अर्पण कुमार की कविताएँ


अर्पण कुमार


भाषा मनुष्य की वह क्रांतिकारी खोज है जिससे वह एक दूसरे से सटीक अभिव्यक्ति कर सके। हिन्दी के महत्त्वपूर्ण कवि धूमिल का मानना है कि 'कविता, भाषा में आदमी होने की तमीज है'। संवेदनाओं को दर्ज करने वाली कविता हमें सचमुच में इंसान बनाती है। कवि का अनुभव और उसकी सूक्ष्म दृष्टि कविता को वह धार प्रदान करती है जो अन्य किसी विधा में नहीं मिलती। इसीलिए कोई कविता या उसकी कोई पंक्ति तुरन्त मन मस्तिष्क में अपनी जगह बना लेती है। दुनिया का हर कवि कविता को ले कर सोचता है और उसे अपनी कविता में दर्ज करने का प्रयास करता है। 'वे कविता के पास जाएँ' कवि अर्पण कुमार की कविता है जिसमें वे कविता की उस क्षमता की बात करते हैं जो कहीं और नहीं दिखती। रेल यात्रा में जब सारे यात्री सो रहे होते हैं कवि कविता में अपने अनुभव दर्ज कर रहा होता है। कबीर लिखते हैं 'सुखिया सब संसार है, खाए अरु सोवै।/ दुखिया दास कबीर है, जागै अरु रोवै॥' एक कवि के कविता की यह ताकत होती है कि उसे पढ़ते हुए किसी पुरखे कवि की कविता याद आए। अर्पण कुमार के पास उनके निजी अनुभव हैं। कहन का अपना तरीका है जो उन्हें अलग ला खड़ा करता है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं कवि अर्पण कुमार की कविताएँ।



अर्पण कुमार की कविताएँ 


चहारदीवारी से बाहर निकलते हुए


थक जाती हैं आँखें  टिकी-टिकी  

कंप्यूटर स्क्रीन पर  

सीपियाँ चिटकी, टूटी हुईं    

सड़क पर गिरी लीचियाँ कुचली हुईं 

बरसाती नदियाँ सूखी हुईं

सुंदर कोई पेंटिंग बिखरी हुई  


ठंडे पानी के डाल झोंके आँखों में

रक्त प्रवाह बढ़ाता सोते जाँघों में    

निकल आता हूँ  बाहर बंद कक्ष से

गुज़रता तीखे हॉर्न,  भन्नाए लोगों बीच 

ढूँढ़ता कोई कोना, देखता हूँ आकाश 

शांत-शांत 

देखता हूँ पोखर में प्रतिबिंबित आकाश भी  

जिसकी छवि के साथ  हैं  हिलती-मिलती 

लहराते सागवानों की  छवियाँ डोलती

   

मन है प्रसन्न  

निहार उड़ती तितलियाँ 

पकड़ कभी जिन्हें 

पा लेता था अनमोल धन   

याद आती हैं वे अठखेलियाँ 

पुनर्जीवित होता जिनमें बचपन 

एक तितली तभी कह उड़ चली 

कान में कुछ धीरे से 

कि तुमने यह धरती रौंद डाली कैसी 

कि हम अब अल्पसंख्यक हो चलीं 


देखता हूँ 

खजूर, नारियल के फल अच्युत  

जो होंगे कभी किसी को प्रस्तुत  

फ़िलवक़्त जाने-चखे स्वाद की है प्रत्याशा 

रोमांचित, लालायित हो उठती यह जिह्वा  

      

किसी भी समय 

अपना फ़ोटो खिंचवाने को तत्पर

उत्साहित, चुस्त-दुरुस्त गुलमोहर 

रोज़ हुलस कर कहता है मुझसे 

रहूँ चौबीसो घंटे खिले-खिले से 


अँगड़ाई में उठते हाथों की लय

रचती है कोई मनभावन दृश्य 

मिल परस्पर दोनों हाथों की उँगलियाँ  

सिर के ऊपर छत्र बनाती हैं-    

श्रम और श्रम से ब्रेक के बीच

शरीर कुछ हल्का होता है

उजागर होता 

नव-विचार का नन्हा सूरज  

तनाव की बदली में था जो ढँका 


देखी जा सकती है पूरी दुनिया

कंप्यूटर-स्क्रीन पर

मगर मिलना हो 

सच्ची, कच्ची-पक्की दुनिया से

भीतर उतारनी हो उसकी गंध

रचना हो गीत का सार्थक बंध 

आना पड़ेगा  ख़ुले में ही

पनपना, खिलना और मुर्झाना-  

होंगी सभी क्रियाएँ ख़ुले में ही।



वे कविता के पास जाएँ


सड़क पर अभी-अभी 

एक बच्चे ने 

सखुए के पत्ते पर रख खीरा 

गाय को खिलाया 

गाय खा गई वह पत्ता भी

जिसमें रख कर दिया गया था खीरा 

वह भोजन आधा-अधूरा नहीं छोड़ती 


टहलती हुई गाय आ गई थी

सड़क के इस पते पर    

जैसे कोई डाकिया कंधे पर नहीं 

बल्कि अपने पेट में रखे हो 

चिट्ठियों के चार-चार थैले

टहल रहा हो मंद-मंद

निश्चिंत भाव 

किसी को पत्र सौंपने की 

उसे कोई ज़ल्दी न हो


इत्मिनान से खाया 

गाय ने वह प्रसाद

उसकी भूख के हिसाब से 

खीरा प्रसाद ही ठहरा  

कुछ देर खड़ी रही 

सड़क के बीचों-बीच 

फिर आगे बढ़ गई


बच्चे के लिए गाय 

किसी प्रार्थना की तरह आई 

किसी अनुरोध की तरह चली गई  


सड़क के दो किनारे जैसे दो तट हों 

दोनों तटों पर बसी दुकानों बीच 

सड़क किसी बाँकी नदिया की तरह बहती है- 

बच्चा कुछ देर 

जाती गाय को

देखता रहा  

मैं उन दोनों को 

अबोल, अनमोल ऐसे पल  

कपूर की तरह चमकते और उड़ जाते हैं 


जो नहीं हुए इन पलों के गवाह 

दिन-विशेष की उनकी डायरी में 

अहिंसक, आनंददायक ये क्षण 

अंकित होने से रह गए बेशक 

मगर वे निराश न हों  

इस घटना की चर्चा 

उन्हें किसी कविता में मिलेगी; 

कविताएँ ऐसी घटनाओं की 

संचयिकाएँ होती हैं   

वे कविता के पास जाएँ। 



मार्जिन  


बढ़ी होती है मार्जिन टाइम 

कुछ ट्रेनों की

वे धीमे-धीमे या रुकती चलती हैं 

मसलन, कटनी से बिलासपुर तक की अवधि 

पाँच घंटों की है

दूसरे एक्सप्रेस ट्रेनों के लिए

मगर ‘नवतनवा एक्सप्रेस’ के लिए

साढ़े छह घंटों की, 

उत्तर भारत को मध्य भारत से 

जोड़ती यह ट्रेन

कभी, कहीं थम जाती है

सरसराती लंबी कोई सर्पिणी

हठात् रुक जाती है    


ब्रह्म मुहूर्त में ही टूट चुकी थी नींद 

घनघनाए सुबह पाँच बजे मोबाइल अलार्म, 

उससे काफ़ी पहले पड़ गई जागरण की नींव   


कल रात टीटीई ने बताई मार्जिन टाइम की बात

बतौर सवारी मेरी कोफ़्त समझ गई हैं 

सफ़ाई दी उसने पूरे रेलवे की ओर से जैसे        

जिसका नाम अब नहीं याद 

मगर जिसके चेहरे का है कुछ-कुछ अंदाज़  

 

बोगी के फ़र्श की ओर 

टॉर्च जलाते  आरपीएफ़ जवान

चले जा रहे  दूसरे डब्बों की ओर  ले जाती रही हूं तो 

तेज़ कदम छलाँगते हमारा एसी कूपा

जो है अभी अँधेरे में डूबा 

ज़्यादातर सहयात्री  

सोए हैं निश्चिंत जिसमें अभी 


चाय वाले की आवाज़ धीमी 

उसकी बेस्वाद चाय गर्म है


दूर, और दूर दिखती मंज़िल से बौखलाया मैं 

टाइम पास करने की निकालता हूँ कोई जुगत

साँसें गिनता हूँ सोए पैसेंजर्स की,   

तेज़ी से घट रही बैटरी के साथ मोबाइल में 

दर्ज़ कर रहा हूँ अपने ये अनुभव  

जो हो रहे हैं सेव 

बतौर ई-मेल ड्राफ़्ट

क्या यह है कोई कविता जनाब! 


दूधिया रोशनी में पढ़ रहा हूँ 

प्लेटफ़ॉर्म किनारे खड़े 

पेड़ों से झरे 

निस्पंद पत्तों की रेखाएँ 


ट्रेन 

एक घंटे विलंब से 

है पहुँची ‘उमरिया’

मस्त-मस्त थाप देता 

दिखा जहाँ एक ढोलकिया  


सुबह छह बजने को है

घरों, दुकानों, मंदिर, पेट्रोल-पंप की 

लाइट बुझी नहीं अभी   

पेड़ों, टावरों, चिमनियों के पीछे 

फैला क्षितिज ललउँध हो चला है  

ठिसुआया अँधेरा खिसकता जा रहा है

मार खाए बच्चे की तरह चुपचाप 

अधनत गर्दन 

 

सवा छह बजे ‘बीरसिंहपुर’ पहुँच चुकी है ट्रेन 

साफ़-सुथरे जिसके प्लेटफ़ॉर्म पर 

चढ़ते-उतरते पैसेंजर्स 

गिने जा सकते हैं इस समय 

उँगलियों पर; 

काली जींस के बाएँ पॉकेट में 

सफ़ेद कंघी रखा एक नौजवान 

सीट के नीचे और आसपास 

फैले कूड़े हटाता जा रहा है 

पूरी तत्परता से 

उसकी झाड़ू और चाल में फ़ुर्ती है 

कूड़े और अपने पैरों के बीच 

एक समान मार्जिन बनाए

वह बढ़ता जा रहा है कूड़े संग 

बोगी की इस तरफ़ से उस तरफ़;  


मिट्टी में मार्जिन के साथ खड़े पेड़

अपनी फैलती शाखाओं 

और हरियाते पत्तों के साथ

गलबहियाँ करते परस्पर  

पहुँच आकाश में 

पाट देते हैं नीचे की मार्जिन;  

घर की मार्जिन में बनी सीढ़ियाँ  

किसी मकीं को आकाशगामी बनाती हैं

बिछ कर सीढ़ियाँ

पहुँचाती हैं हमें ऊँचाई तक 

वे होती हैं दाई

जिसे है ख़बर हमारे कदम-कदम की,     

छोटे-बड़े मकानों की शृंखलाएँ 

पार करती जा रही है ट्रेन

ज़्यादातर छतों, खिड़कियों पर नहीं है कोई 

मगर मैं हाथ हिलाता हूँ उपस्थित मान उन्हें  

अदेखे, अनजाने  

देखे, जाने हो उठते हैं

     

‘अमलाई’ पहुँचते-पहुँचते 

सूरज आ चुके रौ में 

     

आधे घंटे की देरी से 

साढ़े सात बजे ‘अनुपपूर’ पहुँची ट्रेन 

फ़िलवक़्त सुस्ता रही है, 

अब भी हैं सोए

आधे मुसाफ़िर मेरी बोगी के;    

‘पेंड्रा रोड’ की गुफ़ा से 

गुज़र रही है ट्रेन- 

दौड़ती ट्रेन और स्थिर पहाड़ के बीच 

बनाई गई है जो मामूली-सी मार्जिन

चमकता जिसमें प्रकाश 

बढ़ाता जो बच्चों का उल्लास; 

हरे चने बेचती स्त्री के पीछे-पीछे  

एक मार्जिन से  

छूटती चली जा रही है

हरे चने की गंध; 

सिर के बालों और भौंहों के बीच 

ललाट है कोई मार्जिन  

जो उम्र के साथ बढती है

जैसे-जैसे ग़ायब होते चलते हैं 

सिर के बाल, 


मार्जिन पर ऐसे कुछ और दृश्य 

ला सकता है कवि 

मगर गंतव्य ‘उस्लापुर’ स्टेशन के प्लेटफ़ॉर्म किनारे 

तयशुदा मार्जिन के साथ खड़ी है उसकी ट्रेन 

जहाँ समेटनी है उसे यह यात्रा 


ट्रेन की 

बढ़ी होगी मार्जिन टाइम 

कवि की नहीं।     

 



सुनी कहानियाँ शब्दों में ढालते हुए


मैं चाहता हूँ 

वह मुझसे हमेशा तन कर बोले

रोब-दाब से, 

नाज़-ओ-नख़रा लिए भरपूर   

उसकी बेलौस हँसी की गर्माहट 

फैली रहे चारों ओर  

उसका स्वस्थ, दरमियाना शरीर

ज़ल्दी न खोए अपनी कांति   


मेरे ज़ेहन में बसा है जो उसका रूप 

स्कूल दिनों से   

उसके वर्तमान को 

मैं वहीं से छू पाता हूँ 

ठीक-ठीक आज भी 


वर्षों बाद इधर कुछेक वर्षों से

हो रही है बातचीत उससे-   

जितनी सुनी जा सकती थीं 

वे कहानियाँ सुनीं मैंने उससे 

परस्पर जोड़ते उनके तार 

सुनता हूँ वे क़िस्से कई-कई बार   

अभी बची होंगी कितनी ही कथाएँ 

जिन्हें उसके मुख 

सुनना, गुनना, लिखना है मुझे   


स्कूल में मुझसे रहा बिंधा 

आत्मदीप्त हृदय उसका

इन दिनों है बिंधा  

मेरा लोलुप कथाकार 

उसकी अनथक जिह्वा से 

जिस पर चलचित्र-सी चढ़ी हैं 

गाँव-क़स्बे की सैंकड़ों कहानियाँ 

(जिनमें प्रत्यक्ष, परोक्ष है शामिल वह)         

जिनके आकर्षण-पाश से 

क्या कभी बाहर आ पाएगा

मेरा व्याकुल श्रोता मन! 


आगे की मेरी उम्र कट जाएगी 

सुनी कहानियाँ शब्दों में ढालते

सच्चे पात्रों के माथे झूठ का टीका चढ़ाते 

मिलावटी को ज़रा-सा ख़ालिस बतलाते

मस्तीख़ोर, सीधे-सादे, रंग-बिरंगे 

खोए-खोए, खाए-पीए, अधनंगे 

पात्रों का ब्रह्मा 

स्वयं नहीं कुछ उनके आगे।  



लेकिन निराश नहीं होऊँगा 


मैं बताना बंद कर दूँगा 

छोटा, बड़ा कोई राज़

साझा नहीं करूँगा 

धीर-गंभीर, हल्की-फुल्की कोई बात    

जब नहीं सुनेगा मुझे कोई 


अश्रुत रह जाने का श्राप क्यों कर झेलूँ! 


लेकिन मैं निराश नहीं होऊँगा 

पुतले बना लोगों के  

बाँटूँगा उनसे अपना दुःख-सुख; 


बाहरी ही नहीं 

परिवार के लोग भी लगें जब उकताने, 

नज़रें चुराने और मुँह चिढ़ाने 

सुनते हुए मुझसे 

एक ही सुख़न बारंबार;   


नहीं कोई शिकायत किसी से    

मगर जब कोई एक ही विषय 

मथ रहा हो मुझे बार-बार 

हो गिरफ़्त जिसकी ‘फ़्लो’  में  

मैं उसी ‘द-ज़ोन’ में 

रहना चाहूँ लगातार   

मैं सुनाऊँगा अपनी दास्तान 

किसी-न-किसी को 

फिर चाहे हो वह मेरा साया 

या हों लोगों के पुतले

क्या फ़र्क़ पड़ता है! 

  

पत्नी, प्रेमिका या इक्के-दुक्के दोस्त 

हो व्यस्त अपनी दिनचर्याओं में 

जब फ़ोन उठाना बंद कर देंगे  

उड़ाएँगे मेरा परिहास तरह-तरह से 

जीता-मरता ऐसी स्थिति में 

मैं उतार दूँगा 

कंप्यूटर पर भीतर का महाभारत 

रँग डालूँगा सैंकड़ों पेज 

जो कभी, कहीं नहीं छपेंगे 

जिन्हें कभी, कहीं छपने के लिए 

मैं नहीं भेजूँगा  


मैं मगर लड़ना नहीं छोड़ूँगा 

रणनीतियाँ बनाना भी नहीं 

लोगों के बीच 

चुप रहूँगा 

अपनी किसी रणनीति पर 


ख़ाली समय में 

मैं ऐसे वीलॉग देखूँगा 

जिनमें अफ़्रीकन लड़कियाँ 

वीडियो ब्लॉगर से निःसंकोच माँग रही हैं पैसे  

अपनी तस्वीर खिंचवाने की एवज़ में-   

अच्छा है जा कर वहाँ  

फ़ोटोग्राफ़ी की हुनर बढ़ाई जाए 

मिला जाए ऐसी बिंदास लड़कियों से 

उन्हें चिढ़ाते, उनसे चिढ़ते 

डूबा जाए 

जीवन के आदिम रंगों में,  

वहाँ के सुंदर और हृष्ट-पुष्ट 

बाऊ-बाऊ की शाखाओं पर 

उतरती शाम देखी जाए

ज़िराफ़ की गर्दन पर 

चढ़ती धूप देखी जाए  

भटका जाए मीलों-मील 

उबड़-खाबड़ पथ पर

लटकाए कोई बैकपैक   

     

लोग जब थकने लगें 

मेरी बातों से 

चिढ़ने लगें 

मेरे बारंबार कॉल से 

निकल चुपचाप 

अपने चिर-परिचित परिवेश से

मैं पहुँचूँगा 

किसी अपरिचित देश में 

बंद कर दूँगा जा कर जहाँ 

इनकमिंग-आउटगोइंग कॉल की सेवाएँ 

अपने मोबाइल पर;  

ब्रेक लूँगा परिजनों से 

पहुँच जाऊँगा परायों की दुनिया में 

उन्हें अपना बनाने 

टिकूँगा उनके साथ 

जब तक वे बर्दाश्त कर सकें मुझे 

और फिर निकल पड़ूँगा 

नए, अगले किसी पड़ाव की ओर

अपनायत की मिठास घोले 

ऐसे किसी बर्ताव की ओर।   



सागर ख़ाली हाथ कब लौटने देता है 


एक रुमाल के साथ गया 

अपनी शॉर्ट में 

सागर के तट उसकी गोद में 


लौट रहा हूँ दो रुमालों के साथ 


दूसरी जेब ख़ाली 

अच्छी नहीं लग रही होगी 

दाता रत्नाकर को 

भर दी उसे अपनी रेत से उसने  


हाथ डाले दोनों जेबों में 

मैं लौट रहा हूँ 


घुसा आ रहा है अर्णव 

अर्पण संग 

शहर के अंदर 




सागर, सख़्त-जान अभिभावक


क्या-क्या समोए स्वयं में  

लुभाता कभी डराता है 

पानी का प्रकर्ष,  

सागर बैठाता हमें सहर्ष

अपनी जाँघों पर  

अपनी गोद में  

हम जो सैलानी हैं  

हम जो मछुआरे हैं   

तेज़ अपने थपेड़ों से 

वह ख़ूब करता प्रहार हम पर 


लवण का कोई शरण्य है 

तो वह सागर ही 

पहुँचती दूर तक 

जिसके नमक की गमक   

भगाती जो निगेटिविटी 

हमारे आस-पास की,    

शैवाल या कि सिवार 

मोती या कि मूँगा

झिलमिलाते कितने 

मोहक रंग उसमें  

पनपते, लड़ते, जीते, मरते 

मगर उमंगों से भरे-भरे  

कितने जीवन स्पंदित उसमें 

क्या है किसी के पास 

सागर से बड़ा खजाना!   


बैठिए कुछ देर 

उसकी गोद में 

खींच सकती हैं उसकी लहरें 

हमें अपने अंदर,  

लहर-प्रहार से हमें 

पटखनियाँ देता चलता है सागर   

कई बार बुरी तरह   

छिल जाते हमारे घुटने

हम आते फिर भी 

उसका अलमस्त नाद सुनने  


सागर अभिभावक है

कोई सख़्त-जान अभिभावक  

जो हमें है मज़बूत बनाता 

गाढ़े दिनों के लिए 

हमें है तैयार करता। 



सागर, कोई तपस्यारत ऋषि


सागर की गोद में 

जल-क्रीड़ा करने के लिए 

पहुँचना होता है सागर के तट 

जहाँ तक पहुँचने के लिए

धँसना होता है कई बार  

दूर-दूर तक फैली 

उसकी बालुका-राशि में 

आगे बढ़ना होता है 

धँसते-उठते पैरों से

अपनी बाधित, मंथर गति के साथ    

तपस्यारत जल-ऋषि परीक्षा लेता है  

हमारे आत्मबल की  

दूर तक फैलाए अपने सिर के बाल 


चिर साधक 

कारीगर अनथक 

सागर हमें नहीं 

हमारे साहस, 

हमारी ज़िद को आमंत्रित करता है। 



पारदर्शी, तीखी धूप का आकर्षण 


मैं ग़ायब हूँ 

अधिकाधिक मंचों से


अगर सुनने लगूँ

अपने दोस्त की बात

बचा-खुचा एकाध मंच भी 

बॉयकॉट कर देगा मुझे


जानते हुए यह 

मैं पहुँचता हूँ उसी दोस्त के पास 

जीवन के बीहड़ में ले जाते 

जिसके क़िस्सों की पारदर्शी, तीखी धूप 

मंचों की चमचमाती रोशनी से अधिक 

मोहक और जादुई है

जिसके आगे जोड़तोड़ के सारे समीकरण 

बेस्वाद और बेमानी हैं।       



बचपन की कौंध 


बड़े बच्चों में कौंध उठता है 

उनका बचपन 

जैसे अर्से बाद 

राह चलते दिख जाए 

नीलकंठ पक्षी

मन हुलस उठता है

मूँग-दाल हलवे की मिठास 

भीतर उतरती है 


चेन्नई से पुडुच्चेरी जाते हुए

कल जब उतर रहा था मैं 

एक जगह चाय पीने  

गोद में रखी मेरी कलाई-घड़ी नीचे गिरी 

उसे गिरने से बचाने की कोशिश में 

मैं लड़खड़ाया 

बेसाख़्ता हँस पड़ा मेरा छोटा बेटा 

मालूम कि न मालूम उसे   

उसकी खिलखिलाहट 

मुझे उसके बचपन में ले जाती है


बड़े बच्चों में 

सकारात्मक भावों के साथ-साथ 

स्थापित होने की चिंता, उकताहट 

किसी बात पर क्रोध दिखता है 

जिनके शिकार हैं हम सब भी 


कलाई-घड़ी के गिरने पर 

वह जिस तरह से हँसा 

कुछ देर के लिए

समय बहुत पीछे चला गया

जब कुछ गिरने पर 

उसका लड़कपन 

निर्दोष हँसी हँसता था

जिसकी अनुगूँज में भूल जाती थी 

छोटे-बड़े कई दुःख  

गृहस्थी हमारी 


आगे ऐसे दृश्य और आएँगे 

अलग-अलग चेहरे पहने 

बेटे का बचपन कुछ देर के लिए 

ऐसी कोई कौंध बिखेरेगा हमारे सामने

 

बचपन की दुनिया 

पीछे छोड़ आए बच्चे 

यूँ अनजाने उपहार दे जाते हैं  

जैसे वे लड़ पड़ते हैं, झुँझला उठते हैं 

ग़ुस्से में इन दिनों 

बहुत कुछ सुना जाते हैं

अपने माता-पिता को।  



झन्नाटेदार ताने


1

बुरा लगने पर भी   

किसी अपने के संग 

कुछ और नहीं कर सकती बेशक

इतना बता सकती हो उन्हें  

कथा हो तुम नहीं कोई क्षेपक 

मिले तुम्हें जब भी मौक़ा 

मारो चौके पे चौका 

उफ़नती नज़रों से, 

क्षीप्र शब्द-तीरों से 

किसी कामी का दुःसाहस दुर्बल करो

विवाह में होती ज़बर्दस्ती 

पुरातन समस्या है 

जिसे लगभग अकेले, हो अडिग 

हल करना होता है   

पति है वह नियंता नहीं  

उसकी बाँहें फूल लगें, शिकंजा नहीं

तुम्हारी मर्ज़ी के बग़ैर वह आगे न बढ़े 

जंगली भालू न बने, तुम्हें भयातुर न करे 

अगर फिर भी न चेते वह   

दिखाए उल्टी-सीधी करामात 

नहीं समझे तुम्हारे जज़्बात 

मारो ताने कुछ ऐसे

रह जाए वह कसमसा के 

आक्रांता बिल्ला भागे बिलबिला के 

कि उसके अंदर 

अंगड़ाई लेतीं जंगली लताएँ 

ढीठता और क्रूरता की यूँ मुर्झाएँ 

जैसे उन पर ढेर सारा तेज़ाब 

फेंक दिया गया हो


उकट कर रख दे सब कुछ  

वे शब्द तेज़ाब ही होते हैं।    


2


तुम्हें तोड़नी होगी अपनी छवि 

बेवज़ह मार खाती स्त्री की  

छोड़ लघुतर होने का भाव 

बढ़ना होगा ले अपनी नाव  

प्रत्युत्तर की आँच करनी होनी 

तुम्हें तेज़ इतनी  

कि मज़े लेने की नीयत से आते 

परिजन, पड़ोसी पास न फटकें तुम्हारे   

दुम दबाए भागें किसी ठौर और के।   


3


तुम्हारी माँ, मौसी, बहन, सास, ननद, बेटी 

तुम्हारे पिता, भाई, ससुर, पति, प्रेमी, बेटा 

जो कोई हो वह

अगर तुम्हें नहीं दे रहा सम्मान 

उनके लिए खटने की 

नहीं ज़रूरत दिन-रैन    

लो तनिक भी नहीं 

तुम उनका संज्ञान

तुम नहीं कोई बंधुआ मज़दूर 

तुम्हारा घर है यह, 

नहीं कोई कोयला ख़दान


इकतरफ़ा करते, सोचते सबके लिए

तुम पचास छूने को आई 

लेकर यू-टर्न जीवन-पथ पर 

अब तुम्हें 

सम्मान की धूप पीनी है

ख़ुली हवा में साँस लेनी है  

जानता हूँ 

पशु से भी बदतर हुए हैं 

तुम्हारे संग बर्ताव  

कर स्थिर मन 

भूलने की कोशिश करो 

वे पुराने घाव

मगर भूलो नहीं उनको 

जो सूत्रधार हैं, गुनहगार हैं  

इस दलदल में तुम्हें फेंकने के  

अगर कभी आ जाएँ 

मायके के वे लोग तुम्हारे दर 

मत माफ़ करना उन्हें

बेलिहाज रहना हर हाल निडर 

हैं ये वही लोग 

जिन्होंने बोझ मान तुम्हें 

असमय ढकेला अंधकार में  

अवयस्क को बना विवाहिता 

मुख से उसके तेज़ छिना  

अरमानों के गोटे सजी उसकी चदरिया 

छिन्न-भिन्न कर डाली 

हरदम मुस्कुराती कली 

व्यथित, खिन्न कर डाली   


तुम्हारे ख़िलाफ़ 

जो गोलबंद हुआ तूफ़ान था 

ये उसी तूफ़ान से निकली 

जहरीली, कमीनी हवाएँ है  

इन्हें एक कप चाय देना भी 

तुम्हारे धैर्य का है अपमान 

रूठता, चिढ़ता होता हो, हो उनका प्रस्थान।  


4 


घरेलू हिंसा सहती आई स्त्री 

ले सकती है कड़े फ़ैसले भी  

चलते हैं लंबे दौर 

नाराज़गी के चलें  

कुछ छुपाने की नहीं ज़रूरत 

जानते हैं लोग जानें  


साहस भरे छोटे उछालों से  

तुम्हें गढ़ने होंगे दृश्य अभिनव

असंभव करना होगा संभव   

लोग समझें कि 

तुम सिर्फ़ औरों के लिए नहीं 

स्वयं के लिए भी 

जीना जानती हो

ज़हर कभी पिया था तुमने 

अब ज़हर पचाना जाती हो      

तुम्हें गति लानी होगी  सोच में,

स्वभाव में  

समय परीक्षा ले कैसी भी 

न टूटे कड़ी मनीषा की 

समेटे रहना है स्वयं को 

हर बिखराव में  

चमकाती रहो अपनी पाँखें, 

अचिंतित लेती रहो साँसें  

चलना न छोड़ो, 

लंबी चाहे सूनी हो राहें    


त्यागना होगा तुम्हें 

आत्महत्या का लिजलिजा विचार 

निकाल फेंकना होगा 

कोई चिपचिपा ख़याल 

मुक्ति नहीं ढूँढ़ने होंगे उपाय  

तभी छठी मइया भी होंगी सहाय 

बदलना होगा अपना ‘थिंकिंग पैटर्न’ 

भूलकर कष्ट 

रहे हों वे जितने भी स्पष्ट

जीना होगा तुम्हें शेष जीवन    

किसी उत्सव की तरह

वरदान है जो, सँभालो जिसे 

किसी वैभव की तरह।  


5 


बन जाए तुम्हारा यथार्थ 

जब कोई ज्वलनशील पदार्थ 

उसमें जलने, जलाने से बेहतर है 

लिया जाए सहारा अभिनय का 

सच जब हो जाए असहनीय 

जिया जाए 

नाटक के किसी किरदार की तरह; 

समय पर काम नहीं आनेवालों से 

किनाराकशी करते 

नए सच्चे  दोस्त बनाए जाएँ;  

अपने उतर आएँ अगर हरामीपन पर 

उन्हें हरामी कहने से 

परहेज न करना होगा

अशिष्ट ऐसे उद्गार पर 

खेद न करना होगा  

वास्ता कोई न रखते उनसे 

तुम्हें आगे बढ़ना है- 

कि वे तकते रह जाएँ तुम्हें  

और मान लें कि सचमुच 

किसी और मिट्टी की बनी हो तुम

थक-हार कर, खा-खा थपेड़े    

हर बार मगर कुछ नए ढंग से

आ दुष्टों के सम्मुख 

हुई खड़ी हो तुम 

स्वयं ही स्वयं को जनी हो तुम 

रचे दुर्भाग्य कैसा भी चक्रव्यूह 

तनी थी, तनी हो तुम


वे जान लें तुम्हें     

कि बदल सकती हो तुम 

कभी भी रूपाकार अपना

पूर्णतः न मिले गर 

अधूरा ही सही 

कर सकती हो साकार सपना 


इस बीच 

वे बरसाएँगे ख़ूब सारे ताने 

तानों के बदले 

तुम्हें लौटाने होंगे ताने  

ताने हाँ कई ताने

झन्नाटेदार ताने


सीधे छिड़क बीज

उगाते हैं धान बोगहा 

हो अटूट जितना भी 

तोड़ा जा सकता है पगहा  

भर लंबे डग 

कहीं पहुँच सकते 

कोमल कदम 

कब किसे मिल जाए 

उसके हिस्से का सर्वोत्तम!  

अकस्मात् किसी सुबह 

ख़ोली जा सकती हैं 

जकड़ी खिड़कियाँ 

कभी न्योता 

जा सकता है उजियारा।      



प्रेम-संवाद में कविता


जो कविताएँ तुम पर नहीं लिखी गईं 

उनमें भी तुम हो

कैसे? 

ऐसे कि वे कविताएँ 

तुम्हारी संगति में बनीं 

बारिश और धरती की संगति में 

जैसे बनते हैं बुलबुले 

मगर, बुलबुले तो ज़ल्दी नष्ट हो जाते हैं   

हाँ, मगर कविताएँ नहीं 

तुम स्वयं मानती हो कि 

एकांत में तुम्हें 

कविताएँ पढ़ना, सुनना पसंद हैं    

मुझे तो बुलबुले बनते और 

मिटते देखना भी अच्छा लगता है 

मगर, उनसे तुम्हें कोई ताक़त मिलती है? 

नहीं  

और कविता सुनने से?  

मिलती हो शायद

अच्छा लगता है

कुछ बदलता है 


प्रेम-संवाद में 

संभव हुई यह कविता 

अंततः 

बच गई

बुलबुले की क्षणिकता से।   


(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग्स कवि विजेन्द्र जी की हैं।)


परिचय 

चर्चित कवि, कथाकार, संस्मरणकार और आलोचक। विभिन्न विधाओं में किताबें प्रकाशित। कई पुरस्कारों से सम्मानित। राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय गोष्ठियों में शिरकत। ‘प्रति-संसार’ नाम से ‘पाखी’ में चर्चित कॉलम।        

'नदी के पार नदी', 'मैं सड़क हूँ’, 'पोले झुनझुने', 'सह-अस्तित्व', 'नदी अविराम' कविता संग्रह, 'पच्चीस वर्ग गज़’ शीर्षक से उपन्यास एवं आलोचना की दो पुस्तकें प्रकाशित। कहानियाँ और संस्मरण विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित। ‘प्रति-संसार’ नाम से ‘पाखी’ पत्रिका में स्तंभ लेखन।  

जन्म : 14 फरवरी 1977    

कविता-संग्रह :

नदी के पार नदी (2002), मैं सड़क हूँ (2011),  पोले झुनझुने (2018), सह-अस्तित्व (2020), नदी अविराम (2022)


उपन्यास :

पच्चीस वर्ग गज़ (2017)


आलोचना/संपादन : 

‘आत्मकथा का आलोक, ‘मैंने जो जिया’ (उद्भ्रांत) पर चतुर्दिक विमर्श’ (2020)- संपादन   

‘सर्जना के आयाम : सर्जक उदयभानु पांडेय’ (2022)

सुदीर्घ आलोचनापरक आलेख विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित।

कथेतर गद्य :

कुछेक यात्रा-संस्मरण प्रकाशित। 


संयोजन/संपादन :

जनसुलभ पुस्तकालय (साहित्यिक-सांस्कृतिक मंच)

जनसुलभ पुस्तकालय कहन कोश (साहित्यिक-सांस्कृतिक मंच)

रवि वार्ता (साहित्यिक-सांस्कृतिक मंच)


प्रसारण :

*कविताएँ/कहानियाँ आकाशवाणी के नई दिल्ली, जयपुर, बिलासपुर एवं गोरखपुर केंद्रों से प्रसारित। 

* दूरदर्शन के जयपुर और जगदलपुर केंद्रों से कविताओं का प्रसारण।  

* रचना केंद्रित संवाद, दूरदर्शन के जगदलपुर केंद्र एवं पत्रिका टीवी, जयपुर से प्रसारित।


स्तंभ-लेखन : 

'पाखी' पत्रिका में 'प्रति-संसार' नाम से नियमित स्तंभ-लेखन। 

विशेष रुचि (फ़ोटोग्राफी) : 

विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं और पुस्तकों के आवरण में चित्रों का उपयोग।


संपर्क : 


मोबाइल नंबर : 9413396755 

ई-मेल :  : kumararpan1977@gmail.com 

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