परांस-10 : कुंवर शक्ति सिंह की कविताएँ
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| कमल जीत चौधरी |
इस दुनिया में जितने भी व्यक्ति हैं सभी में असाधारणता है। भले ही वे साधारण दिखें, लेकिन उनका हुनर, उनकी खूबी अपनी होती है। साधारण होने का भले ही दिखावा कर लिया जाए, साधारण होना आसान नहीं होता। इन लोगों में से कोई एक कौटिल्य निकल आता है, इनमें से कोई एक आर्यभट्ट हो जाता है। इनमें से कोई एक 'सेव पेड़ से नीचे ही क्यों गिरा, आसमान में क्यों नहीं उड़ गया' जैसे हास्यास्पद से लगने वाले सवाल से दुनिया को बदल देने वाले एक सिद्धांत की खोज कर डालता है। कुंवर शक्ति सिंह के शब्दों में कहें तो ये लोग कमाल के होते हैं। ये वे कमाल के लोग हैं जिन्होंने इस दुनिया को बेहतर बनाने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है कुंवर शक्ति सिंह अपनी कविता में लिखते हैं : 'कमाल कमाल के लोग/ तुम्हारे घर के पीछे/ पार्क में टहल रहे होते हैं/ फुटपाथ पर बिछी दुकानों पर/ किताबें बीन रहे होते हैं/ कमाल-कमाल के लोग/ फैज़, नेरुदा, रजनीश को जब चाहें/ नींद से उठा लेते हैं/ यह कमाल-कमाल के लोग/ कहीं सुदूर/ जंगली फूल चुन रहे होते हैं।' इस बार के परांस के हमारे कवि यही कुंवर शक्ति सिंह हैं।
अप्रैल 2025 से कवि कमल जीत चौधरी जम्मू कश्मीर के कवियों को सामने लाने का दायित्व संभाल रहे हैं। इस शृंखला को उन्होंने जम्मू अंचल का एक प्यारा सा नाम दिया है 'परांस'। परांस को हम हर महीने के तीसरे रविवार को प्रस्तुत कर रहे हैं। अपरिहार्य कारणों से इस महीने यह कॉलम चौथे रविवार को प्रस्तुत किया जा रहा है। इस कॉलम के अन्तर्गत अभी तक हम अमिता मेहता, कुमार कृष्ण शर्मा, विकास डोगरा, अदिति शर्मा, सुधीर महाजन, दीपक, शाश्विता, महाराज कृष्ण संतोषी और मनोज शर्मा की कविताएं प्रस्तुत कर चुके हैं। इस क्रम में आज हम दसवें कवि कुंवर शक्ति सिंह की कविताएं प्रस्तुत कर रहे हैं। कॉलम के अन्तर्गत कवि की कविताओं पर कमल जीत चौधरी ने एक सारगर्भित टिप्पणी लिखी है। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं कुंवर शक्ति सिंह की कविताएं।
परांस-10:
रह गया बाक़ी तुम से... जीने की ज़रूरत कहना
कमल जीत चौधरी
कुंवर शक्ति सिंह; अपने जीवन के कुंवर हैं। इस कुंवरपन में वे हरफ़नमौला हैं, और एक कवि हैं। वे डोगरी के सुप्रसिद्ध कवि पद्म सिंह निर्दोष जी के पुत्र हैं। निर्दोष जी का सम्बन्ध राज परिवार से था। जम्मू-कश्मीर में डोगरा शासन आने पर इनके परिवार को इनका कलीठ (अखनूर से बीस किलोमीटर दूर) का किला और 84 गाँवों की जागीर दे दी गई। पद्म सिंह निर्दोष ने राज परम्परा से परे; कविताई, और लोकमानस को चुना। वे 1994 में दुनिया छोड़ गए। उनकी छोड़ी हुई दुनिया में शक्ति सिंह पहले ही अपनी एक दुनिया बना चुके थे, जो कुछ बदलावों के साथ आज भी कायम है। कुंवर शक्ति सिंह ने स्वयं का वरण किया है। उनका कवि-लेखक और पत्रकार होना भी; उन्होंने स्वयं चुना है। इस स्वयं को वे जिन भावों और शिल्प में पेश करते हैं, उसका प्रतिनिधित्व निम्नलिखित काव्य-पंक्तियाँ कर सकती हैं:
'कई भजन, गंगाजल और
पूजा के फूल थे
उसकी आँखों में
बांसुरी की एक तान जैसी थी
उसकी पूरी उम्र,
उसका अस्तित्व उसका जिस्म था
जैसे हवा में उड़ता रंग रूहानी
उसका हर प्रेमी अज्ञातवास में मोक्ष पा लेता था
सबको अपनी मंज़िल सा लगता था
डूबते हुए सूरज की कोई किरण तोड़ लेता था
रात भर के लिए'
(निर्वात)
यहाँ भरपूर कविताई है। 'आँखों में भजन, गंगाजल और पूजा के फूल देखना', 'उम्र को बांसुरी की तान में सुनना', 'डूबते सूरज की किरण तोड़ना' अभिभूत करता है।
उनकी लगभग सभी कविताएँ पढ़ीं। पढ़ कर जो महसूस हुआ, उसे रेखांकित करने का प्रयास किया है:
● वे अपने पक्ष से अधिक अपने विरुद्ध जाते हुए भी देखे जा सकते हैं। इनका यह विरुद्ध या विपरीत उनका एक हासिल है या एक सीमा, यह इनकी अगली काव्य-यात्रा से मालूम होगा।
● शक्ति की कविताई कुछ खाली और अधूरा छोड़ देने की इच्छा-भाव से भरी है। यह एक साध की तरह है। 'वे कविता-कला को हथियार या रचनात्मकता नहीं, बल्कि अपने मन की बोली कहते हैं।' यह अपने पिता, स्वयं से और चिनाब दरिया से बहुत प्यार करते हैं। प्यार इनकी उर्जा है। इनका प्यार; इनके अनकहे में अधिक है, कहे में कम। स्त्री पक्ष की इनकी कविताएँ और भी चुप हैं। अपनी शुरुआती दो-तीन कविताओं में वे बहुत लाउड हैं, जैसे 'विद्रोह' शीर्षक कविता में, मगर बाद में वे नीरवता की हद छूते हैं, और उसमें उदास होते हैं:
'बिजली की तारों पर मौन बैठ गए हैं शब्द
और प्रेम का सूरज ढल रहा है तन्हा
इसी शहर में-
तुम कोई घर सजा रहे थे
खिड़की से सूरज को
बार-बार कह रहे थे
'अब डूब जाओ... हो सके तो सदा के लिए'
एक उदास शाम...
हाँ, तुमने सिर्फ़ कहा नहीं
बस, मैंने ही ले लिया
देश निकाला।'
(एक उदास शाम)
वे नाराज़गी प्रकट करते हैं मगर कविताओं में खीझते नहीं हैं। वे स्वयं को अधिक सुनते हैं, और सुनते हुए ही कविताएँ लिखते हैं। इन्हें पढ़ते हुए; स्वयं को सुनना चाहिए। इससे उन कविताओं की असम्प्रेषणीयता भंग होगी, जिन पर दुरूह, अस्पष्ट और अबूझ होने के आक्षेप लग सकते हैं।
● यह न्यायसंगत होगा कि इनकी कविताओं में वैचारिक स्टैंड्स और जोखिम न ढूंढ़े जाएँ। इसके लिए इनकी पत्रकारिता का मूल्यांकन करना अधिक ठीक रहेगा। यह कार्य किसी अन्य साथी के हिस्से में छोड़ता हूँ। जहाँ तक कवि होने की बात है तो शक्ति सिंह अव्यवस्था, शोषण, ग़रीबी, साम्प्रदायिकता, फासीवाद आदि की शिनाख़्त और तस्दीक़ करने के कवि नहीं हैं। वे मुख्य रूप से इससे त्रस्त वैयक्तिक-आंतरिकता की गहन पड़ताल करने वाले कवि ठहरते हैं। वे व्यक्ति की सीमाओं और काल को अभिव्यक्त करने वाले कवि हैं। उनकी राजनैतिक चेतना; हिन्दी की प्रगतिशील परम्परा के सांचे में कम ढलती है। हालांकि इनकी कुछेक कविताओं में सत्ता के विरुद्ध साहस भरा प्रतिरोध है। यह अच्छा है कि वे ईश्वर और धर्म को देखने का नज़रिया बदलने की बात करते हैं। 'विद्रोह' शीर्षक कविता में शोषकों की दुनिया को नष्ट करने का आह्वान भी करते हैं:
'हम मिल कर जला देंगे तुम्हारा शहर
जहाँ सिर्फ़ तुम रहते हो
बाकी सभी तुम्हें सहते हैं ...
हम तुम्हें ढूँढ़ लेंगे
तुम्हारी खोपड़ी लगाएँगे
किसानों के खेतों में कौओं को उड़ाने के लिए...
तुम उलटी गिनती गिनना शुरू करो
चार... तीन... दो...एक।'
(विद्रोह)
यह शुरुआती कविताएँ शक्ति सिंह की नींव हैं। मगर यह शक्ति सिंह की कविताई का मूल स्वभाव नहीं है। अपनी एक सुप्रसिद्ध कविता, 'नबील अहमद के लिए' में; वे मुखर हो कर भी बहुत सयंत स्वर में प्रतिरोध जताते हैं:
'यार नबील! तुम्हारे लहजे-तुम्हारी जवानी की क़सम
तुम से जब मिला था
तुम में नज़र आई थी एक मुकम्मल संस्कृति।
भारत की ज़मीन पर पाँव रखते ही
भले ही कस्टम वालों ने
तुम्हारा लैपटॉप खाली कर दिया था
मगर तुम्हारी सबसे अहम चीज़
फिर भी तुम्हारे साथ रही
कई बार सोचता हूँ-
'मैं क्यों भुला दूँ नबील को, सियालकोट को या तुम्हें पाकिस्तान?'
मैं क्यों भुला दूँ मेंहदी हसन, फहमिदा रियाज़ या मल्लिका पुखराज को?'
(नबील अहमद के लिए)
यह कविता आत्मीयता की ज़मीन पर लिखी गई है। यहाँ भारतीयता के दो बड़े मूल्यों, 'वसुधैव कुटुम्बकम' और 'विश्व बंधुत्व' की भावना निहित है। कुंवर शक्ति सिंह की दादी माँ सियालकोट की थीं। भले हमारे देश का विभाजन हो गया, मगर भारत-पाक की साझी संस्कृति और इधर-उधर फैली इसकी जड़ें हमें जोड़ती हैं। इसी विरासत के चलते शक्ति सिंह इस कविता में लिखते हैं:
'सरहद पर बीड़ियां बदलते दो किसानों की खातिर
फ़ैज़ की ग़ज़लों और लाहौर की गलियों की खातिर
अगर मैं कह भी दूँ- 'पाकिस्तान ज़िन्दाबाद'
तो लोगों को क्यों लगे
कि मैंने भारत को कोई गाली दी है।'
(नबील अहमद के लिए)
नबील अहमद शक्ति के दोस्त हैं। आख़िर दोस्त हैं, अगर यही कविता वे लिखते तो यक़ीनन इस तरह लिखते:
'सरहद पर बीड़ियां बदलते दो किसानों की खातिर
पाश की कविताओं और अमृतसर की गलियों की खातिर
अगर मैं कह भी दूँ- 'हिन्दोस्तान ज़िन्दाबाद'
तो लोगों को क्यों लगे
कि मैंने पाकिस्तान को कोई गाली दी है।'
पाकिस्तान में इसे इस तरह से पढ़ा जाना चाहिए। यह कविता दोनों देशों के जन के लिए बहुत लाभदायक है।
शक्ति; अपने दोस्तों के प्रति प्यार से भरे रहते हैं। अपने एक प्रिय साथी मोहसिन की असमय हुई मृत्यु पर हृदयविदारक वेदना से भर उठते हैं। यह कारुणिक अभिव्यक्त दुर्लभ है:
'जासमीन का फूल था वो
मुरझाने से पहले
टूट कर बिखर गया
सब का कहना है-
'मोहसिन तो मर गया है'
मुझसे, मेरे भीतर से
कोई बार-बार कह रहा है
बाँध टूट गया है, शहर बह गया है
यह कहाँ की है खुदाई
कि जगह-जगह नज़र आते
उसके फूल से चेहरे पर
मुझे काली स्याही फेंक देनी होगी
घाव होने के कारण
मुझे जिस्म का वह हिस्सा ही काट देना होगा।'
इस कविता में एक न भूलने वाला शोक गीत सुनाई देता है। इनके यहाँ भीतर की टूटन, अजनबीपन, आवारगी, विभाजन, विस्थापन और व्यर्थता बोध को भी देखा जा सकता है। बाहरी सत्ताओं की क्रूरता से अधिक इन्हें अन्दर के सवाल मथते हैं, बेचैन करते हैं। वे लिखते हैं:
'जो बरस मैं जिया नहीं,
क्या उनके बदले मेरी उम्र लम्बी हो जाएगी?'
● आलोच्य कवि के लेखन की जड़ें; पैरों में नहीं बल्कि इनके पंखों में हैं। यहाँ कवि के पैर नहीं, बल्कि सफर दिखता है। इस यात्रा में तय की गई दूरी नहीं, बल्कि इस काव्य-यात्री की आँखें दिखती हैं। इन आँखों की खिड़कियों में पाठक को स्मृतियां और इतिहास की सतरें दिखती हैं। यह सतरें; पंक्तिबद्ध पेड़ सरीखी हैं। यहाँ कवि को अपना ही सच; लोक कथा जैसा लगता है। इस लोक कथा में इनके पूर्वजों की ज़मीन देखी जा सकती है:
'एक ऐसा गाँव जो चढ़ान पे है
इक्का दुक्का घर हैं
लाल बंजर मिट्टी है
अक्सर मेरे सपनों में आता है।'
(एक ऐसा गाँव)
● इनका लेखन अपवाद का साहित्य है। यह कम दिखते आदमी की काव्य कथा है। शक्ति का यह कम, इनके द्वारा उकेरे गए कमाल-कमाल लोगों में है। यह 'कम' लाहौर, दिल्ली, मनावर और जम्मू की गलियों तक खूब अभिव्यक्त हुआ है:
'यह लोग पानी होते हैं
कहानी होते हैं
सारे झरने, नदियां, समुद्र जहाँ मिलें
यह वहाँ से निकलने वाली
सारे तत्वों की एक महीन धार होते हैं
जो पास ही
किसी जंगली घास में समा जाती है।'
(कमाल कमाल के लोग)
● इनकी कविताओं में आदमी की बेचैनी, तनाव, संताप, अस्पष्टता, स्मृति, शोक, हर्ष और स्वीकारोक्तियां हैं। इनका 'तुम' दरअसल आदमी का 'मैं' है। यह आदमी शक्ति सिंह भी है। 'तुम डर क्यों गए' कविता में वे लिखते हैं:
'तुम जियो ऐसा ही संन्यास
तुम बन जाओ ऐसी मीरा
जिसे कृष्ण से नहीं पत्थर से प्रेम है।'
(तुम डर क्यों गए)
इनका कविता-नायक यह सराप; स्वयं को देता है। ऐसे सराप इतर भी मिल जाएँगे। इनकी कविताई की कुछ अन्य छवियाँ और वृत्तियाँ देखें:
'दीवारों पर फ्रेम लटके है। छवियां कोई चुरा ले गया है।'
××
'यहाँ चाँदनी गिरती है बिजली की तरह',
××
'मर जाते हैं वे लोग
जिन्हें कभी न कभी तो पैदा होना चाहिए था।',
××
'मेरे पास आओ:
भले सदियों पुराना एक वट वृक्ष समझ के
या अपनी मुट्ठी में कसा रुमाल समझ के'
उपरोक्त उद्धरित काव्य पंक्तियों में कुंवर शक्ति सिंह एक समर्थ कवि नज़र आते हैं। इस होने में व्यक्ति की हृदयविदारक पीड़ा, भयावहता, त्रासदी और उम्मीद देखी जा सकती है। यह व्यष्टि से समष्टि की ओर ले जाती हैं। आत्मा पर लिखी यह काव्य पंक्ति, इन्हें आत्मसिद्ध कवि दर्शाती हैं:
'आत्मा पर...
उजालों और फूलों के गहरे दाग़ हैं।'
यहाँ आत्मा को अँधेरे से कोई खतरा नहीं है। इस पर उजालों और फूलों के गहरे दाग़ हैं। इन दाग़ों का कर्जदार हुआ जा सकता है।
● इनका लेखन एक काव्यगत आत्मकथा है, जो एक पिता की स्मृतियों, संतति के वर्तमान और एक स्त्री के सन्धिकाल से स्याही पाती है। यह आत्मकथा वैयक्तिक भावों का जीवनचरित भी है, और इस चरित में अतीतजीविता नहीं बल्कि अतीत से संवाद है।
● कवि द्वारा प्रयोग किया गया एक बिंदु भी मायने रखता है। कविताओं को पढ़ते हुए चिन्हों, स्पेस और फॉन्ट का पाठ भी ज़रूरी है। आलोच्य कवि द्वारा विस्मयबोधक चिन्ह का एक प्रयोग देखें:
'...
जैसे पानी में बहता
पीपल का पत्ता
या उसी पानी के किनारे
एक-दूसरे पर ओक भर-भर पानी फेंकते दो लोग!
कितनी सुन्दर होती है प्रेम की स्वीकृति!
कितना सुन्दर होता है अज्ञात प्रेम!
कितना सुन्दर होता है
प्रेम का शव भी!
जब हम सुन्दर होते है....
तो कितने सुन्दर लगते हैं!'
(कितने सुन्दर होते)
यहाँ 'एक दूसरे पर ओक भर-भर पानी फेंकते दो लोग!', 'कितना सुन्दर होता है, प्रेम का शव!' और 'जब हम सुन्दर होते हैं.... तो कितने सुन्दर लगते हैं!' में प्रयुक्त हुए विस्मयबोधक चिन्ह; परस्पर और सम्मुख स्थितियों में हर्षित, चकित, स्वीकार और साधु होने जैसे अर्थ भाव प्रकट करते हैं।
● इनकी कविताओं को शीर्षक की आवश्यकता नहीं है। यह न भी रखे जाते तो भी फ़र्क नहीं पड़ता। दरअसल स्वगत और एकालाप के अंतर्गत आने वाली यह कविताएँ; उपशीर्षकों की कविताएँ हैं। इनका पाठ उप-उपशीर्षकों में भी किया जा सकता है। इस पाठ में जम्मू-कश्मीर की विशेष मनोस्थिति भी देखी जा सकती है, जो बहुत कुछ कहना चाहती है, मगर पल-पल घटित हो रहे विभाजन के कारण कुछ छूट जाता है:
'सोचा न था
दरवाज़ा टूटेगा
टूटा भी तो अँधेरी कोठरी में से निकला
वही आधा, अधूरा, ठहरा हुआ सब
तुम्हें मालूम है?
मुझे अभी तुमसे कुछ कहना ही था
कि घटित हो गया
एक विभाजन फिर से,
रह गया बाक़ी तुम से... जीने की ज़रूरत कहना!'
(रह गया बाक़ी)
जीने की यह ज़रूरत बनी रहे। एक न एक दिन यह रह गया बाक़ी भी सुना जाएगा। पूरा। शक्ति सिंह के रास्ते प्रशस्त हों। वे जिस भी जगह खड़े हों, इनकी नीवें; इन्हें पुकारती रहें। 'परांस' के इस कवि के लिए अशेष मंगलकामनाएँ! धन्यवाद!
सम्पर्क:
कमल जीत चौधरी
ई मेल : jottra13@gmail.com
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| कुंवर शक्ति सिंह |
कवि परिचय:
शक्ति सिंह कवि-लेखक-पत्रकार और स्तम्भकार हैं। वे फ़िल्म-लेखन से भी जुड़े हैं। इनका जन्म 10 अप्रैल 1979, अखनूर (जम्मू) में हुआ। इन्होंने जम्मू विश्वविद्यालय से फाइन आर्ट्स में बी.एफ.ए की है। लम्बे समय तक 'दैनिक कश्मीर टाइम्स' और 'दैनिक जागरण' में कार्यरत रहे। 'आउटलुक' और 'द संडे इंडियंस' के साथ भी स्वतंत्र पत्रकारिता की। इन्होंने जगजीत सिंह, निदा फ़ाज़ली, रामजेठ मलानी, वी. पी. सिंह, सईद अली शाह गिलानी, राजेंद्र यादव जैसी शख्सियतों का साक्षात्कार किया है। अपनी पत्रकारिता के लिए 1997 में जम्मू-कश्मीर राज्य सम्मान, 2006 में महाराजा गुलाब सिंह मैमोरियल जर्नलिस्ट अवार्ड से सम्मानित हुए। इन्होंने 1994-95 में कविताएँ लिखना शुरू किया। अपेक्षित धैर्य के बाद; 2016 में इनका पहला कविता संग्रह 'शहर जब सो जाता है' शाया हुआ। इस पर इन्हें एक हिन्दी साहित्य मण्डल ने पुरस्कृत भी किया। इसके बाद 2018 में इनकी कविताएँ; जम्मू-कश्मीर की चुनिंदा कविताओं के साझे संग्रह, 'मुझे आई डी कार्ड दिलाओ (स. कमल जीत चौधरी) में प्रकाशित हुईं। 2025 में इनकी चयनित कविताओं का एक चयन भी प्रकाशित हुआ। इन दिनों 'सिविल सोसाइटी अखनूर' और 'प्रेस क्लब अखनूर' में सक्रिय हैं।
कुंवर शक्ति सिंह की कविताएँ
रह गया बाक़ी
दरवाज़ा टूटा है अकस्मात
काली कोठरी में से
निकले हैं वे क्षण हांफते हुए
जिनमें हम खेले थे इकट्ठे, हँसे थे इकट्ठे
और तुम्हारी भावनाओं ने लिया था
मेरे मन का चुंबन
सोचा न था
दरवाज़ा टूटेगा
टूटा भी तो अँधेरी कोठरी में से निकला
वही आधा, अधूरा, ठहरा हुआ सब
तुम्हें मालूम है?
मुझे अभी तुमसे कुछ कहना ही था
कि घटित हो गया
एक विभाजन फिर से,
रह गया बाक़ी तुम से... जीने की ज़रूरत कहना!
कितना सुन्दर होता है...
कितना सुन्दर होता है हमारा सुन्दर होना!
जब हम सुन्दर होते हैं...
तो कितने सुन्दर लगते हैं!
जैसे, तितली, गौरैया, गिलहरी
जैसे पानी में बहता
पीपल का पत्ता
या उसी पानी के किनारे
एक-दूसरे पर ओक भर-भर पानी फेंकते दो लोग!
कितनी सुन्दर होती है प्रेम की स्वीकृति!
कितना सुन्दर होता है अज्ञात प्रेम!
कितना सुन्दर होता है
प्रेम का शव भी!
जब हम सुन्दर होते है....
तो कितने सुन्दर लगते हैं!
बंद करो यह किताब
बंद करो यह किताब
मैं मर चुका हूँ
मुझे मरे हुए दिन, महीने नहीं, बरस हो रहे हैं
बंद करो यह किताब
तुम्हारे दूधिया आँगन की मिट्टी में से
निकले यह किताब
'मुसलमानों के ताबीज़' बन कर
पर इसका इंतकाल चढ़ा नहीं
यह तुम्हें रुला नहीं सकती
हँसा भी नहीं सकती
तुम मायके से लाई थी इसे ससुराल
इसने देखी है तुम्हारी हर रात
इसे शैल्फ से हटा दो
टेबल लैंप बुझा दो
सुबह बच्चों ने स्कूल जाना है
जल्दी सो जाओ
पुरानी एलबम देखता हूँ तो माँ का चेहरा मिलता है शर्मिला टैगोर के साथ
पिताजी लगते हैं गुरुदत्त
तुम अब लगती हो रेखा
भला क्या रखा है
जहाँ अपना ही सच लगे लोककथा
इसे बंद कर दो...
जब सुबह रंगे हाथ पकड़ी जाए
लोग पौने कब होते हैं
आधे कब होते हैं
अधूरे कब होते हैं
निर्वात में कब चले जाते हैं
लोग जीते जी कब मर जाते हैं
लोग मर कर कैसे जीते हैं
यह लोग कप्तान से साधु क्यों बन जाते है
मग़र उम्र भर ईश्वर से नाराज़ रहते हैं!
इनके अंतिम संस्कार में पूरी दुनियां होती है
इनके जीते जी यह रेत के बर्तनों में पानी पीते हैं
यह अपने ही शहर में रहते हैं...
जैसे रेस्तरां में हो कोई पहाड़ी वेटर
यह अपने ही गाँव में रहते हैं...
जैसे इक पागल को समझा जाए गुप्तचर!
यह लोग हमें अक्सर मिलते हैं
सामने से आ रहे होते हैं
किसी गली से
किसी सड़क से, किसी पगडंडी से।
यह लोग हमारे आंखों से आँखें नहीं मिलाते!
यह अपनी नज़रों से
अपनी खोई हुई आँखें ढूँढ़ते हैं!
यह लोग पानी होते हैं
कहानी होते हैं
सारे झरने, नदियां, समुद्र जहाँ मिलें
यह वहाँ से निकलने वाली
सारे तत्वों की एक महीन धार होते हैं
जो पास ही
किसी जंगली घास में समा जाती है।
लोग पौने, आधे, अधूरे
तब ही होते हैं
निर्वात में तब ही जाते हैं
जीते जी तब ही मर जाते हैं
जब सुबह रंगे हाथ पकड़ी जाए
रात के कोठे से!
जब ईश्वर निराश हो जाएँ
और चले जाएँ लम्बी छुट्टी पर।
तुम डर क्यों गए
तुम डर क्यों गए
जब बाहें फैलाए
तुम्हें समुद्र में उतरना था
जब सर्दी के एक निर्मम दिन तुम्हें
अपने तन से लाशों के कपड़े उतार कर
निर्वस्त्र होना था
इस जीवन ने ही तो भाग्य से कहा था
कि सारे विश्वासघातों को विभूति समझ
अपने तन पर लेप लिया है।
फिर तुम डर क्यों गए?
अपने भीतर किसे लगाया है तुमने
अपनी छाती से?
यह कौन है
जिसके पाप तुम छुपाना चाहते हो
जिसके अपराध तुम ने भुला दिए।
तुम जियो ऐसा ही संन्यास
तुम बन जाओ
ऐसी मीरा जिसे कृष्ण से नहीं पत्थर से प्रेम है।
कमाल कमाल के लोग
कमाल-कमाल के लोग
चले गए!
कमाल कमाल के लोग
तुम्हारे घर के पीछे
पार्क में टहल रहे होते हैं
फुटपाथ पर बिछी दुकानों पर
किताबें बीन रहे होते हैं
कमाल-कमाल के लोग
फैज़, नेरुदा, रजनीश को जब चाहें
नींद से उठा लेते हैं
यह कमाल-कमाल के लोग
कहीं सुदूर
जंगली फूल चुन रहे होते हैं
किसी कॉफ़ी हाऊस के कोने में
हल्की मुस्कान लिए
आत्म-संवाद कर रहे होते हैं
फिर वेटर से एक दिन
उस के पहाड़ की कहानी पूछ लेते हैं
कमाल-कमाल के लोग
रेडियो का स्टेशन बंद होने के बाद भी
रेडियो बंद नहीं करते
यह लोग न भेजी हुई
चिट्ठियों के जवाबों की प्रतीक्षा
जीवन भर करते हैं
तुम इन लोगों का माथा चूम लो
इन से किसी फूल सी
या चंदन सी गंध आएगी
यह कृष्ण के
या बुद्ध के दूत होते हैं।
निर्वात
कई भजन, गंगाजल और
पूजा के फूल थे
उसकी आँखों में
बांसुरी की एक तान जैसी थी
उसकी पूरी उम्र,
उसका अस्तित्व उसका जिस्म था
जैसे हवा में उड़ता रंग रूहानी
उसका हर प्रेमी अज्ञातवास में मोक्ष पा लेता था
सबको अपनी मंज़िल सा लगता था
डूबते हुए सूरज की कोई किरण तोड़ लेता था
रातभर के लिए
सपनों की पूरी दुकान थी उसकी
और सांसें किराये पर देता था
कोई कहता है
लाहौर की गलियों से आया था वो
कोई कहता है-
बनारस के घाट से आया था
यहीं इसी जगह रहता था
अब यहां नहीं रहता...
लोग कहते हैं
जिन्न था, लौट गया चिराग़ में
कोई कहता है दिल्ली की झिलमिलाती सड़क किनारे लैंप-पोस्ट के नीचे खड़ा दिखा था
समय के निर्वात से धूल तो उतरे!
शहर जब सो जाता है
शहर जब सो जाता है
मैं सुबह तक पढ़ता हूँ तेरे ख़त
किस्सों के पुतले बना कर रखता हूँ सामने
और दिल से कहता हूँ
तुम्हारा न कहा हर शब्द
ज़िन्दगी इसे ही कहते हैं तो
इक टेढ़ी-मेढ़ी लंबी-छोटी लकीर अगर
कोई बच्चा ही खींच दे
तो क्या करें ख़ुदाओं का
शहर जब सो जाता है
मैं तब सच से पीठ लगाए देखता हूँ झूठ
शहर जब जाग जाता है
मैं तब एक सड़क होता हूँ।
एक ऐसा गाँव
एक ऐसा गाँव
जो चढ़ान पे है
अक्सर मेरे सपनों में आता है
जहाँ मंडी लगती थी
खुशबूदार मसालों की
और इत्र बिकते थे
राजा का जैट लैंड किए था जहाँ
टूट गए हैं पंख जिसके
जहाँ पुराने गुरुद्वारे की डियोड़ी पर
कुछ लोगों को दिखी है
बीबी चाँद कौर
सैंतालीस के बाद जहाँ
ज़मीन से निकले हैं
गड़बा, सुराही...
और कुछ कांसे के कटोरे
जहाँ से पूरी की पूरी बस्ती
हो गई थी विस्थापित
एक ऐसा गाँव जो चढ़ान पे है
इक्का दुक्का घर है
लाल बंजर मिट्टी है
अक्सर मेरे सपनों में आता है।
विद्रोह
मेरा क्या बिगाड़ोगे
मैं तुम से क्या डरता हूँ
यह डर किसी और को दिखाना
मैं तुम्हारे हलक में हाथ डाल कर
खींच लूंगा तुम्हारी अंतड़ियां
और डाल दूँगा तुम्हारे जैसे ही कुत्तों के आगे
यह झूठा तिलिस्म अब किसी और को दिखाना
मेरे साथ है विद्रोहियों का एक बड़ा जत्था
हम मिल कर जला देंगे तुम्हारा शहर
जहाँ सिर्फ़ तुम रहते हो
बाकी सभी तुम्हें सहते हैं
मैंने वे सारे प्रशिक्षण ले लिए हैं
जो होते हैं आत्मघाती
मैंने वे सारी सौगंधें ले ली हैं
जो होती हैं ख़तरनाक
हम तुम्हें ढूँढ़ लेंगे
तुम्हारी खोपड़ी लगाएँगे
किसानों के खेतों में कौओं को उड़ाने के लिए
और तुम्हारा नाम नहीं जुड़ने देंगे
'फिदेल' या 'सद्दाम' के साथ
तुम्हारे नाम का जारी करेंगे
फ़तवा
तुम्हारा नाम नहीं लेने का
तुम्हारा नाम नहीं सोचने का
तुम उलटी गिनती गिनना शुरू करो
चार... तीन... दो...
एक।
(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग्स कवि विजेन्द्र जी की हैं।)
सम्पर्क
मोबाइल : 94196 31196





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