ा या संघर्ष सार्वजनीन बन जाता है। कमलेश्वर का प्रारम्भिक जीवन अभाव और संघर्षों में बीता। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और अपनी जद्दोजहद जारी रखी। आगे चल कर नई कहानी के प्रवर्तक के तौर पर मोहन राकेश और राजेन्द्र यादव के साथ इन्हें रेखांकित किया गया। हालांकि इलाहाबाद में भी इनकी एक त्रयी दुष्यन्त कुमार और मार्कण्डेय के साथ बनी। इस त्रयी के अनेक कारनामे और स्मृतियां इलाहाबादी लोगों की स्मृतियों में करीने से दर्ज हैं। ’गर्मियों के दिन’, ’राजा निरबंसिया’, ’मुर्दों की दुनिया’, ’देवा की मां’, ’कस्बे का आदमी’ ’भटके हुए लोग’, ’बेकार आदमी’ जैसे बेजोड़ कहानी संग्रह और कितने पाकिस्तान जैसा बेजोड़ उपन्यास लिख कर इन्होंने खुद को साबित किया। कल 27 जनवरी को कमलेश्वर की पुण्य तिथि थी। उनकी स्मृति को नमन करते हुए आज पहली बार पर हम प्रस्तुत कर रहे हैं रवि नन्दन सिंह का आलेख 'हमेशा वर्तमान में जीने वाला आदमी: कमलेश्वर'।


'हमेशा वर्तमान में जीने वाला आदमी : कमलेश्वर'


रवि नन्दन सिंह


आज 27 जनवरी को कथाकार, संपादक, संवाद एवं पटकथा लेखक कमलेश्वर की पुण्यतिथि है। उन्हें स्मरण करना हिंदी कहानी की एक पूरी परंपरा को याद करना है, वह भी इलाहाबाद में रहते हुए जहां कमलेश्वर के साहित्यकार की निर्मिति हुई है। कमलेश्वर नई कहानी' के त्रिकोण (कमलेश्वर, मोहन राकेश और राजेंद्र यादव) में सबसे महत्त्वपूर्ण कड़ी हैं। प्रेमचंद की तरह उन्होंने भी आम आदमी को कथा नायक बनाया। किन्तु उनका बचपन बहुत आर्थिक संघर्षों में बीता। इतना संघर्ष करना पड़ा कि वे बचपन देख ही नहीं सके और उन्हें कम उम्र में ही जिम्मेदारियों का निर्वाह करने के लिए विवश होना पड़ा। इस बारे में उन्होंने अपने संस्मरण ’गर्दिश के दिन’ में विस्तार से लिखा है। 

       

कमलेश्वर का परिवार कभी जमींदार हुआ करता था किंतु सब कुछ पहले ही समाप्त हो चुका था और परिवार अभाव का जीवन जीने के लिए विवश था। मैनपुरी में 1932 में जन्मे कमलेश्वर का पूरा नाम कमलेश्वर प्रसाद सक्सेना था। जब कमलेश्वर तीन साल के थे तभी पिता का देहांत हो गया और उसके बाद घर के हालात लगातार बदतर होते गए। एक अन्य बड़े भाई मैनपुरी से निकल कर इलाहाबाद में अपने हालात से लड़ रहे थे, दूसरे भाई सिद्धार्थ पढ़ रहे थे और घर की उम्मीद थे। कमलेश्वर के शब्दों में "वह लड़ाई का जमाना था। सामंती घर बुरी तरह ढह चुका था। नौकर-चाकर बिदा हो चुके थे।..

          

तब कमलेश्वर को पिता का चेहरा भी ठीक से याद नहीं था। वे लिखते हैं कि ”अमीर कहे जाने वाले घर में गरीब की तरह रहना, खाना खा कर भी भूखा उठना, अकुलाहट भरे दुखों में भी हंस लेना, बच्चा होते हुए भी वयस्कों की तरह निर्णय लेना मेरी मजबूरी बन गई थी।.. मां रात ढाई तीन बजे उठ कर हाथ में कपड़ा लपेट कर कुट्टी काटती, चक्की चलाती, बर्तन धोती और सुबह नहा धो कर पुराने जमींदार घराने की इज्जतदार मालकिन हो जाती। मुहल्ले वालों के घावों पर मरहम लगाती और रात को चुपचाप रोया करती। होली दिवाली पर मां अपनी कोई बडी संभाल कर रखी सिल्क की पुरानी साड़ी निकाल लाती। और घण्टों एक एक कतरन का अंदाजा लगाती कि अगर आस्तीन छोटी कर दूं तो दो कुर्ते बन जाएंगे, एक तेरा, एक माना का, मुन्नी की फ्राक का घेरा भी निकल आएगा।' घर से बाहर जा कर बड़े भाई अपना दूध और अखबार बंद कर देते ताकि खर्च बचा सकें।"  

         

बकौल कमलेश्वर ”लड़ाई के दिनों में पढ़ने के लिए भी तेल नहीं मिलता था। तब हम कुछ दोस्त शीशियां और कुप्पियां ले कर म्यूनिस्पेल्टी की लालटेनों से तेल चुराने के लिए निकल पड़ते थे। मुझे आज तक दुख है कि मैं अपने पढ़ने के लिए कभी भी नई किताबें नहीं खरीद पाया। जब मेरे सहपाठी अपने पिता के साथ किताबों की दुकान पर जा कर कोर्स की नई नई किताबें कापियां खरीदते थे तो मेरी आंखों में आंसू आ जाते थे। मेरे साथ कोई न होता था।”

         

"गर्मी की छुट्टियों के बाद जब स्कूल खुलता था तो वहां जाने का उत्साह मन में नहीं होता था। पुरानी पुस्तकें- वह भी पूरी नहीं, कापियां खरीदने को पैसे नहीं होते थे, इसलिए भाई साहब के आने की प्रतीक्षा रहती थी कि वह आएंगे तो सरकारी कागज के दस्ते दो दस्ते साथ लाएंगें और तब मेरी बेनाप की कापियां बनेंगी। मां अपनी फटी धोतियों की किनारियां लपेट लपेट कर रखती रहतीं थीं और स्कूल खुलते ही मेरे लिए उन किनारियों का नया बस्ता सी देती थीं। एक आने की रबड़ या स्केल के लिए मां से पैसे मांगते हुए मुझे डर लगता था, क्योंकि इससे मां की निपट गरीबी खुल जाती थी और व अपनी विवशता में झुझला जाया करती थीं। तीन-तीन दिन मैं भूगोल की कक्षा में नहीं जा पाता था, क्योंकि राम बाबू जैन की दुकान से दुनिया का नवशा खरीदने के लिए मां से कहने की हिम्मत नहीं पड़ती थी।”

       

स्कूल में ”रिसेस में सब लड़के प्याऊ के पास लगे रामभरोसे के खोचे पर पहुंच जाया करते थे और दबा कर चाट मिठाई खाया करते थे और आलू की सिकती हुई टिकिया देख कर मेरा जी बहुत ललचता था, लेकिन प्यास लगी होने पर भी मैं उधर नहीं जाता था। रिसेस के बाद जब टिकिया खत्म हो जाती थी तो मैं पानी पीने जाता था और खोचे की बची हुई चीजों पर उचटती हुई नज़र डाल कर लौट आता था।” 

         

"इन छोटी छोटी कठिनाइयों ने, जो उस समय मेरे छोटे से अस्तित्व के लिए बहुत बड़ी थीं, मुझे झिंझोड़ कर रख दिया था। साइकिल वाले ने मेरी साइकिल छीन ली थी क्योंकि मैं मरम्मत का पैसा नहीं दे पाया था।" 

          

"धीरे धीरे मां की आंखों के आंसू बिल्कुल सूख गए थे। वह निपट सूनी आंखों से सपाट दीवारों और अंधेरे सूने कमरे को देखती रहती थीं और उन्हें दिल के दौरे पड़ने लगे थे। फिर भी वह कुछ नहीं कहती थीं।”



किशोर कमलेश्वर मैनपुरी के गवर्नमेंट हाई स्कूल से हाई स्कूल पास कर के आगे की पढ़ाई के लिए 1945 में इलाहाबाद आए। यहां मोहत्सिमगंज इलाहाबाद में अपने बड़े भाई के परिवार के साथ रहने लगे। यहीं क्रांतिकारी सोशलिस्ट पार्टी के योगेश चटर्जी से उनकी मुलाकात होती है और पार्टी ज्वाइन कर लेते हैं। इलाहाबाद के घंटाघर चौक में पार्टी मुख्यालय था जिस पर लाल झंडा फहरा रहा था। वहीं से जनक्रांति अखबार निकलता था। किशोर कमलेश्वर पार्टी दफ्तर में देश विदेश की तमाम खबरें और पुस्तकें पढ़ते लगे। पार्टी के लोगों के पास कपड़ा नहीं था, जूते नहीं थे, बिस्तर भी नहीं थे किंतु भविष्य के प्रस्ताव थे, योजनाएं थीं, पर्चे थे और भाषण थे। इसलिए सबकुछ था। 

          

तभी देश का विभाजन हुआ और कमलेश्वर शरणार्थियों के कैंप में रसद पहुंचाने  लगे, उनकी सहायता करने लगे और जनक्रांति अखबार में लिखने लगे। तब कायस्थ पाठशाला में इंटर के छात्र थे। किसान आंदोलन के सिलसिले में पकड़े गए और नैनी जेल में डाल दिए गए। आंदोलन के कारण कॉलेज से दो वर्ष तक निष्कासित हो गए। नाबालिग होने के कारण जेल से छूट गए। जब जमुना पुल पार करते हुए वापस मोहत्सिम गंज वाले घर को लौट रहे थे कि यमुना में कूद कर आत्महत्या का भी ख्याल आया किन्तु वे अपने अंदर का ज़हर शिव की तरह पी गए और घर लौट आए। पार्टी, अखबार आदि सब कुछ बिखर चुका था। रास्ते में उन्होंने साहित्य सम्मेलन के पुस्तकालय का बोर्ड देखा और अंदर चले गए। वहां साहित्यिक पुरखों की तस्वीरें देख कर उसी दिन से उन्हें एक नया मकसद मिल गया। शिक्षा पूरी करना और लिखना अब उनके जीवन का उद्देश्य था।

       

कमलेश्वर इलाहाबाद के कायस्थ पाठशाला से इंटर कर के 1950 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के बी ए की कक्षा में दाखिल हुए और वहीं से 1954 में हिंदी से एम ए किए। दुष्यंत और मार्कण्डेय उनके सहपाठी थे। उनके मित्र तीनों को ’त्रिशूल’ कहा करते थे। इन्ही दिनों कमलेश्वर ने दुष्यंत और मार्कण्डेय के साथ मिल कर 'विहान' नामक पत्रिका का पहला अंक निकाला। यद्यपि पत्रिका आगे नहीं निकल सकी और पहला अंक ही आखिरी अंक सिद्ध हुआ। 

        

दुष्यंत कुमार ने कमलेश्वर के बारे में विश्वविद्यालय के दिनों की एक रोचक घटना का जिक्र किया है। बाँदा जिले के अतर्रा कस्बे में एक कवि सम्मेलन का आयोजन था, जिसमें दुष्यंत को आमंत्रित किया गया था। संग-साथ के लिए उन्होंने आयोजकों को मार्कण्डेय और कमलेश्वर का नाम भी दे दिया। मार्कण्डेय तो कुछ कविताएँ लिखते तथा सस्वर पाठ भी करते थे। लेकिन कमलेश्वर कविता नहीं लिखते थे तथा कहानीकार के रूप में अभी स्थापित भी नहीं हुए थे। वहाँ जा कर कमलेश्वर ने दुष्यंत का यह गीत पढ़ा था- 


"सिंधु सा है विश्व, सौ ठहराव हैं जल में। 

व्यर्थ बाँधो मत नयन का नीर आँचल में।" 

             

कमलेश्वर को पहले लेखन में रुचि नहीं थी और वे इंटर तक विज्ञान के छात्र भी थे। किंतु इलाहाबाद के संघर्ष के दिनों में कमलेश्वर का कहानीकार जाग उठा। उनकी पहली कहानी ’कामरेड’ इंटर की पढ़ाई के दौरान 1948 में लिखी गई जो एटा से प्रकाशित ’अप्सरा’ नामक पत्रिका में छपी। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अध्ययन के दौरान ही उन्होंने आम लोगों की गर्दिश की कहानियां लिखनी शुरू की। यहीं रहते हुए 1957 में 'राजा निरबंसिया' लिखी जो उनकी सर्वाधिक लोकप्रिय कहानी रही। कुछ दिनों बाद ही इन कहानियों की चर्चा हिंदी पत्र पत्रिकाओं में होने लगी। इन कहानियों को ’कस्बे की कहानियां' कह कर प्रचारित किया गया। इलाहाबाद का यही समय था जब ’गर्मियों के दिन’, ’राजा निरबंसिया’, ’मुर्दों की दुनिया’, ’देवा की मां’, ’कस्बे का आदमी’ ’भटके हुए लोग’, ’बेकार आदमी’ आदि कहानियां और ’एक सड़क सत्तावन गलियां’ नामक उपन्यास सामने आए। यहीं पर उन्हें दुष्यत, मार्कण्डेय,  अमरकांत, रामकुमार वर्मा, धर्मवीर भारती, अमृत राय, उपेंद्र नाथ अश्क, जितेन्द्र, ओम प्रकाश श्रीवास्तव, ओंकार अलिन, वीरेंद्र महावीरत्ता, सतीश पाण्डे,  बलवंत सिह आदि जैसे लोग मिले, जिनसे वाद-विवाद भी हुआ, संघर्ष भी हुए और अपनेपन का अत्यंत सुन्दर समय भी बीता। यह नई कहानी आंदोलन की गहमागहमी का दौर था। हिंदुस्तानी एकेडेमी, साहित्य सम्मेलन, परिमल, प्रलेस के कार्यक्रमों में समय बीत रहा था। इसी दौर में मोहन राकेश और राजेंद्र यादव से मुलाकातें और वाद विवाद भी हुआ। इलाहाबाद के बारे में कमलेश्वर ने लिखा है कि इलाहाबाद 'एक सोचता हुआ शहर था वो... कोई क्या खाता है, क्या पहनता है, कैसे रहता है, इस सबसे ऊपर इलाहाबाद के आदमी की पहचान ही यही थी कि वो क्या सोचता है...?'




        

कमलेश्वर एक प्रतिभासंपन्न साहित्यकार थे जो एक ही बैठक में कहानी को पूरा कर देते थे। इस संबंध में कमलेश्वर स्वयं कहते हैं, "मैं अगर एक सिटिंग में कहानी को खत्म कर नहीं सका तो वह कहानी मुझ से फिर कभी पूरी नहीं हो पाती। चाहे आठ-दस घंटे लगे मगर यह सिलसिला लगातार होता है। बीच में मैं नहा लूँगा, कोई आया तो बातचीत भी हो जायेगी। मगर बाहर नहीं जाता। जब कहानी पूरी हो जाती है तब निकल पाता हूँ। उपन्यास भी बस सात-आठ बैठकों में। यों भी मेरे उपन्यास छोटे-छोटे हैं।"

       

बचपन से ही कमलेश्वर बड़े स्वाभिमानी और जिद्दी रहे। बचपन में कमलेश्वर जब मैनपुरी कस्बे में पढ़ाई करते थे, उसी समय सरकारी स्कूल के उनके मास्टर कस्बे के बड़े-बड़े अफसरों के लड़कों को ही मानीटर बनाते थे। चाहे वे होशियार, शालीन तथा नम्र न हो फिर भी उन्हें मानीटर बनाया जाता था। यह बात कमलेश्वर से सही नहीं जाती थी। वे अपनी सारी उदासीनता के बावजूद दर्जे में ज्यादातर अव्वल आते थे। लेकिन मास्टर जी उन्हें कभी मानीटर नहीं बनाते थे।              

        

कमलेश्वर 1958 में इलाहाबाद से दिल्ली गए और ’नई कहानियां’ के संपादन से जुड़े तथा 1966 में दिल्ली से मुंबई गए और सारिका के संपादन से जुड़ गए। विहान' जैसी पत्रिका का 1954 में संपादन आरंभ कर कमलेश्वर ने कई पत्रिकाओं का सफल संपादन किया जिनमें 'नई कहानियाँ' (1958-66), 'सारिका' (1967-78), 'कथायात्रा' (1978-79), 'गंगा' (1984-88) आदि प्रमुख हैं। इनके द्वारा संपादित अन्य पत्रिकाएँ हैं- 'इंगित' (1961-63) 'श्रीवर्षा' (1979-80)। हिंदी दैनिक 'दैनिक जागरण' (1990-92) के भी संपादक रहे। वे 1997 में 'दैनिक भास्कर' के संपादक बने। इसके बाद जैन टीवी के समाचार प्रभाग का कार्य भार संभाला। 

        

मुम्बई में वे फिल्म जगत में भी बहुत प्रभावशाली रहे। उनकी लिखी फिल्मों की संख्या लगभग 100 हैं। कुछ फिल्में जैसे बदनाम बस्ती, फिर भी, अमानुष, घड़ी के दो हाथ, आंधी, मौसम, सारा आकाश, राम बलराम, सौतन, मि० नटवरलाल, द बर्निंग ट्रेन, तुम्हारी कसम, पति पत्नी और वो, आदि बहुत सराही भी गईं। फिल्मी लेखन के बारे में कमलेश्वर स्वयं कहते हैं कि "जब मैं एक साहित्यिक लेखक था तब मैंने किसी को फिल्मी लेखन के लिए बैसाखी नहीं बनाया। और जो मैं आज फिल्मी दुनिया में कुछ बन पाया हूँ वह भी सिर्फ अपनी कोशिशों से। मैंने न कभी किसी का सहारा लिया और न लूँगा।"




सन 1980 से 1982 तक कमलेश्वर दूरदर्शन के अतिरिक्त महानिदेशक भी रहे और भारतीय दूरदर्शन के पहले स्क्रिप्ट लेखक के रूप में भी जाने जाते हैं। उन्होंने टेलीविजन के लिए कई सफल धारावाहिक लिखे हैं जिनमें 'चंद्रकांता', 'युग', 'बेताल पचीसी', 'आकाश गंगा', 'रेत पर लिखे नाम' आदि प्रमुख हैं। भारतीय कथाओं पर आधारित पहला साहित्यिक सीरियल 'दर्पण' भी उन्होंने ही लिखा। दूरदर्शन पर साहित्यिक कार्यक्रम 'पत्रिका' की शुरुआत इन्हीं के द्वारा हुई तथा पहली टेलीफ़िल्म 'पंद्रह अगस्त' के निर्माण का श्रेय भी इन्हीं को जाता है। तकरीबन सात वर्षों तक दूरदर्शन पर चलने वाले 'परिक्रमा' में सामाजिक-सांस्कृतिक समस्याओं पर खुली बहस चलाने की दिशा में साहसिक पहल भी कमलेश्वर ने ही की थी।


जब कमलेश्वर दूरदर्शन में अपर महानिदेशक थे, उस समय उनके काम-काज में किसी ने हस्तक्षेप या बाधा डाली तो वे उसे सह नहीं पाते थे। अपने विरोध में जब काम होया उसी समय वे इस्तीफा दे कर चले जाते। कमलेश्वर ने स्वयं लिखा है कि, "दूरदर्शन में विस्तार का प्रस्ताव था। मैं भारतीय कला का हिमायती था और ब्रह्मचारी जी योग पर कार्यक्रम 'देखाने का दबाव डाल रहे थे। जिसे मैंने इन्कार कर दिया था। अड़चन यहाँ से शुरू हुई। उनकी पहुँच सीधे पी. एम.तक थी। साल भर बाद एक प्रोजेक्ट को जो मेरे द्वारा रिकमेंडेड था। थोड़ा बदल देने का इशारा हुआ। मैं सचिव के कमरे में गया। सचिव मुझ से बजुर्ग थे। उन्होंने समझाया कि बैठो और थोडी सी फेर बदल कर दो। मैंने एक सफेद कागज माँगा उन्होंने समझा कि मै फेर-बदल के लिए माँग रहा हूँ। मैंने तीन मिनट में उसी कागज पर इस्तीफा लिख कर दे दिया। सचिव महोदय हतप्रभ रह गये।"       

      

कमलेश्वर लगातार रचनात्मक रूप से सक्रिय बने रहे। उनके पास तीन 17 कहानी संग्रह, 12 उपन्यास, 3 नाटक, दो यात्रा वृत्तांत, तीन संस्मरण, तीन नाटक,  99 फिल्मों की पटकथा लिखने के साथ साथ अनेक पत्र पत्रिकाओं में लिखे स्तंभ और लेख मौजूद हैं। इन्हें सर्वाधिक ख्याति उनके उपन्यास ‘कितने पाकिस्तान’ ने दिलाई और इन्हें एक कालजयी साहित्यकार बना दिया। इस पर साहित्य अकादमी अवॉर्ड भी मिला। हिन्दी में यह ऐसा उपन्यास है, जिसके अब तक  बारह से अधिक संस्करण हो चुके हैं। पहला संस्करण छ: महीने के अन्तर्गत समाप्त हो गया था। दूसरा संस्करण पाँच महीने के अन्तर्गत, तीसरा संस्करण चार महीने के अन्तर्गत। इस तरह हर कुछेक महीनों में इसके संस्करण होते रहे और समाप्त होते रहे। कहानियों में राजा निरबंसिया, जॉर्ज पंचम की नाक, इतने अच्छे दिन, मांस का दरिया आदि प्रमुख हैं। आश्चर्य है कि उनकी लगभग 300 कहानियों में दोहराव नहीं मिलता। 

        

नई कहानी' का त्रिकोण कमलेश्वर, मोहन राकेश और राजेंद्र यादव ने ही स्थापित किया था। उस ज़माने में मोहन राकेश उनके सबसे करीबी दोस्त हुआ करते थे। कमलेश्वर ने एक किस्सा सुनाया था, 'नौ सालों तक मैं और राकेश (दिल्ली में) एक ही घर में ऊपर नीचे रहे. वो ज़माना वो था कि जो लोग विभाजन के बाद यहाँ आए थे, उनको लोग अपना घर किराए पर नहीं देते थे. तब मैंने राकेश की माँ को अपनी माँ बनाया और मेरे नाम पर मकान लिया गया और राकेश मेरे साथ रहने लगे। क्योंकि हम लोग दिन भर मस्ती में बातें करने, गप्पें लड़ाने और नई कहानी की बातें सोचने में लगे रहे थे, जब भी कोई आता था तो हमें काफ़ी हाउस या टी हाउस में पाता था।


            

कमलेश्वर ने बीबीसी के संवाददाता रेहान फ़ज़ल को दिए एक साक्षात्कार में बताया था कि, ''वो दौर इलाहाबाद का बहुत सुनहरा दौर था। बड़े से बड़े लेखक इलाहाबाद में मौजूद थे। मेरे अपने गुरु बच्चन जी विश्वविद्यालय में पढ़ाते थे, फ़िराक साहब थे। सुमित्रा नंदन पंत थे, महादेवी जी थीं, निराला जी थे... किस किस को याद करें। हम लोग सब थे नई पीढ़ी के, धर्मवीर भारती थे, मार्कंडेय थे, दुष्यंत थे, अजित थे यानि कितने ही लोग.. यानि 'इट वाज़ अ गैलेक्सी ऑफ़ पीपुल। इसकी वजह ये है कि इलाहाबाद में इस तरह का बौद्धिक माहौल हुआ करता था.. चाहे वो हाईकोर्ट के जज या वकील हों या विश्वविद्यालय में जो हमारे प्राध्यापक होते थे, उनके लिए नवरत्न तो बहुत छोटा जुमला हो जाएगा। वो एक तरह से सैकड़ों रत्नों की एक मंजूषा थी।"

         

कमलेश्वर ने उस वार्ता में आगे बताया कि 'जब हम लोग अकेले दो तीन दोस्त बैठते थे तो 'रामाज़' हुआ करता था। कॉफ़ी हाउस था और वहाँ की ख़ासियत ये थी कि जो भी ताज़ा किताब आई हो, या कोई ताज़ा विचार आया हो और अगर आप उससे परिचित नहीं थे तो आप उस महफ़िल में मंज़ूर नहीं किए जाते थे। शाम वहाँ से लौट कर हमारा बहुत बड़ा अड्डा था 'युनिवर्सल बुक डिपो'। वहाँ से हम किराए पर किताबें लेते थे, उन्हें पढ़ते थे और फिर तैयार हो कर जाते थे।'      

       

कमलेश्वर की पत्नी गायत्री ने कमलेश्वर अपनी किताब, 'कमलेश्वर मेरे हमसफ़र' में जिक्र किया है कि कमलेश्वर की लिखी ’आँधी' फ़िल्म बहुत चली लेकिन फ़िल्म का नाम देते समय लिखने का सारा श्रेय गुलज़ार ने ले लिया। वे लिखती हैं- "गुलज़ार ने फ़िल्म के 'क्रेडिट्स' में 'रिटेन एंड डायरेक्टेड बाई गुलज़ार' लिख कर सिर्फ़ 'स्टोरी' में कमलेश्वर जी की नाम दिया, जबकि सारी फ़िल्म कमलेश्वर ने जे. ओम प्रकाश से सब कुछ तय हो जाने के बाद भोपाल के 'जहाँनुमा' और दिल्ली के 'अकबर होटल' में लिखी थी। कमलेश्वर जी को इसका बहुत दुख हुआ। एक बार घर पर ही इन्होंने गुलज़ार से पूछा तो उन्होंने गोलमोल सा उत्तर दिया, 'भाई साहब फ़िल्म तो 'सेल्योलाइड' पर ही लिखी जाती है, उसे 'डायरेक्टर' ही लिखता है.' गुलज़ार ये बात कह कर ख़ुद ख़ुश नहीं हुए थे. ये बात उनके चेहरे से भी झलक रही थी।"

         

अंत में सिर्फ इतना ही कि प्रेमचंद की तरह कमलेश्वर ने आम आदमी को कथा नायक बनाया है। इस संबंध में वे लिखते हैं कि "हमारे साहित्य ने सदैव महापुरुषों की सुध ली; आम आदमी की कभी सुध नहीं ली। वह आदमी को बौना बनाने और बौने लोगों को ऊपर उठाने में लगा रहा। उस साहित्य ने अतीत की गौरव गाथा गायी, भविष्य के सपने सँजोए, पर वर्तमान के गौरव से पलायनवादी रूख अपनाया। सत्ता से जुड़े लोगों ने साहित्य से षड्यंत्र कर हमें एक ऐसे खुशगवार माहौल में खड़ा कर दिया जहाँ हम स्वयं की पहचान भूल गए।... जब तक हम अतीत के मोह और भविष्य की कल्पना छोड़ अपने वर्तमान को बेहतर नहीं बनाते, तब तक प्रगति नहीं कर सकते। अपने समय के आम आदमी की चिंता सर्वोपरि है।" सचमुच वे वर्तमान में जीने वाले कथाकार थे।


रवि नन्दन सिंह 


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