कल्पना मनोरमा का आलेख 'मुक्ति कोई अलंकार नहीं'

 

कल्पना मनोरमा


स्त्री मुक्ति का सवाल आज एक अहम सवाल है। इस बात में कोई दो राय नहीं कि पितृसत्तात्मक व्यवस्था ने स्त्री मुक्ति का अगर विरोध नहीं किया तो उसमें कोई रुचि भी नहीं दिखाई। पितृसत्तात्मक व्यवस्था की जकड़न कुछ इस तरह बनी रही कि स्त्री को उससे निकलने के लिए सोचने में ही शताब्दियों लग गए। आज बदले हुए समय की स्त्री अपनी मुक्ति के लिए सजग और सचेत है। लेकिन सवाल फिर वही है कि मुक्ति का वास्तविक मतलब क्या है? यह उच्छृंखल होना तो कतई नहीं है। कवयित्री कल्पना मनोरमा स्त्री मुक्ति के इन सवालों से टकराते हुए लिखती हैं 'मुक्ति देह के त्याग में नहीं, चेतना के विस्तार में है। वह बाहर से मुक्त दिखने में नहीं, भीतर से निर्भय होने में है। जब स्त्री अपने निर्णयों की ज़िम्मेदारी बिना संकोच के स्वयं उठाने लगेगी, जब वह दूसरों की आँखों से खुद को देखना बंद कर सकेगी और अपने अंत:प्रकाश में स्वयं को निहार सकेगी, तब वह किसी से मुक्त कहलाने की मुहताज नहीं रहेगी, वह स्वतः मुक्त हो जाएगी।' आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं कल्पना मनोरमा का आलेख 'मुक्ति कोई अलंकार नहीं'।


'मुक्ति कोई अलंकार नहीं'

 

कल्पना मनोरमा


आज का समय स्त्री के अधिकार, मुक्ति या अस्मिता की केवल पुकार नहीं, बल्कि उन सभी अस्तित्वों की आवाज़ सुनने का आग्रह करता है, जिन्हें सभ्यता ने लंबे समय तक मौन मान लिया था या खारिज़ करने की साजिश की थी। इसलिए अब प्रश्न केवल स्त्री या पुरुष का नहीं, बल्कि समूचे जीव जगत और उनके पारस्परिक संबंधों की पुनर्रचना का है। इसमें वे भी शामिल हैं जो जड़ कहे गए—नदी, पर्वत, वनों की गंध, मिट्टी की स्मृति और पक्षियों की उड़ान। उनके भीतर भी जीवन है, स्मृति है, भाषा है। उन्हें अब सिर्फ़ संसाधन नहीं, संवाद का अंग समझे जाने की ख्वाहिश है। यानी वर्तमान में विमर्श किसी एक वर्ग, जाति या लिंग के इर्द-गिर्द नहीं घूमता। वह बहुस्वरात्मक, बहुस्तरीय और बहुपरिप्रेक्ष्यीय हो चला है। अब यह जानना आवश्यक हो गया है कि कौन-सी चुप्पी क्यों बन रही है? किसकी आवाज़ को बार-बार अनसुना क्यों किया गया? और कौन-सी परंपराएँ अब बदलाव की आकांक्षा से भीतर-ही-भीतर हिल रही हैं। यह समय केवल अधिकारों की नहीं, उत्तरदायित्व की चेतना भी माँगता है। जब तक हम सभी अस्तित्वों के पारस्परिक संबंधों को, उनके दुःख-सुख को, उनके अनुभवों को साझा करने के लिए उदार और सजग नहीं होंगे, तब तक कोई विमर्श संपूर्ण हो ही नहीं सकता। स्त्री के सवाल भी उक्त सबसे पृथक नहीं है, वह उसी व्यापक सवाल का हिस्सा है, जिसमें पृथ्वी, समय जीव-जगत है। एक साझा मुक्ति की तलाश में सब हैं। यह मुक्ति सत्ता से नहीं, सह-अस्तित्व की करुणा से उपजेगी। 


ऐसे समय में जब 'स्त्री-विमर्श' की बात बार-बार की जाती है, तो उसका सरलीकरण मात्र उत्पीड़न, अधिकारों या समानता की माँग तक कर देना, स्त्री के संपूर्ण अस्तित्व के साथ अन्याय होगा। स्त्री होना केवल सामाजिक या सांस्कृतिक स्थिति नहीं है, न ही यह केवल सत्ता-संरचनाओं में अनुपस्थिति का मुद्दा है, यह एक अस्तित्वगत वास्तविकता है, जो जैविक, भावनात्मक, सामाजिक, मानसिक और आत्मिक स्तर पर एक जटिल सृष्टि की तरह घटित होती दिख रही है।

    

स्त्री अपने अनुभव-लोक में सिर्फ पीड़िता या अधिकार से वंचित प्राणी नहीं है, वह सृजनकर्ता है, विचारशील है, सहनशील है, और एक व्यापक आत्मा है, जो अपने अंतर्विरोधों और स्वायत्तताओं के साथ जीती और रास्ते बनाती है। इसलिए, स्त्री-अनुभव को केवल समाजशास्त्रीय या राजनीतिक तर्कों के धरातल पर नहीं, बल्कि संवेदना, साम्यता और आत्मिक समझ की भूमि पर खड़ा कर के देखा जाना चाहिए। इस ऊबड़-खाबड़, असंवेदनशील और तेजी से भटकती हुई दुनिया में यह अधिक ज़रूरी हो गया है कि हम स्त्री को एक 'प्रश्न' भर नहीं, बल्कि एक 'प्रस्तावना' के रूप में देखें। एक ऐसी प्रस्तावना जो मनुष्य होने की शर्तें बदल सकती है, विमर्श की दिशा मोड़ सकती है, और चेतना के उन आयामों को खोल सकती है, जिन्हें अब तक सायास अनदेखा किया गया है।

   

स्त्री-विमर्श का मर्म तब गहराता है जब वह केवल प्रतिक्रियात्मक न हो कर सृजनात्मक भी हो। जब वह केवल अन्यायों की गिनती नहीं, बल्कि न्याय की संभावनाएँ भी निर्मित करता है। विमर्श का मतलब किसी एक पक्ष के लिए खड़ा होना मात्र नहीं है। वह एक दृष्टि है, जो किसी विषय को उस रूप में देखने की ताकत देती है, जैसा वह है या जैसा वह हो सकता है। इसलिए यह आवश्यक है कि स्त्री के शरीर और मन दोनों की असुविधाओं को न केवल समझा जाए, बल्कि उन असुविधाओं के पीछे छिपी सत्ता, संस्कृति, भाषा और प्रतीकों की गुत्थियों को भी खोला जाए। समस्या के लक्षणों को देख कर समाधान नहीं मिलता, उसके कारणों की तह तक जा कर सृजनात्मकता की ऐसी प्रक्रिया विकसित करनी होगी, जो पीड़ा को केवल उजागर न करे, बल्कि उसकी अंतःध्वनि को भी सुन सके। जब किसी की अखंडता को सँवारने के लिए हम किसी दूसरे की खंडित होने  की शर्त न रखें। ऐसे में विमर्श नहीं, प्रतिशोध की विकृति मानसिकता जन्म लेती है। और ऐसे में मुक्ति की आकांक्षा नहीं, बल्कि मातम की आहटें अधिक सुनाई देती हैं।

   

समता की तलाश में जब हम असमानता को ही रेखांकित करने लगते हैं। तो वह विमर्श नहीं रहता, एक और सत्ता-प्रवृत्ति बन जाता है। और सत्ता जब स्वयं संविधान बन जाए, जब नैतिक विवेक और मानवीय गरिमा की जगह सिर्फ दंड और नियंत्रण की भाषा बोले  तब उसका परिणाम केवल क्रूरता होता है, उससे ज़्यादा कुछ नहीं। सत्ता का संवैधानिक हो जाना, यानी मानवीय विवेक का स्तर गिर जाना। इसलिए स्त्री-विमर्श को किसी आंदोलन की सीमित परिधियों में नहीं, बल्कि एक व्यापक मनुष्यता के पुनर्गठन के रूप में देखना होगा। जहाँ स्त्री-पुरुष के साथ अन्य सभी की अस्मिताएँ एक-दूसरे की नींव पर नहीं, बल्कि अपनी-अपनी स्वायत्त गरिमा पर खड़ी हों। यह सिर्फ तकनीकी प्रगति और भौतिक उन्नति का युग नहीं है, बल्कि वह दौर भी है जहाँ मनुष्य अपनी जड़ों से कटता जा रहा है। जड़ें जो प्रकृति में थीं, संबंधों में थीं, सामूहिकता और संवेदना में थीं। इस अलगाव ने विमर्शों की मूलभूत भूमि को भी बदल दिया है। अब विमर्श का अर्थ केवल सामाजिक असमानताओं की चर्चा भर नहीं होना चाहिए, बल्कि विमर्श को उस स्तर पर पहुँचना होगा जहाँ मनुष्य, प्रकृति, चेतना और अस्तित्व आदि एक समग्र प्रणाली की तरह समझे जाएँ। अगर आज भी विमर्श केवल ‘लिंग’ या ‘वर्ग’ आधारित दायरे में सिमटा हुआ है, तो वह अधूरा है।

  

यही कारण है कि आज नदियाँ मर रही हैं, वनों की साँसें धधक रही हैं, पर्वत अपने मौन में शोकग्रस्त हैं और पशु–पक्षी हमारी कथित 'उन्नति' की आहट से भयभीत हैं। पेड़-पौधे हों या आदिवासी समुदाय, महिलाएँ हों या वनस्पति, सब किसी ऐसी करुण पुकार में लिप्त हैं जो सत्ता की भाषा से नहीं, केवल संवेदना और समझ की भाषा से ही सुनी जा सकती है। दरअसल, समतामूलक समाज की कल्पना तब ही संभव है, जब असमानता के भीतर छुपी, समानता को देखने की दृष्टि विकसित करें। प्रकृति उत्कृष्ट उदाहरण है। जहाँ विविधता है, पर विरोध नहीं। जहाँ प्रत्येक तत्त्व अपनी स्वतंत्र सत्ता में रहते हुए एक गहरे समन्वय का हिस्सा है। ऋतुओं की अदल-बदल, दिन और रात का क्रम, जल और अग्नि का परस्पर होना, ये सब विरोध नहीं, पूरकता के प्रतीक हैं। स्त्री और पुरुष भी इसी प्रकृति की ही संतान हैं, और उनके संबंधों में भी यही पूरकता मूलभूत रूप से अंतर्निहित है लेकिन इस जोड़ी को प्रतिस्पर्धा में ढाला गया, या अनायास संतुलन टूट गया। जब ‘एक’ को सत्ता सौंप दी गई और ‘दूसरे’ को समर्पण तभी से समाज और प्रकृति एक दीर्घकालिक विकृति की ओर बढ़ने लगी।


वंदना शिवा जब यह कहती हैं कि “स्त्री और प्रकृति, दोनों का शोषण एक ही विचार पद्धति का परिणाम है”, तो दरअसल वे उसी बिंदु की ओर संकेत करती हैं, जहाँ से समस्त असंतुलन की शुरुआत हुई। उपभोग की मानसिकता, अधिकार की नहीं, अधिग्रहण की प्रवृत्ति, यही आज न स्त्री को मुक्त होने देती है, न प्रकृति को जीवित। यह एक ही वृत्ति है जो स्त्री को ‘देह’ और पृथ्वी को ‘भूस्खलन’ में बदल देती है। और यह भी ध्यान देने योग्य है कि विमर्श केवल तब तक ही उपयोगी है, जब तक वह न्याय की आकांक्षा से प्रेरित है, अन्यथा वह भी एक सत्ता बन कर, अपने ही प्रतिपक्षों को रौंद सकता है। यह खतरा आज स्त्री-विमर्श के साथ भी जुड़ चुका है, जहाँ अक्सर कुछ चयनित, शिक्षित, शहरी स्त्रियों की स्वतंत्रता को संपूर्ण स्त्री-मुक्ति का प्रतीक मान लिया जाता है, जबकि बहुसंख्यक स्त्रियाँ आज भी अपने अस्तित्व को किसी तरह 'बचना' मानती हैं, 'जीना' नहीं। अतः विमर्श को नए सिरे से समझने की आवश्यकता है। अब वह समय नहीं जब हम केवल अधिकारों की भाषा में बात करें, अब आवश्यकता उस सांस्कृतिक, दार्शनिक और आत्मिक भाषा की है जो एक समन्वयी दृष्टि विकसित कर सके। क्योंकि जब तक विमर्श समावेशी नहीं होगा, तब तक वही करेगा जो सत्ता करती आई है, कुछ को स्थापित कर के बाकी को खारिज।





मुक्ति, स्त्री की हो या पृथ्वी की, तब तक एक मृगतृष्णा बनी रहेगी, जब तक मुक्ति और प्रकृति के मूल गणित को समझा नहीं जाता। एक बीज और एक भूमि के बिना कोई सृजन संभव नहीं न जैविक, न मानसिक, न सामाजिक। यह गणित सरल है लेकिन मनुष्य उसे बार-बार उलझा देता है। क्योंकि उसे सत्ता चाहिए, समन्वय नहीं। दुखद यह है कि आज भी समाज स्त्री को उसकी भूमिका में तो स्वीकारता है, परंतु उसकी सत्ता को नहीं। जैसे हम जल को पीते हैं, उपयोग करते हैं, पर उसे ‘जीवन’ नहीं मानते। ठीक वैसे ही, स्त्री का भी उपयोग तो किया गया। पूज्य और उपभोग्य दोनों रूपों में, लेकिन उसकी स्वतंत्र सत्ता को न समाज ने, न विमर्शों ने, न नीतियों ने पूर्णतः स्वीकारा नहीं। जब तक हम स्त्री को केवल ‘विषय’ या ‘उद्देश्य’ मानते रहेंगे, और उसे ‘प्रस्तावना’ नहीं, तब तक हम उसकी उपस्थिति को आधा ही समझेंगे।


अंततः विमर्श का उद्देश्य केवल प्रतिरोध या आरोप नहीं, बल्कि सृजन का होना चाहिए, एक ऐसी सृजनात्मक प्रक्रिया जो न केवल असमानताओं को उजागर करे, बल्कि संतुलनों की पुनर्स्थापना भी कर सके। क्योंकि अगर विमर्श किसी और को गिरा कर ही अपना अस्तित्व बनाए, तो वह विमर्श नहीं, एक और हिंसा है। इसलिए ज़रूरी है कि हम विमर्शों की भाषा बदलें। तकनीक और सत्ता की नहीं, संवेदना और सह-अस्तित्व की भाषा में बात करें। जब तक विमर्श जीवन की लय से नहीं जुड़ेगा, तब तक उसका कोई स्थायी प्रतिफल नहीं होगा। सचमुच, विमर्श तब ही सार्थक होगा जब वह जीवन की विविधताओं को समता में रूपांतरित कर सकेगा जैसे प्रकृति करती है, चुपचाप, बिना प्रदर्शन, बिना वर्चस्व, एक गहरी धुन में। स्त्री और पुरुष उसी धुन में चल सकें, यही विमर्श का अंतिम लक्ष्य होना चाहिए। एक ऐसी दुनिया जहाँ स्वतंत्रता, सृजन और संतुलन, तीनों एक साथ घटित हो सकें। अत: बिगड़ी हुई स्थित को जब कोई न समझे तो स्त्री को स्वयं बीड़ा उठाना चाहिए। स्त्री चिन्तन में गहरी उतरे और सोचे कि उसका अपना स्वरूप है क्या? उसका अपना धरातल क्या है? वह सिर्फ देह में रहती है या विचार में? वह किस भूमि पर खड़ी है, किस दिशा की ओर बढ़ रही है? वह अपने को किस रूप में देखती है, और किन रूपों में उसे देखा गया है? क्योंकि अब भी स्त्री उसी छवि की पुनर्रचना कर रही है, जो शताब्दियों से समाज ने उसके लिए गढ़ दी हैं। परंपरागत दृष्टिकोण में उसका 'रूप' देह से जुड़ा रहा है। सौंदर्य, यौनिकता, मातृत्व, सहनशीलता आदि के प्रतीक के रूप में स्त्री को हमेशा देखा जाता रहेगा है। तो मुक्ति की कामना को स्त्री क्या त्याग दे? क्योंकि स्त्री को या तो देवी बना कर पूजनीय बना दिया गया, या देह बना कर उपभोग की वस्तु…। इन्हीं गढ़ी हुई छवियों ने उसे बाहरी उत्पाद में रूपांतरित कर दिया, न कि आत्मानुभूति से सम्पन्न एक संप्रभु सत्ता। अब समय है कि स्त्री स्वयं से यह प्रश्न पूछे कि क्या वह अभी भी दूसरों द्वारा निर्मित छवियों में जी रही है, या अपने भीतर की सत्ता को पहचानने के रास्ते पर बढ़ चली है? स्त्री-विमर्श ने हमेशा यह प्रश्न उठाया है कि क्या स्त्री मात्र एक शरीर है? क्या उसका ‘स्व’ केवल उसकी सामाजिक भूमिकाओं और दूसरों की अपेक्षाओं से ही परिभाषित होगा?

 

इन प्रश्नों ने स्त्री के भीतर गहरी हलचल पैदा तो की है। वह सोचने भी लगी है, प्रश्न उठाने लगी है, प्रतिरोध करने लगी है और खुद को महत्वपूर्ण मानने की चाहत में रहने लगी है। यानी आधुनिक स्त्री का 'धरातल' बहुलता से समृद्ध है। लेकिन ध्यान से देखा जाये तो वह न तो पूरी तरह परंपरा में रचा-बसा सच है, न ही पूर्णतः आधुनिकता की ओर एकरैखीय ढंग से अग्रसर होना है। वह अतीत के अनुभवों, वर्तमान की चुनौतियों और भविष्य की आकांक्षाओं, तीनों को अपने भीतर समेटे एक संक्रमणशील स्थिति में खड़ी दिख रही है। उसकी अस्मिता कोई स्थिर या पूर्वनिर्धारित स्थिति नहीं, बल्कि एक निरंतर गतिशील प्रक्रिया है जो समय, अनुभव और आत्म-चेतना के साथ आकार लेती है। 


तो क्या अब सम्पूर्ण स्त्रियों ने अपने मन के साथ किए गए समझौतों को चुनौती देना शुरू कर दिया है? 


इस बात को समझना बहुत जरूरी है। क्योंकि कुछ मुट्ठी भर स्त्रियाँ अब केवल सामाजिक उत्तरदायित्वों की वाहक भर नहीं रही; वह अपने विकल्पों की सर्जक भी है। उसकी दृष्टि अब केवल बाहर की दुनिया में समानता की माँग तक सीमित नहीं, वह भीतर की दुनिया में उतर कर अपने अस्तित्व की तहों को टटोल रही हैं, पहचान रही हैं और उन्हें सुदृढ़ भी करने की कोशिश कर रही हैं। अंततः कहने वाले कहते हैं कि स्त्री की दिशा अब एकमुखी नहीं रही। वह आत्मस्वीकृति से भरी, बहुआयामी और बहुपथीय हो गई है। लेकिन ध्यान देना होगा कि यह परिवर्तन किसी निष्कर्ष की तरह नहीं, बल्कि एक सतत संवाद, जागरूकता, और गहन संवेदना की माँग करता है। क्योंकि स्त्री स्वयं कोई तैयार उत्तर भले नहीं है, लेकिन वह एक जीवित प्रश्न तो है। एक ऐसा प्रश्न, जो समय, समाज और सत्ता से लगातार टकराता है। और यही उसकी सबसे बड़ी चेतन उपलब्धि होनी चाहिए कि वह स्वयं को रचे, खोजे और अपने होने की शर्तें स्वयं तय करे। लेकिन ऐसा सम्भव नहीं। 


जब तक स्त्री स्वयं यह नहीं समझती कि उसे मुक्ति किससे चाहिए, परंपरा से, पुरुष से, अपनी ही conditioning से या आत्मसंशय से? और यह भी तय नहीं कर पाती कि यह मुक्ति किसके लिए है, समाज की स्वीकृति के लिए या अपनी संपूर्णता के लिए? तो 'मुक्ति' एक खोखला नारा बन कर रह जाती है। एक ऐसा नारा जो सुनाई तो देता है, लेकिन कहीं गूँजता नहीं। क्या किसी ने स्त्री से पूछा कि जिसे देखने वाले 'कैद' कह रहे हैं, स्त्री कैसे देखती है? हो सकता है, हर स्त्री–मुक्ति की आकांक्षी ही न हो। या शायद उसकी मुक्ति की परिभाषा उसी राह से हो कर गुजरती हो, जिसे बाहर से देखने वाले बंधन कहते हैं।


क्या पता, समाज को जो कैद दिखती है— वही स्त्री के लिए स्वीकृति, सुरक्षा, और कभी-कभी ‘जन्नत’ भी हो। इसलिए स्त्री-मुक्ति का प्रश्न केवल स्त्री की दशा का नहीं, उसकी दृष्टि का भी है। हर स्त्री की यात्रा, उसकी संवेदना, उसकी ज़रूरतें और उसकी ‘मुक्ति’ का रास्ता अलग हो सकता है।


जैसा कि गीतकार बुद्धिनाथ मिश्र लिखते हैं —


“एक बार और जाल फेंक रे मछेरे, 

जाने किस मछली में बंधन की चाह हो…”


यह पंक्ति स्त्री के भीतर छिपी उस मौन जिज्ञासा को स्वर देती है। जो कभी-कभी मुक्ति से नहीं, बल्कि अपनी स्वेच्छा से चुने गए बंधन से अर्थ पाती है। मिश्र जी की यह पंक्ति, “एक बार और जाल फेंक रे मछेरे, जाने किस मछली में बंधन की चाह हो…”  स्त्री की मनःस्थिति के रूप में पढ़ी और समझी जा सकती है। यह पंक्ति स्त्री के भीतर मौजूद उलझनों, अंतर्विरोधों और उसकी चेतना में पल रहे द्वंद्व का गहरा बिम्ब प्रस्तुत करती है। क्योंकि जब तक स्त्री स्वयं अपनी इच्छा और आत्म-बोध से मुक्ति की कामना नहीं करती, तब तक किसी के द्वारा दी गई ‘मुक्ति’ कभी संपूर्ण नहीं हो सकती। क्यों? क्योंकि मुक्ति कोई वस्तु नहीं है, जिसे बाहर से दिया या पाया जा सके। यह एक आंतरिक स्थिति है, स्वयं की खोज और स्वीकृति का परिणाम है। इसी बात को एक और स्थिति के माध्यम से समझा जा सकता है, आज की स्त्री एक ओर वर्चस्ववादी पुरुष-सत्ता को अस्वीकार कर स्वतंत्र और आत्मनिर्भरता का उत्सव बन जाना चाहती है, लेकिन दूसरी ओर, पुरुष-सत्ता के एक और संस्करण, उपभोक्तावादी संस्कृति द्वारा प्रस्तुत यौनिक वस्तुकरण (सेक्स टॉय) की ओर भी आकृष्ट होती दिखाई देती है। यह स्थिति दर्शाती है कि मुक्ति का विकल्प खोजते–खोजते, स्त्री उसी जाल में उलझती चली गयी, जिससे वह स्वयं को मुक्त करना चाहती है, आभासी ही सही, सुख पाना चाहती है।

  

इस विरोधाभास को समझे बिना, 'मुक्ति' केवल शब्दों का एक खेल बन कर रह जाएगी। मुक्ति केवल सामाजिक, मानसिक या शारीरिक स्वतंत्रता नहीं, बल्कि मुक्ति एक आत्मिक अवस्था है, एक ऐसा शून्य, जहाँ न बंधन है, न आकांक्षा, न लिप्सा है, न ही किसी प्रकार की उत्कंठा। यह एक ऐसी स्थिति है, जहाँ स्त्री स्वयं को अपेक्षाओं के बोझ से मुक्त और अपने अस्तित्व की संपूर्णता में स्थिर हो पाती है।


 

निस्संदेह, मुक्ति का मार्ग कठिन है, लेकिन असंभव बिलकुल नहीं। यदि स्त्री संकल्प करे, और स्वयं को मुक्ति की स्थिति में देखने का साहस करे तो वह उसे साध भी सकती है, जी भी सकती है। यह कहना गलत होगा कि मुक्ति साध्य नहीं है। स्त्री मुक्त भी हो सकती है और परिवार, संबंध, समाज, इन सबका संतुलन भी बनाए रख सकती है। लेकिन किसी और के द्वारा दी गई मुक्ति जो बाहर से थोप दी गई हो या ‘दया’ या ‘उपकार’ के भाव से दी गई हो तो वह न तो स्त्री समझ पाएगी, न ही उसे आत्मा की जमीन पर बरत पाएगी। मुक्ति, आत्मबोध से उपजती है, अनुरोध से नहीं। आत्म-बोध की यात्रा स्वयं तय करनी पड़ती है। ऐसा नहीं स्त्रियों ने मुक्ति की चाहत में जिद न की? खूब दिलदारी से की, क्योंकि स्वतंत्र होने की इच्छा जीवन की है। मुक्ति की जिद देखनी हो, तो भक्ति-काल की स्त्रियाँ याद न आएँ ऐसा हो ही नहीं सकता। आंडाल, अक्क महादेवी, ललदद्द और मीराँ, ये सभी स्त्रियाँ मुक्ति और स्वतंत्रता का पवित्र और साहसी उदाहरण हैं। इन स्त्रियों ने केवल सामाजिक बंधनों या देह की सीमाओं से नहीं, अपनी आत्मा की परतों से भी स्वयं को मुक्त किया। उन्होंने पुरुष-सत्ता की कठोर दीवारों के भीतर रहते हुए अपनी आंतरिक सत्ता को पहचाना, और भौतिक प्रतिबंधों को सहजता और साहस से त्यागते हुए आत्मिक चेतना का आलोक छू लिया। क्योंकि मुक्त होना बार-बार अपनी कैद को सजाना या उसका दृश्य बदलते रहना नहीं होता। मुक्ति का अर्थ है — उन सारे आग्रहों, परिभाषाओं और अपेक्षाओं को झटक कर एक ओर रख देना, जिनसे व्यक्ति का अस्तित्व सीमित होता है। और यदि यह आत्म-बोध का झटका संभव न हो तो बुद्ध का ‘मध्यम मार्ग’ ही सबसे सधा हुआ रास्ता है।  जहाँ न अतिशय आग्रह है, न पूर्ण त्याग, जो है वह केवल जागृत संतुलन, जो अंततः आत्मा को सहजता से स्वतंत्र करता है, अपना कर देखना चाहिए। लेकिन इस बोध तक पहुँचने के लिए स्त्री को अपने भीतर झाँकना होगा— अपनी भूलों को स्वीकारना होगा। भूली हुई सत्ता को पुनः पहचानना होगा। अपने पैरों के नीचे की रेत को स्वयं हटा कर, उन पदचिह्नों को खोजना होगा जहाँ से उसकी पुरखिनों की यात्रा शुरू हुई है। स्त्री के लिए यह आत्म-स्मरण ही मुक्ति की पहली सीढ़ी है। 

  

और उससे भी पहले, स्त्री को स्त्री के प्रति उदार होना सीखना होगा। जब तक स्त्री स्वयं की बेटी, बहू, माँ, सास या मित्र के रूप में दूसरी स्त्रियों के प्रति असंवेदनशील बनी रहेगी, तब तक कोई बाहरी शक्ति उसे न मुक्त कर सकती है, न करवा सकती है। स्त्री-विरोधी दृष्टिकोण केवल पुरुषों तक सीमित नहीं है, वह स्त्री के भीतर भी घर कर चुका है। इसलिए अतिवाद और निष्क्रियता, दोनों से बचते हुए, उसे ‘संतुलन’ की विद्या सीखनी होगी—वही संतुलन जो उसे भीतर से स्थिर करेगा, बाहर से सहचर। स्त्री-मुक्ति में यही संतुलन वह बीज है, जो सद्भाव, आत्मबोध और स्वतंत्र सत्ता को जन्म दे सकता है। यह वही राह है जहाँ स्त्री अपने स्वरूप, अपनी शक्ति, और अपनी दिशा को पहचान पाएगी। तब उसे किसी वर्चस्ववादी सत्ता से लड़ना नहीं पड़ेगा क्योंकि वह स्वयं एक सत्ता बन चुकी होगी। 

   

स्त्री को समझना होगा कि वह पहले एक मनुष्य है। उसका मस्तिष्क, उसकी चेतना, उसकी संवेदना,यही उसकी सबसे बड़ी पूँजी हैं। देह की सुंदरता से कहीं अधिक ज़रूरी है, विचारों की सुदृढ़ता। जब यह दृष्टि स्त्री के भीतर बनेगी, तभी वह अपने हक–हकूक का संतुलित और विवेकपूर्ण निर्णय ले सकेगी। महादेवी वर्मा ने कुछ सोच कर ही कहा था —“स्त्री वह शक्ति है जो जीवन को जन्म देती है, इसलिए उसे निर्बल कहना स्वयं मानवता का अपमान है।”


अंततः स्त्री को हर वक्त यह स्मरण रखना चाहिए कि मुक्ति कोई दान नहीं, स्व–अर्जन है। और अर्जन की राह में स्त्री के पास साहस, समझ और स्व–अनुशासन ही उसके सबसे विश्वसनीय उपकरण हैं। जैसा कि जे. कृष्णमूर्ति कहते हैं, “बिना किसी मूल्यांकन के केवल देख पाना ही बुद्धिमत्ता का सर्वोच्च रूप है।” इसलिए, जब स्त्री की चेतना अपनी पूरी गरिमा और गहराई में जागेगी, तो वह न पराधीनता को स्वीकार करेगी, न किसी की कृपा पर अपना अधिकार दिखाएगी। उसे अपने को देह, समाज या संबंधों के आईने में नहीं, अपने विचारों, निर्णयों और संवेदना के उजाले में देखना होगा। यही उजाला उसकी भीतर की यात्रा को दिशा देगा। यह यात्रा किसी बाहरी क्रांति से नहीं, बल्कि भीतर की स्पष्टता और आत्म–संवाद से शुरू होती है। जहाँ स्त्री स्वयं को केवल एक 'स्त्री' नहीं, एक पूर्ण 'मनुष्य' मान कर जीती है।


स्त्री-मुक्ति के बाबत बार-बार महसूस होता रहा है कि मुक्ति कोई अलंकार नहीं—जिसे बाहरी स्वीकृति या सामाजिक अनुमोदन से स्त्री के माथे पर ताज की तरह पहनाया जा सके। और कोई उपाधि भी नहीं है, जिसे संविधान, राज्य, पुरुष-सत्ता  या समाज प्रदान करें। यह एक भीतरी कंपन है, एक आत्मिक स्पंदन, जो तब उत्पन्न होता है जब स्त्री अपने भीतर की गहराइयों में उतरती है, स्वयं को टटोलती है, पहचानती है और  बिना किसी डर के स्वयं को स्वीकारती है। मुक्ति देह के त्याग में नहीं, चेतना के विस्तार में है। वह बाहर से मुक्त दिखने में नहीं, भीतर से निर्भय होने में है। जब स्त्री अपने निर्णयों की ज़िम्मेदारी बिना संकोच के स्वयं उठाने लगेगी, जब वह दूसरों की आँखों से खुद को देखना बंद कर सकेगी और अपने अंत:प्रकाश में स्वयं को निहार सकेगी, तब वह किसी से मुक्त कहलाने की मुहताज नहीं रहेगी, वह स्वतः मुक्त हो जाएगी।

  

ऐसी मुक्ति दैहिक संघर्षों से ऊपर उठ कर आत्मा की स्थिरता में जड़ें जमाती है। यह वह अवस्था है, जहाँ स्त्री को न तो स्वयं को सिद्ध करना पड़ता है, न ही अपनी स्वतंत्रता के लिए मोल-भाव करना पड़ता है। तब स्त्री न पुरुष-विरोध में खड़ी होती है, न पुरुष-स्वीकृति की प्रतीक्षा में, बल्कि वह स्वतः अपने अस्तित्व की पूर्णता में प्रतिष्ठित होने लगती है। स्त्री की सबसे बड़ी उपलब्धि वही होगी जब वह बाहरी स्वरों के कोलाहल से परे जा कर अपने भीतर की आवाज़ सुनने लगेगी और उन्हीं निर्देशों पर अपने जीवन की दिशा तय करेगी। 


वह सौंदर्य जो अब तक रूप, विनय और स्वीकार्यता से परिभाषित होता रहा, अब विचारों की स्पष्टता, अनुभवों की ईमानदारी और आत्मा की स्थिरता से पहचाना जाएगा।और शायद यही स्त्री का असली सौंदर्य होगा, उसकी सच्ची मुक्ति और भविष्य की सबसे गूढ़ और विश्वसनीय क्रांति भी….।


(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग्स कवि विजेन्द्र जी की हैं।)


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लेखिका परिचय :

कल्पना मनोरमा, सेवानिवृत्त अध्यापक और स्वतंत्र लेखिका हैं। वे स्त्री-विमर्श, सामाजिक यथार्थ, पुरुष-पीड़ा और बाल-साहित्य पर केन्द्रित लेखन करती हैं। उनके तीन कविता संग्रह और एक कथा संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। दो कविता संग्रह, एक कथा संग्रह तथा दो बाल कथा संग्रह प्रकाशनाधीन हैं। साथ ही, पुरुष अनुभवों की संवेदना को केन्द्र में रखे गए उनके दो संपादित कथा संग्रह भी प्रकाशित हो चुके हैं। उनकी रचनाएँ मानवीय संबंधों की बारीकियों और सामाजिक संवाद की गहराई के लिए विशेष रूप से सराही जाती हैं।



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