सूरज पालीवाल का आलेख 'मजदूर आंदोलनों के संघर्ष और जिजीविषा की गाथा'
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| इसराइल |
एक दौर था जब भारत तेजी से औद्योगीकरण की राह पर आगे बढ़ रहा था। पश्चिम बंगाल में कई कल कारखाने उत्पादन की प्रक्रिया से जुड़े हुए थे और लाखों मजदूरों की रोजी रोटी इन कारखानों से जुड़ी हुई थी। कारखाने के मजदूरों के जीवन और उनकी समस्याओं को ले कर इसराइल, शेखर जोशी और सतीश जमाली जैसे कथाकारों ने कई महत्त्वपूर्ण कहानियां लिखीं। इसराइल खुद इन कारखानों से जुड़े हुए थे और मजदूरों के दुःख दर्द से अच्छी तरह वाकिफ थे। यही वजह है कि उनकी कहानियों में गरीबी और अभावों का जो मार्मिक और प्रामाणिक अनुभव दर्ज किया गया है, वह दूसरी जगह कम ही दिखाई पड़ता है। मजदूर अपने हको हुकूक के लिए लड़ाईयां भी लड़ रहे थे। उन्हें पता था कि पूंजीवादी प्रवृत्ति वाले मिल मालिकों का एकमात्र लक्ष्य खुद को और समृद्ध बनाना है। मजदूरों को बेहतर सुविधाएं पाने के लिए अपनी लड़ाई स्वयं लड़नी थी। ऐसे में इसराइल ने अपने लेखन का केन्द्र इन मजदूरों के जीवन और संघर्ष को ही बनाया। वरिष्ठ आलोचक सूरज पालीवाल लिखते हैं "कई बार कुछ कहानीकार अपने इतिहास के कारण जाने जाते हैं और कुछ इतिहास से मुंह मोड़ कर चलने-लिखने के कारण। इसराइल की कहानियों में अपने समय का वह अनलिखा इतिहास है जिसमें आम लोगों के दुख-दर्द हैं इसलिये वह वैयक्तिक कम सामाजिक अधिक हैं। कहना न होगा कि वह सामाजिक ज़िंदगी का दौर था इसलिये उसकी लड़ाइयां भी सामाजिक थीं जो सामूहिक तौर पर लड़ी भी गईं- इसराइल इन्हीं सामूहिक और संगठित लड़ाइयों के समर्थ कथाकार हैं।" आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं सूरज पालीवाल का आलेख 'मजदूर आंदोलनों के संघर्ष और जिजीविषा की गाथा'।
'मजदूर आंदोलनों के संघर्ष और जिजीविषा की गाथा'
सूरज पालीवाल
इसराइल सातवें दशक के कहानीकार थे। उन्होंने बहुत कम कहानियां लिखीं जो दो कहानी संग्रहों- 'फर्क' और 'रोजनामचा' में संग्रहीत हैं। लेकिन यह कहना उचित ही होगा कि उनकी कहानियों में उस समय के कलकत्ता की सामाजिक, राजनीतिक हलचलों एवं मिल मजदूरों के क्रांतिकारी तेवरों के साथ गरीबी और अभावों का जो मार्मिक और प्रामाणिक अनुभव है, वह दूसरी जगह कम ही देखने को मिलता है। यह वह दौर था जब पूरे पश्चिम बंगाल में राजनीतिक रूप से उथल-पुथल थी, नक्सली आंदोलन अपने आरंभिक चरण में सामंती अवशेषों को चुनौती दे रहा था और पूंजीवादी साम्राज्य को किसान और मजदूरों के लिये सत्यानाशी मान कर उसके विरुद्ध संगठित आंदोलन चलाया जा रहा था। कहना न होगा कि 1967-70 के बीच पश्चिम बंगाल में राजनीतिक अस्थिरता अपने चरम पर थी, जिसका लाभ एक ओर नक्सली आंदोलन को मिला तो दूसरी ओर वाम मोर्चा के संगठित आंदोलनों को। 1972-1977 में तत्कालीन मुख्यमंत्री सिध्दार्थ शंकर रे ने दमनकारी नीतियों से इन सामाजिक-राजनीतिक आंदोलनों को कुचलने का प्रयास किया तो उसके विरुद्ध अपने अधिकारों के प्रति सजग किसान और मजदूर अधिक सक्रिय हुए, जिसकी परिणति वाम मोर्चा का क्रांतिकारी उदय है, जिसने एक ओर लोगों की सोच बदली तो दूसरी ओर कांग्रेसी सत्ता को चुनौती दे कर 1977 में ज्योति बसु के नेतृत्व में सरकार बनाई। यही वह समय है, जिसे आधार बना कर महाश्वेता देवी ने ‘हजार चौरासीवें की मां’ जैसा महत्वपूर्ण उपन्यास लिखा। इसराइल की कहानियां और महाश्वेता देवी के उपन्यास को पढ़ने के बाद छात्र और मजदूर आंदोलन का जो ‘लाल रंग’ देखने को मिलता है, वह उस समय के पश्चिम बंगाल की प्रामाणिक तस्वीर है। आज जब उस समय के दस्तावेजों को पढ़ते हुए अपने समय को देखते हैं तो दोनों का अंतर साफ दिखाई देता है। इस समय राजनीतिक आंदोलनों की धार कुंद हुई है और मजदूर आंदोलन लगभग समाप्त कर दिये गये हैं इसलिये देशी-विदेशी कंपनियां आराम से मजदूरों का शोषण भी कर रही हैं और निरापद भाव से साम्राज्यवादी ताकतों का पोषण भी कर रही हैं। मुझे लगता है ऐसे क्रूर समय में मजदूर आंदोलनों की अधिक आवश्यकता है लेकिन उसके लिये सड़कों पर कौन उतरे? मध्य वर्ग के खाये-पिये-अघाये लोग अपने ही इतिहास से अनभिज्ञ हो कर सत्ता का कीर्तन कर रहे हैं और उन्हीं के समाज का आम आदमी लगातार अभावों की जिंदगी के अंधेरों में ठोकरें खाने को विवश किया जा रहा है। यह समय हमारी चुप्पा बदमाशियों का समय है यह बात इसराइल की कहानियां पढ़ने के बाद और तीव्रता से मथती है। कहना न होगा कि इसराइल की कहानियां नेहरू युग के अंत और वाम मोर्चा के उदय के बीच के क्रांतिकारी परिवर्तनों की साक्षी हैं, जिन्हें एक नये तेवर के साथ लिखा और पढ़ा गया। ज़ाहिर है कि आज के समय में इस प्रकार की कहानियों की कल्पना करना बेमानी होगा। कई बार कुछ कहानीकार अपने इतिहास के कारण जाने जाते हैं और कुछ इतिहास से मुंह मोड़ कर चलने-लिखने के कारण। इसराइल की कहानियों में अपने समय का वह अनलिखा इतिहास है जिसमें आम लोगों के दुख-दर्द हैं इसलिये वह वैयक्तिक कम सामाजिक अधिक हैं। कहना न होगा कि वह सामाजिक ज़िंदगी का दौर था इसलिये उसकी लड़ाइयां भी सामाजिक थीं जो सामूहिक तौर पर लड़ी भी गईं- इसराइल इन्हीं सामूहिक और संगठित लड़ाइयों के समर्थ कथाकार हैं।
इसराइल के पिता और चाचा चौबीस परगना के काकीनाड़ा में चटकल मजदूर थे इसलिये उन्होंने ज़िंदगी के अभाव और संघर्षों को बहुत निकट से देखा था। उनकी कहानियों में जो स्वर बार-बार उभर कर सामने आता है वह है-चटकल मजदूर का बेटा ही चटकल मजदूर यूनियन का नेता बनेगा। यह आवाज अकेली उनकी ही नहीं है बल्कि उस समय के ट्रेड यूनियन के नेताओं और कर्मचारियों की सामूहिक आवाज है। इसराइल का आरंभिक जीवन ही नहीं बल्कि सारा जीवन इन्हीं संघर्षों में गुजरा था इसलिये उनकी कहानियां कारखानों की चलती मशीनों के शोर को गुंजाती हैं और मजदूरों के पसीने की गंध में नहाई हुई हैं। आज के समय में इस प्रकार की कहानियां लिखना कठिन है और कुछ समझदार कहानीकार यह भी कह सकते हैं कि ये कहानियां बासी हैं या उस समय की कहानियां हैं। लेकिन यह भी सच है कि अपने समय की ईमानदार कहानी ही आगे की कहानी होती है, वही कालजयी होती है और वही हमारे अतीत और वर्तमान की डोर बनती है। मध्य वर्ग के सपनों की अधिकांश कहानियां सुविधाजीवी जीवन की इकहरी कहानियां होती हैं, जो कुछ दिनों के बाद उदास और बासी नज़र आने लगती हैं।
गांव और किसान जीवन पर उनकी केवल एक कहानी ‘फर्क’ है, जिसके नाम पर उनका पहला कहानी संग्रह है। किसान और गांव उनकी कहानियों में अन्यत्र भी आते हैं लेकिन केवल स्मृतियों में, प्रत्यक्ष नहीं। इसका एक कारण जो समझ में आता है, वह है उनका अपना जीवन जो कारखाने के मजदूरों के बीच में गुजरा। उनका जन्म बिहार के गोपालगंज के मुहम्मदपुर गांव में हुआ था लेकिन बाद में वे अपने पिता के साथ चले गये और बाद का सारा जीवन वहीं गुजरा इसलिये उनके अनुभवों के गांव स्मृतियों के सहारे कहानियों में आते हैं। वे सीपीएम के सक्रिय कार्यकर्ता थे इसलिये उनका साबका मजदूर यनियनों के साथ किसान संगठनों से भी पड़ता था। किसान संगठनों की अनिवार्यता को वे भलीभांति महसूस करते थे जो ‘फर्क’ कहानी में देखा जा सकता है। यह कहानी वैचारिक है इसलिये सतर्क और सबल है। कहानी की शुरूआत सर्वोदयी बेनी बाबू के इस कथन से होती है ‘भूदानी नेता बेनी बाबू ने घर-घर घूम कर किसानों से अपील की थी कि तुम लोग अब किसी संगठन या झंडे के नीचे क्यों जाओ, मैंने जमीदार से पूरा गांव भूदान में ले लिया है। इसलिये अब बेदखली का सवाल ही नहीं उठता। जयप्रकाश बाबू जल्दी ही आने वाले हैं और आदर्श सर्वोदयी गांव की नींव पड़ने वाली है।’ इससे पहले इसराइल ने सूचना दी कि ‘थोड़े दिन पहले ही इशापुर गांव में खेत मजदूरों और किसानों का संगठन बना था।’ संगठन बनने की सूचना पहले हैं और सर्वोदयी गांव बनाने की सूचना बाद में। इसलिए बाद की सूचना दब जाती है और पहली सूचना कहानी में छा जाती है। कहना न होगा कि इसराइल पहली सूचना के साथ हैं, वे चाहते हैं कि भूदानी नेता बेनी बाबू का छद्म उभर कर आये इसलिये वे दोनों सूचनाएं कहानी के आरंभ में ही दे देते हैं। अन्याय और शोषण के विरुद्ध हिंसा और अहिंसा के वाक्जाल से नहीं लड़ा जा सकता, जब दमनकारी शक्तियां हावी हों तो उनके विरुद्ध उन्हीं हथियारों से लड़ना चाहिये। एक दिन भगलू बटाईदार के लड़के बिशू ने उन्हें साफ-साफ कह दिया कि ‘बेनी बाबू, आपको कोई दूसरा गांव नहीं मिलता जो आप जमींदार साहब से ले लें। हम गरीबों के पीछे हाथ धो कर क्यों पड़े हैं? आपको चुनाव लड़ना नहीं है, तब आप क्यों इस झमेले में पड़ रहे हैं। शिवजी बाबू खेत आपको दान देंगे, खेत बोयेंगे किसान और फसल होने पर शिवजी बाबू के गुंडे बंदूक ले कर आयेंगे और फसल काट कर ले जायेंगे। ठीक उसी समय आपका अविर्भाव होगा और फसल के दूसरे छोर पर लाठी-तीर-भाला-गंड़ासा लिये खड़े किसानों के सामने आप छाती खोल कर पड़ जायेंगे कि पहले मुझको मारो, मैं जिंदा रहते हिंसा नहीं होने दूंगा। आप बौखलाती भीड़ को हिंसा-अहिंसा पर चौपाई सुनायेंगे और इस क्षण-भंगुर संसार के मायाजाल में न फंसने तथा अहिंसा के द्वारा ही आसुरी शक्तियों को पराजित करने की रामधुन गायेंगे। तब तक जमींदार के गुंडे हवाई फायर करते हुये फसल ले कर चले जायेंगे । ... आपकी यह लीला अनंत है बेनी बाबू और इस अनंत की चक्की में हम गरीब पिस गये हैं, आप हमें क्षमा करिये। हम गरीबों को हमारी ही हिंसा पर छोड़ दीजिये। कम से कम अपनी फसल की रक्षा ही कर लेंगे, जिससे हमें साल भर भूखों मरना नहीं पड़ेगा।’
यह कहानी खेत मजदूरों और बटाईदारों के शोषण और उस शोषण से मुक्ति के लिये लंबे और संगठित संघर्ष की कहानी है। भूदानी आंदोलन विनोबा भावे के नेतृत्व में आरंभ हुआ था लेकिन उसकी अवधि लंबी नहीं थी। लंबी अवधि न होने का कारण उसके पीछे ठोस आधार का न होना ही था, भावुक चीजें कब तक जीवित रह सकती हैं? इसलिये बड़े-बड़े जमींदारों ने अपनी अनुपयुक्त, बंजर और श्मशान की भूमि तक भूदानियों को दान में दे दी, जो कभी किसी के काम नहीं आई। कहानी में हिंसा और अहिंसा के प्रश्न को भी पूरे तर्क-वितर्क के साथ उभारा गया है लेकिन प्रश्न यह है कि जब ताकतवर हिंसक हो कर गरीबों के अधिकारों को छीन रहा होे तब हिंसा और अहिंसा के मुद्दे बेमानी हो जाते हैं ? इसलिये अहिंसा और हृदय परिवर्तन जैसी अवधारणाएं शोषण के रास्तों में स्वतः ही खोखली हो कर दम तोड़ देती हैं। कहानी के अंत में बेनी बाबू के गठिये का दर्द बढ़ जाता है इसलिये वे अस्पताल में भर्ती हो जाते हैं, वहां वे देखते हैं कि ‘कई परिचित चेहरे घायल हो कर अस्पताल में पड़े हैं। वे उनसे कहते हैं कि मैं चल फिर सकता तो तुम लोगों की सेवा करता। मैं लाचार हूं, मेरे हटते ही कोशी का पवित्र जल लाल हो गया है। खून की धारा बह रही है। हे राम, यह सब क्या हो रहा है? रात गहराती है बेनी बाबू दर्द से कराहते हैं। उनके बगल का किसान भी दर्द से कराहता है। बेनी बाबू कहते हैं, गठिया में बड़ा दर्द है भाई, मैं फिर उठ कर खड़ा नहीं हो पाऊंगा। बेनी बाबू के बगल का किसान भी बीच-बीच में कराह उठता है। बेनी बाबू उसे सांत्वना देते हैं। किसान कहता है ‘पंडित जी, इन दोनों दर्दों में बहुत फर्क है। मुझे मालूम है आपको कोई चोट नहीं लगी है। बेनी बाबू अपना दर्द भूल कर उदास हो जाते हैं। सोचते हैं-बिशू होता तो कहता-एक दर्द हिंसक है और दूसरा अहिंसक।’ बेनी बाबू गठिया के दर्द से पीड़ित हैं, जो उनकी शारीरिक ब्याधि से उत्पन्न हुआ है पर किसानों को तो ज़मीदार के गुंडों ने पीटा है, जिसके कारण उन्हें दर्द है। एक दर्द निजी है लेकिन दूसरे दर्द का कारण सदियों से चली आ रही सामंती प्रथा को समाप्त करने के प्रतिरोध से उत्पन्न हुआ है। बेनी बाबू सुरक्षित हैं इसलिये अहिंसा की बात कर सकते हैं लेकिन जो असुरक्षित है, जिसके सामने पेट भरने की समस्या है उसके लिये अहिंसा का तर्क बेमानी है।
कलकत्ता एक जमाने में पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के खेत मजदूरों के लिये रोज़गार का बड़ा केंद्र था। गांवों में मजदूरी कम मिलने या न मिलने के कारण खेत मजदूर कलकत्ते की जूट मिलों में काम करने चले जाते थे। कारखानों में काम करने वाले मजदूरों की अलग परेशानियां और चिंताएं थीं लेकिन एक बार जो आ जाता था, उसके लिये वापस लौटने के दरवाजे बंद हो जाते थे। इसलिए घर परिवार और गांव धीरे-धीरे छूट जाते थे, कहते हैं कुछ महीने या साल वह घर वालों को पैसे भेजता था लेकिन बाद में वह भी संभव नहीं हो पाता था। भिखारी ठाकुर के ‘लोक नाट्यों’ में उस मजदूर की पीड़ा और घर में अकेली रह रही उसकी पत्नी के कष्ट बार-बार उभर कर आते हैं। कहना न होगा कि भिखारी ठाकुर उन सबकी आवाज थे, ऐसी आवाज जो भयानक तकलीफों में भीग कर बाहर आती थी। हमारे लोकप्रिय कवि त्रिलोचन ने भी उन अभावों और दुश्चिंताओं से भरी ज़िंदगी को निकट से देखा था इसलिए वे कहते हैं ‘कलकत्ता पर वज्र गिरे’। वे कुपित हो कर नहीं कहते बल्कि दुखी हो कर कहते हैं, जो शहर लाखों मजदूरों को रोज़गार दे रहा हो, उस पर वज्र गिरने की परिणति क्या होगी, इसे त्रिलोचन अच्छी तरह जानते-समझते थे। लेकिन वे यह भी जानते थे कि कलकत्ते में मजदूरों की हालत बहुत सुरक्षित नहीं है, सामंतवाद के जिस शोषण से मुक्ति के लिये वे महानगर में गये थे, वह महानगर उन्हें असुरक्षित बनाये रख कर ज्यादा शोषण कर रहा था। गांव में रह कर महानगर की तकलीफें छोटी दिखाई देती हैं लेकिन पूंजीवाद की चक्की ज्यादा महीन पीसती है। कलकत्ते के महानगरीय बोध और उसके शोषण की प्रामाणिक कहानियां इसराइल लिखते हैं। इन कहानियों को पढ़ते हुये सत्तर और अस्सी का वह दशक याद आता है, जब बदलाव के नारे हवाओं में गूंजते थे। लगता था कि समाजवाद आने वाला है, ये कहानियां इसी बदलाव और उसके लिये लड़ने की कहानियां हैं। आज के समय में जब सुविधा सम्पन्न वर्ग कीर्तन में मगन है तब उससे प्रतिरोध की अपेक्षा करना बेमानी ही होगा। इसलिए अपने इतिहास से अनजान लोग प्रसन्न भाव से कह देते हैं कि प्रतिरोध गुजरे जमाने की चीज थी, अब कोई इस प्रकार का जोखिम उठाने को तैयार नहीं है। इसराइल की एक कहानी है ‘मुस्कान’ जिसमें वे रंगलाल जैसे साधारण से मजदूर की दृढ़ता को दिखाते हैं। रंगलाल पर लेबर आफीसर मिस कांता आरोप लगाती हैं कि ‘यह नौजवान छोकड़ा मुझको देख कर हंसा।’ रंगलाल को नौकरी से निकालने का यह एक सस्ता और घृणित रास्ता था। किसी गरीब मजदूर के लिये नौकरी का क्या मतलब होता है, रंगलाल भलीभांति जानता था। फिर भी वह गलत आरोप को सहने और उसके लिये माफी मांगने के लिये तैयार नहीं था। जबकि एक मजदूर उसे समझाते हुये कहता है ‘मान लेते तो क्या बिगड़ जाता? आखिर तुमको काम ही चाहिये न।’ काम तो चाहिये लेकिन गलत बात को स्वीकार करने की शर्त पर नहीं। हार कर वह आदमी चला जाता है और ‘रंगलाल आत्मग्लानि से भर जाता है। वह क्यों नहीं इस आदमी को आखिरी बार फटकार देता?’ वह और जोर दे कर उस आदमी से कहना चाहता है ‘मैं तुम्हारी हड्डी तोड़ दूंगा। तुम मेरा पीछा मत करो। लोग शक करेंगे कि रंगलाल बिक गया।’ सामान्य-सा मजदूर रंगलाल सेठों के आगे बिकने को गलत और शर्मनाक मानता है। जिस कारखाने में लोग उसे जानते हैं, उन लोगों के बीच समझौता करके नौकरी करने को वह कलंक मानता है। रंगलाल मध्य वर्ग के उन लोगों के लिये उदाहरण की तरह है जो अपने छोटे-छोटे स्वार्थ के लिये बिकने और दलाली करने के लिये हमेशा तैयार रहते हैं। उसके वरिष्ठ साथी लालचन ने मिस कांता के आने पर संजीदगी के साथ कहा था ‘तुम लोग जिसे खूबसूरत गुड़िया कहते हो, वह नागिन साबित होगी। कसूर उसका नहीं उसके जबड़ों में ज़हर भरा जा रहा है।’ लालचन ने अपना अनुभव सुनाते हुये कहा था ‘तीस वर्ष पहले एक साहब ने ही मुझको ट्रेड यूनियन बनाने, पार्टी में शामिल होने और मालिकों से घृणा करने की बात कही थी। विलायत में बदमाश लोगों को पकड़-पकड़ कर कायदे-कानून सिखाये जाते हैं और फिर उन्हें साहब बना कर हिंदुस्तान भेज दिया जाता है। अब यह मेम साहब भी वहीं से ट्रेनिंग ले कर आई हैं।’ उसने यह भी कहा था कि ‘अब हंसने पर भी चार्जशीट मिलेगी।’ रंगलाल के सामने लालचन के अनुभव प्रत्यक्ष हो कर सामने आ रहे हैं, वह सोचता है कांता के सामने एक बार झुक गया तो जीवन भर वह उसे दबाती रहेगी। एक ओर वह खुद को देखता है तो दूसरी ओर उन साथियों को भी जो ‘क्वार्टर्स के पानी-नलों को चार घंटे बंद रखे’ जाने पर भी चुप रहते हैं, दलाल यूनियन से समझौता करने की गलत बात पर भी चुप रहते हैं, समय से पहले और बाद तक कारखाने को चालू रखने पर भी लोग चुप रहते हैं। और तो और ‘जब वह शैतान की तरह मशीनों के बीच घूमने लगी’ तब भी लोग कुछ नहीं बोले। रंगलाल देख रहा है कि कांता के अत्याचार लगातार बढ़ते जा रहे हैं लेकिन उसके अपने लोग चुप हैं। अपने ही साथी के साथ इस प्रकार का जुल्म होने पर कुछ लोग समझौते की बात करते हैं तो कुछ अवसर की तलाश में हैं। लेकिन रंगलाल अपने निर्णय पर दृढ़ है, वह कांता के इस ओछे आरोप पर माफी मांगने को तैयार नहीं है। जन-मानस बदलता है, थोड़े-से लोगों में जो गुस्सा था, वह बढ़ता जाता है, वह देखता है ‘लालचन रात भर घूम कर मीटिंगें करता है। चार बजे सुबह लौटता है। और सुबह से ही बैठकी हड़ताल शुरू होती है। लोग अपनी-अपनी मशीनों पर हैं, पर चुप बैठे हैं। काम नहीं करते। गेटों पर बड़े-बड़े पोस्टर चिपकाते हैं-रंगलाल को काम दो, कांता को निकाल दो। बड़े आफिस के सामने भीड़ बढ़ती जाती है। क्षुब्ध भीड़ नारे लगाती है-कंपनी का जुल्म नहीं चलेगा, जंगली कानून वापस लो।’ कहानी के अंत में इसराइल बताते हैं ‘मिस कांता प्रायः बहरी हो गई हैं। अब वह कानों पर तलहथी नहीं रखतीं। डेढ घंटे बीत गये मगर एक बार भी उनके कंठ से आवाज नहीं फूटी। वह ज्यों-का-त्यों चित्र लिखित-सी खड़ी रही। पुलिस और दरवान भीड़ पर पीछे से अचानक हमला करते हैं। लाठियां बरसती हैं। आंसू गैस के हथगोले पड़ते हैं। जहरीले धुएं की वर्षा होती है। भीड़ में भगदड़ मचती है। भयानक चीत्कार, कोहराम मचा है हजारों की भीड़ दिशाहारा हो गिरती-पड़ती भागती है। मेम साहब डगमगाती हैं और गिर पड़ती हैं। लाठियों की चोट से तिलमिला कर भीड़ मेम साहब को कुचलती हुई भागती है।’
यह कहानी का अंत है जो रंगलाल और उसके साथियों की विजय यात्रा में बदल जाता है। रंगलाल की दृढ़ता ने उसके साथियों को एक कर लड़ने को तैयार किया। मिल के अधिकारी पहले मजदूर को तोलते हैं, उसकी बोली लगाते हैं, माफी मांगने के लिये अपने दलालों के माध्यम से उस पर दबाव डालते हैं तथा उसे घर परिवार की भुखमरी का भय दिखाते हैं लेकिन तब भी वह अपने निर्णय पर दृढ़ रहता है तो मजदूर यूनियन उसका साथ देती है। यह रंगलाल जैसे छोटे-से मजदूर के स्वाभिमान और मजदूर यूनियन की एकता की कहानी है, जो इस उत्तर-पूंजीवादी युग में विलुप्त हो गई है। अब न रंगलाल बचे हैं और न उनकी यूनियनें ही। यह वह जमाना था जब मजदूर यूनियनों से मिल के अधिकारी ही नहीं उनके मालिक भी कांपते थे। जो लोग पूछते हैं कि कम्यूनिस्टों की क्या देन है तो उन्हें इन कहानियों को जरूर पढ़ना चाहिए।
मजदूर आंदोलन का इतिहास सामूहिक शक्ति का रहा है। इस आंदोलन ने मजदूरों के वेतन और काम करने की समयावधि तय की, कारखानों के वातावरण को मानवोचित बनाने के नियम बनाये, मजदूरों के बच्चों से ले कर उनके स्वास्थ्य के प्रति जिम्मेदारियां निर्धारित कीं तथा मजदूर आंदोलन और उसके नेताओं के साथ अपनी एकजुटता की प्रति बद्धता तय की। ज़ाहिर है कि यह सब एक दिन में नहीं हो गया था बल्कि इसके लिये लंबी लड़ाइयां लड़नी पड़ीं, जो जोखिम भरी थीं। ‘लोग जिंदा हैं’ कहानी में इसराइल ने मजदूरों के संघर्ष और उनकी बेचैनियों को उभारा है। हम जिस समाज में रहते हैं, उस समाज से कुछ अपेक्षाएं भी करते हैं और चाहते हैं कि वह हमारे द्वारा किये गये कामों को महत्व दे। संतों और पाखंडियों को छोड़ दीजिए क्योंकि वे सामाजिक नियमों से ऊपर हैं, बाकी का समाज सामाजिक पक्षधरता तय करते हुये किंचित भाव से अपने बारे में भी सोचता है। कुछ लोग हैं जो केवल अपने बारे में ही सोचते हैं और अपने लाभ-लोभ के लिये ही सारे काम करते हैं लेकिन उनसे अलग वे लोग भी हैं, जो सामाजिक हितों को वरीयता देते हैं। मनुष्य का स्वभाव हमेशा एक जैसा नहीं रहता, कभी-कभी काम करते हुये अंदर से कुछ फूटता है और विचार के स्तर पर जा कर समाप्त भी हो जाता है। ‘लोग जिंदा हैं’ कहानी का क्रांतिकारी विजन, जिसको पुलिस गोली मार कर हत्या कर देती है, एक दिन अपनी मित्र सोनिया से मन की बात कहता है ‘सोना, अगर मैं कहूं कि व्यक्तिगत जीवन में मुझको कुछ नहीं मिला तो तुम कहोगी-तुम बड़े तुच्छ आदमी हो, ऐसा क्यों सोचते हो? इन हजारों मजदूूरों और आस-पास के लोगों को देखो, वे ऐसा कहां सोचते हैं? उन्हें भी तो कुछ नहीं मिला। सच है, मैं ऐसा कुछ पाने की चेष्टा नहीं करता। वक्त हमें इसकी इजाजत नहीं दे सकता। फिर भी, कभी-कभी ऐसा ख्याल उठता है, तो वह वर्जित है क्या? क्योंकि यही तो वह फीलिंग और कांशस है जो हममें तड़प पैदा करती है और हम चाहते हैं कि वे हजारों लोग जो हमारी तरह ही अभावों में रह कर भी, हमारी तरह नहीं सोच पाते हैं, उनमें भी यह तड़प भर दें और इस स्थिति को बदलने के सिलसिले में हम एक साथ हो जायें।’ दरअसल, इस स्थिति को बदलने की इच्छा शक्ति ही समाज को बदलती है, स्पष्ट है कि समाज का अधिकांश हिस्सा हमेशा यथास्थितिवादी रहा है, जो दैनंदिन जीवन में किसी प्रकार की जोखिम नहीं लेना चाहता। इसलिये नेतृत्व का जिम्मा या उसका जोखिम उठाने वाले बहुत कम लोग होते हैं। ऐेसे लोग जब परिवर्तन की मांग करते हैं तो कहा जाता है कि कौन है जो सामने आ कर अपनी सुविधा संपन्न जिंदगी को तबाह करना चाहेगा? दुनिया के सारे समाजों में परिवर्तन की आग लाने वाला इसी समाज से पैदा होता है और वह सारे जोखिम उठा कर समाज को बदलने के लिये लोगों के अंदर चिंगारी पैदा करता है। विजन, सोनिया और धन्नू ऐसे ही लोग हैं, जो यथास्थिति को बदलना चाहते हैं और सत्ता उन्हें या तो गोली मार देती है या जेलों में बंद कर देती है या तमाम तरह की अमानुषिक यातनाएं दे कर उन्हें अपने रास्ते से हटाने का काम करती है। ज़ाहिर है कि इस कहानी को पढ़ते हुए पश्चिम बंगाल का आठवां दशक याद आता है, जिसमें आपातकाल के अत्याचार भी शामिल हैं, जब पढ़े-लिखे, प्रतिभावान और संकल्प से भरे हुये युवकों पर तमाम तरह के अत्याचार कर या तो उन्हें जेलों में ठूंस दिया गया था अथवा गोली मार कर उनकी हत्या कर दी गई थी।
‘लोग जिंदा हैं’ कहानी की सोनिया पुलिस के अत्याचारों के बारे में कहती है ‘उन्होंने सोचा, मैं अपमान और क्षोभ से भर जाऊंगी। फिर वे मुझ पर दहशत के हथौड़े मारेंगे, ताकि मैं मानसिक रूप से विक्षिप्त होकर दिशाहारा हो जाऊं। फिर वे मुझको अपने कब्जे में ले कर वह सब कुछ मुझसे कबूल करा लेंगे, जो वे चाहते हैं और जो मैं नहीं चाहती। इस प्रक्रिया में वे हर कदम पर खुश हो रहे थे कि वे सफल हो जायेंगे और मैं हर कदम पर मजबूत हो रही थी कि मैं बर्दाश्त कर लूंगी।’ इस अमानवीय यातना के बारे में वे आगे कहती हैं ‘मैं नंगी कर दी गई। मेरे जिस्म का हर हिस्सा जख्म से भर गया। मुझको इतना नंगा रखा गया कि शर्म की परिभाषा बदल गई। मुझे लगा जानवरों के सामने नंगे और पर्दे का कोई अर्थ नहीं है क्योंकि वे नंगे और पर्दे में भेद नहीं कर सकते। फिर भी मैं जिंदा हूं। विजन मर गया। मां शरणार्थी बन गई। मैं सोच नहीं पाती कि धन्नू भैया लौट कर आ सकेंगे या नहीं। मैं अस्पताल से निकल कर अपने मुहल्ले में जा सकूंगी या नहीं। लेकिन मैं यह सब नहीं सोचूंगी, मैं अब भी जिंदा हूं। कल सबेरे रबर कारखाने के चार मजदूर मुझको देखने आये थे। सुबह हो गई है, आज भी बहुत से लोग मुझको देखने के लिये आयेंगे।’ सुबह हो गई यानी अंधेरी रात कट गई है, अत्याचारों का अंधेरा कितना भी गहरा हो, उसकी सुबह जरूर होती है, हुई इसलिए यह विश्वास भी कायम रहा कि आज भी बहुत से लोग मुझको देखने के लिये आयेंगे। अकेले न होने के विश्वास में जो अब भी उनके साथ हैं वे मजदूर हैं, जो तमाम तरह की तकलीफें सह कर भी सामूहिक शक्ति में यकीन रखते हैं।
इसराइल की कहानियों में कई बार ऐसे पात्र मिलते हैं, जो अपने अनुभवों से सीख कर अपने आस-पास के समाज से जुड़ते हैं और उसके संघर्षों के सहभागी बनते हैं। बने-बनाये पात्रों और स्थितियों पर कहानियां लिखना आसान हैं लेकिन व्यक्तित्वांतरण की प्रक्रिया सरल नहीं है। व्यक्ति का यह स्वभाव है कि वह संघर्षों से सुविधाओं की ओर जाता है लेकिन सहज सुविधाओं को त्याग कर संघर्ष और अभावों की जिंदगी की ओर जाना कठिन और जोखिम भरा है। यह परिवर्तन विचार के कारण ही संभव है। इस संदर्भ में मैं उनकी दो कहानियों का विशेष रूप से उल्लेख करना चाहूंगा- ‘फिर उसी कहानी की’ तथा ‘रात बाकी थी’। दोनों कहानियों में स्त्री पात्रों का जिस प्रकार से परिवर्तन होता है, वह दृष्टव्य है। ‘फिर उसी कहानी की’ भाभी यानी धनेश की पत्नी पहली बार शहर आती हैं और वहां के वातावरण को देख कर अपनी पड़ोसिन जगिया से पूछती हैं ‘का हो, ई इनकलबवा का चीज है, ई कब आयेगा? इसने तो हमारी नींद हराम कर दीहिस है।’ उसकी पड़ोसिन जगिया जवाब देती है ‘इनकलबवा आई-जाई ना, तोहरा खसम की नौकरिया खा जाई, तब जानोगी कि यह क्या चीज है।’ कल्पना करिये कि गांव से पहली बार महानगर में आई किसी सामान्य स्त्री को जब यह मालूम पड़े कि उसका पति जिस इंक्लाब को लाने के लिये अपने दोस्तों के साथ रात-रात भर बहस करता है, वह उसके पति की नौकरी खा सकता है तो उसके दिल पर क्या गुजरेगी? धनेश पढ़ा-लिखा था, वह दर्शनशास्त्र में एम. ए. पास था लेकिन गांधीवादी पिता की नौकरी छूटने पर उसने इंक्लाबी नेता बनने की ठानी थी। वह इस विषय पर कई-कई रातें बहस कर चुका था कि मजदूर का बेटा ही उसका नेता हो सकता है। वह यह भी जानता था कि सुविधासंपन्न घर से आया कोई भी पढ़ा-लिखा व्यक्ति मजदूरों के दर्द को नहीं समझ सकता। लेकिन वह मजदूरों की अभावों से भरी जिंदगी से भी भलीभांति परिचित था और उनके अनथक संघर्षों से भी। इसलिये इसराइल उसके परिवर्तनों के बारे में लिखते हैं ‘धनेश अपनी कोर्स की किताबें फेंक-फांक कर बदली मजदूरों की कतार में शामिल होने के लिये कारखाने के गेट के अंदर चला गया। हमें लगा, जैसे वह एक सनसनीखेज जुनून के साथ कारखाने में गया है। वह कारखाने में घुसते ही हमारी बहुत सारी हिचकिचाहटों को नोंच-नोंच कर चिथड़ा करने लगा। मुझे लगा जैसे उसका कोई अपना सपना नहीं था, जो टूटा हो, वह हमारे सपनों को तोड़ रहा था। उसने हमारे बाप-दादों की इस परंपरा को सरेआम तोड़ दिया कि चंदा तो चुपके से लाल झंडा यूनियन को दे आयेंगे मगर मेंबर तिरंगा झंडा यूनियन के बने रहेंगे।’ धनेश के मजदूर नेता बनने से उसके साथी खुश थे लेकिन उसकी पत्नी दहशत में थी, रात-रात भर चलती बहसों और नौकरी जाने की आशंकाओं ने उसके मन को अस्थिर कर दिया था। गांव से आई पत्नी के लिये यह क्रांतिकारी वातावरण नया था लेकिन कौतूहल भरा नहीं था। इसराइल धनेश की सीधी-सादी पत्नी में आये परिवर्तनों को देख रहे थे, वे यह भी देख रहे थे कि पति के जेल जाने के बाद पत्नी जीवन का कौन-सा रास्ता चुनती हैं? जिस पत्नी को शुरू शुरू में इंक्लाबी बहसों से डर लगता था, वे धनेश के जेल जाने के बाद उसके सपनों को पूरा करने में लग गईं। वे बताती हैं ‘मैं कल आधीरात को सुअरबाड़े में गई थी, मीटिंग करने। हम जो कल जुलूस निकालेंगे, उसमें सब मेस्तर-मजदूरिनें आयेंगी। तुम जानते हो, हम डेढ़ बरसों बाद जुलूस निकालने जा रहे हैं। अभी प्रचार नहीं है। आज रात पोस्टर लगाया जायेगा। फिर भी देखना हमारा जुलूस बहुत बड़ा होगा, पहले से भी बड़ा। वे समझते हैं, उन्होंने हमें खत्म कर दिया है। वे ऐसा नहीं कर सकेंगे।’ यह भाभी का अपना आत्मविश्वास है, जो सब कुछ छिन जाने के बाद उत्पन्न हुआ है। यह सामान्य परिवर्तन नहीं है और न सहज संकल्प। जो लोग मजदूर संगठनों के अनवरत संघर्षों को नहीं जानते, संभव है वे भाभी की दृढ़ता को भी एक कहानी ही समझें।
‘फिर उसी कहानी की’ भाभी जैसी ही एक स्त्री चरित्र ‘रात बाकी थी’ कहानी की वनमालिनी है। भाभी के पति धनेश मजदूर आंदोलन में जेल गये थे, इसलिये उनके जेल जाने पर उन्हें पश्चाताप नहीं है लेकिन वनमालिनी के पति बलात्कार के आरोप में जेल गये हैं इसलिये उनका दुख अलग तरह का है। कहानी के नेरेटर जेल में राजबंदी चाचा से मिलने जाते हैं और वनमालिनी अपने पति से। राजबंदियों से मिलने जाने में न कोई शर्म है और न किसी प्रकार की कुंठा लेकिन बलात्कार के आरोपी की पत्नी निर्भय हो कर नहीं जा सकती। इसलिये नेरेटर से अपना दुख व्यक्त करते हुए वह कहती है ‘काश वह आपके चचा की तरह ही जेल गया होता। आपसे मुलाकात होने और जेल में राजबंदियों को देखने के बाद से मैं यह सोच रही हूं। लेकिन यह नहीं होना था। अगर ऐसा हुआ होता तो आज मैं भी आप ही की तरह कुंठारहित होती। जेल गेट पर सर उठा कर आती जाती, तब मुझे इतना भय भी न होता, तब मैं पुलिस की गोलियों के बीच से गुजर जाती, शायद मर भी जाती।’ यह निर्भय वक्तव्य नहीं है बल्कि लंबे समय के दुख से उपजा वक्तव्य है, जो एक प्रकार का पश्चाताप भी है। तब यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि इतना सब कुछ होते हुए वह अपने पति से मिलने क्यों जाती है? वनमालिनी स्वयं अपना पक्ष रखते हुए कहती है ‘ब्याह के बाद घर जमाई की तरह ही वह मेरे घर रहा था। जहां तक पता है, उसका अपना कोई नहीं है। वह नितांत अकेला है। यह शादी उसकी नौकरी की बुनियाद पर हुई थी। वह एक सौदागरी आफिस में किरानी था। आपने देखा नहीं है, वह उम्र में मुझसे बहुत बड़ा है। पाकिस्तान में उसके खानदान वाले मार डाले गये हैं। उसने बताया भी यही था। आज मैं उससे न मिलूं तो उससे मिलने वाला कोई भी नहीं है। उससे भी बड़ी बात यह है कि हर बार की मुलाकात में वह अधिक से अधिक गिड़गिड़ाता है, हजारों बार क्षमा मांगता है और हाथ पकड़ कर रोनी-सी आवाज में अनुनय-विनय करते हुये आगामी सप्ताह आने का वादा मांगता है। उसके व्यवहार से एक पति का आभास नहीं मिलता, बल्कि एक निहायत डरपोक लिजलिजे कुत्ते का आभास मिलता है जो मेरे अगले सप्ताह आने के वादे पर जी रहा हो। दरअसल उसकी अपराधी भावनाओं ने इतना सोचने पर उसे मजबूर कर दिया है कि उसने मेरा पति बने रहने का नैतिक अधिकार खो दिया है। हां, इतना जरूर है कि अब मैं उसके साथ नहीं रह पाऊंगी।’ यह एक ऐसी स्त्री का दुख है जो अपने अपराधी पति के कुकर्मों से दुखी है लेकिन उसके अकेले और कमजोर होेने के कारण उससे मिलने भी जाती है। क्या यह एक स्त्री की संवेदनशीलता है, भावुकता है या पत्नी होने का सहज कर्तव्य? लेकिन कहानी इन प्रश्नों से टकरा कर न तो बड़ी बनती है और न किसी बड़ी सामाजिक प्रवृति को पोषित ही करती है बल्कि कहानी तब बड़ी बनती है, जब वह कलकत्ते में चल रही हड़ताल, चारों ओर लोगों की धड़-पकड़, गोलियों और कर्फ्यू के बीच पुलिस द्वारा पकड़ी जाती है। सत्ता और पुलिस के इस दमन के विरोध में झुकती नहीं है बल्कि उन लोगों के साथ खड़ी रहती है, जो हड़ताल का समर्थन कर रहे हैं। पुलिस द्वारा पकड़े जाने पर ‘वनमालिनी अपने पास घायल बेहोश पड़े युवक को देख कर व्यग्र हो गई। वह फौरन उठी और बच्ची को मेरी गोद में डाल दिया और बेहोश युवक के पास जा कर उसका माथा सहलाने लगी। उसके माथे से बहते खून को आंचल से पोंछने लगी। उसने दरवाजे पर खड़े पुलिस वालों को सुना कर कहा- हम कसाईखाने में डाल दिये गये हैं। कसाई रात भर में न जाने कितनों को जिबह करेंगे?’ वनमालिनी का यह परिवर्तन उसके निजी दुखों और कुंठाओं से पार जाने के बाद हुआ है। पहले वह हड़ताल के समर्थन में नहीं थी लेकिन बाद में वह उसका हिस्सा बनती है और सामूहिक शक्ति के रूप में उभरती है। इसराइल की कहानियों में स्त्री चरित्रों का यह परिवर्तन एक ओर उन्हें अडिग और संगठित संघर्ष का हिस्सा बनाता है तो दूसरी ओर उनके परिवार के दायरे को विस्तृत करता है। कहना न होगा कि निजी दुःख व्यक्ति की सोच को सीमित करते हैं तो समाज की चिंताएं उसके सोच और व्यक्तित्व को बड़ा बनाती हैं।
रात-दिन अथक परिश्रम करने के बाद भी चटकल मजदूरों का जीवन तमाम तरह की परेशानियों और अभावों से भरा हुआ है। इसके दो बड़े कारण हैं, एक, मजदूरी कम है तो दूसरा पारिवारिक जिम्मेदारियां बहुत हैं। अधिकांश मजदूर गांव से आते हैंं, गांव में उनका भरा-पूरा परिवार रहता है जो महानगर की मुसीबतों से अनजान यह चाहता है कि उसका परिवारीजन प्रति माह उनके खर्च के लिये रुपये भेजता रहे। गांव की गरीबी और बेरोजगारी से भाग कर वह महानगर में आता है लेकिन यहां भी वह उन्हीं मुसीबतों का शिकार बना रहता है। यह सही है कि मजदूर संगठनों ने उनकी दैनंदिन तकलीफों को कम किया है लेकिन रोज-रोज मालिकों और उनके मातहत अधिकारियों से टकराने में उसकी आधी शक्ति समाप्त हो जाती है। नौकरी से निकाले जाने और पक्की नौकरी न लगने के कारण वह मजदूर संगठनों के पास जाता है इसलिए कई बार उनकी राजनीति का शिकार भी बनता है। हर मजदूर की कहानी नई है, उसके संघर्ष भी अलग तरह के हैं लेकिन गरीबी के दुख एक जैसे हैं। इस स्थिति में वह न चाहते हुये भी महाजनों के कर्ज के शिकंजे में फंसता चला जाता है। कर्ज का यह शिकंजा इतना भयावह है, जिसे वेतन मिलने वाले दिन कारखाने के गेट पर देखा जा सकता है। इस क्रूर महाजनी व्यवस्था पर इसराइल की दो कहानियां हैं- एक, पंच और दूसरी, मुर्दों का रखबारा। ‘पंच’ कहानी का जुठन और ‘मुर्दों का रखबारा’ कहानी का फूदन अपनी-अपनी तरह से कर्ज के चक्रव्यूह में फंसे हुये हैं, वे लोख कोशिश करके भी उससे मुक्त नहीं हो पाते। जुठन जानता था कि ‘इस पूरी स्थिति के दो ही विकल्प हो सकते थे, पहला यह कि वह अपनी इज्जत को देखे और महाजन का हाथ दबा कर कहे कि जो कहोगे, मानूंगा पर इस चौराहे पर बेआबरू मत करो। या इज्जत फजीहत की बात को गोली मार दे-इसमें छिपाने की क्या बात है, सब तो कर्ज खाते हैं और तन कर कहे कि नहीं दूंगा, क्या करोगे? तुमने मेरा खून चूस लिया है। उसने दूसरा काम ही किया। जुठन ने महसूस किया कि इतने लोगोें के होते महाजन उस पर हाथ नहीं छोड़ सकता या फूहड़-पातर नहीं बोल सकता। उसकी हिम्मत बढ़ गई। वह अंदर से मजबूत हो गया। अगर महाजन ने हंगामे की हरकत की तो वह भी दो चार हाथ देगा, काहे का लिहाज और भय।’ यह हिम्मत और साहस लगातार कर्ज चुकाने के बाद भी महाजन के शिकंजे में फंसे रहने के कारण पैदा हुआ है। जब सभी मजदूर कर्ज में दबे हैं तो फिर किसी के सामने डरना किस बात से? लेकिन ‘मुर्दों का रखबारा’ कहानी में फूदन ऐसा नहीं कर पाता, वह महाजन से डरता है इसलिये वह घर बदलता रहता है ताकि कुछ दिन इस तरह के अपमान से बच सके। वह कहता है ‘कल एतवार है न! सबेरा होते न होते जमदूत आ घेरेंगे। लगेगा गला दबा देंगे। उसके बाद जो हल्ला-गुल्ला, गाली-गलौज, धड़-पकड़ होगी ... कि मत पूछो। चल दिया हूं, कल और हफ्ते भर तो ठीक से बीत जायेगा।’ कहानी की शुरूआत में उसके घर बदलने का भयावह दृश्य है ‘रात के करीब ग्यारह बज रहे थे। फूदन तीन रिक्शों पर चारपाई, बिस्तरा, हांडी, बाल्टी, कोयला, चूल्हा आदि लादे बीवी, दो बेटियों और बेटे के साथ चला जा रहा था। फूदन का पूरा खानदान पैदल ही चल रहा था। सामान अधिक होने के कारण रिक्शे वाले भी पैदल ही चल रहे थे।’ फूदन के बारे में इसराइल ने एक और महत्वपूर्ण जानकारी दी है, जो उसके अथक परिश्रम की निशानी है ‘मैं फूदन को बचपन से जानता हूं। वह मेरा नहीं, मेरे अब्बा का साथी है। वह कभी इस शहर से गायब हो जाता है और छः महीने-साल भर में लौट आता है। मैंने उसे चटकल में तांत चलाते देखा है, कागज कल में कोयल और बांस ढोते देखा है, बैंड पार्टी में पिस्टीन बजाते देखा है, दो रुपये रोज पर कांग्रेस के चुनाव-जुलूस में झंडा ढोते देखा है, गहने की दुकान पर दरबानी करते देखा है, महाजनों का तगादेदार बन कर लाठी के हाथों कर्ज वसूलते देखा है, खोला बाड़ी में मजदूरों के बीच ताड़ी बेचते हुये देखा है और कब्रिस्तान का रखवारा बन कर रात-रात भर लोहबान जला कर दुआ मांगते और मुर्दों की रखवारी करते हुए भी देखा है।’ लेकिन इन तरह-तरह के कामों को करने के बाद उसे एक मकान में निश्चिंत हो कर रहते हुए कभी नहीं देखा। महानगर में मजदूरों के ये अनवरत कष्ट इसराइल की कहानियों को जीवंत और मजबूत बनाते हैं।
सातवें-आठवें दशक में इसराइल की कहानियां अलग धार और तेवर के साथ आ रही थीं। नेहरू युग की समाप्ति के बाद समाज में भविष्य के प्रति चिंताएं और अधिक बढ़ गई थीं, लोगों के मन उद्विग्न थे, राजनीति में अस्थिरता और उथल-पुथल थी, युवा-वर्ग आक्रोशित था, किसान संगठन सक्रिय थे तथा मजदूर-वर्ग के क्रांतिकारी तेवर और तीखे हो गये थे-इसराइल की कहानियां उसी दौर की प्रामाणिक और ईमानदार कहानियां हैं।
(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग्स कवि विजेन्द्र जी की हैं।)
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| सूरज पालीवाल |
(वरिष्ठ आलोचक। जयपुर में निवास।)
सम्पर्क
मोबाइल : 8668898600




इसराइल की कहानियों का बहुत अच्छा विश्लेषण सूरज पालीवाल जी ने इस आलेख में किया है। चटकल और पश्चिम बंगाल के तत्कालीन राजनीतिक एवं सामाजिक परिदृश्य को वस्तुनिष्ठ ढंग से पाठक के सामने रखते हैँ। मजदूर आंदोलन की आवश्यकता को रेखांकित करते हुए पूँजीवाद के वीभत्स कारनामों को कलई भी खोलते हैं। बलात्कारी पति के कारण जेल में बंद पति से मिलने जाने वाली स्त्री की मनोदशा का चित्रण करते हुए सामाजिक और नैतिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता को स्थापित करते हैं।
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