कौशल किशोर का आलेख 'राजेन्द्र कुमार की कविता-यात्रा'
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| राजेन्द्र कुमार |
कई रचनाकार ऐसे होते हैं जो कई विधाओं में एक साथ समानांतर रचना करते हैं। कविता, कहानी, उपन्यास, आलोचना की धारा रचनाकार के यहां एक साथ बहती रहती है। यह आसान नहीं होता। विधाओं के बीच की यह आवाजाही दरअसल उस रचनाकार की एक रचना का ही विविधरूपी विस्तार होता है। राजेन्द्र कुमार की ख्याति एक आलोचक के रूप में थी लेकिन मूल रूप से वह अपने को एक कवि ही मानते थे। उनके चार कविता संग्रह प्रकाशित हैं जो कविता के प्रति उनके अनुराग को प्रदर्शित करते हैं। अभी भी उनके उनकी तमाम कविताएं अप्रकाशित हैं जिनको लेकर दो-तीन संग्रह और प्रकाशित हो सकते हैं। राजेंद्र कुमार की कविताएं कल्पना की उड़ान तो भरती हैं लेकिन उनमें हमेशा एक तर्कशीलता और वैज्ञानिक चेतना दिखाई पड़ती है। 'हर कोशिश है एक बगावत' कविता संग्रह को लेकर कौशल किशोर ने उनकी काव्य यात्रा को रेखांकित करने का प्रयास किया है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं कौशल किशोर का आलेख राजेंद्र कुमार की काव्य यात्रा।
'राजेन्द्र कुमार की कविता-यात्रा'
('हर कोशिश है एक बग़ावत')
कौशल किशोर
राजेन्द्र कुमार हिन्दी के जाने-माने कवि व आलोचक हैं। उन्होंने कहानियां भी लिखी हैं। इस तरह उनकी पहचान कवि व गद्यकार की बनती है। देखा गया है कि अधिकांश आलोचकों ने अपनी सृजनात्मक यात्रा काव्य लेखन से की लेकिन बाद में उनका काव्य लेखन स्थगित हो गया। राजेन्द्र कुमार के साथ ऐसा नहीं है। आलोचना के साथ उन्होंने कविता-लेखन को भी उसी तरह अपने सृजन के केन्द्र में रखा। उनकी आलोचना कविता का ही विस्तार है और आलोचना से कविता की वैचारिकी में प्रखरता आती है। राजेन्द्र कुमार के अब तक तीन कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। 1978 में ‘ऋण गुणा ऋण’ आया। इस पहले संग्रह के प्रकाशन के लम्बे अन्तराल के बाद 2013 में उनका दूसरा संग्रह ‘हर कोशिश है एक बागावत’ छप कर आया। ‘लोहा लक्कड़’ उनका तीसरा संग्रह है।
राजेन्द्र कुमार ने अपनी काव्य यात्रा की शुरुआत ऐसे वक्त में किया जब हिन्दी में अकविता का दौर था। लेकिन उनकी कविताओं में अकविता के अराजकतावादी दौर का प्रभाव नहीं दिखता। बल्कि राजेन्द्र कुमार निराला और मुक्तिबोध के अधिक करीब नजर आते हैं। मुक्तिबोध कविता के बारे में कहते हैं
‘वह आवेग त्वरिता कालयात्री है
...जनचरित्री है’।
कविता के इस खास गुण का दर्शन हमें राजेन्द्र कुमार की आरम्भिक कविताओं में भी होता है जहां वे काव्य-दृष्टि निराला से ग्रहण करते हैं। ‘इलाहाबाद के पथ पर तोड़ती पत्थर’ से उनकी कविता का भावनात्मक रिश्ता जुड़ता है और वह न्याय के पक्ष में ‘शक्ति की मौलिक कल्पना’ करने में समर्थ हो पाती है। अपनी इसी दृष्टि-प्रतिबद्धता की वजह से राजेन्द्र कुमार की यह समझ बनती है कि इसी राह से ‘पुरुषोत्तम नवीन’ में रूपान्तरण होगा। राजेन्द्र कुमार की अनुभव से विचार की इस यात्रा में कविता के कहने के अन्दाज में तो बहुत परिवर्तन नहीं आता लेकिन वह ऐसा शिल्प अवश्य निर्मित करती है जो विषय वस्तु को मार्मिक के साथ साथ मारक भी बनाता है। राजेन्द्र कुमार की कविताओं की यह खासियत है कि यह बिना उत्तेजना व उग्रता पैदा किये हमें अपील करती है और पाठक के यथार्थ बोध को बढ़ाती है।
‘ऋण गुणा ऋण’ 1978 में प्रकाशित हुआ था। 2014 में इसका परिवर्धित दूसरा संस्करण आया है। इसमें ‘कुछ अन्य कविताएं’ से एक खण्ड है जो पहले संस्करण में शामिल नहीं रहा हैं। इस खण्ड की कविताओं का रचना काल भी वही है। साथ ही, पहले संस्करण में कुछ कविताएं आपातकाल के दौरान अभिव्यक्ति पर लगाये गये सेंसरशिप की वजह से अपने मूल रूप में नहीं आ पाई थीं, इस दूसरे परिवर्धित संस्करण में वे अपने मूल रूप में प्रकाशित हैं। यदि कविताएं अपने मूल रूप में नहीं छापी जा सकी तो इसका कारण वो आसन्न स्थितियां थीं जिनसे ये रू ब रू रही हैं। बहरहाल, राजेन्द्र कुमार के इस संग्रह की कविताओं से कवि के अन्तर्मन, उसके अन्तर्द्वन्द और विकास यात्रा को समझा जा सकता है, साथ ही उस दौर को भी।
संग्रह की पहली कविता है ‘मिट्टी के ढेले’। पन्द्रह पंक्तियों की इस छोटी कविता से ही राजेन्द्र कुमार के काव्य की भाव-भूमि और चरित्र सामने आती है। यहां मिट्टी के ढेले की नियति के माध्यम से पर-पीड़ा की सहज अनुभूति है।
‘पता नहीं क्यों
मन क्यों उदास हो गया है’
यह आत्मकथन इसी की अभिव्यक्ति है। राजेन्द्र कुमार की कविताओं में यह पर-पीड़ा का अहसास लगातार सघन होता गया है। कविता की यह दुनिया अनुभूतियों से बनती है। अपनी कविता ‘शीशा’ में राजेन्द्र कुमार कहते हैं:
‘मुझे मिला है
जीवन का जो चौड़ा शीशा
उसमें हो कर
मुझे देखने दो वे सारे अक्स
कि जिनमें ढल आयी हैं
मेरी अनुभूतियां‘!’
इन्हीं से बनती है उनकी जीवन दृष्टि। इसी से वे अपने समय, समाज और यथार्थ को देखते हैं, अपने अन्तर की पड़ताल करते हैं। जीवन, प्रकृति और परिवेश में जो सृजन हो रहा है, जो घटित हो रहा है, वही राजेन्द्र कुमार की कविताओं में अभिव्यक्ति पाता है। जैसे कविता ‘गुलाब’ को देखें
‘मैं चुप था
पंखुरियां भोली
शरारत से बोलीं-‘अरे, तुम तो कवि हो न?
- देख क्या रहे हो ? - मेरे
सौन्दर्य को वाणी दो
भावों के तुम तो
बड़े मुखरदानी हो!’
यहां कोई कृत्रिमता नहीं, वस्तुनिष्ठता है। यही राजेन्द्र कुमार की काव्य विशेषता है।
राजेन्द्र कुमार के कवि की निर्मिति में उनके भीतर और बाहर की भूमिका है। इस अन्तर्द्वन्द को सामने लाती एक कविता है ‘बाहर-भीतर’। यह कैसा विरोधाभास है कि
‘सभ्य दिखने के चक्कर में
हम जिन नाखूनों को कुतर डालते हैं
उन्हीं से वह अपनी भयानक अंगुलियों के कवच
तैयार करता है’।
राजेन्द्र कुमार जिस मध्यवर्ग या बौद्धिक समुदाय से आते हैं, उसके जीवन में बहुत दिखावापन है। वह बाहर जैसा दिखता है, अन्तर में वह वैसा ही नहीं है। इस द्विचितापन को राजेन्द्र कुमार अपनी कई कविताओं में उभारते हैं। मनुष्य इस कदर ‘सभ्यताक्रान्त’ है कि ‘हम धारते हैं शक्ल/शक्लें उतारते हैं’। एक कविता ‘अति रिक्त चेहरे’ में कहते हैं
‘और भी हो सकते हैं
लेकिन, जहां तक मैं जानता हूं
मेरे दो चेहरे हैं’।
अर्थात धोखा, धूर्तता, पाखण्ड, छद्म इस कदर सभ्यता का पर्याय बन गया है कि आदमी विवश हो गया है कि वह कई कई चेहरों के साथ जिये।
लेकिन राजेन्द्र कुमार ‘सभ्यता’ के नाम पर इस द्विचितापन को जरूरी नहीं मानते बल्कि इससे संघर्ष करते हैं। इस दिखावेपन का क्रिटिक रचते हैं। वे ‘दीवार’ कविता में कहते हैं
‘दर्प की दीवार
जिसे मैंने खुद ही खड़ा किया था
अपने को
औरों से अलग करने के लिए
आज, जाने क्यों मुझे ही
बेहद कुरूप लगने लगी है।’
मानव दर्प तभी पैदा होता है जब अन्तर में कुण्ठा का भाव रहता है और इस कुण्ठा को तोपने छिपाने के लिए ही आवरण के बतौर दर्प का भाव पैदा होता है। यह दर्प देखने में जितना सुन्दर लगता है, वह अन्तर में उतना ही कुरूप है। इसीलिए इस सच्चाई का संज्ञान होते ही मोहभंग होता है और विद्रोही स्वर उभरता है
‘और तब मैं बेचैन हो उठता हूं
सोचता हूं
क्या पाऊँ
कि ऊपर से नीचे तक
इस दीवार को छील डालूँ
नंगा कर दूँ
या ढहा दूँ!’
‘ऋण गुणा ऋण’ संग्रह की कविताओं का रचना काल आपातकाल और उससे पहले का है। उस आपातकाल के आज पांच दशक हो गये। उस वक्त से काफी कुछ समय गुजर चुका है लेकिन आज भी उसकी छाया बनी हुई है। यह ऐसा दौर था जब लिखने व बोलने की स्वतंत्रता समाप्त कर दी गई थी। संवैधानिक अधिकारों का अपहरण कर दिया गया था। इसी दौर की कविता है ‘पावस की शाम’। यथार्थ किस तरह हमारे मन-मस्तिष्क पर अपना असर डालता है, कविता में देखा जा सकता है। हमारे अन्तर्मन में जो भाव उपजता है, वह यथार्थ का ही अक्स होता है। इसीलिए कहा जाता है कि हमारे अन्तर्मन में जो चल रहा होता है तथा जो भाव उभरते रहते हैं, बाहर प्राकृतिक क्रियाओं व दृश्यों की अनुभूति भी वैसी ही होती है। स्वतंत्रता मनुष्य की प्रकृति ही नहीं उसकी संस्कृति भी है। यदि इसका अपहरण हो जाय तो मन का उदासी व विषाद से भर जाना स्वाभाविक है। ऐसे में ‘पावस की शाम’ भी अन्तर्मन को सुहानी नहीं कर सकती। कविता का आरम्भ ही होता है
‘वर्षा के झरने से
ये शाम
अभी अभी धुल के निकली है
कुछ उजली हो गयी है
लेकिन कैसी है यह उदासी
जो फिर भी नहीं धुली
नहीं मिटी, नहीं घुली!’
समय ने मन को इतना आक्रान्त कर रखा है कि ‘पावस की शाम’ सुहानी नहीं बेरौनक लगती है। वह मन को प्रफुल्लित नहीं कर पाती। यहां ‘सफेदी’ भ्रम है, आडम्बर है। वास्तविकता तो यह है कि
‘सफेदी की आड़ ले
पीलापन-कुछ और उभर आया है।’
जब सीधे व सहज तरीके से अपनी बात कहने की गुंजाइश खत्म कर दी गई हो, ऐसे में राजेन्द्र कुमार प्रतीकों और बिम्बों के माध्यम से अपनेे विचारों को अभिव्यक्ति करते हैं। कैसा है यह समय? यह कवि के बिम्बों में द्रष्टव्य है
‘अलगनी पर लटकी
मोती-सी बूंदें
कांप-कांप उठती हैं.....
उनमें से कब कौन
पवन के झोंकों से
नीचे आ गिर पड़े-
कुछ ठीक नहीं!’
यह ऐसा ही समय है, भय, संशय और दुविधा से भरा कि कब कौन गिर पड़े, कब कौन समर्पण कर दे, कह पाना कठिन है। इसी का विस्तार ‘बारिश से पहले का अंधेरा’ में हम देखते हैं। यह कविता आपातकाल के दिनों में ‘धर्मयुग’ में छपी और जब छपी तो तीन जगहों पर स्याही पुती थी। इस संग्रह में कविता मूल रूप में आयी है।
राजेन्द्र कुमार का यह काव्य कौशल है कि कवि कविता में प्राकृतिक क्रियाओं, घटनाओं से उन समय-संदर्भों को तार्किक तरीके से उदघाटित करता है और इसके लिए बिम्बों व प्रतीकों का सहारा लेता है। लेकिन आजादी बाद के भारतीय जनतंत्र की यह विडम्बना है कि बिम्बों और प्रतीकों के माध्यम से कही बातों पर भी बंदिशें हैं। जगह जगह कविता पर स्याही का पोत दिया जाना, इससे समझा जा सकता है कि अभिव्यक्ति पर कैसा और कतना गहरा पहरा है? कवि के लिए यह रचनात्मक बेचैनी है। लेकिन राजेन्द्र कुमार का यह आशावाद है जो विपरीतताओं में भी साथ नहीं छोड़ता। उस अदृश्य को वे दृश्य बनाते हुए कहते हैं
‘टांगता है
हर आंगन की अलगनी पर
मेघेन्द्र-नन्हीं-नन्हीं
अदृश्य-आश्वस्तियां।
पहचान में आता हुआ
धीरे-धीरे यह अंधेरा ही तो है
जो जमीन पर
आसमान से झुकता हुआ उजलाता है’।
और भी -
‘सब कुएं तालाब सूखे के हुए माना, मगर
अपने बादल भी न हों, यह तो कोई मानी नहीं’।
राजेन्द्र कुमार की कविताएं जो औसत से लम्बी हैं, उनकी शैली बहुत कुछ कथात्मक है जैसे ‘वे तीन और चौथा मैं’, ‘बीवी से गरीबी तक’, ‘यूरेका-यूरेका’, ‘पुतली घर का भोंपू’ आदि। यह 70 के दशक का वह दौर है जब ‘गरीबी हटाओ, समाजवाद लाओ’ बतौर नारे खूब उछाले गये थे जिसकी परणिति देश में इमरजेन्सी के रूप में हुई। कविता में उस दौर का जो चित्र उभरता है, वह कुछ इस तरह है -
‘वह अपनी बीवी के पास जाने से कतराता है
बीवी के बगल में लेटते ही
उसे लगता है- महाजन की बही के दिल में
उसका अंगूठा-निशान
फैल कर कुछ जगह पा गया है’
और
‘जो हाथ
उसका सीना
उसकी पीठ सहला रहे होते हैं, वे
बीवी के नहीं, बही के मालूम होते हैं-
महाजन की बही के!’
यह है सम्मोहित करने वाले नारे का राजनीतिक यथार्थ जिसमें ‘गरीबी हटाओ’ गरीब को ही खत्म कर देने तथा ‘समाजवाद लाओ’ और कुछ नहीं महज महाजनी लूट का पर्याय है। इन कविताओं से गुजरते हुए बरबस गोरख पाण्डेय की मशहूर कविता ‘समाजवाद बबुआ धीरे धीरे आई......’ की याद आती है। वहीं, राजेन्द्र कुमार ‘यूरेका-यूरेका’ में कहते हैं - ‘समाजवाद आने वाला है.....’। यह कविता में टेक की तरह गहरे व्यंग्य के साथ बार बार आता है, और छल व छद्म के रहस्य से परदा उठाता हैं
‘रहस्य की बात है
सुनो, समाजवाद ने
मेरे देश के नक्शों को स्टोर कर रखा है
यह ऐसा समाजवाद है जो ‘मेरे हिस्से में से खाता है
मेरे हिस्से में से पहनता है
सांस लेता है मेरे हिस्से में की
खून और मांस लेता है मेरे हिस्से में से’।
अर्थात गरीब मेहनतकश की लूट पर ही वह जिन्दा है। इनसे कोई लगाव नहीं। इनके प्रति वह अपार घृणा-भाव से भरा है। देश भी उसके लिए निहित स्वार्थों के लिए इस्तेमाल की वस्तु, लूट का ही पर्याय है। वह उसके लिए नक्शा है जिसे तोड़ता, मरोड़ता है। ऐसा ‘जादुई सपना’ जगाता है जिसमें
‘मैं देखता हूं
जो कुछ उछाला था उसने
वह नक्शा नहीं, नारा बन गया है
गरीबी मिट गयी है
अमेरिका, रूस, जापान में वक्तव्य दे कर
लौटने वाला
एकदम अनजाना अनचीन्हा
अजनबी-अपना ‘हमारा’ बन गया है!’
कहते हैं इतिहास अपने को दोहराता है। ‘अच्छे दिनों’ के जुमले में क्या वही यथार्थ हमारे सामने एक भिन्न संदर्भ में प्रस्तुत नहीं है ? छल व छद्म से भरी पूंजी की सत्ता आज ‘सबका साथ, सबका विकास’ जैसे भ्रम को रचती, जो अपने मूल में असहिष्णुता व बर्बरता की मनुष्य विरोधी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की पोषक है, काॅरपोरेट-फासीवादी राज के रूप में क्या उपस्थित नहीं है? राजेन्द्र कुमार का कविता संसार इन्हीं सवालों से रू ब रू हैं। वे भारतीय जीवन के क्रूर यथार्थ और उसके अन्तर्विरोधों को उदघाटित करने वाले ऐसे कवि हैं जो
‘धुंधलाते हुए धन-चिन्ह की परवाह से
आहत न दीख
अर्थ सीखा
नया, ऋण को कर गुणित ऋण से
लिया पा- स्वयं को पुनर्परिभाषित होने का
तरीका!’
इस प्रक्रिया में कविता वहां पहुंचती है जहां ‘अब नहीं,-
अब और नहीं
उबरना है मुझको
उन तीनों के बीच से गुजरना है मुझको
न पीक हूं कि उगलते रहो मुझको
न मैं लीक हूं कि चलते रहो मुझ पर
कुचलते रहो मुझको।’
यह सब्र का टूटना है। इसी से बदलाव के बीज का अंकुरण होता है जो अनुभव और विचार का खाद-पानी लेकर बढ़ता है और समय के साथ परिपक्व होता जाता है। इसे राजेन्द्र कुमार के बाद की कविताअें खासतौर से ‘हर कोशिश है एक बगावत’ और ‘लोहा लक्कड़’ की कविताओं में देखा जा सकता है।
‘हर कोशिश है एक बगावत’ की कविताएं तीन खण्डों में विभक्त हैं। ये जहां काल खण्ड की दृष्टि से बड़ा विस्तार लिए हैं, वहीं विषय-वस्तु के लिहाज से इनमें बड़ा वैविध्य है। इस संग्रह में राजेन्द्र कुमार की 60 कविताएं संकलित हैं। इनमें कुछ छोटी, कुछ औसत तथा कुछ लंबी कविताएं हैं। इनमें कुछ कविताएं ऐसी हैं जो अलग से अन्तर्पाठ की मांग करती हैं। इस संग्रह में 1963-64 के दौर में लिखी ‘निराला का दृष्टि-दान’ और ‘मूंगफली के छिलके’ जैसी कविताएं हैं तो 2010-11 में रचित ‘केन किनारे केदार’, ‘काव्य-तिलकित भाल नागार्जुन’ और ‘मनमोहनी अदा का दावतनामा’ संग्रहित हैं। इस तरह करीब आधी सदी में फैली हुई इन कविताओं को राजेन्द्र कुमार के काव्य संसार का प्रतिनिधि काव्य संग्रह माना जा सकता है।
राजेन्द्र कुमार के इस संग्रह की कविताओं का चयन और उनका खण्ड विभाजन कवि शैलेय द्वारा किया गया है जो कविता की प्रकृति के अनुकूल है। वे रचना काल से अलग विषय को ध्यान में रखकर किया गया है। लेकिन लगता है कि अगर समय को देखा जाय तो राजेन्द्र कुमार की कविताएं हिन्दी कविता के तीन काल खण्डों का भी प्रतिनिधित्व करती हैं। आरम्भिक दौर की कविताओं में जीवन व समाज के अनुभव ज्यादा हैं। इनमें स्थितियों का चित्रण हैं या उन पर काव्यात्मक टिप्पणी है। यह कवि के बनने व रचने का दौर है। आगे इस अनुभव की सघनता बढ़ती है। उनमें गहराई आती है। कविता समाज के नये-नये विषयों से साक्षात्कार करती है। इस प्रक्रिया में कविता अपनी वैचारिकी भी निर्मित करती है। जहां ‘ऋण गुणा ऋण’ में यथास्थिति को सामने लाती है, उससे रू ब रू है, वहीं ‘हर कोशिश है एक बगावत’ उससे आगे बढ़कर बुनियादी बदलाव के विचारों से अपने को लैस करती है।
हम यहां 1963 में लिखी कविताओं की चर्चा करेंगे। उस दौर की एक कविता है ‘मूंगफली के छिलके’। यह समाज में बढ़ते आर्थिक, सामाजिक व सांस्कृतिक विभाजन को सामने लाती है। इस विभाजन का विस्तार बच्चों तक होता है जहां शहरी खाये पीये समाज के बच्चों के लिए ग्राम पिकनिक स्थल है, खेती से ले कर ग्रामीण जीवन-व्यापार उनके लिए उत्सुकता के केन्द्र बन गये हैं। ‘खजुहे कुत्ते’ उनके कैमरे में कैद उनके ड्रांईंग रुम की दीवालों पर पहुंच जाते हैं। यही यथार्थ है कि जिस तरह गन्ने की पेराई के बाद खोई तथा मूंगफली से दाना खाने के बाद उसके छिलके फेंक दिये जाते हैं या उन्हें जला दिया जाता है। समाज में बढ़ता विभाजन समाज के उस श्रमजीवी हिस्से का अपने लिए उपयोग तो कर रहा है लेकिन अन्ततः उनकी स्थिति उस खोई या मूंगफली के छिलके की तरह होती जाती है।
‘मूंगफली के छिलके’ का किसान, खेत जोतते और गन्ना को पेर कर उससे गुड़ बनाते भले कोल्हू का बैल हो गया हो लेकिन नवउदारवादी व्यवस्था के मौजूदा दौर में
‘कहां है वो खेत
कहां हैं वो बीज
कहां हैं वो फसलें’
जैसे प्रश्नों से जूझते किसान का इनसे निर्वासन उसका जिन्दगी से निर्वासन में तब्दील हो रहा है। राजेन्द्र कुमार की कविता ‘यह खुदकुशी नहीं, हत्या’ किसान आत्महत्या की पृष्ठभूमि और इस आत्महत्या के पीछे के कारणों को उदघाटित करती है। ‘खुदकुशी’ को हमेशा जीवन से पलायन माना जाता है। इसीलिए नवउदारवादी नीतियों के कर्ताधर्ता किसानों की आत्महत्या को उनकी मानसिक कमजोरी के रूप प्रचारित करते हैं। राजेन्द्र कुमार इस प्रचार के बरक्स कहते हैं कि जहां
‘अन्न पेट के लिए नहीं उनके यहां
उनके यहां
अन्न है रखने को गोदामों में’
और किसानों की ‘जगहें मुर्दाघरों में’, वहां यह आत्महत्या कैसे हो सकती है? ऐसे हिंसक व अमानवीय तंत्र में यह तो हत्या है।
इस संग्रह का एक खण्ड ‘कविता का सवाल’ शीर्षक से है। कविता का सवाल रोटी के सवाल से जुड़ा है। रोटी जिन्दगी की अनिवार्यता है अर्थात कविता जिन्दगी से जुड़ी है।
‘घड़ी मिलाने का सही वक्त तो वही था
जब उसने कहा था - एक कविता का सवाल है’ -
कविता, जिन्दगी और समय के बीच से गुजरती है और इनके बीच द्वन्द्वात्मक रिश्ता बनता है। कविता अपने खास समय में जीवन के जद्दोजहद व सवालों से रुबरु होती है। इसी प्रक्रिया में वह समय को रचती है। ‘कश्मीर: उन दिनों - इन दिनों’ ऐसी ही कविता है। कश्मीर ‘उन दिनों’ के सपने से ‘इन दिनों’ के यथार्थ की खुरदुरी जमीन पर खड़ा है या घायल पड़ा है।
‘मेरे सपनों में आ रहा है वह कश्मीर
जहां बचपन
सेब के दरख्तों को देख कर हुलसता है’
वह आज
‘करोड़ों की नींद में
डरावने सपनों की तरह आ रहा है’।
कश्मीर जिसकी जमीन, पहाड़, चारागाह, वादियां, झील, चिनार - सब बैरकों के हवाले है, हथियारों व बारूद की गंध से भर गया है। कश्मीर की सच्चाई इस रूप मे उभरती है:
‘यहां तो सड़कों के
जिस किसी मोड़ से गुजरता हूं’
नजर आते हैं बंकर
और उनमें झांकती हैं बंदूक की नलियां’
और
‘खुले में चलना छोड़
बंदूक की नलियों में जा रहा है श्रीनगर’।
कविता भय, डर, फौजी साये और दोहरे आतंक में जी रहे कश्मीर का कश्मीर से गायब हो जाने और कश्मीरियों के पलायन को सामने लाती है,
‘ये सिर्फ घाटी ही तो नहीं
यह बहुतों का घर भी तो है
कब लौटेंगे वे
जिनका घर है यह’
जैसा असहज व संवेदित कर देने वाला प्रश्न उठाती है। यह देश के ‘लोकतंत्र’ को प्रश्नांकित करती है। उसके खंडित चेहरे को सामने लाती है।
1990 के बाद के दौर में तीन बड़ी घटनाएं घटती है। ये हैं सोवियत समाजवादी व्यवस्था का विघटन, बाबरी मस्जिद का ध्वंस और भूमंडलीकरण व नवउदारवादी नीतियों के रास्ते देश का संचालन। जहां धर्म का राजनीतिकरण और राजनीति का साम्प्रदायिकीकरण होता है, वहीं ग्लोबल दुनिया के साथ समायोजन में देश जिस नवउदारवादी रास्ते पर आगे बढ़ता है, वह औपनिवेशिक दासता का नवीन संस्करण साबित होता है। इस पूरी परिघटना ने हमारे सामाजिक व सांस्कृतिक जीवन को किस तरह प्रभावित किया है, राजेन्द्र कुमार की कविताओं में इसका बखूबी दर्शन होता है। यहां आकर राजेन्द्र कुमार की कविताएं नया आयाम लेती हैं। उदाहरण के लिए ‘मनमोहनी अदा का दावतनामा’ है जिसमें न सिर्फ गहरा व्यंग्य है बल्कि इस कविता में वे अपना काव्य शिल्प भी नया गढ़ते हैं। इस कविता को पढ़ते हुए जे पी आंदोलन के दौरान लिखी नागार्जुन की कविताओं की बरबस याद हो आती है।
राजेन्द्र कुमार अपनी एक कविता में उनकी खबर लेते हैं जो अपने धर्म की श्रेष्ठता के लिए तर्क, बुद्धि व विवेक को दरकिनार कर नफरत फैलाते हैं तथा इंसान का लहू बहाकर धर्म ध्वजा फहराते हैं, कविता सवाल करती है:
‘इसका रंग भगवा हो चाहे हरा
इसका रंग लहू का रंग तो नहीं होता
फिर इसे रंगने के लिए
आ
इस कदर जरूरी क्यों हो जाता है
बहाना
इंसान का लहू!‘
और इस सच्चाई को सामने लाती है कि बाजार, संसद और अयोध्या के तार आपस में कहीं गहरे जुड़े हैं। वह कहती है:
‘किधर को जाता है यह रास्ता?
बैकुंठ को या बाजार को
संसद को
अयोध्या को या दिल्ली को?’
कविता आधुनिकता को परिभाषित करते हुए कहती है कि यह ऐसी ‘आधुनिकता’ है जो ‘आध्यात्मिकता’ में रंगी हुई है कि इसके द्वारा
‘इतनी अधिक फहरानी पड़ीं संस्कृति की पताकाएं
कि कपड़ा कम पड़ने लगे’।
इसकी वजह से क्या हुआ? देश, लोकतंत्र, आजादी, राष्ट्रप्रेम सब नंगा हुआ।
आज ‘प्रगति’, ‘उन्नति’ और ‘विकास’ के बड़े बड़े दावे किये जा रहे हैं। ये दावे नहीं, ‘उन्माद’ की संस्कृति है जहां असहमति और विरोध की गुंजाईश नहीं है। विरोध करने पर वही होगा जो विनायक सेन जैसों के साथ हुआ, जो दाभोलकर, कलबुर्गी, पानसरे व गौरी लंकेश के साथ हुआ या अर्बन नक्सल के नाम पर जारी है। राजेन्द्र कुमार इन्हें अपने सवालों की जद में लाते हैं:
‘नहीं बताते कि पहले यहां क्या था
जहां अब उधार का वैभव है
विदेशी पूंजी का बाजार है
नहीं बताते कि पहले यहां क्या था
जहां अब पसरता हुआ अमरीका है, जापान है’।
राजेन्द्र कुमार की कविताएं आज के यथार्थ को जिस रूप में निरूपित करती है, वह देश का अमेरीकीकरण है, नवऔपनिवेशिक दासता है। इसी की देन है -
‘स्त्री कुछ और स्त्री हुई
पुरुष कुछ और पुरुष
हिंदू कुछ और हिंदू हुए
मुसलमान कुछ और मुसलमान’
नहीं हुआ तो सिर्फ
आदमी ही नहीं हुआ कुछ और आदमी’।
राजेन्द्र कुमार की कविताएं इसी ‘कुछ और आदमी’ बनाने की कविता है। इसीलिए वह मनुष्य विरोधी शक्तियों से मनुष्य को बचाने के संघर्ष में शामिल होती है। नफरत और ‘प्यार में दिल’ तोड़ने वालों के विरुद्ध प्रेम का गीत रचती है:
‘जिएंगे-मरेंगे
सबमें व्यापेगी प्रेम की पीर
सांस लेंगे इन्हीं में
कहीं कोई मीरा
कहीं कोई कबीर...’।
कितनी गहरी आशा और विश्वास है जो इस रूप में अभिव्यक्त होता है:
‘हम हों, न हों
साबुत दिल के वारिस
हरदम रहेंगे दुनिया में!’
राजेन्द्र कुमार अपने इस संग्रह के अन्तिम खण्ड ‘कविता के किरदार’ में हमें अपने किरदारों से मुलाकात कराते हैं। यह बहादुरशाह ज़फ़र से शुरू होती है और अजन्मे भाव शिशु तक जाती है। ये ‘आजादी और गुलामी के बीच छिड़ी जंग’ के ऐसे किरदार हैं जिनकी यात्रा इतिहास से शुरू होती है और वर्तमान से होते हुए भविष्य तक जाती है। ‘हमारा लहू सिर्फ इतिहास के पन्नों पर/सूख चुका लहू नहीं है’ राजेन्द्र कुमार की कविताएं संघर्ष और सपने को जिलाए रखती है और कहती है
‘हमारे रक्त -कण
उमड़ कर किसी भी क्षण
ज्वार बन सकते हैं
और हम एक नया
जन उभार बन सकते हैं’।
यह रक्त कण उस रक्त बीज की तरह है जो ‘अदेखे भाव-शिशु मेरे अजन्मे’ की कल्पना का कारण है।
राजेन्द्र कुमार प्रश्न करते हैं ‘मानना होगा यही क्या.....पूर्ण होता ही नहीं कुछ भी सृजन में ?’ और ‘हर कोशिश है एक बगावत’ के रूप इसका उत्तर भी स्वयं देते हैं। जैसे मुक्तिबोध कहते हैं ‘नहीं कविता कभी खत्म नहीं होती’ की तरह कविता और सृजन का संघर्ष जारी रहता है। यह अकारण नहीं है कि राजेन्द्र कुमार की कविताओं से गुजरते हुए बरबस मुक्तिबोध याद आते हैं। मुक्तिबोध कहते हैं
‘कोशिश है
जीने की
जमीन में गड़ कर भी’।
मुक्तिबोध की कविता में विपरीतताओं के विरुद्ध जीने की जीजीविषा व संघर्ष है। राजेन्द्र कुमार की कविताओं में इसका विस्तार है। यहां ‘कोशिश’ अपने वर्ग चरित्र में अलग अर्थ और आयाम लिए है। आमतौर पर मनुष्य के अन्दर विविध किस्म की महत्वकांक्षाएं जन्म लेती और विकसित होती हैं। उसका मन इच्छाओं.आकांक्षाओं के सागर में गोते लगाता है और उसे पाने के लिए वह तमाम तरह की कोशिशें करता है, अवसरवादी समझौते करता है। इसमें उसे सफलता मिलती है। वह असफल भी होता है।
राजेन्द्र कुमार की ‘कोशिश’ इस कथित कोशिश से गुणात्मक रूप से भिन्न है। राजेन्द्र कुमार कहते हैं
‘कोशिश - हां, कोशिश ही तो कर सकता हूं’।
यह इस व्यवस्था के अन्दर ‘क्षण में लघु, क्षण में विराट’ होने के गुण से पूर्ण ‘महावीरों’ से अलग है। कवि का ‘लघुता’ से साक्षात्कार का भाव अत्यन्त सरल, सहज ही नहीं है बल्कि यह मध्यवर्गीय संस्कारों से सर्वहारा संस्कारों में रूपान्तरण का उसका कठिन आत्मसंघर्ष है। यहां कोई दंभ नहीं है। बल्कि यह उनकी पहचान व प्रतिष्ठा का संघर्ष है जिनकी प्रार्थनाएं अनसुनी, व्यथा अनकही, उमंगें अनदिखी और आंसू अनछलके रह गये। कविता का यह केन्द्रीय भाव है जो अपने को ‘समानधर्माओं’ से जोड़ता है जो लगातार ऐसी ही कोशिशों में लगे हैं। यह कोशिश बुनियादी बदलाव की है। इसमें निरन्तरता है तथा अपने निजी प्रयासों को सामूहिक प्रयासों में रूपांतरण करना है। यह कोशिश ‘चिड़िया’ की उस आंख की तरह है जिसके बारे में राजेन्द्र कुमार कहते हैं:
‘कोई भी आंख सिर्फ आंख नहीं होती
होती है पूरी की पूरी - एक दुनिया - भरी-पूरी....
कि सपने हर आंख की आत्मा होते हैं
कोई भी तीर
जिन्हें बंध नहीं सकता’।
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| कौशल किशोर |
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