शिवकुमार पराग के गजल संग्रह पर हरेराम समीप द्वारा लिखी गई भूमिका
दुष्यन्त कुमार ने अपनी गजलों के माध्यम से हिन्दी गजल को एक नया मोड़ प्रदान किया। इस गजल में माशूका का प्रेम नहीं बल्कि समकालीन समय की आहट थी। इसके खुद के जन सरोकार थे। इसमें बोझिलपना नहीं था बल्कि सहज रूप में यह अभिव्यक्ति को एक नई धार प्रदान कर रही थी। ऐसे में कई अन्य रचनाकार भी गजल विधा की तरफ मुड़े और उसे अपनी रचनाओं के जरिए समृद्ध करने का काम किया। शिव कुमार पराग हमारे समय के ऐसे ही गजलकार हैं। पराग जन आंदोलनों से जुड़े रहे हैं इस नाते उनके यहां जन के प्रति एक सहज प्रतिबद्धता दिखाई पड़ती है। बिना किसी दुराग्रह के वे सहज रूप में ही अपनी बातें बेबाकी से कह डालते हैं। बकौल हरेराम समीप "उनकी ग़ज़लें एक तरफ़ अपने समय की गड़बड़ियों की शिनाख्त करती हैं, तो दूसरी ओर समय के सवालों से टकराती हैं। ऐसा करते हुए वे हमारे समय के प्रमुख जनधर्मी ग़ज़लकार दुष्यन्त, अदम, शलभ, कृषक आदि की समृद्ध परम्परा से जुड़ते हैं। जहां तक शिल्पगत विशेषताओं की बात है, पराग ग़ज़ल की बारीकियों को समझते भी हैं और एक निश्चित सोच के साथ आमजन के हित में ग़ज़लें लिखते भी हैं। इन ग़ज़लों के कथ्य में हमारे समय की क्रूर सच्चाइयाँ और उनके बीच मनुष्य की असहायता की तस्वीरें उद्घाटित होती हैं। ये व्यवस्था के खिलाफ आक्रोश भरी ग़ज़लें बन कर उभरी हैं, जो लगातार विसंगतियों पर चोट करती हैं। लेकिन ध्यान देने वाली बात यह है कि इस आक्रोश ने आस्था व विश्वास की जमीन कभी नहीं छोड़ी है। संघर्ष के बीच कभी हिंसा का समर्थन नहीं किया है।" हाल ही में पराग जी का एक नया गजल संग्रह प्रकाशित हुआ है 'देख सको तो देखो'। इस संग्रह की भूमिका लिखी है हरेराम समीप ने।आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं शिवकुमार पराग के गजल संग्रह पर हरेराम समीप द्वारा लिखी गई भूमिका 'विसंगत वर्तमान से असहमत जनपक्षधर ग़ज़लें'।
'विसंगत वर्तमान से असहमत जनपक्षधर ग़ज़लें'
हरेराम समीप
हिन्दी कविता के अस्सी के दशक में दुष्यंत कुमार की ग़ज़लों की लोकप्रियता के साथ हिन्दी ग़ज़ल की विकास-यात्रा में एक अभूतपूर्व मोड़ आया था। तब सैकड़ों कवि और गीतकार ग़ज़ल-लेखन की ओर उद्धत हुए और दुष्यंत की तरह सामाजिक और राजनीतिक चेतना से ओतप्रोत यथार्थपूर्ण और जनपक्षधर ग़ज़लें लिखने लगे। वरिष्ठ कवि शिवकुमार ‘पराग’ भी हिन्दी एवं भोजपुरी ग़ज़ल की इसी जनपक्षीय परम्परा के सुपरिचित ग़ज़लकार हैं। बेहद मृदुभाषी और शालीन प्रकृति के ‘पराग’ के व्यवहार से आप कतई अंदाजा नहीं लगा पाएँगे कि यह मुस्कराता व्यक्ति अपनी अग्निधर्मी काव्याभिव्यक्ति के कितने ज्वालामुखी अपने अंदर समेटे हुए है। पराग ने रचनात्मक काव्य-लेखन के साथ तत्कालीन जनधर्मी साहित्यिक संस्थाओं जैसे जलेस, जसम आदि के जनांदोलनों में रह कर अनेक कोरस जन-गीत व जन-ग़ज़लें भी लिखी हैं। इस तरह पराग की ग़ज़लें किताब में आने से बहुत पहले ही जनता के दिलों में घर बना चुकी हैं, जो एक जनकवि की पहचान भी होती हैं। यह भी उल्लेखनीय है कि पराग ने हिन्दी के साथ अपनी लोक-भाषा ‘भोजपुरी’ में भी अनेक ग़ज़लें और कविताएँ लिखीं हैं, जो आज बहुत लोकप्रिय हो रही हैं।
श्री शिवकुमार ‘पराग’ का जन्म 3 जुलाई, 1959 में वाराणसी में ही हुआ। अपनी उच्च शिक्षा काशी हिन्दू विश्वविद्यालय वाराणसी से प्राप्त कर वे एक बैंक में कार्यरत रहे। विद्यार्थी जीवन से ही उनकी कविताएं प्रकाशित होने लगीं थीं। 1975 में आपात काल और लोकनायक के ‘सम्पूर्ण क्रान्ति’ आन्दोलन ने उनके लेखन को गति और दिशा प्रदान की। उन दिनों की लगभग सभी बड़ी पत्रिकाओं में पराग जी की रचनाएं निरन्तर प्रकाशित होने लगीं। कमलेश्वर और धर्मवीर भारती द्वारा संपादित पत्रिकाओं जैसे 'सारिका', 'गंगा' और 'धर्मयुग' में पराग की ग़ज़लें उन दिनों प्रकाशित और चर्चित होती रहीं। तब से चली उनकी इस रचना-यात्रा में अब तक उनकी पांच पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें एक ग़ज़ल संग्रह ‘देख सको तो देखो’, एक दोहा संग्रह ‘देश बड़ा बेहाल’, एक कविता संग्रह तथा एक गीत संग्रह है। एक कविता संग्रह भोजपुरी भाषा में भी प्रकाशित हुआ है। उन्होंने जनान्दोलनों पर जनपक्षीय रचनाएँ लिखी तथा वर्षों तक साहित्यिक पत्रिका ‘अभिनव कदम’ के संपादन से भी जुड़े रहे।
अपने बारे में पराग बताते हैं,”नौकरी के क्रम में गांव-गांव घूमता रहा। ग्रामीण-जन की असह्य पीड़ा को देखा तो उनके अपरिमित उल्लास को भी देखा, उनकी चुप्पी देखी तो प्रतिरोध भी, उनका गुस्सा देखा और आसक्ति भी। इन्हीं अनुभूतियों के बल पर ही शायद मैं अपनी कविता के राग को जनता के अनुराग से जोड़ पाया हूँ। बचपन से ही मां-बाप से अलग वनवास जिया है मैंने। इस वनवास ने मुझसे बहुत कुछ छीन लिया, लेकिन दिया भी बहुत कुछ। मेरे बंजारेपन ने मेरी कविता को बहुत समृद्ध किया है, ऐसा मुझे लगता है। आजमगढ़ और मऊ प्रवास के दौरान मेरी जनपक्षधरता को धार मिली। बनारस ने मुझे साहित्य का संस्कार दिया तो आजमगढ़ ने उसे धार दिया और मऊ ने उसे विस्तार दिया। यहाँ मेरी सोच का दायरा विस्तृत हुआ। भाई पंकज गौतम जी के साथ विचार और जयप्रकाश राय ‘धूमकेतु’ जी के विमर्श ने प्रत्यक्षतः और अप्रत्यक्षतः मेरे कवि-व्यक्तित्व को मजबूती दी।’’
हिन्दी ग़ज़ल के सन्दर्भ में पराग ने जो लिखा है, ‘‘हिन्दी ग़ज़लकारों के चलते ग़ज़ल विधा में एक नए किस्म का आवेग आया है। दुष्यंत ने ग़ज़ल को जो जमीन दी, वह इतिहास नहीं, परम्परा बन चुकी है। हिन्दी ग़ज़ल के बारे में यह कहना गलत है कि ‘एस्कैप फ्राम रियलिटी’ वाली शैली में शुद्ध उत्तर मध्यकालीन इश्किया शेरो-शायरी का, बहुत कम तैयारी के साथ लेखन चल रहा है। या फिर एक जिद के साथ सामाजिक सरोकारों को तुकान्त बनाया जा रहा है। सच तो यह है कि हिन्दी ग़ज़ल ने ग़ज़ल की सोच का विस्तार किया है।’’
उनका पहला ग़ज़ल संग्रह ‘देख सको तो देखो’ सन 1993 में प्रकाशित हुआ, इसमें 86 ग़ज़लें संग्रहित हैं। इस संग्रह पर खूब चर्चा हुई, लेकिन चूंकि अब यह संग्रह अप्राप्य है और इस बीच पराग ने अनेक ग़ज़लें लिखी हैं हैं, इसलिए मैंने उन्हें यह प्रस्ताव दिया कि पिछले संग्रह की ग़ज़लों के साथ नयी ग़ज़लों को जोड़ कर एक नया संवर्धित ग़ज़ल संग्रह प्रकाशित किया जाए, बरसों विचार करने के बाद पराग अब राजी हुए है तो यह दूसरा ग़ज़ल संग्रह अब आपके हाथों में है।
इस संग्रह के पहले संस्करण पर अनेक लेखकों के महत्वपूर्ण विचार यहाँ उदधृत किये जा रहे हैं, जो उनकी ग़ज़लों की अहमियत और प्रासंगिकता पर रौशनी डालते हुए डॉ. ब्रजेश पालीवाल लिखते हैं, ‘‘‘देख सको तो देखो’ संग्रह विचारोत्तेजक रचनाओं की सूचना देता है। सत्य की तरफ से कुछ कहने की तड़प या बेचैनी इन रचनाओं के केन्द्र में है। तमाम लोगों के सहमे, दबे, बुझे मन में कवि नयी उमंग का संचार कर रहा है। उसे मनुष्य की स्वार्थपरता तथा महानगरों के आत्मकेन्द्रित जीवन में अपनी सोंधी मिट्टी का सोंधापन प्राप्त नहीं होता। ‘वह’ या ‘वो’ शब्द के माध्यम से वे वर्तमान परिवेश में कभी अपनी या अपने जैसे सोच वाले लोगों की स्थिति, मर्यादा, बेबसी और अपने आदर्शों के लिए बलिदान हो जाने की बात कहता है, साथ ही वह जिस तरह की धरती, व्यवस्था और जिस तरह के लोग चाहता है, उसे स्पष्ट करता है।"
वहीं डॉ. पंकज गौतम के अनुसार, ‘‘इस दशक के युवा कवियों में अपनी काव्यगत चिन्ताओं, सामाजिक सरोकारों और सहज शिल्पगत विशेषताओं के कारण शिवकुमार पराग ने तेजी से अपनी अलग पहचान बनायी है। खासकर ग़ज़लों को पराग ने हिन्दी जाति का संस्कार दिया है। ये ग़ज़लें यथार्थ की जटिलताओं से हमारा परिचय कराती हैं। पराग की ग़ज़लों को उर्दू ग़ज़ल की पारम्परिक कसौटी पर कसना सही नहीं है और भाषा के स्तर पर तो कतई नहीं। वे उर्दू ग़ज़ल की परम्परा या असर से अनभिज्ञ हैं या नहीं, उससे मुक्त जरूर हैं। उन्हें हिन्दी में ग़ज़ल के नाम पर उसके फार्म में कविता लिखी गयी है। न ही वे हिन्दी-उर्दू ग़ज़ल के विवाद में फँसते हैं क्योंकि उनके लिए कविता को अपने समय के मुददों और प्रश्नों से सम्बद्ध कर, कविता की शर्तों पर सम्प्रेषण का प्रश्न, रूप की अपेक्षा अधिक महत्वपूर्ण है, इसके लिए किसी भी काव्य-रूप को अपनाने, उसमें हस्तक्षेप या तोड़-फोड़ करने में हिचक नहीं होती। उनकी ग़ज़लों में लगभग पंद्रह वर्षों की हलचलों और सामाजिक, राजनीतिक गतिविधियों के टूटे-बिखरे, आधे-अधूरे किन्तु मार्मिक और सजीव अक्स एक ओर हैं, तो ललकार और चेतावनी के ध्वनि-बिम्ब दूसरी ओर, बीच में है अंतःसलिला सरस्वती की तरह विचार-बोध और भाव-बोध का ऐन्द्रिक एकात्म। इस संग्रह की ग़ज़लों का मूल स्वर बेचेनी है। यह बेचैनी समकालीन राजनीति की दरारों और उनकी परिणतियों से उपजी है। इसलिए इनमें तात्कालिकता की गूंज ज्यादा सुनाई देती है और अनायास ही में, मेरी और मेरा आत्मबोधक शब्द उभर आते हैं लेकिन यही तो इन ग़ज़लों की खासियत है।’’
डॉ. कुंअर बेचैन ने लिखा है कि ‘‘शिवकुमार जी की ग़ज़लें दहकती हुई आग की लपटों का संगीत हैं। वह आज जो अंधकार में रोशनी बनने के लिए व्यग्र है और जिसकी चिंगारियाँ उड़-उड़ कर यह संदेश दे रही हैं कि अंधकार के वो दिन जाने वाले हैं और एक नई रोशनी का आगमन होने वाला है।’’
डॉ। वशिष्ठ अनूप लिखते हैं कि ‘‘पराग जी की ग़ज़लें देश के बहुसंख्यक मेहनतकश जनता के जीवन और उसकी धड़कनों से जुड़ी हैं। उनकी ग़ज़लों में इसी जनता जिसे जन-सामान्य या आम आदमी कहा जाता है, के जीवन की समस्याओं का बहुत प्रामाणिक चित्रण हुआ है। उन्होंने यह देखा है कि वह किसान और मजदूर वर्ग जो प्रगति के रथ की धुरी, पहिया और अश्व सब कुछ हैं, प्रगति से कोसों पीछे आदिम युग की बर्बरताएं झेल रहा है। वह वर्ग, जो सब कुछ उत्पन्न करता है, हर चीज बनाता है, वह स्वयं मूल्यहीन और नाचीज है। उसका पेट भूखा है, शरीर जर्जर है, सपने लहूलुहान हैं और आँखों में आँसुओं का ताल है-
"नीली-नीली रेखाओं के जाल हमारी आंखों में
देख सको तो देखो सूखे ताल हमारी आँखों में”
और भी अनेक लेखकों तथा पाठकों ने उनके संकलन की ग़ज़लों पर विस्तार से चर्चा की थी। यहाँ पुन: मैं पराग के इस समग्र संकलन की ग़ज़लों के चुनिन्दा अशआर से उनकी रचनाशीलता को उजागर करता हूँ। सबसे पहले इन ग़ज़लों के मिज़ाज को समझने के लिए उनके आत्मकथ्य की तरह आए कुछ शेर दृष्टव्य हैं-
लोहा हूँ हथौड़ों की चोट खा रहा हूँ मैं
शोलों में तप कर लाल हुआ जा रहा हूँ मैं
वर्तमान आँधियों में ख़ुद को पाने का अहसास कराता पराग का यह शेर उनकी संवेदना को यूँ उजागर करता है-
मेरा भविष्य हादसों के पार जाएगा
हाँ, वर्तमान आंधियों में पा रहा हूँ मैं
मैं बिजलियों की आँख का तारा हूँ दोस्तो
अँधी गुफा में जलती ग़ज़ल गा रहा हूँ मैं
कवि अपने सरोकार स्पष्ट करते हुए कहता है कि ‘अंधी गुफा में जलती ग़ज़ल ग़ा रहा हूँ मैं’। कठिन यथार्थ के बीच सार्थक राह खोजने की यह अभिव्यक्ति है। वास्तव में जीवन को देखने और परखने की पराग की यह दृष्टि उन्हें दूसरों से अलग करती है। इनकी बिम्बधर्मी चेतना के ये उदाहरण भी देखें-
कोई लहर, कोई हलचल, कोई आवाज़ नहीं,
थका-थका सा समुन्दर दिखायी देता है।
टहनी-टहनी दर्द बिछे हैं पत्ते-पत्ते अफसाने
तड़प रहा है कल्पवृक्ष मैं खड़ा हुआ हूँ सिरहाने
अथवा यह-
वक्त के थपेड़ों से हम बहुत बचाते हैं,
जाने कैसे सपने हैं, टूट-टूट जाते हैं।
‘सपनों का टूट-टूट जाना’ साधारण जन के प्रति कवि की स्पष्ट प्रतिबद्धता व्यक्त करता है। वहीं इन समस्याओं के हल के लिए आदमी को प्रयास करने हेतु जागृत करने में कवि जुटा हुआ है-
कोई तरकीब सोचिए कैसे
धुंध से रोशनी में आएं हम
जीवन की सबसे बड़ी सच्चाई है, भूख। हमारे देश में एक बहुत बड़े वर्ग को भूख के लिए तरसना होता है। समाज की बहुत बड़ी आबादी आज भी रात को भूखा सोती है, इससे बड़ा हमारा दुर्भाग्य क्या हो सकता है।
भूख के दृश्य जब भी आते हैं। आम आदमी की इसी पीड़ा पर कवि कहता है-
हम बहुत देर तिलमिलाते हैं
पराग ग्रामीण पृष्ठभूमि से आते हैं इसीलिये यहाँ ग्रामीण जीवन का चित्रण बहुत प्रामाणिक व मर्मस्पर्शी हुआ है-
इतना आदर दिया गया मुझको
फूस का घर दिया गया मुझको
चैन की बाँसुरी मिली उनको
आह का स्वर दिया गया मुझको
यही वजह है कि वे अपनी ग़ज़लों के द्वारा लगातार किसान और मजदूर के समर्थन में आवाज उठाते हैं-
नारों, वादों, सपनों सूखे होठों की टकराहट से
आते रहते हैं अक्सर भूचाल हमारी आँखों में
क्यों उजाला हमें नहीं मिलता
चांद सूरज निकलते रहते हैं
लेकिन इस नकली लोकतंत्रीय व्यवस्था में आम आदमी के लिए जीवन जीने के साधन उपलब्ध नहीं हैं , उसके काम नहीं हो रहे हैं जबकि स्वार्थी लोग यहाँ मौज उड़ा रहे हैं। अयोग्य व गलत लोग पद-प्रतिष्ठा पा रहे हैं और सही आदमी को उपेक्षा, तिरस्कार, यातना मिल रही है-
जब भी सच का साथ निभाया,
ख़ुद को बहुत अकेला पाया।
कोर्ट-कचहरी, थाना-ऑफिस, साहेब-बाबू, मंत्री जी,
लोकतंत्र के वध में देखो शामिल पूरा लश्कर है।
हरेक फूल की आँखों में हादसों के जुलूस,
ये कैसा बाग और कौन इसका माली है!
जिनके अपने पाँव थे वे दौड़ से बाहर हुए
और फिर बैसाखियों को ताज पहनाया गया
ऐसे स्वार्थपूर्ण वातावरण में जहाँ राजनीति ने भी भ्रष्टाचार और नौकरशाही के जाल में आम जन को भटका दिया है और जन-कल्याण कार्य निरस्त हो गए हैं। कवि देख रहा है कि भ्रष्टाचार का यूँ बोलबाला है कि यह रोग की तरह पूरे समाज में बिखर गया है–
बादलों से निकल पड़ा लेकिन
रास्ते में बिखर गया पानी
अथवा यह कि-
सुबह से राशन की लाइन में खड़े-खड़े दोपहर हुई
देखो पेट खेलावन का कब आता उसका नंबर है
जो विकास का महल आंकड़ों में दिखलाया जाता है
जाओ कभी पास से देखो झरता हुआ पलस्तर है
ये झरता हुआ पलस्तर इस लोकतंत्र की इमारत के पतन का प्रतीक है। यह पतन विकास के नाम से हो रहे पर्यावरण और प्रकृति के दोहन का भी है जो अस्तित्व के खतरे की तरह आया है। बेलौस बात कहने में वह अपने भीतर ‘कबीर’ को पाता है। उसका ‘कबीर’ हर गलत बात के विरुद्ध प्रतिरोध के लिए तंज़ करता है-
ये तो सहने की हद हो गई
खून अब भी उबलता नहीं
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| शिवकुमार पराग |
कवि मानता है कि यह मुर्दनी पहले से ही दबे, कुचले लोगों पर लगातार हो रहे शोषण और दमन का परिणाम है, जो रोजाना खबरों में आती हैं। साथ ही सशक्त प्रतिवाद भी उभरने लगा है-
दलितों को अब और दबाया जाना बहुत बुरा होगा
एक हाथ में संविधान है एक हाथ में पत्थर है
दूसरी तरफ महानगरों के विकास और धन के केन्द्र बनते नगरों में गांवों से तेजी से पलायन ने मध्यमवर्गीय मानसिकता का नया वितान खड़ा कर दिया है। जहाँ नकलीपन दिखावा और ईर्ष्या जीवन के अंग बन गए हैं-
यहां कहां तुम खोज रहे हो सौंधी मिटटी, अपनापन
महानगर है, महानगर की बात निराली होती है
और यह कि-
मुस्कराने की व्यर्थ कोशिश में
अब तो बस होंठ थरथराते हैं
पांवों में नहीं बेड़ियों न हाथ बंधे हैं
फिर भी हमारा मन तो हुकूमत का दास है
इसी नयी आत्मकेन्द्रित संस्कृति ने हमारे आपसी संबंधों का अवमूल्यन कर दिया है। सम्बन्धों में स्वार्थ और नकलीपन ने जगह पा ली है और विश्वास का धरातल खिसकने लगा है-
जो अँधेरों के समर्थन में थे,
धूप के पोस्टर उठाये हैं।
कवि के स्वभाव में प्रतिरोध है, उसे झुकना स्वीकार नहीं। तरह-तरह के प्रलोभन भी उसे विचलित नहीं कर पाते हैं। देश स्तर पर अंतराष्ट्रीय स्तर पर स्वाभिमान को गिरवी रख कर हो रहे समझौतों से कवि अपनी असहमति व्यक्त करता है-
मुझको झुकना कबूल हो जाता
उनके हाथों का फूल हो जाता
राजनीति ने समाज में धार्मिक सांस्कृतिक विघटन के लिए साम्प्रदायिकता को अस्त्र बनाया है और समाज में भय व आतंक फैला है, हमारे धर्मनिरपेक्ष ढांचे को यूँ तितर-बितर किया जा रहा है-
इतने मजहब है जोड़ने वाले
और तेजी से बंट रहे हैं लोग
कट्टरता और आतंकवाद ने संसार में प्रत्येक व्यक्ति को भय और असुरक्षा के साए में जीने पर मजबूर कर दिया है। शासन व्यवस्था इसे बढ़ा रही हैं। व्यवस्था की जड़ों में छिपे इस दुराग्रह और षड्यंत्र का पर्दाफाश करते इस शेर को देखिये-
आँधी की आशंका पत्थर का डर है
बालू की नींव और शीशे का घर है
समाज में जो आर्थिक, सामाजिक और सास्ंकृतिक असमानता निरन्तर बढ़ती जा रही है। वे उस पर निरंतर चोट करने से नहीं चूकते-
हर समय वे दुलारे गये
एक हम ही तो मारे गए
बाजार के विकास के साथ ही उपभोक्ता-संस्कृति का विकराल रूप बढ़ता जा रहा है। बाजार और उपभोक्तावाद से पराग का ये शेर हमें सावधान करता है-
ऐसी कविता प्यारे लिख
जो मन को झंकारे लिख
सिर पर है बाजार चढ़ा
जो यह ज्वार उतारे लिख
इस चमचमाते बाजार के नेपथ्य में गहरा अन्धेरा बाताता शेर भी देखें-
निआन रोशनी की गोद में दिवाली है
खुली जो आँख तो देखा कि रात काली है
भारतीय राजनीति की विद्रूपताएं इतनी भयावह हो गई हैं कि अब हमें अपने संविधान, अपनी लोकतंत्रीय आस्थाओं पर संदेह होने लगा है, जनशक्ति पर आशंका होने लगी है-
लोगों को उनके आगमन की गंध लगी है
कालीन हैं हम ठीक से फैलाए गए हैं
हम बहुत चाहते हैं मगर
रुख हवा का बदलता नहीं
पराग की ग़ज़लों में प्रतिरोध की यह चेतना उनकी सामाजिक, राजनीतिक चेतना का ही उत्कर्ष है।अतः कह सकते हैं कि पराग मूलतः चिन्ता और प्रतिरोध के कवि हैं-
धीरे-धीरे आगे बढ़ते जाते हम
राजमहल में दहशत भरते जाते हम
अम्न और शान्ति का आह्वान करते हुए पराग बार-बार प्रेम व इंसानियत बचा कर रखने की अपील करते हैं। उनकी ये ग़ज़लें सांप्रदायिक विद्वेष के खिलाफ खड़ी रहकर लोकतंत्र, समन्वय, समरसता और एकता के प्रति अटूट आस्था का आह्वान करती हैं-
गर हो सके तो अब कोई शम्मा जलाइये,
इस दौरे सियासत का अंधेरा मिटाइये।
पराग ने सामाजिक बदलाव का अपना ध्येय घोषित कर दिया है। इसके लिए उसे रचनात्मक राह ही सही लगती है। साहित्य या कहूं सृजन के जरिए संघर्ष का आह्वान करता है- एक बेहतरीन संघर्षधर्मी शेर उद्धरणीय बन पड़ा है यहाँ-
हाथ कुछ तो आएगा वो जीत हो या हार हो
जिन्दगी की आंख से आंखें मिला कर देखिए
तिनका-तिनका जुटा के लाती रही,
ज़िंदगी घोसला बनाती रही।
वे स्वयं से भी यही कहते हैं कि-
कोई रास्ता इस तरह का निकालो
मेरी आंख में रोशनी है बचा लो
कवि की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि इतनी ऊहापोह में भी उसकी उम्मीद या आशा का स्वर कभी मद्धिम नहीं पड़ा है-
हर तरफ अंधकार है फिर भी
आस के दीप टिमटिमाते हैं
सुबह आई है नए परचम उठा कर देखिए
धूप उम्मीदों में होती है जा कर देखिए
उम्मीदों की धूप इन ग़ज़लों में बार-बार उतरते-चढ़ते प्रयत्न का संदेश देती है। एक पौराणिक प्रतीक के प्रयोग से यह बात अधिक असरदार होकर आई है कि-
ये दौर मांगने से रास्ता नहीं देगा
समुद्र जड़ रहेगा विनतियाँ हजार करो
पराग जानते हैं कि समाज में परिवर्तन आसानी से नहीं बल्कि संघर्ष और बलिदान के रास्ते से आता है। कविता की सामाजिक, राजनीतिक भूमिका और हिन्दी ग़ज़ल के तेवर को लेकर पराग बहुत गंभीर हैं-
उखाड़ फेंकना आसान तो नहीं लेकिन
हवा को, लहर को तैयार कर रहा हूँ मैं
जो गिर पड़े हैं उन्हें शब्द सहारा देंगे
ग़ज़ल की सोच का विस्तार कर रहा हूँ मैं
परिवर्तन की आस लगाये बैठा हूँ,
अब भी थोड़ी आग बचाये बैठा हूँ।
बिना समय गंवाए क्रान्ति की दिशा निर्धारित करते हुए ग़ज़लकार कहता है कि-
ये वक्त बोलने का नहीं तेज होड़ लो
लोहा गरम है चोट करो और मोड़ लो
मुल्क के मसीहाओ! तुम तो जानते होगे,
हम जो सिर उठाये हैं, तख़्त डगमगाये हैं।
यहां गुफ्तगू का अंदाज देखिए कि-
रस्सी नहीं है रोशनी की गाँठ पड़ेगी
फिर आओ और खुद को उजाले से जोड़ लो
यहां अपने अधिकार के लिए संघर्ष और उन्हें प्राप्त करने के लिए कोई कसर नहीं रखने की सलाह देता कवि निर्भीकता से कहता है-
जिस पेड़ में रोटी के फूल देख रहे हो
उस पर किसी तरह से चढ़ो और तोड़ लो
वे इस संघर्ष को और स्पष्ट करते हुए आगे कहते हैं कि-
चलो बतायें उन्हें सच का सामना करना,
वो रंग - रंग के सपने संजोये रहते हैं।
कल तो हम भीड़ थे हम शोर थे हम कुछ भी न थे
आज हम खुद को कतारों में सजा लें यारो
हरेक सच तुम्हारे सामने खड़ा होगा
तुम अपने झूठ के पर्दे को तार-तार करो
वे इस जड़ता के और न बढ़ जाने की आशंका के तहत अपनी सोच में ऊष्मा को प्रवाहित करने की सलाह देते हैं। सामाजिक सौद्देश्यता इनकी ग़ज़लों में आह्वान की तरह आती है-
बर्फ दिल में उतर न जाए कहीं
सोच में आग तो जलाएं हम
और इसके लिए अपने हृदयों में तपिश पैदा करने एवं कोई भी खतरा उठाने का आह्वान करते हैं -
इतना खतरा चलो उठाएं हम
अपने भीतर तो सुगबुगाएं हम
भीगे-भीगे-से लग रहे हैं लोग,
धीरे-धीरे सुलग रहे हैं लोग।
पराग अपने शेरों के माध्यम से जन-जन तक हिम्मत और हौसला बनाए रखने का संदेश पहुंचाते हैं-
हार जीत जो हो सो हो
लेकिन मन न हारे लिख
उपर्युक्त अध्ययन से यह स्पष्ट हो जाता है कि ये विसंगत वर्तमान से असहमति दर्शाती जनपक्षधर ग़ज़लें हैं। चूंकि शिवकुमार पराग एक प्रतिबद्ध जन-ग़ज़लकार हैं। उनके रचनात्मक सरोकार जन-जीवन से सन्नद्ध हैं। वे यह स्पष्ट करते चलते हैं कि उनके शेर उनकी संघर्षचेतना के संवाहक हैं, जिनमें जागरण का वह स्वर है, जो उन्हें एक जनपक्षधर ग़ज़लकार के रूप में परिचित कराता है। उनकी ग़ज़लों में ऐसे अनेक पैने और धारदार शेर हैं, जो उनके ग़ज़ल-सृजन की सार्थकता सिद्ध करते हैं। उनकी ग़ज़लें एक तरफ़ अपने समय की गड़बड़ियों की शिनाख्त करती हैं, तो दूसरी ओर समय के सवालों से टकराती हैं। ऐसा करते हुए वे हमारे समय के प्रमुख जनधर्मी ग़ज़लकार दुष्यन्त, अदम, शलभ, कृषक आदि की समृद्ध परम्परा से जुड़ते हैं। जहां तक शिल्पगत विशेषताओं की बात है, पराग ग़ज़ल की बारीकियों को समझते भी हैं और एक निश्चित सोच के साथ आमजन के हित में ग़ज़लें लिखते भी हैं। इन ग़ज़लों के कथ्य में हमारे समय की क्रूर सच्चाइयाँ और उनके बीच मनुष्य की असहायता की तस्वीरें उद्घाटित होती हैं। ये व्यवस्था के खिलाफ आक्रोश भरी ग़ज़लें बन कर उभरी हैं, जो लगातार विसंगतियों पर चोट करती हैं। लेकिन ध्यान देने वाली बात यह है कि इस आक्रोश ने आस्था व विश्वास की जमीन कभी नहीं छोड़ी है। संघर्ष के बीच कभी हिंसा का समर्थन नहीं किया है।
यहाँ पराग की प्रगतिशील चेतना उनमें नया आयाम और नया युगबोध भरती है। इसका एक कारण यह है कि ये ग़ज़लें वैयक्तिक भाव-भूमि पर आधारित न हो कर वैचारिक और सामाजिक भूमि पर अवस्थित हैं। इन ग़ज़लों में भारतीय समाज-व्यवस्था की जटिलताओं के अनेक चित्र मिलते हैं। पराग जानते हैं कि आज की ग़ज़ल का रुझान भी कल्पना या भावना की ओर नहीं बल्कि यथार्थबोध की ओर है और विशेषत: राजनीति के यथार्थ पक्ष को मुखरता के साथ प्रस्तुत किया गया है।
दरअसल कहन और भाषा का मुहावरा दो ऐसे बुनियादी तत्व हैं, जिनसे ग़ज़ल असर पैदा करती है और वह पाठक की स्मृति में जगह बनाती है। इन ग़ज़लों में ग़ज़ल की कारीगरी से अधिक प्रतिरोध, संघर्ष, और इंसानियत का स्वर पाठकों को रिझाता है। संवेदनशीलता पराग की ग़ज़लों का जीवंत तत्व है। दलित, वंचित और उपेक्षित के दुख को जानना-समझना उनकी रचनात्मकता का पहला सोपान है। अपनी सजल आंखों से मानवीय न्याय के लिए यह छटपटाहट शब्दों में ढलकर दुखिया के दर्द को रूपायित करती हैं। इन ग़ज़लों में उन असहाय दिलों का सामूहिक आर्त्तनाद है, जो निरन्तर शोषण का शिकार हो रहे हैं। तात्पर्य है कि आज के आमजन की बेचैनी बार-बार इन ग़ज़लों में सामने आई है। इनकी अनुभूतियों में मौलिकता है। उन्होंने जनता के दुख दर्द को महसूस किया और उन्हें अपनी ग़ज़लों में ढाला है।
जहाँ तक प्रतिबद्धता का सवाल है, यह प्रतिबद्धता हिन्दी ग़ज़ल में अनेक स्तरों पर मुखरित हुई है। अपने रचना कर्म में प्रत्येक ग़ज़लकार सोद्देश्य होता है। प्रतिबद्धता रचना की विषयवस्तु के प्रति रचनाकार की एकाग्रता बनाए रखने में बड़ी सहायक होती है। पराग जनता से प्रतिबद्ध हैं, किसी वाद से नहीं। उनकी ये ग़ज़लें व्यवस्था को चुनौती देती हैं और इसमें परिवर्तन का आह्वान भी करती हैं और सामूहिक संघर्ष की प्रेरणा भी देती हैं। वे सदैव प्रगतिशील मानव मूल्यों के लिए संघर्षरत गजलें हैं।
आशय यह है कि पराग एक सुलझे हुए तथा संवेदनशील ग़ज़लकार हैं। उनकी ग़ज़लों का सीधा सम्बंध भारतीय सामाजिक व्यवस्था, और विशेषकर मजदूर, किसान और सामान्यजन के जीवन से है। वे हिन्दी और अपनी मातृभाषा भोजपुरी की ग़ज़लों में आमजन की चिन्ताओं को विषय बनाते हैं तभी तो इनमें आम इंसान का दर्द और आकांक्षाएं व्यक्त हुई हैं। हाँ यह अवश्य है कि उनकी शायरी में यथार्थ का इतना दबाव है कि रुमानियत का पक्ष कहीं दब गया है। इस तरह कवि का मन रागात्मकता से आगे मानवीय-व्यथा का आइना बनकर उपस्थित हुआ है। उनकी ग़ज़लों ने ग़ज़ल के ख्याल, मिजाज और कहन की नज़र से जो मुकाम हासिल किया है, वह आश्वस्त करता है। इस तरह शिवकुमार पराग की ये ग़ज़लें पाठक में आत्मविश्वास जगाती हैं। वे आशा, आस्था और विश्वास से भरे हुए ग़ज़लकार बनकर सामने आते हैं, जिसकी तस्दीक इनके शेर बराबर करते हैं। ‘देख सको तो देखो’ संग्रह की ये जीवन्त ग़ज़लें हैं,जिनसे हिन्दी ग़ज़ल निस्संदेह समृद्ध हुआ है। अतः यह कहा जा सकता है कि शिवकुमार पराग की ग़ज़लों की महत्ता और प्रासंगिकता पर विस्तार से चर्चा आवश्यक है।
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| हरिराम समीप |
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शानदार। दोनों मित्रों को शुभकामनाएं
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