चन्द्रभूषण का आलेख 'हिंदुत्व, के. एम. मुंशी, और ‘जय सोमनाथ’
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| कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी |
'हिंदुत्व, के. एम. मुंशी, और ‘जय सोमनाथ’
चन्द्रभूषण
कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी का गुजराती उपन्यास ‘जय सोमनाथ’ लंबे समय से हिंदी में भी उपलब्ध है। इसकी गिनती कुछ ऐसी गिनी-चुनी साहित्यिक रचनाओं में होती है, जो न केवल बड़ी सामाजिक उथल-पुथल का कारण बनीं बल्कि लंबे समय तक दिखाई पड़ने वाले किसी ठोस नतीजे में घनीभूत हो गईं। आजाद भारत में महात्मा गांधी के जिंदा रहते एक ही धार्मिक ध्वंसावशेष का पुनर्निर्माण शुरू हुआ, और वह था सौराष्ट्र का सोमनाथ मंदिर। गांधी जी इसे एक संदिग्ध अतीत-यात्रा और वर्तमान में सामाजिक विद्वेष पैदा करने वाला कार्य ही मानते थे लेकिन सरदार पटेल ने उन्हें सामाजिक सद्भाव पर कोई बुरा प्रभाव न पड़ने का आश्वासन दिया, साथ ही यह वचन भी दिया कि जीर्णोद्धार का काम पूरी तरह जन सहयोग से किया जाएगा, सरकार का एक पैसा भी इस पर खर्च नहीं होगा।
के. एम. मुंशी की भूमिका इस अभियान में ‘जय सोमनाथ’ और उससे पहले पाटण-त्रयी उपन्यास शृंखला लिखने की तो थी ही, जूनागढ़ रियासत के भारत का हिस्सा बन जाने के बाद वहां के दौरे पर गए कांग्रेस के एक शीर्ष प्रतिनिधिमंडल के सदस्य के रूप में उन्होंने कई सभाओं में सोमनाथ मंदिर को जड़ से बिल्कुल नया बनाने की बात भी कही थी। इस ब्यौरे से किसी को लग सकता है कि ‘जय सोमनाथ’ मध्य काल की पृष्ठभूमि पर हिंदुत्ववादी मिजाज का कोई राजनीतिक उपन्यास होगा। एक अर्थ में यह है भी, लेकिन ऐतिहासिक तथ्यों को दरकिनार करने वाले उतने मोटे अर्थों में हरगिज नहीं, जो अभी की मुख्यधारा वैचारिकी की पहचान बनते जा रहे हैं।
सोमनाथ मंदिर पर महमूद गजनवी का हमला और उसका सामना करने का एक वृहद साझा प्रयास इस उपन्यास की मूल कथावस्तु है, लेकिन गौर से देखने पर यह बात केवल पृष्ठभूमि तक सीमित लगती है। ज्यादा गहरी कहानी कुछ और है, जो पीछे, अलग ही पिच पर चलती है। सबसे बड़ी बात यह कि स्वतंत्रता आंदोलन के बहुत सारे प्रखर नेताओं की तरह के. एम. मुंशी भी बहुत पढ़े-लिखे और बड़े नजरिये वाले लेखक थे। इतिहास पर न केवल उनकी गहरी पकड़ थी, बल्कि एक बार उन्होंने भारतीय इतिहास कांग्रेस की अध्यक्षता भी की थी। किताब लिखते हुए अपनी तरफ से उन्होंने ऐतिहासिक तथ्यों के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं की है। बाद में उनके राजनीतिक नजरिये में एक बुनियादी बदलाव आया, जिस पर आगे बात होगी, लेकिन उनके लेखन को खुली दृष्टि से ही देखा जाना चाहिए।
दो पक्ष और कुछ दरारें
जय सोमनाथ’ के आमुख में ही के. एम. मुंशी ने दो ऐसी बातें कह दी हैं, जिन्हें कहने के लिए (साफ कहें तो सोमनाथ मंदिर पर महमूद गजनवी के हमले की सत्यता को ले कर संदेह जाहिर करने के लिए) संघ के बुद्धिजीवी आज भी रोमिला थापर के खिलाफ हरसंभव अवसर पर विषवमन करते रहते हैं। मुंशी जी साफ कहते हैं कि-
क. ‘भारतीय इतिहास में इस (सोमनाथ मंदिर पर महमूद गजनवी के) आक्रमण का कुछ भी उल्लेख नहीं है।’
और
ख. ‘हमारे उपलब्ध ऐतिहासिक आधार भीम देव (कथानायक) के राज्य काल को सदैव शृंखलित बताते हैं। विक्रमी संवत 1086 (सन 1028-29 ई.) के ताम्रपत्र के अनुसार भीम देव कच्छ पर राज्य करते थे और वि. सं 1088 (1030-31 ई.) में इनके मंत्री विमल ने आबू (पर्वत) पर एक बड़ा मंदिर बनवाया था। यदि आक्रमण 1082-83 (1025-26 ई.) में हुआ माना जाए तो 1088 की यह सत्ता और समृद्धि वाली बात कुछ अजीब-सी लगती है।’
ग. ‘सोमनाथ के आक्रमण का पहला ब्यौरेवार वर्णन महमूद के दो सौ वर्ष बाद लगभग 1230 ई. में इब्न असीर की ‘कामिलुत्तवारीख’ में मिलता है।’ तो क्या यह वर्णन ही मुंशी जी को ‘जय सोमनाथ’ लिखने के लिए काफी लगा?
नहीं, उनके पास इसके लिए एक और प्रकरण भी है, हालांकि वह उतना पक्का नहीं लगता।
घ. ‘मुस्लिम इतिहासकार फरिश्ता कहता है कि ‘नहरवाल (अनहिलवाड़) का राजा विरहमदेव (भीम देव) अजमेर के नरेश तथा अन्य राजाओं की सेनाओं को एकत्रित करके सुल्तान का रास्ता रोकने की भारी तैयारी कर रहा था, इसलिए उसने सिंध के मार्ग से मुलतान जाने का विचार किया। मार्ग में असह्य गर्मी और पानी के नितांत अभाव के कारण सेना का अधिकांश भाग पागल हो कर मर गया।’ तो भीम देव की इतनी बड़ी विजय का उल्लेख किसी प्रशस्ति में, द्वयाश्रय में, कीर्तिकौमुदी में या किसी दूसरे इतिहास में क्यों नहीं है?’
मुंशी जी की यह रचना कीर्तिकौमुदी तो नहीं है लेकिन उसके आस-पास इसे माना जा सकता है। महमूद की लौटती हुई सेना को हैरान-परेशान करने, उसे रास्ता बदल कर अत्यंत असुविधाजनक रास्ते से वापसी के लिए मजबूर कर देने को हम सीधे मुकाबले में उस पर विजय प्राप्त करना भले न कह सकें लेकिन यह पराक्रम भी कुछ घट कर नहीं है। बहरहाल, एक उपन्यास आप इतिहास समझने के लिए नहीं पढ़ते। ऐतिहासिक तथ्य साहित्यिक रचना के लिए सिर्फ ढांचे की भूमिका निभाते हैं। पुरातत्व से स्थापित तथ्यों की ऐसी-तैसी किए बगैर कोई कहानी उनके बीच से ही अपने लिए एक जिंदा स्पेस निकाल लेती हो तो, उसके प्रामाणिक अस्तित्व के लिए इतना काफी है।
महमूद गजनवी का जिक्र मुंशी जी के इस उपन्यास में ज्यादातर अफवाहों और किंवदंतियों की शक्ल में आता है। जिन गिने-चुने दृश्यों में वह प्रत्यक्ष दिखाई पड़ता है वहां लेखक ने उसके रणकौशल और समझदारी की तारीफ की है। पूरी किताब में उसकी एक ही जिद दिखाई गई है। यह कि उसे हर हाल में सोमनाथ को नष्ट करना है, क्योंकि उसकी नजर में वह बुतपरस्ती का, कुफ्र का केंद्र है। छोटी-मोटी लड़ाइयों में उसे उलझना नहीं है। वीर शत्रुपक्ष का ही क्यों न हो, खुल कर उसकी तारीफ उसे करनी है। गले पर खंजर रख देने वाले बैरी को भी आजाद छोड़ देना है।
दूसरी तरफ, भारतीय पक्ष में कुछ राजा बहुत संकीर्ण दिमाग के दिखाए गए हैं। गद्दारी का एक स्वतःस्फूर्त आध्यात्मिक तर्क उभरता दिखाया गया है और ‘भारत देश’ या ‘हिंदू धर्म’ जैसी बड़ी धारणाओं को हजार साल पुराने उस कथा समय पर बरबस थोपने की कोशिश भी नहीं की गई है। बावजूद इसके, गुजरातियों के एकजुट सैन्य प्रतिरोध को रेखांकित करना इस उपन्यास का एक बड़ा उद्देश्य है, जो यहां सिद्ध भी होता है। ठेठ रेतीले रेगिस्तान की रातों, सुबहों और दुपहरियों के इतने सुंदर दृश्य इस उपन्यास में दिखते हैं, वहां उठने वाली आंधियों का ऐसा जानलेवा सम्मोहन कि जिसे कहानी में कोई दिलचस्पी न हो, वह सिर्फ इनके लिए भी इसको पढ़ सकता है।
खैर, बाकी ब्यौरों, युद्ध की तैयारियों और लड़ाई के दृश्यों में मैं नहीं जाता। 1937 में, यानी कोई नब्बे साल पहले पूरी कर ली गई और न जाने कब से प्रशंसित हो रही किताब पर अभी यह सब लिखने का कोई औचित्य भी नहीं है। तो सीधे उस कहानी पर आते हैं, जिसका जिक्र ऊपर आया है और एक प्रकट मुहावरे के तहत पढ़ी जाने वाली युद्ध रचना में जिस पर कम ध्यान जाना सहज-स्वाभाविक है। यह कहानी है बचपन से जवानी में प्रवेश कर रही देवदासी चौला की, जो उपन्यास में आने वाला पहला इंसानी चरित्र है। जिसकी अजीब सी बेचैनियों का वर्णन करते हुए किताब शुरू होती है और जिसकी अप्रत्याशित मृत्यु के साथ ही यह समाप्त हो जाती है।
देवदासियां
बड़े मंदिरों के आस-पास एक छोटी बस्ती देवदासियों की हुआ करती थी। जिंदा रहने के लिए पूरी तरह मंदिर पर ही निर्भर इन स्त्रियों के आधिकारिक पति मंदिर के आराध्य देव ही हुआ करते थे लेकिन अघोषित रूप से एक या एकाधिक पति भी होते ही थे। उनके बच्चे होते थे जो शायद देवता के ही बच्चे माने जाते रहे हों। इनमें भी लड़कियों का जीवन पथ पूर्वनिर्धारित होता रहा होगा लेकिन लड़कों का क्या होता होगा, इस पर कम बातें मिलती हैं। एक देवदासी पर केंद्रित उपन्यास होने के बावजूद ‘जय सोमनाथ’ में भी इस पर कोई बात नहीं है।
ये देवदासियां आती कहां से थीं? सिर्फ देवदासी माताओं से जन्मती थीं या समाज से लगातार इनकी नई कुमुक भी आती रहती थी, इस बारे में हिंदी कथाकार शिव प्रसाद सिंह ने अपने उपन्यास ‘नीला चांद’ (पृ. 453) में ‘पद्म पुराण’ से एक श्लोक उद्धृत कर रखा है। संभवतः नवें अध्याय का 52वां श्लोक (या 52वें अध्याय का नवां)। इसमें बताया गया है कि धैर्य और कठिन श्रम से अनेक कन्याओं को खरीद कर मंदिर के देवता को समर्पित करने वाला व्यक्ति महाधनाढ्य होता है, राजा बनता है और मरने के बाद स्वर्ग की प्राप्ति करता है-
‘क्रीता देवाय दातव्या धीरेणाक्लिष्टकर्मणा
कल्पकालभवेत्स्वर्गो नृपो वासो महाधनी।’
(पद्मपुराण, 52/9)
पश्चिमी और मध्य भारत के पुराने राजवंशों के बारे में ज्यादातर जानकारियां ग्यारहवीं से चौदहवीं सदी ईसवी के बीच हुए दो जैन आचार्यों हेमचंद्र (1088-1172) और मेरुतुंग (जन्म-मृत्यु का समय अस्पष्ट है लेकिन उनके ग्रंथों में दर्ज रचना काल 1306 से 1363 ई. तक का है) के ग्रंथों ‘शब्दानुशासन’ और ‘प्रबंधचिंतामणि’ से प्राप्त होती है। ऊपर किशोर वय वाली जिस देवदासी चौला का जिक्र आया है, वह एक ऐतिहासिक चरित्र है और उसका जिक्र मेरुतुंग की प्रबंधचिंतामणि के ‘कुमारपाल प्रबंध’ में इस प्रकार आता है-
‘श्रीमदणहिलपुरपत्तने बृहति भीमदेवे साम्राज्यं पालयति श्री भीमेश्वरस्य पूरे चउलादेवी नाम्नी परायांगना…तामंतःपुरेण्यधात्।’
(उद्धरण के. एम. मुंशी का)
वाक्य का हिंदी अर्थ (मेरी तरफ से) इस प्रकार है- ‘महान अणहिलपुरपत्तन (शहर) में जब श्री भीम देव साम्राज्य का पालन कर रहे थे, तब श्री भीमेश्वर के नगर में चउला देवी नाम की एक परायांगना (विवाहिता अथवा किसी अन्य पुरुष से संबंधित स्त्री) थी। राजा उसको अंतःपुर में ले गए।’ यह काम भीम देव ने चउला से विवाह कर के किया, या किसी और तरीके से, ऐसा कोई तथ्य इस वाक्य में तो क्या, पूरे पाठ में ही मौजूद नहीं है। जो भी हो, यहां मौजूद धुंधलके का मुंशी जी ने कैसा रचनात्मक उपयोग किया है, यह जानने के लिए हम इतिहास से सीधे उपन्यास में चलते हैं।
एक स्त्री और चार पुरुष
‘जय सोमनाथ’ की शुरुआत सोमनाथ मंदिर के सौंदर्य वर्णन के साथ ही उसकी पौराणिक महत्ता और समाज में उसकी जगह बताने से होती है। पाटण नाम के दो शहर हैं। अनहिलवाड़-पाटण चालुक्य सोलंकी राजा भीम देव की राजधानी है जबकि प्रभास-पाटण उससे ठीक-ठाक दूरी पर स्थित एक गढ़ है, जहां सोमनाथ मंदिर है और उसी के इर्द-गिर्द यह शहर बसा हुआ है। मंदिर के बारे में बताया गया है कि यह शैव धर्म के पाशुपत मत का केंद्र है और इसी के परिसर में देवी त्रिपुरसुंदरी का एक मंदिर भी बना हुआ है। त्रिपुरसुंदरी को पार्वती का एक नाम भी समझा जाता है, हालांकि ये शाक्त परंपरा की देवी हैं। शैव और शाक्त परंपराओं में टकराव का जिक्र मुंशी जी के उपन्यास में भी आता है, हालांकि इसकी व्याख्या वे विचारों और प्रथाओं से ज्यादा व्यक्तिगत प्रवृत्तियों के द्वंद्व की तरह करते हैं।
तो उपन्यास का पहला दिन ही सोमनाथ मंदिर में शिवलिंग के सामने देवदासी चौला के प्रथम नृत्य प्रदर्शन का है। मंदिर में हर दिन होने वाला नृत्य देवता की उपासना का ही एक हिस्सा है, लेकिन चौदह-पंद्रह साल की लड़की चौला के लिए यह एक सपना पूरा होने जैसा है। उसकी मां मंदिर की प्रधान देवदासी है और सोमनाथ के मुख्य पुजारी, पाशुपत पंथ के प्रधान ‘गंग सर्वज्ञ’ के साथ उसका रिश्ता अघोषित पति-पत्नी जैसा है। देवदासियों का घोषित पति मंदिर का देवता ही हुआ करता है, यह बात ऊपर कही जा चुकी है। लड़की चौला प्रधान पुजारी और प्रधान देवदासी के रिश्ते से ही उपजी है, लेकिन उसकी उम्र ऐसी है कि शिव को ही अपना पिता, प्रेमी, पति और सर्वस्व मानने में उसे कोई समस्या नहीं होती। न जाने कब से वह खुद को मंदिर में अधिष्ठित शिवलिंग के ही प्रति समर्पित मानती आ रही है। उसके सामने उसका पहला नृत्य जीवन के अकेले इम्तहान का पर्चा लिखने जितना मुश्किल है।
इस इम्तहान में तो वह अव्वल दर्जे से पास हो जाती है, लेकिन वहीं वह चार बिल्कुल अलग मिजाज के पुरुषों की नजर में चढ़ जाती है। नतीजा यह कि अगले कुछ घंटे ही उसकी छोटी सी जिंदगी का रास्ता तैयार कर देते हैं। इन पुरुषों में एक हैं मंदिर में नंबर 2 पोजिशन संभालने वाले आचार्य शिवराशि, जो गंग सर्वज्ञ के पट्टशिष्य और उत्तराधिकारी भी हैं। उन्हें लगता है, गुरु की जगह उन्हें बाद में मिलेगी लेकिन उनकी इस अघोषित बेटी पर अपना दावा उन्हें अभी से पक्का कर लेना चाहिए। दूसरे हैं पाटण के राजा भीम देव, जो एक विचित्र से घटनाक्रम में उसे अपनी दूसरी या तीसरी रानी बनाने की दिशा में बढ़ते हैं। तीसरा 20 साल का एक लड़का, सुदूर रेगिस्तान की घोघागढ़ रियासत का राजकुमार सामंत चौहान, जो कभी न कभी लड़की का प्रेम प्राप्त करने का सपना देखता है, लेकिन एक सुबह उसको किसी और पुरुष की अंकशायिनी पा कर अचानक अपनी बहन घोषित कर देता है।
इस सूची में चौथा व्यक्ति है कंक नाम का एक कालमुखपंथी साधू, जिसने 108 अनिंद्य सुंदरियों का गला काट कर देवी को प्रसन्न करने का प्रण ले रखा है, और चौला में अपना संकल्प पूरा होने की संभावना उसे बिल्कुल साफ दिख रही है। यहां अपना एक ऐतराज जताना मुझे जरूरी लगता है। इतिहास में मुंशी जी की गति बहुत अच्छी थी, लेकिन भयंकर से लगते शब्द ‘कालमुख’ ने उन्हें भरमा लिया। ‘जय सोमनाथ’ में इस चरित्र का उन्होंने डरावना चित्रण किया है। मुंह पर काला रंग पोते एक ऐसा व्यक्ति, जिसका ऊपरी होंठ कटा हुआ है और दांतों के ऊपर सीधे नाक के छेद दिखाई पड़ रहे हैं! जो एक सुंदर लड़की देख कर केवल देवी को उसकी बलि चढ़ा देने के बारे में ही सोच पाता है!
लुप्त पंथों का खलनायकीकरण
कुछ-कुछ इसी तरह का चित्रण शिवप्रसाद सिंह ने ‘नीला चांद’ में एक वज्रयानी का किया है। चुराए हुए घोड़े पर एक राजकुमारी को उसके घर से उठा कर ले जाता हुआ एक अधनंगा मुस्टंडा, जो दूर से ही शराब, पसीने और न जाने किन-किन अग्राह्य चीजों की बास मार रहा है! जो अपना दायां कंधा साफ काट दिए जाने के बावजूद लड़की को किसी भी हाल में अपनी वज्रयोगिनी बनाने पर अड़ा हुआ है! दोनों मामलों में एक ही बात साझा है कि शैव कालमुख और बौद्ध वज्रयानी, दोनों ही समुदाय भारत से बहुत पहले मिट चुके हैं। उनके बारे में कोई कुछ भी कहे, किसी की आस्था आहत नहीं होने वाली। वरना ऐसे वर्णनों को वाजिब बताने वाला कोई तथ्य दोनों ही लेखकों के पास नहीं है।
वज्रयानियों के बारे में कहीं अलग से बात होगी। फिलहाल तो इतना ही कि दलाई लामा और भारत में रह रहे लगभग सारे ही तिब्बती वज्रयानी हैं। रही बात कालमुख की तो नाम के अलावा उन्हें बुरा मानने की अकेली वजह रामानुजाचार्य के कुछ वाक्य हैं, जहां उन्होंने नवीं से 14वीं सदी ईसवी तक मौजूद इस शैव संप्रदाय को खोपड़ियों में डाल कर भक्ष्य-अभक्ष्य कुछ भी खा लेने वाला, सुरा-सुंदरी का सेवन करने वाला, भय पैदा करने वाला बताया है।
इस वर्णन से ऐसा लगता है कि ईसा की 11वीं-12वीं सदी में हुए विशिष्टाद्वैतवादी वैष्णव आचार्य रामानुज ने कालमुख और कापालिक मतों में घालमेल कर दिया है। इन दोनों समुदायों में शैव आस्था को छोड़ कर कुछ भी साझा नहीं था, यह बात पुराने शोधों से भी स्पष्ट थी लेकिन ब्रिटिश-अमेरिकी इतिहासकार डेविड नील लॉरेंजेन ने अपने लंबे शोध से इसमें नए पहलू जोड़े हैं। 1991 में प्रकाशित अपनी किताब ‘द कापालिकाज ऐंड कालामुखाज : द लॉस्ट शैवाइट सेक्ट्स’ में कालमुखों का सही नाम उन्होंने काल + आमुख = कालामुख बताया है। मृत्यु का, या समय का सामना करने वाला, सदा उसके सामने खड़ा रहने वाला संप्रदाय। कर्नाटक में इस पंथ की स्पष्ट पहचान वाले मठ और मंदिर इतने ज्यादा मिले हैं और लिंगायतों के साथ उनकी निरंतरता इतनी स्पष्ट है कि लॉरेंजेन बेहिचक इस नतीजे पर पहुंचते हैं- ‘इस संप्रदाय का खलनायकीकरण रामानुजाचार्य ने शायद वैष्णवों की खुन्नस निकालने के लिए किया हो।’
खैर, चौला की कहानी पर लौटते हैं। जिस दिन अपने सौभाग्य से और इन चारों पुरुषों द्वारा भी सुख और दुख देने वाली बहुत सारी घटनाएं चौला के साथ घटित होती हैं, वही दिन पाटण साम्राज्य में यह सूचना पहुंचने का भी है कि गजनी का अमीर यामीनुद्दौला महमूद सोमनाथ विजय का इरादा बांध कर बहुत बड़ी फौज के साथ मुल्तान पहुंच चुका है और एक, या ज्यादा से ज्यादा दो महीने में वह सिर पर होगा। ध्यान रहे, महमूद का भारत पर यह लगभग आखिरी बड़ा धावा है। किसी स्थायी महामारी की तरह पिछले पचीस से ज्यादा वर्षों से वह कभी सिंध, कभी कन्नौज तो कभी कहीं और के धावे मारता आ रहा है। चौंकने वाली कोई बात इस हमले से नहीं जुड़ी है और मौत जैसी एक निश्चितता इसमें शामिल है कि अकेले दम पर या कई देसी राज्यों को मिला कर भी उसे परास्त नहीं किया जा सकता।
आमने-सामने
आगे रेगिस्तान की कुछ रोंगटे खड़े कर देने वाली यात्राओं और अलग-अलग तरह के कुछ युद्धों के वर्णन हैं। यात्रा वर्णनों की प्रशंसा ऊपर की जा चुकी है, युद्धों को करीब से देखने के लिए आपको किताब पढ़नी पड़ेगी। गजनवी को रोकने और भटकाने की जितनी कोशिशें की जा सकती थीं, की जा चुकी हैं। भीम देव की राजधानी अनहिलवाड़ पाटण है, लेकिन समुद्र को अपने लिए मददगार मानते हुए अंतिम रूप से हमलावर का सामना प्रभास पाटण में ही करने का फैसला वे लेते हैं। गजनवी की सेना बहुत बड़ी है और उसका सैन्य कौशल भी बेहतर है। लड़ाई का उद्देश्य भी उसे पराजित करने से ज्यादा अधिक से अधिक समय तक गढ़ के सामने उसे रोके रखने और अपने समर्थकों द्वारा पीछे से उसे परेशान करने का ही है, हालांकि उपन्यास में इस पर अलग से ज्यादा बात नहीं की गई है।
आम नागरिकों को नुकसान से बचाने के लिए प्रभास पाटण में रहने वालों को समुद्र के रास्ते किसी और शहर भेजा जा चुका है लेकिन सोमनाथ के पुजारियों का दल, बाकी सारे साधू और बिल्कुल अड़ जाने पर चौला और उसकी मां नगर में ही रह जाते हैं। पीछे के किस्से से सिर्फ इतना कि भीम देव ने कंक कालमुख से चौला की जान बचाई है। लड़की की उम्र एक त्राता पुरुष के प्रति मुग्ध हो जाने की हो चुकी है, लेकिन यह मुलाकात घड़ी भर से ज्यादा की नहीं थी। यह आदमी उसके देश का राजा है, यह सूचना उसके आकर्षण को और बढ़ाने वाली सिद्ध हुई। लेकिन जब उसने धनुर्धर भीम देव को किले की प्राचीर से भीषण युद्ध करते देखा तो उसका मन मिथकों के संसार में चला गया। महमूद गजनवी उसके लिए त्रिपुर और भीम देव त्रिपुरारि हो गए। शिव से उसका जनम का रिश्ता संपूर्ण हुआ।
‘जय सोमनाथ’ के कोई तीस बरस बाद हजारी प्रसाद द्विवेदी ने भी बड़ा विद्रोह संगठित करने में जुटे एक पराक्रमी राजा और लंबे सम्मोहन में जा चुकी उसकी सर्वांग सुंदर रानी के इर्दगिर्द ‘चारु चंद्रलेख’ नाम का उपन्यास लिखा, हालांकि इस रचना का कथा-समय ‘जय सोमनाथ’ के दो सौ साल बाद का, मोहम्मद गोरी के हमले के कुछ समय बाद भारत में कायम गुलामवंशी इल्तुतमिश के राज का है। दोनों स्त्री पात्रों के सम्मोहन का स्वरूप जरूर अलग है। द्विवेदी जी के यहां ऐसा एक नाथपंथी सिद्ध के प्रभाव में हुआ है, जबकि मुंशी जी के यहां भीतर से ही उपजा है।
बहरहाल, प्रभास पाटण के किले पर दोनों पक्षों की लगातार बदलती रणनीतियों के बीच दिन भर युद्ध चलता है और रात में जितना भी समय मिलता है, चौला और भीमदेव का प्रगल्भ प्रेम चलता है। युद्ध और प्रेम, दोनों का अंजाम क्या होगा, इसकी ज्यादा फिक्र करने में किसी को कोई फायदा नहीं दिखता। खैर, इसके जरा पहले ही एक नया सियापा यह देखने में आता है कि गंग सर्वज्ञ का उत्तराधिकारी, सोमनाथ मंदिर का पुजारी नंबर 2, शिवराशि नाम का आचार्य चौला में त्रिपुरसुंदरी के दर्शन करने लगता है। त्रिपुरसुंदरी शाक्त तंत्र की देवी हैं और उनकी पूजा में यौन प्रतीकों की बड़ी भूमिका है। कुछ खास तिथियों पर होने वाली उनकी बड़ी अर्चना में जिस स्त्री के सिर वे आ जाती हैं, पूजा के सारे विधि-विधान उसी पर आजमाए जाते हैं। संकेत है कि प्रसादस्वरूप वह पुजारी को मैथुन-संगी भी बनाती है।
सोमनाथ और त्रिपुरसुंदरी
कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी की खासियत है कि अपने जीवन भर के रचनाकर्म और राजनीति के केंद्र में जिस सोमनाथ मंदिर को वे रखते रहे, उसी के परिसर में ऐसे पूजा विधान के वर्णन और उससे जुड़ी मानसिकता के रेखांकन में वे न तो कहीं स्खलित होते हैं, न ही उसके बारे में बताते हुए कोई अतिशय कड़ा रवैया अपनाते हैं। पाशुपत पंथ के साथ जुड़ी ऐसी शाक्त रीति-नीति अटपटी जरूर है लेकिन दोनों पंथों के बीच सदियों लंबा संश्लेषण जैसे कश्मीर में चला, कुछ हद तक असम और बंगाल में भी यह दिखा, वैसा ही गुजरात में भी हुआ हो सकता है।
लेकिन पुजारी नं. 2 शिवराशि के मिजाज में हो रहे रासायनिक परिवर्तन में आस्थाओं के टकराव या उनमें मौजूद किसी किस्म के दोहरेपन की कोई भूमिका नहीं है। उनकी आस्था चाहे जैसी भी हो, उसकी जड़ में ही एक खोट आ गई है। इसमें वासना का घालमेल हो चुका है और इस बात को वे अंत-अंत तक स्वीकार नहीं करते।
गजनवी की फौजों के प्रभास गढ़ पर लगने से थोड़ा ही पहले देवी महोत्सव की सुबह-सुबह उन्हें पता चलता है कि चौला कुछ सरशामी की हालत में है। खुद पर त्रिपुरसुंदरी की सवारी आने की बात वयस्क आयुवर्ग की एक अन्य देवदासी भी लगातार कह रही है और इसे साबित करने में वह जी-जान से जुटी है। लेकिन शिवराशि उसे पाखंडी घोषित करते हैं और शाक्त रुझान वाले बाकी पुजारियों के सामने न केवल इस बात पर अड़ जाते हैं कि देवी तो केवल चौला पर आई हुई हैं, बल्कि अपने समर्थकों को ले कर चौला के घर में घुस जाते हैं और उसकी मां के विरोध को दरकिनार करते हुए उसको घर में ही बंद कर के चौला को देवी के पूजास्थल पर उठा लाते हैं।
अजीब बात है कि चौला किसी मजबूरी में नहीं, बड़े उत्साह से उनके साथ जाती है। यह प्रकरण देखने लायक है। ‘मंदिर के वृद्ध पुजारी ने हर तीन महीने के बाद भिन्न-भिन्न स्त्रियों में त्रिपुरसुंदरी को उतरते देखा था। उसके लिए यह नया अनुभव नहीं था। परंतु आज उसके भी होश-हवास जाते रहे।… चौला आई मंदिर में- दौड़ती। अधीर नयनों से उसने शिवराशि को बीच में खड़ा देखा, ‘शिवराशि, मेरे नाथ कहां हैं!’ ‘ये रहे’, शिवराशि ने दोनों भुजाएं फैला कर बताया। परंतु चौला में इस संकेत को समझने की शक्ति न थी। उसने शिवराशि को दूर हटाया और दौड़ती हुई गर्भद्वार में पहुंची, ‘मेरे नाथ, मैं आ गई। यह आई! यह आई!’ और वह मंदिर के शिवलिंग से लिपट गई तथा मनमाने ढंग से प्यार करने लगी। पीछे खड़े नर-नारी गर्भद्वार में से इस अद्भुत प्रणय को अत्यंत आदर से देख रहे थे।’
भितरघात की दलील
किसी संयोगवश गंग सर्वज्ञ का चौला के घर पहुंचना, वहां बंद दरवाजे के भीतर से चीखती-चिल्लाती उसकी मां से शिवराशि द्वारा चौला को उठा लिए जाने की सूचना प्राप्त होना और ऐन मौके पर उनका हर तरफ से बंद मंदिर में चल रहे त्रिपुरसुंदरी के गुप्त पूजा अनुष्ठान में प्रवेश पा लेना। उनके मानसिक द्वंद्व का चित्र मुंशी जी इन शब्दों में खींचते हैं- ‘गंग सर्वज्ञ की स्वस्थता क्षण भर को जाती रही। उनकी दृष्टि अनेक वर्षों के तप से विशुद्ध हो गई थी। जब वह छोटे थे तभी से उनको विश्वास हो गया था कि त्रिपुरसुंदरी की वाममार्गीय विधियों में अत्याचार और अधमता का अंश है। … पूर्ण इच्छा के बिना कोई इसमें दीक्षा न ले, दीक्षित हुए बिना इसे कोई देख न सके, स्वयं उनके या शिवराशि के बिना कोई इसका उत्सव न मना सके- इन नियमों को उन्होंने पहले ही से लागू कर दिया था। … चौला के विषय में उन्होंने यह दृढ़ निश्चय कर लिया था कि वे इस निर्दोष बालिका को वाममार्गीय दीक्षा नहीं दिलाएंगे।’
इस प्रकरण का अंत गंग सर्वज्ञ द्वारा चौला को मुक्त कराने, अपने साथ हिंसा पर उतारू और शिवराशि और अन्य साधुओं को फटकार कर पूजा बंद कराने और त्रिपुरसुंदरी के मंदिर को भी अस्थायी रूप में बंद करा देने में होता है, लेकिन यह सब कर के वे अपने लिए शत्रुओं का एक जमावड़ा खड़ा कर लेते हैं। यह गुट उन्हें अपनी आस्था के विरोधी एक दुष्चरित्र तानाशाह की तरह देखने लगता है और यह राय बना लेता है कि इस पाप की सजा गंग सर्वज्ञ के साथ-साथ प्रभास पाटण को भी मिलेगी। गजनवी का घेरा जब गढ़ पर पड़ता है तो शिवराशि के पीछे-पीछे इस साधू-गिरोह को भी लगता है कि उनकी बात सच होने जा रही है। तभी एक रात शिवराशि चौला को भीम देव के साथ प्रणय में जाते देखता है और ‘त्रिपुरसुंदरी को दूषित करने वाले’ राजा के विनाश को अपना परम कर्तव्य मान लेता है।
किस्से में एक छोटा सा मोड़ घोघागढ़ के राजकुमार सामंत चौहान द्वारा अपना कुल-खानदान खो कर किसी प्रेत की तरह पाटण वापस लौटने, लड़ाई के बड़े दायरे को भांप कर उसमें रणनीतिक लोच के साथ शामिल होने और चौला को एक बार देख लेने की लालसा लिए प्रभास गढ़ लौटने के रूप में आता है। एक सुबह वह भीमसेन से कुछ मंत्रणा करने उनके डेरे पर जाता है और वहां चौला को उनके साथ देख लेता है। उसके लिए यह दो-चार महीने में ही दूसरी बार दुनिया बदल जाने जैसा है। एक बार अपने परिवार और राज्य का विनाश, दूसरी बार प्रेम का। लेकिन इस उथल-पुथल ने उसे भीतर से इतना पका दिया है कि वह किसी धक्के वाली प्रतिक्रिया नहीं देता। चौला को अपनी बहन बताता है और राजा को पांच प्रतिष्ठित लोगों के सामने तुरंत उससे विवाह कर लेने के लिए विवश कर देता है।
हार्ड लैंडिंग
उपन्यास में शिवराशि और उसके गिरोह की गद्दारी से ही प्रभास गढ़ में गजनवी की फौजों का प्रवेश और पाटण को पराजित होते दिखाया गया है। राजा खुद किले के भीतर की लड़ाई में घायल हो कर मृतप्राय पड़ा है। गंग सर्वज्ञ महज दो-चार दिनों की विवाहिता चौला को उसके साथ सती करने के लिए चिता भी चुनवा चुके हैं। लेकिन तभी उन्हें गढ़ से निकलने का एक गुप्त रास्ता मिल जाता है और राजा को उठा कर चार-पांच लोगों के साथ वे किसी सुरक्षित जगह निकल जाते हैं। वहां राजा भीम देव को किसी तरह बचा लिया जाता है। गजनवी ने पाटण को जीत तो लिया है, लेकिन वहां ठहरना उसके लिए घाटे का सौदा बन जाता है। पीछे से गुजरातियों के हमले झेलता हुआ एक मुश्किल रास्ते से वह वापस लौट जाता है और उसकी अजेय फौजों को भगा देने का श्रेय भीम देव के हिस्से आता है।
यहां से आगे का उपन्यास चौला के लिए एक किस्म की हार्ड-लैंडिंग का है। छुटपन से ही वह खुद को शिव की प्रेमिका मानती आई थी। शिव की युद्धरत छवि को ही उसने भीम देव पर आरोपित कर दिया था और मानने लगी थी कि उनकी पत्नी बन कर उसका प्रेम, भक्ति और कला-कौशल अपनी मंजिल हासिल कर चुका है। लेकिन यह बमुश्किल पंद्रह-सोलह की एक लड़की की सोच थी, जो कुछ समय के लिए भीतर और बाहर से त्रिपुरसुंदरी बन गई थी। यहां से आगे एक गर्भवती स्त्री के रूप में वह अपने शरीर में हो रहे परिवर्तन देखती है और भीम देव को कूटनीतिक स्थिरता वाले एक राजनीतिज्ञ के रूप में परिपक्व होता हुआ पाती है।
यह सब उसकी नजर में एक किस्म का प्रदूषण है। जिस दुनिया में वह जीती थी, वह सदा के लिए उजड़ चुकी है। दुनियादारी उसके लिए दुःस्वप्न सरीखी है, जिसका अंत नवनिर्मित प्रभास गढ़ में राजाओं की सभा के बीच नए सिरे से बनाए गए शिवलिंग के सामने उसके उन्मादी नृत्य के बाद लिंग पर ही सिर पटक कर हुई उसकी मृत्यु में होता है।
मुंशी जी की विचारयात्रा
इस सार-संक्षेप से एक बात तो जाहिर है कि कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी की रचना दृष्टि में ‘विदेशी आक्रमणों से घिरे हिंदू भारत’ की विचारधारा भले ही एक केंद्रीय तत्व की तरह मौजूद हो, लेकिन अपने लेखन में वे आत्मा के अन्वेषण वाली शर्त की कहीं से भी अनदेखी नहीं करते। वे अरविंद घोष (श्री अरविंदो) के शिष्य थे। एक समय सशस्त्र क्रांति से भी उनका कुछ जुड़ाव हुआ करता था। उनकी राजनीतिक विचारधारा हिंदुत्व और धर्मनिरपेक्षता के बीच आवाजाही करती रही, लेकिन उनके लेखन में इसकी उपस्थिति का सरलीकरण नहीं किया जा सकता।
उम्र में वे जवाहर लाल नेहरू से दो साल बड़े और डॉ. राधाकृष्णन से एक साल छोटे थे, लेकिन अपनी साहित्यिक कृतियों और 'सोमनाथ उद्धार' को ले कर चलाए गए धार्मिक-राजनीतिक आंदोलन के बल पर तत्कालीन भारतीय मध्य वर्ग के मन में उनका मुकाम बहुत ऊंचा हो गया था। 1920 के दशक में उनकी राजनीति चितरंजन दास और मोतीलाल नेहरू की स्वराज पार्टी से शुरू हुई थी। नमक सत्याग्रह और दांडी यात्रा के वक्त वे गांधी के अनुयायी बन कर कांग्रेस में आए। लेकिन तीस दशक के अंत में मुस्लिम लीग जब पाकिस्तान की मांग को लेकर डट गई तो इसके जवाब में उन्होंने अहिंसा का दामन छोड़ कर ‘अखंड हिंदुस्थान’ के लिए गृहयुद्ध की हद तक जाने की बात भी कही।
नतीजा यह हुआ कि गांधी जी ने उन्हें कांग्रेस पार्टी छोड़ देने की सलाह दी, जो उन्होंने तुरंत मान ली। फिर 1946 में भारत का स्वतंत्र होना तय जान कर गांधी के ही बुलावे पर वे कांग्रेस में लौटे, संविधान सभा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, उत्तर प्रदेश के पहले राज्यपाल बने, लेकिन अपना यह कार्यकाल समाप्त होते ही दोबारा अखंड हिंदुस्थान आंदोलन की शुरुआत कर दी। उनकी इस टेढ़ी-मेढ़ी राजनीतिक-वैचारिक यात्रा का समापन विश्व हिंदू परिषद की स्थापना करने और फिर बीजेपी के पूर्ववर्ती दल जनसंघ की सदस्यता ग्रहण करने में हुआ। अभी, मोदी युग में हिंदुत्व विचारधारा की जो शक्ल हमारे सामने है, के. एम. मुंशी जैसे रचनाकारों के लिए उसमें भला क्या जगह हो सकती है?
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| चन्द्रभूषण |
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